शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

विकास का प्रसव काल

विकास की योमे पैदाईश का अवसर था। प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं को तकलीफ हो रही थी। वह घर में नए मेहमान की तरह आ रहा था। उसके आने से सभी को उजियारा नजर आ रहा था। प्रकृति को यह तकलीफ थी कि उसकी बरसों की मेहनत से हवा, पानी और विभिन्‍न परेशानियों को झेलते हुए बड़े किए वृक्षों को विकास की राह में बाधा मान कर हटा दिया गया था। वह किसी को छाया देते, किसी को रोजगार देते और किसी गरमी में तपते राहगीर को शीतल हवा के झोंके से तृप्‍त कर देते, लेकिन उनको विकास में बाधा मान कर उस पथ से हटाया जा रहा था। अब भी वे शान्‍त थे, क्‍योंकि उनके हटने से विकास को नई राह मिलेगी और वे किसी मकान की शोभा तो किसी के घर की रोटी पकाने के काम आएंगे।

जब भी कहीं विकास का जन्‍म होता है वह हमेशा दूसरों को दुखी कर ही पैदा होता है। वह अपनी पैदाईश के बाद लाभ देता है, लेकिन प्रसव काल में सभी को काफी तकलीफों का सामना करना पड़ता है। इस बार वह हमारे यहां आ रहा था एक नया पथ लेकर। उसके जन्‍म के बाद उड़ती धूल और गड्ढों से बचाते हुए वह सभी को राहत प्रदान करेगा, लेकिन अभी प्रसव काल चल रहा था, सभी को परेशानी हो रही थी।

विकास के आने से किसी को खुशी थी तो कुछ के पेट में दर्द हो रहा था। कुछ का बना बनाया व्‍यवसाय विकास की आंधी में उजड़ने लगा था तो किसी को उसके पैदा होने तक आवाजाही की परेशानियों से दो चार होना पड़ रहा था। विकास का आना दो धारी तलवार था, कुछ को खुशी थी कि चलो उनको इसका फायदा आगे मिलेगा, लेकिन कुछ को काफी दिक्‍कत थी। अब वे क्‍या करेंगे, कैसे करेंगे, उनका साथ कौन देगा। कैसे उन्‍हें फिर से अपना आशियाना बसाने का मौका मिलेगा। पर क्‍या करें विकास का प्रसव काल तकलीफों का पहाड़ लेकर आता है और जन्‍म में पटाखे फूटने लगते हैं। वह बुढ़ापे में फिर से तकलीफ देता है, लेकिन अपने शैशव काल से लेकर जवानी के दिनों में सभी की ऑंख का तारा बन कर रहता है।

अब विकास हमारे यहां आ रहा था तो कहीं खुशी कहीं गम का माहौल था। मानवीय संवेदनाओं को सभी समझ सके यह हर किसी के बस की बात नहीं। मानवीय संवेदनाएं अंतर्मुखी होती है और चुपके-चुपके एक कमरे में बैंठ कर रो लेती है, किसी से कुछ नहीं पाती है। जब वह कुछ कहना चाहती है तो उसे विकास की चकाचौंध दिखा कर शान्‍त कर दिया जाता है। वह इतनी भोली होती है कि उसकी जुबान खुले उसके पहले ही विकास की चमक उसकी ऑंखों पर ऐसी छा जाती है कि वह सही होकर भी सभी को गलत लगने लगती है। यहां भी विकास के आने से वह रो तो रही थी, लेकिन उसकी जुबान नहीं खुल पा रही थी। सभी समझा रहे थे कि विकास आएगा तो उसकी ही पूछ परख बढ़ेगी, सभी उसका सम्‍मान करेंगे और वह भी दुगनी रफ्तार से आगे बढ़ेगी।

आज मानवीय संवेदना का पेट खाली था और तकलीफ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। हर कोई उसका मजाक उड़ा रहा था कि इतने सालों से विकास का इंतज़ार था और अब जब वह प्रसव काल से गुजर रहा है तो तुम व्‍यर्थ में विलाप कर रही हो। विकास को आने तो दो फिर देखना तुम्‍हारा भी रूतबा बढ़ जाएगा। मानवीय संवेदना को आज के पेट की चिन्‍ता सता रही थी और लोग उसे सपने बेंचने में लगे थे। वह भी सपनों में खोना चा‍हती थी, लेकिन खाली पेट का दर्द वह अकेली समझ सकती थी कोई और उसके इस दर्दभरी कराह को मेहसुस भी नहीं कर सकता था।

सबको पता है जब भी विकास आता है वह अपने साथ एक आंधी जरूर लेकर आता है। जिसमें प्रकृति के बसे-बसाए वृक्षों को अपनी आहूति देना पड़ती है और मानवीय संवेदनाओं को स्‍वयं से समझौता करना पड़ता है। यहां भी विकास इन दोनों के लिए परेशानियों का सबब लेकर आया लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। विकास की चकाचौंध ही इतनी खतरनाक होती है कि वह धूमकेतु की चमक को भी फीका कर देती है। सभी विकास के आने का स्‍वागत कर रहे थे और प्रकृति मानवीय संवेदनाओं के साथ चुपचाप अपने पर होते अत्‍याचार सहन कर भी मौन थी।       

                               -संजय भट्ट


                                                                                   -

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

कुछ तो लोग कहेंगे

 

जो दिखता है, वही बिकता है। किसी ने यह टेग लाइन दी और आज जमाना इसी पर चलने लगा। सब कुछ सिर्फ दिखावे के लिए हो रहा है। हर किसी को अपना सबसे अच्‍छा बताने की होड़ लग गई है। यह तो मानव स्‍वभाव रहा है कि उसे सर्वश्रेष्‍ठ करने की ललक रही है, लेकिन यह ललक पागलपन की इतनी हदें पार कर देगी कभी सोचा नहीं था। सिर्फ और सिर्फ दिखावे के लिए सब कुछ करना चाहे इसमें कुछ भी खर्चा हो या स्थिति दयनीय हो जाए। सबको पता है कि उन्‍हें अपना कमाया खाना है, लेकिन फिर भी अच्‍छा दिखने और दिखाने की होड़ में अपने आप को दांव पर लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं।

मैं अपने परिवार के एक शादी समारोह में बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ पहुँच गया। कपड़े भी कुछ ऐसे नहीं पहने थे कि कोई नोटिस करे, लेकिन मैं सबके नोटिस करने का कारण बन गया। मेरी पत्‍नी से लेकर सभी का एक ही सवाल था,ऐसे कैसे आ गए। मैं आश्‍चर्य में था कि ऐसे से क्‍या मतलब हो सकता है। क्‍या मुझ में कोई कमी है। मुझ से यहां आ कर कोई गलती हो गई है। ऐसे सवालों से जुझता रहा और कार्यक्रम समाप्‍त होने तक विभिन्‍न कामों को कुशलतापूर्वक निपटाता हुआ घर पहुँचा। वही सवाल था शादी में ऐसे कैसे आ गए। मैं फिर हतप्रभ कि मैंने आखिर गुनाह क्‍या किया है। रहा नहीं गया। पत्‍नी से पूछ लिया ‘ आखिर कौन सी कमी थी, मुझमें’।छूटते ही बोली ऐसी शकल लेकर आ गए मेरी तो इज्‍जत का फालूदा ही बना दिया। मैंने भी पूछ लिया आखिर क्‍या कमी रह गई।

झल्‍लाते हुए बोली- आपसे मुंह लगना बेकार है। आपकी इज्‍जत है, समाज में सब लोग आपको मानते हैं, फिर भी ऐसे ही उठ कर चले आए। मैं अब भी हैरान था कि ऐसा क्‍या हुआ जिसकी वजह से समाज में मेरा और मेरे परिवार के साथ मेरी पत्‍नी की इज्‍जत भी दांव पर लग गई। मैंने अपना सवाल दोहराया- ऐसी कौन सी कमी रह गई, जिससे समाज को, परिवार को और तुम्‍हें नीचा देखना पड़ा। अब पत्‍नी का पारा सातवें आसमान पर था। गुस्‍से में बोली शकल देखी है अपनी कांच में। मैंने कहा देखी है, जैसा हूँ वैसा ही दिख रहा हूँ, मुझे तो कोई कमी नहीं नजर नहीं आ रही मेरी शकल में।  वो बोली यह बढ़ी हुई दाढ़ी और साधारण सा पेंट शर्ट भला कौन शादी में पहन आता है। सब को देखा था कैसे आए थे और एक तुम उठ कर चले आए।

मैंने समझाते हुए कहा- कपड़े अच्‍छे थे और दाढ़ी का क्‍या है आजकल तो फैशन में है। दूल्‍हे को भी दाढ़ी थी। उसने कहा-दूल्‍हे की दाढ़ी और तुम्‍हारी दाढ़ी में फर्क है। वह दाढ़ी को सेट करवा कर आया था और आप ऐसे ही खीचड़ी बालों वाली दाढ़ी के साथ आ गए।
अगली शादी समारोह में जाने का फिर से अवसर मिल गया। इस बार मेरे कपड़ों तथा दाढ़ी का पूर्ण ध्‍यान रखते हुए संपूर्ण नियंत्रण के सा‍थ में शादी में पहुँचा। इस बार पत्‍नी के अनुसार सुन्‍दर और मेरे अनुसार कार्टून नजर आ रहा था। शादी का कार्ड आने के बाद ही सभी कपड़ों की ट्रायल ली गई और मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी को समय रहते कटवाया गया। सवाल सब का अब भी वही था अरे आप ऐसे होकर कैसे आ गए। फिर भौचक रह गया कि आखिर इस बार कौन सी गलती कर दी।
इस कार्यक्रम को निपटा कर जैसे ही घर पहुँचा पत्‍नी से बोला- इस बार भी सभी ने वही सवाल किया। पत्‍नी ने कहा हमेंशा ऐसे ही हर कहीं पहुँच जाते हो इस बार थोड़ा टीप टाप होकर पहुँचे तो लोग पूछेंगे ही। तब मैंने पत्‍नी को समझाया कि कुछ तो लोग कहेंगे ही। इसलिए जैसे हो वैसे रहो तो कोई सवाल का असर नहीं पड़ता। जमाने को दिखाने के लिए अपने लिए जियो।
                                                                -    संजय भट्ट

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...