शनिवार, 26 मार्च 2022

तांगे का घोड़ा

 

(संजय भट्ट)
वैसे तो आजकल की औलादों को पता भी नहीं होगा कि तांगा नाम की कोई सवारी होती होगी और कोल्हू कोई बैल से चलकर तेल निकालने वाली मशीन। गलती उनकी भी नहीं है, यह कलयुग का प्रभाव है कि हर तरफ सिर्फ मशीन ही मशीन दिखाई देती है, कोई बिजली से चलने वाली तो कोई पेट्रोल-डीजल से चलने वाली। हां पर हम तो उसी जमाने के हैं, जिन्होंने यह देखा है- ‘‘तांगे में फिल्मों का प्रचार’’ और सवारी के लिए जिद्दोजहद। वैसे तो सवारी उस जमाने में कम ही हुआ करती थी, क्योंकि लोगों की टांगों में किसी पहिए का रोग पैदा नहीं हुआ था। इसी तरह कच्ची घनी (कोल्हू) चलाने के लिए बैल का उपयोग किया जाता था। दोनों ही उपकरणों में घोड़ा और बैल का उपयोग किया जाता था। इनकी एकाग्रता और ध्यान भंग न होकर जैसे चलाना चाहो वैसे चलाने के लिए आंखों पर एक खास किस्म का पट्टी बांधी जाती थी। जिससे इन दोनों जानवरों का ध्यान भंग नहीं होता था, क्योंकि इनके आसपास क्या हो रहा है, कौन क्या कर रहा है, कुछ दिखता ही नही था। जब कुछ दिखता नहीं था तो कुछ समझने की जरूरत ही क्या थी। तांगे के घोड़े को मालिक का चाबूक और लगाम का इशारा चलाया करता था और कोल्हू के बैल का एक ही मार्ग होता था गोल घूमना।
अब तांगे और कोल्हू रहे नहीं लेकिन घोड़े और बैल भी अब भी है। इनमें से कई तो पढ़े लिखे और अच्छा जॉब भी कर रहे हैं, लेकिन इन्हें भी अपने काम से फुरसत नहीं होने के कारण जो दिखाया जा रहा है बस वही देख कर आगे चले जा रहे हैं। इनका भी मार्ग अपने घर से निकल कर ऑफिस और नौकरी की जिम्मेदारी से घर के धनिया पुदीना तक सीमित हो गया है। अपनी समझ से पढ़ाई कर ली अच्छी नौकरी हांसिल कर ली और नहीं भी मिली तो सोशल मीडिया पर जिन्दगी बसर कर ली। पिताजी की नौकरी थी तो पेंशन और बिजनेस है तो उसके सहारे घर का काम तो चल ही रहा है। अब इन घोड़ों की हालत तांगों में लगने वाले घोड़े से थोड़ी अलग तो होगी ही, क्योंकि ये मानव प्रजाति के घोड़े हैं। इनको चाबूक से नहीं हंकाला जा रहा है, लेकिन इन्हें सवारी तो इतनी ही ढोना है। ये अपनी मर्जी से आंखों पर पट्टी बांध कर सिर्फ एक तरफा देखने का प्रयास करते हैं, ऐसा नहीं है, लेकिन इनकी मजबूरी है। इनकी बौद्धिक क्षमता को इतना साफ सुथरा कर दिया है कि इन्हें जो दिखाया जा रहा है या समझाया जा रहा है, ठीक उसी पर अपना फालोअप करते हैं। इन्होंने अपना ग्रेजुएशन किसी भी कॉलेज से किया हो लेकिन व्हाटसएप्प युनिवर्सिटी से इनके पास तांगे का घोड़ा होने का डिप्लोमा जरूर होता है। ये फेक्ट्स एंड फाईल और चैक एंड बैलेंस के फार्मूले को समझते ही नहीं है। इन घोड़ों पर हिप्नोटिज्म का इतना असर होता है कि यह कुछ सोंचते ही नहीं बस अपने मालिक के हंकाले गए रास्ते को ही स्वर्ग की सीढ़ी समझते हैं और चढ़ते रहते हैं।
दरअसल इनकी कोई गलती नहीं होती। इन्हें सिर्फ और सिर्फ एक ही प्रकार की चंदी और एक ही प्रकार मार्ग दिखाया जा रहा है। दूसरा मार्ग सामने आ भी जाए तो इनके मालिक इतने शातिर हैं कि इनको तुरंत दूसरी चंदी दिखा कर इनका रास्ता बदल देते हैं। इनको कुछ भी नजर नहीं आने देते। चाहे जो मुद्दे हो, इनसे जुड़े हो, इनकी बेहतरी से जुड़े हो लेकिन मालिक प्रति वफादारी का ऐसा पाठ पढ़ाया जाता है कि यह उसके अलावा किसी की सुनने और देखने का विचार भी मन में नहीं लाते। एक मालवी भाषा की कहावत है ’’नांचे कूदे वांदरी और खीर मदारी खाए’’ बस यही हालत इन घोड़ों की है। यह नाच गा कर माहौल पैदा करते हैं और इनके मदारी अपना मजमा जमा कर पैसा इकट़ठा करने में लग जाते हैं। इनकी खुद से बांधी पट्टी इनको कहीं भी अन्य देखने और सुनने से वंचित कर समझने से भी वंचित कर देती है। अब तांगों की जगह मैट्रो, ई बस, ऑटो के साथ ही कैब ने ले ली हो, लेकिन इनके घोड़े अब भी समाज में इनका एहसास करवा देते हैं। वैसे ही तेल कारखानों में कोल्हू बिजली से चलने लगे हो, लेकिन इनके बैल आज भी मौजुद है, जो सिर्फ एक ही गोले में घूमते रहते हैं अंधभक्त की तरह।  


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Very nice

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