विकास की योमे पैदाईश का अवसर था। प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं को तकलीफ हो रही थी। वह घर में नए मेहमान की तरह आ रहा था। उसके आने से सभी को उजियारा नजर आ रहा था। प्रकृति को यह तकलीफ थी कि उसकी बरसों की मेहनत से हवा, पानी और विभिन्न परेशानियों को झेलते हुए बड़े किए वृक्षों को विकास की राह में बाधा मान कर हटा दिया गया था। वह किसी को छाया देते, किसी को रोजगार देते और किसी गरमी में तपते राहगीर को शीतल हवा के झोंके से तृप्त कर देते, लेकिन उनको विकास में बाधा मान कर उस पथ से हटाया जा रहा था। अब भी वे शान्त थे, क्योंकि उनके हटने से विकास को नई राह मिलेगी और वे किसी मकान की शोभा तो किसी के घर की रोटी पकाने के काम आएंगे।
जब भी कहीं विकास का जन्म होता है वह हमेशा दूसरों को दुखी कर ही पैदा होता है। वह अपनी पैदाईश के बाद लाभ देता है, लेकिन प्रसव काल में सभी को काफी तकलीफों का सामना करना पड़ता है। इस बार वह हमारे यहां आ रहा था एक नया पथ लेकर। उसके जन्म के बाद उड़ती धूल और गड्ढों से बचाते हुए वह सभी को राहत प्रदान करेगा, लेकिन अभी प्रसव काल चल रहा था, सभी को परेशानी हो रही थी।
विकास के आने से किसी को खुशी थी तो कुछ के पेट में दर्द हो रहा था। कुछ का बना बनाया व्यवसाय विकास की आंधी में उजड़ने लगा था तो किसी को उसके पैदा होने तक आवाजाही की परेशानियों से दो चार होना पड़ रहा था। विकास का आना दो धारी तलवार था, कुछ को खुशी थी कि चलो उनको इसका फायदा आगे मिलेगा, लेकिन कुछ को काफी दिक्कत थी। अब वे क्या करेंगे, कैसे करेंगे, उनका साथ कौन देगा। कैसे उन्हें फिर से अपना आशियाना बसाने का मौका मिलेगा। पर क्या करें विकास का प्रसव काल तकलीफों का पहाड़ लेकर आता है और जन्म में पटाखे फूटने लगते हैं। वह बुढ़ापे में फिर से तकलीफ देता है, लेकिन अपने शैशव काल से लेकर जवानी के दिनों में सभी की ऑंख का तारा बन कर रहता है।
अब विकास हमारे यहां आ रहा था तो कहीं खुशी कहीं गम का माहौल था। मानवीय संवेदनाओं को सभी समझ सके यह हर किसी के बस की बात नहीं। मानवीय संवेदनाएं अंतर्मुखी होती है और चुपके-चुपके एक कमरे में बैंठ कर रो लेती है, किसी से कुछ नहीं पाती है। जब वह कुछ कहना चाहती है तो उसे विकास की चकाचौंध दिखा कर शान्त कर दिया जाता है। वह इतनी भोली होती है कि उसकी जुबान खुले उसके पहले ही विकास की चमक उसकी ऑंखों पर ऐसी छा जाती है कि वह सही होकर भी सभी को गलत लगने लगती है। यहां भी विकास के आने से वह रो तो रही थी, लेकिन उसकी जुबान नहीं खुल पा रही थी। सभी समझा रहे थे कि विकास आएगा तो उसकी ही पूछ परख बढ़ेगी, सभी उसका सम्मान करेंगे और वह भी दुगनी रफ्तार से आगे बढ़ेगी।
आज मानवीय संवेदना का पेट खाली था और तकलीफ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। हर कोई उसका मजाक उड़ा रहा था कि इतने सालों से विकास का इंतज़ार था और अब जब वह प्रसव काल से गुजर रहा है तो तुम व्यर्थ में विलाप कर रही हो। विकास को आने तो दो फिर देखना तुम्हारा भी रूतबा बढ़ जाएगा। मानवीय संवेदना को आज के पेट की चिन्ता सता रही थी और लोग उसे सपने बेंचने में लगे थे। वह भी सपनों में खोना चाहती थी, लेकिन खाली पेट का दर्द वह अकेली समझ सकती थी कोई और उसके इस दर्दभरी कराह को मेहसुस भी नहीं कर सकता था।
सबको पता है जब भी विकास आता है वह अपने साथ एक आंधी जरूर लेकर आता है। जिसमें प्रकृति के बसे-बसाए वृक्षों को अपनी आहूति देना पड़ती है और मानवीय संवेदनाओं को स्वयं से समझौता करना पड़ता है। यहां भी विकास इन दोनों के लिए परेशानियों का सबब लेकर आया लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। विकास की चकाचौंध ही इतनी खतरनाक होती है कि वह धूमकेतु की चमक को भी फीका कर देती है। सभी विकास के आने का स्वागत कर रहे थे और प्रकृति मानवीय संवेदनाओं के साथ चुपचाप अपने पर होते अत्याचार सहन कर भी मौन थी।
-संजय भट्ट
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