सोमवार, 27 फ़रवरी 2023
गुब्बारा और बुलबुला
गुब्बारा और बुलबुला दोनों हवा के साथी है। जब तक हवा रहेगी दोनों का अस्तित्व रहेगा, लेकिन जैसे ही हवा विपरित हुई दोनों का वजूद खतम हो जाता है। गुब्बारे में हवा भरी जाती है उसमें अपनी हवा सहने की ताकत होती है। वह अपने अन्दर हवा को इस तरह ढंक कर रखता है कि गुब्बारा तो दिखाई देता है, लेकिन इसमें भरी हवा को सिर्फ मेहसूस किया जाता है। गुब्बारे और हवा का अनोखा रिश्ता है। गुब्बारा जैसे ही बेवफा हुआ हवा निकलने लगती है। छोटा सा छेद भी उसे रास्ता प्रदान कर देती है। हवा कभी गुब्बारे के लिए वफादार नहीं होती, वह कैद होती है, इसलिए कैद से छूटने के बहाने ढूंढने लगती है। गुब्बारा यही सोंचता है कि हवा को अपने प्यार की कैद में रख ले, जिससे उसका वजूद कायम रहे, लेकिन हवा कैद से बाहर निकलने का रास्ता खोजती है, क्योंकि हवा के सारे साथी बाहर होते हैं तथा वह कुछ ही मात्रा में गुब्बारे के अंदर समाहित होती है। जो हवा उसकी साथी बन कर या उसकी कैद में रहकर उसका साथ देती है वह ही हवा अपना बहुमत बढ़ते देख और बाहर वालों का साथ मिलने पर गुब्बारे को धमाके के साथ फोड़ देती है।
रविवार, 26 फ़रवरी 2023
अपने वाला आदमी
वह सभी के काम आता था। किसी की भी कोई भी परेशानी हो दौड़ जाता था। हर समस्या में आगे रह कर समाधान करने का शौक था। वह सभी को अपने वाला आदमी समझता था। लोग उसकी इस बेवकुफी कहें या सज्जनता का भरपूर लाभ लेते थे। उसका नाम समाज में देवता पुरूष था, लेकिन वह ऐसा देवता था जो सिर्फ वरदान देने का काम करता था। उसकी कोई आराधना तब तक ही करता था, जब तक कि उससे काम हो, लेकिन वह इस बात को नहीं मानता था। निष्काम भाव से सभी की पीड़ा में सहयोगी बन कर सामने आ जाता था। उसके रहने मात्र के प्रभाव से लोगों की समस्याओं का समाधान हो जाता था। वह यही समझता था कि किसी का सहयोग करने से जरूरत पर उसके सहयोग के लिए इतने हाथ होंगे कि गिनती कम पड़ जाएगी। हांलाकि वह भगवान से प्रतिदिन यही मांगता था कि उसका और उसके अपने वालों का जीवन बाधा रहित हो तथा कभी किसी की मदद की जरूरत नहीं पड़े।
जब से समाज सभ्य हुआ या सभ्यता का चौला ओढ़ कर समाज घूम रहा है तब से बिना किसी की मदद के कोई भी जीवन नहीं जी सकता है। चाहे कितना ही आत्मनिर्भर होने का दंभ भरे लेकिन कहीं न कहीं दूसरे की सहायता की जरूरत पड़ ही जाती है। जो व्यक्ति सभी की छोटी-बड़ी जरूरत में मदद करता है, उसको कभी कोई छोटी जरूरत कम ही पड़ती है, लेकिन जब भी पड़ती है, उसका विश्वास तोड़ने के लिए काफी होती है। वह मौके पर अपनी मदद नहीं करने वाले के बहानों को उनकी मजबूरी समझ कर माफ कर देता था, यही उसकी गलती थी। उसके मन में परायेपन का भाव कभी आया ही नहीं वह हमेशा सभी को अपना ही समझता रहा। समस्या का समाधान करने वाले को कोई समस्या नहीं आए और वह बिना मदद हल हो जाए यह संभव नहीं है।
काम तो एक दूसरे से पड़ते ही रहते हैं, लेकिन वक्त पर काम आने वाले बिरले ही होते हैं। मौत के बाद मातमपूर्सी पर आने वालों की संख्या जरूरत में काम आने वालों की संख्या से हमेशा कम ही होती है। व्यक्ति की हैसियत के हिसाब से समाज में उसका स्थान तय होता है। उसने कभी घर, परिवार, बच्चों, और समय की परवाह किए बगैर सभी की खुल कर मदद की। उसको मिलने वाले झूठे सम्मान से उसके मन में यही विश्वास रहा कि सभी अपने लोग है। उसने किसी की भी समस्या हल करने के बाद या पहले यह नहीं पूछा कि इसमें उसका क्या लाभ होगा। दूर-दूर तक उसकी इस छवि के कायल थे लोग, मिलने पर प्रशंसा करते कि वह नेक इंसान है, लेकिन यह वास्तविकता से कोसों दूर का मामला था। सभी उसकी मदद का फायदा लेना चाहते थे, क्योंकि मुफ्त में होने वाले लाभ को भला कौन छोड़ना चाहेगा।
समय का पहिया कभी भी एक जैसा नहीं चलता है, वह कभी कभी उल्टा भी घूमता है। अब वे अपने पद पर नहीं रहे। सेवाकाल पूर्ण हो चुका था, सभी ने बड़े जोर-शोर से विदाई कर घर तक पहुँचाने का काम अच्छे से किया था। कुछ समय बाद उनको अपने काम से ऑफिस जाने का अवसर मिला। उनको बड़ा गुमान था सब अपने वाले ही है, चुटकियों में काम हो जाएगा। बदलते समय का एहसास नहीं था। वह ऑफिसर जिसके सैकड़ों काम विश्वास पर किए थे, वह आज बैठने के लिए कुर्सी तक नहीं दे रहा था। वह मातहत जो कल तक खड़ा रहता था आज टेबल पर पैर रख कर बैठा था और बोल रहा था काम तो हो जाएगा, लेकिन मेरी दक्षिणा का क्या होगा। आज उनके विश्वास को उन्होने घायल अवस्था में तड़पते देखा था, जिन्हें वे अपने वाला समझ कर सारे काम बिना कुछ पाने की उम्मीद में करते थे, वह अपने वाले भी पराए ही निकले। उन्हें एहसास हो गया था कि वह मान-सम्मान वह झूठा अपनापन, वो प्रशंसाएं सारी पद की थी। अब वे किसी काम के रहे नहीं तो उनके काम कौन आएगा।
-संजय भट्ट
सोमवार, 20 फ़रवरी 2023
प्रक्रिया में उलझे काम
काम करने के सौ बहाने और नहीं करने का एक, लेकिन वह एक क्या है, जिससे सारे बनते काम बिगड़ जाते हैं। बहुत कोशिश के बाद पता चला कि वह एक काम है- प्रक्रिया। हमारे यहां सारे काम प्रक्रिया से ही पूर्ण होते हैं। कोई भी काम हो उसमें प्रक्रिया की उलझन हमेशा से रही है, लेकिन ये किसी को पता नहीं कि प्रक्रिया जितना काम सुधारती है, उससे कहीं अधिक काम को बिगाड़ देती है। प्रक्रिया में उलझ कर काम या तो समय सीमा में नहीं हो पाता है या उसको करने वाला परेशान हो जाता है। जब मामला ज्यादा उलझ जाता है और सभी प्रक्रिया में उलझ कर उल्टा सीधा कर बैठते हैं तो उस प्रक्रिया को बदल दिया जाता है। समय बीत जाता है लेकिन प्रक्रिया कभी पूर्ण नहीं होती। काम सामाजिक हो या सरकारी सारे प्रक्रिया के अधीन ही होते हैं।
मेरे दोस्त को एक लड़की पसन्द थी दोनों एक दूसरे को अच्छे से जानते थे, लेकिन विवाह अभी प्रक्रिया अधीन था। ऐसा नहीं है कि दोनों के माता-पिता इस विवाह को करना नहीं चाहते थे या दोनों को विवाह को लेकर कोई परेशानी थी, लेकिन विवाह सामाजिक और धार्मिक प्रक्रियाओं के अधीन उलझ रहा था। उमर बीतती चली जा रही थी, लेकिन प्रक्रिया है कि पूर्ण होने का नाम नहीं ले रही थी। लड़के को लड़की पसन्द थी और लड़की को लड़का लेकिन दोनों के मॉं-बाप चाहते थे कि एक बार परिवार के सदस्य घर-बार देख लें और सारी बातें बड़े बुजूर्गों के बीच तय हो जाए तो शादी का क्या है कर ही देंगे। इस सभी के बीच यह भूल रहे थे कि शादी लड़के-लड़की की करना है, घर की नहीं। फिर ऐसा भी नहीं कि लड़का अपने मॉं-बाप की सेवा में घर पर ही रह रहा हो। वह अपनी नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर में रहता है वहीं दोनों को रहना है, लेकिन फिर भी परिवार की स्वीकृति की घर-बार देखने की प्रक्रिया को पूर्ण होना जरूरी है, यह नहीं हो तो विवाह की क्या गारन्टी कि वह सही होगा। अब जब तक प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो विवाह अटका रहेगा। इस बीच दोनों को लगा कि प्रक्रिया में उलझ कर जिन्दगी को तबाह करने से अच्छा है कि विवाह कर लिया जाए। दोनों ने अपने दोस्तों को बुलवाया और रजिस्टर्ड मैरिज के साथ मंदिर में फेरे ले लिए। दोनों के माता-पिता को बात पता चली तो मसला गम्भीर हो गया। डपटते हुए कहा क्या हम तुम्हारे इस विवाह के खिलाफ तो थे नहीं बस कुछ सामाजिक प्रक्रियाएं हैं उनका ही पालन कर रहे थे। इतनी भी क्या जल्दी थी। अब देखो प्रक्रिया पूर्ण नहीं हुई तो समाज में सब लोग बाते बना रहे हैं, तुम्हारी बुआ और फुफाजी मुँह फूला कर घूम रहे हैं। समाज में थू-थू हो गई। सारी इज्जत का बेण्ड बज गया। इस मामले में सभी को इज्जत और प्रक्रिया की पड़ी थी, किसी को भी लड़के-लड़की की उम्र निकल जाने की फिक्र नहीं थी। खैर यह सामाजिक प्रक्रिया का मामला था जो निपट गया, लेकिन सरकारी प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो तो खासी परेशानी आ जाती है।
सरकारी प्रक्रिया सामाजिक प्रक्रिया से भी खतरनाक है। सरकारी प्रक्रिया पूर्ण करते-करते आपके जूते घिस जाए या बचपन का काम बुढ़ापे तक नहीं हो किसी को चिन्ता नहीं बस प्रक्रिया के बगैर कोई काम नहीं होता। एक व्यक्ति लायसेंस बगैर वाहन चलाते हुए पकड़ा गया। पुलिस ने पूछा लायसेंस नहीं है तो वाहन क्यों चलाते हो। व्यक्ति सीधा-सरल था कहा साहब लायसेंस प्रक्रिया में है। अच्छा तो रसीद ही दिखा दो, व्यक्ति ने कहा वही तो नहीं है। फिर कौन सी प्रकिया में है। विस्तार से समझाया कि भटकने और भटकाने की प्रक्रिया में मामला उलझा हुआ है। लायसेंस बनाने के लिए एप्लाई किया तो आधार कार्ड मांगा, आधार कार्ड के लिए एप्लाई किया तो जन्म प्रमाण-पत्र की मांग की गई, जन्म प्रमाण-पत्र पैदा होने के समय बना नहीं था। वह जमाना ही ऐसा नहीं था कि जन्म प्रमाण-पत्र बने घर में जन्म हुआ तो क्या प्रमाण और क्या प्रमाण-पत्र। फिर कहीं से पता चला कि जन्म प्रमाण-पत्र अब भी बन सकता है, लेकिन जन्मतिथि का प्रमाण हो ऐसा कोई दस्तावेज प्रस्तुत करना पड़ेगा। वह दस्तावेज ही नहीं है तो क्या किया जा सकता है। ऐसे दस्तावेजों में उलझी हुई प्रक्रिया है। इसलिए प्रक्रिया अधीन मामला है। सरकारी काम के लिए जहां कहीं भी जाओ मामला प्रक्रिया अधीन ही रहता है। काम होता नहीं बस एक बोर्ड लगा कर घुमना पड़ता है, कार्य प्रगति पर है, प्रक्रिया पूर्ण होते ही काम पूर्ण हो जाएगा।
मकान बनवाना था। मकान पुश्तैनी था, लेकिन काफी पुराना और जर्जर हो गया था। उसे बनवाने के लिए धन तो था नहीं लोन की सलाह मिल गई। मकान के लोन के लिए एप्लाई किया, ये फोटो कॉपी वो फोटो कॉपी, यह प्रमाण-पत्र वह प्रमाण-पत्र सब इकट्ठा किए गए। सर्वे करने वाले सर्वे भी कर गए। सारी जानकारी ली गई, लेकिन फिर वही प्रक्रिया की परेशानी में मामला अटक जाता। अपनी नौकरी के आधे समय में किए गए लोन के एप्लाई का नतीजा रिटायरमेंट के बाद आया कि पुश्तैनी मकान पर लोन नहीं मिलता जब तक वह आपके नाम का नहीं हो। बार-बार तलाश करने पर एक ही जवाब मिलता आपका काम हो जाएगा, बस प्रक्रियाएं पूर्ण कर दीजिए। आखिर थक हारकर रिटायरमेंट की राशि से मकान ठीक करवाना पड़ा।
जिन्दगी खप गई तब कहीं जाकर एक छोटा सा सबक मिला कि काम करने के सौ तरीके लेकिन काम नहीं करने का एक तरीका और उस तरीके का एक छोटा सा नाम प्रक्रिया। भगवान से प्रार्थना करो कोई भी काम कभी प्रक्रिया में नहीं उलझे। नहीं तो यदि आप ईमानदारी का तमगा अपने सिर पर लेकर घूम रहे हो तो इस उलझन का को तोड़ कर भी बाहर नहीं आ सकते हो।
-संजय भट्ट
शनिवार, 11 फ़रवरी 2023
पति पत्नी और बिजली
दो दिन से पति और पत्नी के बीच बोलचाल बंद थी। कारण रही बिजली, जो आजकल के जमाने में सबसे जरूरी आवश्यकता बन गई है और उसका कोई वैकल्पिक तोड़ भी अभी तक नहीं मिल पाया है। बात सिर्फ इतनी सी थी कि पति और पत्नी सुबह-सुबह अपने कामों में व्यस्त थे और बिजली चली गई। अब बिजली चली गई तो काम सारे ठप्प हो गए। कामकाजी व्यक्ति और ऐसे में बिजली चली जाए तो कितना दुख होता है, इसका अनुमान लगा पाना मुश्किल है। सुबह का समय बच्चों को नाश्ता बना कर देना, पति का टिफिन तैयार करना, ठंड के सीजन में नहाना सब कुछ तो बिजली से चलने वाली मशीनों पर आधारित हो गया है। अब बिजली नहीं तो कोई काम नहीं। काम नहीं तो समस्या ही समस्या।
जैसे ही बिजली गई, पत्नी ने पति से पूछा 'क्यों जी यह बिजली क्यों चली गई' पतिदेव ने भी सहज भाव से उत्तर दिया कि मेरी नौकरी बिजली विभाग में नहीं है। इतना सुनते ही काम प्रभावित होने से झल्लाई पत्नी ने कहा- आपको तो सीधा जवाब आता ही नहीं, कुछ भी पूछो जवाब उल्टा ही दोगे, मुझे क्या पता था, मैंने आपसे पूछा ही क्यों। खुद से सवाल करती पत्नी ने कहा-यह नहीं कि आस पड़ौस में पूछ लें,जरा पता ही कर लें कि उनके यहां भी बिजली बंद हुई है या सिर्फ अपने यहॉं ही गई है। फ्युज वायर कुछ चैक कर लें। सीधा उठा कर कह दिया कि बिजली विभाग में नौकरी नहीं है। बिजली विभाग में नौकरी होती तो भी कौन-सा तीर मार लेते। तुम्हारे कहने से बिजली आ जाती। पत्नी को गुस्सा इस बात पर आ रहा था कि उसने मिक्सर में सब्जी के लिए मसाले पीसने के लिए डाले थे और इधर तेल गरम होने रख दिया था।
इस समय तेल से ज्यादा गरम पत्नी का माथा हो रहा था, क्योंकि टाइट शैड्युल में थोड़ी सी देर भी लम्बी हो जाती है। एक काम प्रभावित हो तो सारे काम प्रभावित हो जाते हैं। तभी उसने पडौस में चलते हुए मिक्सर की आवज सुन कर खिड़की से झांका तो बिजली को चालू देख लिया। अब पत्नी का गरम माथा लावा उगलने को तैयार था। लावा निकला भी लेकिन उसे क्या पता था यह भी फुस्सी बम निकलेगा। उसने पति से ईर्ष्या भरे भाव के साथ कहा अपने यहां बिजली बंद और पड़ौस में चालू, क्या हो रहा है। इस सवाल से भी पति पर कोई असर नहीं हुआ। वह ज्यों-का-त्यों बैठा रहा। अब पत्नी से नहीं रहा गया, उसने तुरंत पति से कहा-देखते क्यों नहीं हमारे यहां आखिर कब बिजली आएगी। पति ने शांत भाव त्याग कर उत्तर दिया- पड़ौसी के यहां इनवर्टर है, इसलिए बिजली चल रही है, हमारे यहां नहीं है। गुस्साई पत्नी का पारा तेज हो गया। आखिर हमारे यहां इनवर्टर कब आएगा, जरा सी देर हो जाएगी तो सभी मेरा ही सिर खाने लगोगे, खाना नहीं बनेगा, टिफिन नहीं बनेगा और गरम पानी के बगैर आपका नहाना भी नहीं होगा। सारे के सारे काम ठप्प हो जाऐंगे और ऑफिस में आप तथा स्कूल में बच्चों को देरी के लिए डांट खाना पड़ेगी।
सारा कसूर बिजली का है, लेकिन किसे समझाने जाओगे। स्कूल और ऑफिस में तो मेरी ही बेइज्जती होगी कि पत्नी ने समय पर काम नहीं किया और बच्चे स्कूल में तथा पति ऑफिस में देर से पहॅुचे। शांत भाव से बिजली के आने के इंतजार में बैठे पति ने घड़ी ओर नजरे घुमाई तो पता चला वास्तव में समय निकलता जा रहा है। पत्नी आधी से ज्यादा तैयारी रात से कर के रख देती है और सुबह जरा सी बिजली के लिए सारा काम अटक जाता है। विवादित और तनावपूर्ण स्थिति के बीच पत्नी ने काम नहीं करने का मन बनाया ही था कि बिजली देवी ने अपनी ऑंखे खोल दी। बिजली के पुनरागमन से सभी के चेहरों पर मुस्कान के भाव थे, लेकिन गुस्साई पत्नी ने फरमान जारी किया, अब बिजली की कमी का समय पूरा करने के लिए सभी को हाथ बंटाना पड़ेगा तभी काम समय पर पूरा होगा नहीं तो देर के लिए मैं जिम्मेदार नहीं हुँ। मदद के लिए पतिदेव किचन की ओर बढ़ रहे थे, लेकिन पत्नी का दूसरा फरमान आया बिना नहाए किचन में मत जाना नहीं तो काम कम करोगे और नहाने में देरी के लिए मुझे जिम्मेदार ठहराओगे।
अब पति जी दुविधा में फंस गए, पहले नहाए तो भी देर और काम करवाने के बाद नहाए तो भी देर। उन्हें कुछ समझ नहीं आ रहा था, लेकिन समस्या का समाधान करने के लिए त्वरित निर्णय की जरूरत थी। पति ने पहले पत्नी की मदद को तरजीह दी, क्योंकि उनकी देर भले ही हो जाए, लेकिन बच्चे तो सही समय पर घर से निकल सकते हैं। आखिर उनका भविष्य उन बच्चों की शिक्षा से ही तो जुड़ा था। खुद डांट खा लेंगे, लेकिन बच्चों और उनकी मॉं का अपमान सहन नहीं कर सकेंगे। आखिरकार सबने मिल जुल कर घर में सुबह का सारा काम निपटा लिया और समय से काम हो गया तो सभी समय से अपने काम पर पहॅुच भी गए, इस सब के बीच पति को सबक मिल गया कि कोई भी काम मिल जुल कर किया जाए तो समय पर पूर्ण किया जा सकता है।
-संजय भट्ट
सोमवार, 6 फ़रवरी 2023
संदेह में ऋतुराज
संजय भट्ट
सब कुछ बदलने का रिवाज सा चल रहा है, लेकिन ऋतुओं का बदलाव नहीं हो रहा है। वह अपने समय पर ही आ रही है। उनमें भी अब संदेह के बादल उभरने लगे हैं। हो सकता है कि आने वाले समय में इनमें भी कोई बदलाव आ जाए। सब कुछ तर्कों के सहारे चल रहा है। तर्कों में इतनी ताकत है कि वह विचारों को बदलने में पल भर भी देर नहीं करते। आज का विचार मान्यता और मनोदशा कल रहे ना रहे।
बसंत की ऋतु चल रही है और इसे ऋतुओं के राजा का दर्जा मिला हुआ है। पता नहीं कब किसने कैसे और किन परिस्थितियों के कारण ऋतुओं का राजा बता दिया गया। चूंकि बदलाव का दौर है तो इस ऋतुराज पर भी संदेह के बादल छाने लगे हैं, प्रजातंत्र के इस दौर में कब इससे यह तमगा छिन जाए नहीं कह सकते। इसके पीछे तर्क इतने मजबूत है कि यह स्वयं भी घबराहट का अनुभव करने लगा है। पहला तर्क तो यह है कि जब ऋतु स्त्रीलिंग शब्द है तो यह राजा बना ही कैसे इसे तो ऋतुओं की रानी कहा जाना चाहिए। वैसे कोई भी राजा बने सभी पर प्रजा को संदेह रहता ही है। अब वो जमाना बदलने लगा है तब जो किसी ने कह दिया मान लिया जाता था, लेकिन अब तो तर्क पर खरा नहीं उतरे तो उसे तुरन्त बदला जा सकता है। यही हाल ऋतुराज पर लागू होने लगा है। इसके ऋतुओं का राजा होने पर संदेह करने लगे हैं।
सबसे पहले लिंग की त्रुटि में उलझाया जा रहा है और इसके बाद की परेशानियां तो और भी बड़ी है। अब इसे राजा माने या रानी यह परेशानी तो है ही यह भी कहा जा रहा है कि यह पुरूषवादी मानसिकता का प्रतीक है। जब ऋतु स्त्रीलिंग शब्द तय हो चुका है तो इतने वर्षों से इसे राजा क्यों माना जा रहा है। यह सरासर स्त्रियों के अधिकार पर हमला है। इसे ऋतुओं की रानी कहा जाए। वह दिन दूर नहीं जब कोई महिला आयोग बकायदा नोटिफिकेशन जारी कर बसंत ऋतु को रानी का दर्जा दे दे या महिलावादी कोई साहित्यकार अपनी टीम बना कर इसके विरोध में खड़ी हो जाए और दबाव में सरकार को कहना पड़े कि यह ऋतुराज नहीं रहा। अब इसे ऋतुओं की रानी माना जाएगा।
राजा रानी का विवाद तो है ही, इसके ऊपर से कई तर्क और सामने आए हैं। इसमें कहा जा रहा है कि मौसम में बदलाव हो जाता है ठंड से गर्मी की ओर बढ़ने लगते हैं दिन बड़े हो जाते हैं और जल्दी सवेरा होने से जल्दी उठना पड़ता है। फिर बसंत की ऋतु आते ही ठंड और गर्मी का पता नहीं चलता। घर से स्वेटर पहन कर निकलो और काम पर पहॅुंचते-पहॅुचते गर्मी लगने लगती है। रात में कंबल रखो, रजाई रखो या चद्दर से ही काम चल जाएगा इसका भी अंदाजा नहीं लगता। ऋतु बदलते ही मौसम में बदलाव के साथ बीमारियों की दस्तक होने लगती है। जिसे पुरी ठंड में सर्दी खासी का असर नहीं हुआ हो वह इस मौसम में इसका शिकार हो जाता है। तर्क धारियों की बारिश यहीं समाप्त नहीं होती। उनका कहना है कि जैसे ही बसंत की ऋतु आती है हरियाली की चादर ओढ़े खड़े वृक्ष नग्नता धारण कर पूर्णत: गंजे हो जाते हैं। सूखे पत्तों की भरमार से सड़के पट जाती है और उनके घूमने फिरने में परेशानी आने लगती है। इन सूखे पत्तों से नालियां चॉक हो जाती है और चारों और गंदगी का आलम हो जाता है। ऐसे में बसंत को ऋतुओं का राजा कैसे कहा जा सकता है। राजा गंदगी का प्रतीक तो नहीं हो सकता है। फिर धूल के गुबार उड़ना शुरू हो जाते हैं दिन में अलसाया सा आलम हो जाता है। काम में मन नहीं लगता है। धूल सूखे पत्ते नग्न वृक्ष और हरियाली छिनने वाले को राजा कैसे माना जा सकता है।
पुराने जमाने में पता नहीं क्या सोंच कर इसे ऋतुराज बता दिया गया। इसके कोई लक्षण राजाओं वाले तो है नहीं। राजा तो सब का रक्षक होता है और उसके राज्य में चहॅूंओर खुशहाली होनी चाहिए। यदि यह सब नहीं है तो फिर राजा कैसे मान ले। इस बसंत के आते ही प्रजा बीमारियों से ग्रसित और प्रकृति पर सूखे की मार लगना शुरू हो जाती है तो राजा होने का क्या दायित्व यह निभाता है। राजा का धर्म कष्ट देना नहीं है और प्रजा अगर कष्ट अनुभव कर रही हो तो राजा को राजा रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। हो सकता है इसने अपने समय में किसी दादागिरी के कारण या मैनुपुलेटेड पद्धति से खुद को राजा बना लिया हो। यह प्रजातांत्रिक देश है और यहां ऋतुओं के राजा का भी चुनाव प्रजातांत्रित तरीके से होना चाहिए।
इतने सारे विरोधी तर्कों को सुनने के बाद से बसंत की नींद हराम है, डर लग रहा है कि यह तर्कवादी मिलकर कहीं इससे ऋतुराज का तमगा ही नहीं छिन ले। इस दौर में बच्चे भी पीछे नहीं है उनका भी तर्क ऋतुराज के खिलाफ में जा रहा है उनका कहना है कि सभी ऋतुओं में मौज मस्ती से स्कूल जाते हैं या स्कूल की छूट्टिया हो जाती है, लेकिन बसंत के आगमन से उनके सिर पर भी परीक्षा की तलवार लटकने लगती है और सभी तरफ से एक ही जोर होता है पढ़ाई करो। सारी मौज मस्ती छिन लेता है बसंत उनकी। अब या तो बसंत को अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ेगा या पद छोड़ना पड़ेगा। बस विकल्प की ही देर है कभी भी बसंत को ऋतुराज के पद से हाथ धोना पड़ सकता है, यह चर्चा सुनकर बसंत को गहरा सदमा लगा है। आने वाले दिनों में कोई और ऋतुओं की रानी इस ऋतुराज का ताज अपने सिर पर सजा लेगी।
शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023
मजबूरी का मंच
संजय भट्ट
आजकल गतिविधियों की संख्या बढ़ गई है। विभिन्न स्थानों पर कई गतिविधियों का आयोजन हो रहा है। सभी में मंच का निर्माण और उस पर बैठने वाले अतिथियों को लेकर जद्दोजहद होने लगी है। हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी पद पर है और सामाजिक कार्यकर्ता का कहना ही क्या। फिर कार्यक्रम सामाजिक हो, राजनीतिक हो या सरकारी सभी को मंच पर बैठना है और सभी को अपना ज्ञान भी पेलना है, चाहे उस ज्ञान में कई सारी अज्ञानताओं का पीटारा क्यों न हो। जो समाज के बारे में नहीं जानते वे सामाजिक कार्यकर्ता है और राजनीति में दल का प्रत्येक सदस्य अपने आप को जनप्रतिनिधि समझता है। उन्हें यह भी पता नहीं है कि जनप्रतिनिधि वह होता है, जो चुन कर जनता का प्रतिनिधि बनता है। यह जनता का हक होता है कि वह किसे चुने और किसे रिजेक्ट कर दे, लेकिन रिजेक्ट हो चुका व्यक्ति भी किसी न किसी दल का प्रतिनिधित्व करता है और फिर कुछ नहीं तो सामाजिक कार्यकर्ता का तमगा या भूतपूर्व फलाने का पद तो उसके पास होता ही है।
इस सब से मंच और मंचीय कार्यक्रम की गरिमा का चाहे नाश हो जाए, लेकिन उनको मंच और भाषण का मौका देना आवश्यक हो जाता है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो आयोजक की खैर नहीं। ज्यादातर कार्यक्रम सरकारी होते हैं तथा सरकार की ओर से जनप्रतिनिधियों को उसमें शामिल करने के निर्देश भी दिए जाते हैं, लेकिन आयोजक की परेशानी है कि वह किसको जनप्रतिनिधि माने और किसे रिजेक्ट कर दे। जिसको भी मौका नहीं मिलता है वह दूसरे दिन चढ़ाई का मुड़ बना कर आयोजक को चमकाता है या अपने आका को इसकी सूचना देता है कि फलां कार्यक्रम में उसे तरजीह नहीं दी गई। आयोजक की यह परेशानी है कि वह किस-किस को मौका दे और किसे रिजेक्ट कर दे। कई कार्यक्रम तो सरकारी अधिकारियों की उपस्थ्िाति में करवाना बेहतर होता है।
दूसरी प्यास छपास की होती है, कार्यक्रम में उपस्थित है तो उनका नाम अगले दिन अखबार और न्युज चैनल पर आना चाहिए। क्या करें मजबूरी भी है यदि उनका नाम नहीं आएगा और उन्हें मंच नहीं मिलेगा तो उन्हें पहचानेगा कौन और उनकी छवि कैसे गढ़ी जाएगी। यह नहीं पता होता है कि इस छवि को चमकाने के चक्कर में वे अपना सम्मान उस आयोजक के सामने खो रहे हैं, जिसे न चाहते हुए भी मंच और मौका देना होता है। यहां भी वही परेशानी है, जिसके पास कोई काम नहीं है वह हर व्यक्ति अपना मौका देखता है और पिता की कमाई पर मुफ्त की मोटरसाईकिल दौड़ाने वालों का इसमें अलग ही रोल है। वह चाहता है कि उसे मौका मिल जाए और वह भय्या जी के पीछे अपना भी मौका तलाश लें। कुछ तो मान न मान मैं तेरा मेहमान बन कर आने से भी नहीं चूकते और कुछ बेगानी शादी में अब्द़ल्ला दिवाना बन कर घूमते हैं। कुछ को मजबूरी में उस गतिविधि में शामिल करना होता है, जिसमें दूर-दूर तक उसका कोई दखल न हो।
ऐसे में मंच की गरिमा समाप्त हो जाती है, पीछे खड़े होकर फोटो ही क्यों न आ जाए लोगों को दिखाने के लिए हो जाता है कि हम उस कार्यक्रम में मंच पर थे। पढ़ाई-लिखाई और कड़ी परीक्षाओं के बाद पद पर पहुँचे अधिकारी ऐसे माननीयों का सम्मान कर रहे होते हैं, जिनको न तो ज्ञान है और न ही उस विषय में कोई पारंगतता, लेकिन फिर से वही मजबूरी आ जाती है। इन सब प्रपोगेंडा के चलते मंच पर धकमपेल और माईक की छीना झपटी भी हो जाती है। कई बार तो कार्यक्रम अखाड़ा बन कर सामने आते हैं। मंच,मंच नहीं होकर मैदान बन जाते हैं और सारी विवादित स्थिति का सामना करना अकेले आयोजक को करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में मंच अब मजबूरी के मंच बनकर रह गए हैं और आयोजक दबाव में उनको भी मंच देने लग गए हैं , जिनको मंच तो दूर सामने बैठने तक की योग्यता नहीं हो।
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