मंगलवार, 21 मार्च 2023

इंद्रदेव की टंकी का ओवर फ्लो

पहले बरसात से समय बरसात होती थी। लोग इसे इंद्रदेव की महरबानी मानते थे, लेकिन अब कभी भी बरसात हो जाती है। इसे कुछ विज्ञान के मानने वाले पर्यावरण के संरक्षक कहे जाने वाले इंसानी गलती बता रहे हैं। वैसे बरसात अपने मुड पर निर्भर है। उसका जब मन करेगा वह आएगी और उसे रोक पाने की ताकत किसी के पास नहीं है। हमारे घरों में भी पानी की टंकियां है और उनमें भी ज्‍यादा पानी आ जाता है तो ओवर फ्लो हो जाती है। कुल मिलाकर चाणक्‍य वचन लागू होता है- ‘अति सर्वत्र वर्जयेत्’ जो ज्‍यादा है वह बाहर आएगा उसे रोक पाना मुश्किल है। चाहे फिर वह टंकी में भरा पानी हो या मस्तिष्‍क में भरा ज्ञान। कहा जाता है कि ज्ञानी पुरूष हमेशा चुप्‍पी धारण किए होते हैं, लेकिन वह जब भी बोलते हैं, अच्‍छे-अच्‍छों की बोलती बंद कर देते हैं। बस ऐसा ही कुछ इन दिनों इंद्रदेव के साथ हो रहा है। आखिर उनके यहां भी तो कुछ स्‍टोरेज की व्‍यवस्‍था होगी। जब स्‍टोरेज करने की क्षमता समाप्‍त हो जाती है तो वह ओवर फ्लो तो होगा ही। इंद्रदेव भी कितना धीरज धरते। आखिर जमीन से आते इतने पानी को समेटने की क्षमता तो उनकी टंकी में भी नहीं है, सो वह तेरा तुझको अर्पण करने वाली स्थिति में आ गए हैं।
पहले हमारे पूर्वज किसी भी प्रकार का जल ग्रहण कर लेते थे, लेकिन कम ही बीमार पड़ते थे। आज हम सभी को शुद्ध पानी की आदत हो गई है। पानी की सफाई के लिए स्‍टोरेज की टंकी को भी साफ करना होता है। यह बात इंद्रदेव तक भी पहुँच गई है। उन्‍होंने भी पानी को समय-समय पर शुद्ध करना शुरू कर दिया है। हम सड़क पर पानी बहा देते हैं। रहीमदास जी के जमाने में सावन भादौ में चलने वाली नालियां आज कचरे और गंदे पानी से अटी पड़ी है और माघ पुस में भी उसी गति से चलती रहती है। हमने सफाई पर जोर दिया तो इंद्रदेव ने भी अपनी टंकी साफ रखना शुरू कर दिया। हमारी फैलाई हुई गंदगी भी तो आखिर कहीं  जा रही है। उससे इंद्रदेव की पानी की टंकी भी गंदी होने लगी है। पानी के अपव्‍यय को रोकने के लिए मुहिम चलती है। पानी को सहेजने के लिए मुहिम चलती है, पानी को साफ सुथरा रखने के लिए मुहिम चलती है, लेकिन पालन कितने दिनों तक और कौन करता है। जैसे ही मुहिम का पखवाड़ा या सप्‍ताह समाप्‍त होता है, सब भूल जाते हैं कि पानी भी कितना कीमती है।
शौचालय से लेकर कार धोने और हर तरह की गंदगी को साफ करने के लिए पानी का ही तो उपयोग हो रहा है। और-तो-और अब पानी को बेंचा भी जाने लगा है। पहले मुफ्त में पानी पिलाने को पुण्‍य समझा जाता था, लेकिन अब पानी को बेंच कर करोड़ों का मुनाफा कमाए जाने लगा है। प्रकृति से पानी मुफ्त में मिलता है, किस्‍मतवालों के यहां कुंओं और नलकूपों में पानी की बहार आ जाती है, लेकिन जब हर वस्‍तु कमाई से जुड़ी हो तो पानी को मुफ्त में कौन देगा।
समय पर हर काम अच्‍छा लगता है, लेकिन जब भी वह असमय होता है कुछ बुरा ही होता है। हमारी छोटी सी चिन्‍ता होती है, मैं, मेरा घर और मेरा परिवार इसी में सिमट कर रह जाते हैं। इससे आगे की सोंच किसी की नहीं होती है। हम जिसे अन्‍नदाता कहते हैं, जो हमारे सुबह-शाम की भूख को शांत करने के लिए लगातार अपना पसीना बहा कर बिना मौसम की परवाह किए खेतों में अपना सब कुछ लगा देता है, उसकी चिन्‍ता सिर्फ हम तब करते हैं, जब हमें अन्‍न की आवश्‍यता होती है। ऐसा ही कुछ ऊपर बैठे भाग्‍यविधाता ने भी सोंच लिया। उन्‍होंने सोंचा कि जिसकी चिन्‍ता उसके अपने नहीं करते उसकी चिन्‍ता मैं क्‍यों करूँ। खैर किसान और इंद्रदेव का तो छत्‍तीस का आंकड़ा रहा है। उसे जब जरूरत होती है, उसको खेतों के लिए पानी नहीं मिलता और जब वह फसल समेट रहा होता है तो बरसात अवश्‍य होती है।
सारा काम सरकारी तरीके का हो गया है। हमारे पूर्वजों ने पानी के लिए बरसात के लिए जो मिन्‍नते की थी उसकी फाईलें अब खुलने लगी है। जब भी कोई बरसात की अर्जी सामने आती है, इंद्रदेव को लगता है कि इन्‍हें पानी की जरूरत है तत्‍काल बारिश हो जाती है। कई कार्टूनिश्‍ट तो मार्च का केलेण्‍डर दिखा कर बरसात रोकने की असफल कोशिश करते हैं, लेकिन बात तो ऊपर जा चुके अपने पूर्वजों की है, जिन्‍होंने बरसात के लिए मिन्‍नते की, गीत गाए और राजा-महाराजाओं ने यज्ञ करवाए। आखिर उनका पुण्‍यफल हमें ही मिलना है। हम धरती के निवासी यह नहीं समझ पाए कि ऊपर बैठे इंद्रदेव के पास कोई केलेण्‍डर नहीं है। वह तो सिर्फ अपनी टंकी की सफाई और हमारे द्वारा की गई गंदगी की सफाई के लिए बरसात कर देते हैं। उससे किसी का फायदा हो या नुकसान उन्‍हें क्‍या फर्क पड़ता है। बस इतना जरूर समझना होगा कि हम हमारे यहां पानी के स्‍टोरेज की सफाई करते समय यह नहीं सोंचते कि हमारी छत से गिरता गंदा पानी किसी को नुकसान पहुँचाएगा या नहीं, हम सिर्फ अपना फायदा सोंचते हैं ठीक उसी तरह से इंद्रदेव ने ठान लिया है, जैसे ही उनके स्‍टोरेज की क्षमता पुरी हुई वह पानी जमीन पर भेज देंगे, इससे किसी नुकसान हो या फायदा अपनी टंकी तो साफ उन्‍हें भी रखना ही होगी।

                                                                                    -संजय भट्ट

शनिवार, 18 मार्च 2023

मच्छर का मतिभ्रम

 मच्छर के बच्चे ने नया-नया उड़ना शुरू किया था। वह जहां भी जाता लोग ताली बजाकर उसे मारने का प्रयास करते और वह समझता कि सब उसका गाना सुनकर खुश होकर तालियां बजा रहे हैं। पहली बार उड़कर जब वह वापस अपने परिवार में लौटा तो उसकी माता को उसने बताया कि लोग मेरा गाना बहुत अच्छे से सुनते हैं और सुनकर खुश हो जाते हैं। लोग जब खुश होकर तालियां बजाते हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। यह सब उसकी मां जानती थी, उसका पूरा परिवार जानता था कि वह अपनी जान पर खेलकर आया है। जिंदगी के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है, मच्छर की जिंदगी ही गंदगी में रहकर गुजरती है और लोगों का खून पीकर उसे अपनी भूख को शांत करना पड़ता है। ऐसा ही सब कुछ उस मच्छर के साथ भी हो रहा था, लेकिन यह उसका मतिभ्रम ही था। वह यही समझता रहा कि लोगों को उसका गाना बहुत पसंद आया।
वह जब लोगों के कानों में जाकर अपनी तुन तुन की आवाज सुनता था तो लोग उसे दबोचने के लिए तालियां बजाने का प्रयास करते और वह अपनी चतुराई से बच कर निकल जाता। मच्छर की जिंदगी भी ज्यादा लंबी नहीं होती। कभी धुंए से तो कभी लोगों की तालियों के बीच फंसकर वह अपनी जान दे देता है। उसकी माता यह भली-भांति जानती थी कि उसका भी जीवन उसके पिता की तरह किसी दिन ऐसे ही समाप्त हो जाएगा। वह अपना वैधव्य कैसे काट रही थी, यह सिर्फ वह जानती थी और कोई उसकी पीड़ा को नहीं जान सकता था।
पेट की आग को शांत करना भी तो जरूरी है और इसी के लिए वह मच्छर अपनी जान पर खेलकर लोगों के पास जाता उन्हें काटता उनका खून पीता और अपनी पेट की ज्वाला को शांत करने का प्रयास करता, लेकिन बार-बार वह बच नहीं सकता था। कभी भी किसी की उंगलियों, हाथों या कहीं और फस कर वह अपनी जान गवा सकता था। अब यह उसे भी पता चल गया था कि उसकी जान ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है, लेकिन फिर भी जब तक जिंदा है तो पेट की भूख को शांत करना बहुत जरूरी है। एक भूख ही तो है जो हमेशा सुबह शाम कभी भी अपनी ज्वाला को उफान पर ला देती और ना चाहते हुए भी मच्छर को इधर भागकर कुछ लोगों या जानवरों को तलाश कर उनके खून से अपनी पेट की ज्वाला को शांत करना पड़ता। रात दिन की भागदौड़ एक समय का इंतजार और किसी आदमी की तलाश उसकी जिंदगी का हिस्सा बन गई थी। लगातार इधर-उधर भटकते रहना और उसके पंखों की भिनभिनाहट के कारण होने वाली ध्वनि जिसे वह शुरू में अपना संगीत समझता वही उसकी मृत्यु का कारण बन जाती है।
ऐसा ही मतिभ्रम हम आम इंसानों को भी हो चुका है। लगातार आमजन भी इसी भ्रम जाल में खोए हुए हैं कि जो हम कर रहे हैं वह हमारे लिए बहुत अच्छा है। आज की युवा पीढ़ी भी इसी मतिभ्रम में खोई हुई है कि इस समय जो उसके पास है या जिसे वह पाना चाहता है, उसके लिए जो प्रयास कर रहा है वही उसके लिए अंतिम सत्य है, लेकिन वास्तविकता ठीक विपरीत उस मच्छर की तरह हैं, जो कभी भी उसे अपने जाल में फंसा कर उसकी जान ले सकती है। जिंदगी से खेलता यह युवा अपने आप को और किसी से कमतर मानने को तैयार नहीं, लेकिन यह हकीकत नहीं है। आजीविका के लिए प्रयास करना खुद को जिंदा रखने के लिए लगातार संघर्ष करना जिंदगी का हिस्सा है। जीवन में बहुत कम लोग ही इसे जान पाते हैं कि जिंदगी का यह हिस्सा कितना महत्वपूर्ण है और कितना कमतर।
हमेशा जिंदगी सफलता नहीं देती, लेकिन थोड़ी सी असफलता से निराश होकर जिंदगी को छोड़ भी तो नहीं सकते। इस सत्य को पहचानने में जिंदगी गुजर जाती है, लेकिन मच्छर की तरह मतिभ्रम में खोए हुए हम हमेशा अपने प्रयासों को अच्छा मानते हैं। यह प्रयास कितने अच्छे हैं, कितनी सफलता दिलाते हैं इसका कोई अंदाजा किसी को नहीं होता l मच्छर भी धीरे-धीरे यह समझ जाता है कि उसकी जो भिनभिनाहट है यही उसकी मृत्यु का कारण बनेगी फिर भी वह अपने पंखों को फड़फड़ाए बिना रह भी तो नहीं सकता। वह जब तक उड़ता रहता है तब तक अपनी जिंदगी को बचाए रखता है और जैसे ही कहीं फस जाता है उसकी जान चली जाती है। आदमी को भी यही समझना होगा कि वह जिन ख्वाबों में वह खोया हुआ है उनकी हकीकत उसकी जिंदगी से कहीं अलग है।  वह भी उस मच्छर की ही तरह है जिसके मरने पर किसी मच्छर को दुख नहीं होता किसी मच्छर को कोई आपत्ति नहीं होती। वह अपने पेट की ज्वाला को शांत करने के लिए फिर से उसी और भागता है जहां उसकी जान को खतरा बना हुआ रहता है।
                                                      -संजय भट्ट

बुधवार, 15 मार्च 2023

जिन्‍दगी बन गए हो तुम

आजकल मोबाईल के बिना एक पल भी गुजरना थोड़ा मुश्किल हो गया है। हर काम में मोबाईल की जरूरत पड़ने लगी है। ऐसा लगने लगा है, जैसे इसके बिना जिन्‍दगी अधूरी है। अब कोई भी काम हो बिना मोबाईल की सहायता के नहीं होता है। स्‍मार्ट फोन आने से जैसे जीवन में क्रांति ही आ गई है। युवा पीढ़ी तो इतनी पंगु हो गई है कि बिना मोबाईल अपना कोई काम नहीं कर पाते। कुछ लोग कहते हैं मोबाईल जिन्‍दगी का हिस्‍सा है, लेकिन ऐसा लगता है कि मोबाईल ही जिन्‍दगी बन गए है।
मोबाईल बिना इंटरनेट के कुछ भी नहीं, आज आम आदमी के पास घर में आटा नहीं तो चल जाएगा, लेकिन मोबाईल में डाटा नहीं हो तो उसकी जिन्‍दगी खतम लगने लगती है। इंटरनेट आने के पहले ही बता दिया गया था कि यह इक्‍कीसवीं सदी की सबसे बड़ी क्रांति होगी और हुआ भी वही। यह रोजमर्रा के कामों में इतनी दखल देने लगा है, जितनी दखल किसी जमाने में भी पत्नियों ने नहीं दी होगी। पत्‍नी जिन्‍दगी का हिस्‍सा है और इंटरनेट वाला मोबाईल जिन्‍दगी। मोबाईल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और मेल के जमाने में सब कुछ आसान और तेज तो हुआ है, लेकिन इतनी ही शिथिलता भी जिन्‍दगी में आ गई है। इस मोबाईल ने जितना जिन्‍दगी को आसान किया है उतना ही आलस्‍य को बढ़ावा दिया है।
सोशल मीडिया के इस दौर में कई दोस्‍त है, लेकिन वह दोस्‍ती नहीं कि घंटों एक दूसरे के आमने सामने बैठ कर गप्पियाते रहे और सुख दुख के समय हाजिर होकर खुशी और गमों को साथ-साथ निभाते रहे। जीने मरने की कसमें खाने वाले भी मुसीबत के समय में साथ नहीं देते हैं। मोहल्‍लों में त्‍यौहारों पर मस्‍ती और सम्‍मान की बहारों का दौर गुजर गया। अब मोबाईल आधारित सोशल मीडिया में संदेश को प्रमुखता दी जाने लगी है। हालांकि इसको लेकर कई तरह के चुटकुले भी चल पड़े हैं, लेकिन यह इतना ढीठ है कि इसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। किसी के हाथ में मोबाईल नहीं हो तो उसकी बेइज्‍जती का एहसास वही समझ सकता है।
छोटी-से-छोटी सूचनाएं तलाशना हो तो याद नहीं रखते गुगल कर लेते हैं। घर के पड़ौस में क्‍या चल रहा है, किसी को पता नहीं, लेकिन जमाने में क्‍या चल रहा है यह सब जानने को उत्‍सुक रहते हैं। आलस्‍य का आलम तो यह हो गया है कि किचन से पत्‍नी कमरे बैठे पति को खाना खाने के लिए न तो बुलाने जाती है और न ही आवाज लगाती है, सिर्फ उसके मोबाईल पर घंटी कर देती है। यही आलम पतियों का भी हो गया है, ऑफिस जाते समय सामने रखे मौजे और टाई न मिले तो तलाशने की कोशिश नहीं करते उसके लिए भोजन तैयार करने में व्‍यस्‍त पत्‍नी को मोबाईल करता है। पहले किसी का नम्‍बर नाम और सामान्‍य ज्ञान की बातों को याद रखा जाता था, लेकिन अब सिर्फ सेव किया जाता है और उसे मोबाईल याद रखता है। घरों का आलम यह है कि दो भाई एक ही कमरे में बैठ कर अपने-अपने मोबाईल के सोशल मीडिया में व्‍यस्‍त रहते हैं।
याददाश्‍त तो इतनी कमजोर हो गई है कि शादी की सालगिरह और बेटे-बेटियों के जन्‍मदिन को मोबाईल में सेव कर रिमांडर में डाला जाता है। हर तरफ सिर्फ एक ही जलवा दिखाई देता है, मोबाईल और इंटरनेट इसके बिना जिन्‍दगी का वजूद खतम हो गया है। कभी अपनी प्रेयसी के लिए फिल्‍मों गाया गया गाना जिन्‍दगी बन बए तो तुम, अब प्रेयसी के लिए कम और मोबाईल के लिए परफेक्‍ट लगता है।
              संजय भट्ट

शुक्रवार, 10 मार्च 2023

संदेशों में समाए नोट के रंग

 

अर्थ बिना सब व्‍यर्थ है। आदिकाल से सब कुछ अर्थशास्‍त्र के बिना नहीं चल रहा है। मंहगाई के सदाबहार दौर में अब आदमी त्‍यौहारों की शुभकामनाओं में भी नोटों के रंगों को तलाशने लगा है। नोटों की लगातार गिरती साख और इनके कलरफुल स्‍वभाव ने इसे होली में रंगों से और महिला दिवस पर महिलाओं के स्‍वभाव से जोड़ दिया है।
गरमी के दिनों में खुले में सोए हुए व्‍यक्ति को काटने के लिए मच्‍छरों की जैसी होड़ होती है ठीक वैसी ही होड़ सोशल मीडिया पर बधाई संदेशों की होती है। इस बार एक ही दिन में दो-दो इवेन्‍ट हो जाए तो पूछो मत लगातार मोबाइल की टन-टन और टूक-टूक में दिन कब निकल जाता है समझ ही नहीं आता। दिन भर शादी के घर जैसी चहल-पहल मोबाइल पर बनी रहती है। फुरसतिए अपने-अपने कमरों की चार दिवारी में बंद होकर दिनभर मोबाइल पर बधाई संदेशों को इधर से उधर करते रहते हैं या त्‍यौहारों पर अपना ज्ञान पैलने में अपने आप को व्‍यस्‍त रखने में सफल होते हैं तथा आपको भी उनकी जमात का हिस्‍सा समझ कर सोशल मीडिया पर लगातार अपना समय काट देते हैं।
त्‍यौहारों पर मिलने वाले बधाई संदेशों का स्‍वरूप अब बदल गया है, जैसे न्‍युज चैनलो में ब्रेकिंग न्‍युज की गलाकाट प्रतियोगिता है वैसी ही प्रतियोगिता अब बधाई के संदेशों की हो चली है। सोशल मीडिया से एक लाभ यह हुआ है कि बधाई संदेश देने के लिए उस व्‍यक्ति तक जाने की जरूरत नहीं होती। घर बैठे ही कोसों दूर बैठे व्‍यक्ति को सात समन्‍दर पार भी बधाई दी जा सकती है।
सभी त्‍यौहारों के बधाई संदेशों को नोटों के रंगों से तौला जाने लगा है। होती तो शुभकामनाएं हैं, लेकिन शुभकामनाएं देने वाला व्‍यक्ति आपको आपकी गरीबी और बढ़ती हुई मंहगाई का एहसास करवाने से नहीं चुकता है। दिवाली पर नोट भेज कर यह अनुभव करवाया जाता है कि आप कितने गरीब है कि आपके पास इन नोटों के कुछ अंश तो है लेकिन गड्डिया रख पाना आपके बस में नहीं है। वहीं होली पर नोटों के रंगों से यह मेहसूस होने लगता है कि दो तीन रंगों से ज्‍यादा के नोट आपके पास नहीं है। डिजीटल युग में यह गरीबी का ताना देने की नई विधा है। घर बैठा व्‍यक्ति अपने आप में अपमानित मेहसुस कर लेता है। इस तरह सांप मर जाता है और लाठी भी नहीं टूटती। व्‍यवहार बना रहता है। अलग-अलग तरीके के एप्‍प में गुलाबी रंग के बड़े से नोट में अपनी गर्ल फ्रेण्‍ड का फोटो  गांधीजी की जगह फिट करके युवा अपनी झांकी को मण्‍डप में बदलने का सपने देखने लगता है, जबकि उसे पता भी नहीं होता है कि जिस गुलाबी नोट का वह फोटो भेज रहा है, उसे कमाने में कितना पसीना और कितने दिनों की कड़ी मेहनत लगती है।
नोटों से सजे इन बधाई और शुभकामना संदेशों से नोटों की गिरती साख का भी अनुभव होता है। लगातार घटती नोटों की साख और सामान की बढ़ती कीमतों से कमाने वाला व्‍यक्ति सदैव ही पीडि़त रहा है, लेकिन इन संदेशों में नोटों को देख कर राहत का एहसास कर लेता है। व्‍यक्ति के पास जो नहीं होता उसकी चाहत उसे हमेशा बनी रहती है और बधाई संदेशों में समाए नोटों के रंग हमेशा उसकी इस चाहत को बरकरार रखने में सफल होती है।
            - संजय भट्ट

शनिवार, 4 मार्च 2023

नम्‍बरों में खोई पहचान

 

इन दिनों हमारी पहचान या तो नम्‍बरों से होने लगी है या कागजों के टूकड़ों में फंस गई है। इन सब चक्‍करों में हम असली पहचान ही खो चुके हैं। पहले हमारी पहचान हमारे नाम, गौत्र, गांव, पिता के नाम और काम से होती थी, लेकिन जमाने में बदलाव के साथ ही हम लगातार हमारी पहचान नम्‍बरों में दस्‍तावेजों में उलझा कर रह गए हैं। हमारी पहचान को गोपनीय बनाने के चक्‍कर में हमें इतना सार्वजनिक कर दिया है कि अब हर कोई हमें अलग-अलग नम्‍बरों से जानता है। इन नम्‍बरों ने आदमी तो आदमी जमीनों तक को नहीं छोड़ा, यहां भी प्‍लाट नम्‍बर और खसरा नम्‍बर हो गए हैं। पुराने मोहल्‍ले अब वार्ड क्रमांक से पहचाने जाते हैं, गलियों के भी अपने नम्‍बर हो गए हैं। शुक्र है अभी नालियों को पहचान का नम्‍बर नहीं मिला है।
सरकारी लोग भी दोहरा चरित्र रखते हैं। एक और कहते हैं कि अपनी पहचान को गोपनीय रखे किसी के साथ साझा नहीं करें, लेकिन दूसरी तरफ खुद ही हमको अलग-अलग स्‍थानों पर अलग-अलग नम्‍बरों से पहचान बनाने को मजबूर करती है। स्‍कूल में जाओ तो स्‍कॉलर नम्‍बर, आधार नम्‍बर, समग्र आई डी नम्‍बर, नौकरी लग जाए तो यह नम्‍बर कोड में बदल जाते हैं। कहीं युनिक कोड, कहीं ट्रेजरी कोड, डाइस कोड, संस्‍था कोड, ऑफिस कोड और न जाने कौन-कौन से कोड। यह शुरूआत पोस्‍ट ऑफिस से हुई थी, जहां पिन कोड नम्‍बर दिए जाते थे, जिससे एक ही नाम के ग्रामों को पहचानने में सुविधा हो सके, लेकिन अब तो इन नम्‍बरों का साथ नहीं हो तो कोई पहचानता तक नहीं है। जगह-जगह नम्‍बर और अलग-अलग नम्‍बर जबकि पता है आधी से ज्‍यादा आबादी इतनी पढ़ी लिखी नहीं है कि इन नम्‍बरों के मायाजाल को समझ सके या इसे काट कर अपनी जिन्‍दगी काट सके। इसके लिए हमेशा, उसे एक कागज के टूकड़े से पंगु बना कर रखा जाता है।
स्‍कूल में जैसे स्‍कॉलर नम्‍बर, रोल नम्‍बर होते हैं, बैंक में खाता नम्‍बर हो जाते हैं। आपकी पहचान का नम्‍बर आधार नम्‍बर और समग्र नम्‍बर होता है, अब तो कहीं-कहीं आपकी पहचान मोबाईल नम्‍बर से भी होने लगी है। हर पहचान के नम्‍बर के साथ एक तरफ सूचना मिलती रहती है कि यह नम्‍बर आपका अपना है इसे किसी के साथ साझा नहीं किया जाए, लेकिन दूसरी तरफ इन नम्‍बरों को बताए बिना कोई काम ही चलता है।
वास्‍तव में इस नम्‍बरों के युग को ही डिजिटल युग कहा जाता है। भारत के विद्वानों ने शून्‍य की खोज करके दुनिया को डिजिटल बनाने की शुरूआत कर दी थी। इसी शून्‍य के आधार पर कम्‍पयुटर की प्रोगामिंग होती है और यही कम्‍युटरों में उलझे नम्‍बर आपको नई-नई पहचान देने का काम करते रहते हैं। कहा जाता है कि कम्‍पयुटर का अपना कोई दिमाग नहीं होता, लेकिन इसको जैसे हांका जाए वह ऐसे ही चलता है। इसको क्‍या दिखाना है, क्‍या ढंकना है और किसकी पहचान करना है किसी पहचान को छिपाना है सब अच्‍छे से आता है, क्‍योंकि यह सब इसे दिमाग वाले समझाते हैं। यह भी इतना नालायक है कि गरीबों के तो पहचान के कोई काम नहीं करता। मामूली बैंक खाता खुलवाने, जिसमें उसके खुद के कमाए धन को वह जमा करता है, उसके लिए भी किसी भी गवाह के साथ ही उसकी पहचान के सारे नम्‍बरों का जखीरा ले लेता है और जिसको-जिसको यह पैसा ऋण के रूप में अपनी कमाई के लिए देता है उसकी कोई पहचान किसी को नहीं बताता।
अपने पहचान नम्‍बरों की गोपनीयता के लिए संदेश भेज कर कहता रहता है कि किसी से साझा नहीं करे, इसका सीधा मतलब होता है कि आपकी पहचान हमारे पास गिरवी रखी है और हम अपनी पहचान किसी के साथ साझा नहीं करते हैं। रोज नए-नए घोटाले सामने आने से और हमरी गाढ़ी कमाई के हजारों रूपए हमारी बिना जानकारी के स्‍वाहा हो जाने से कुछ जागरूक और पढे लिखे लोग जो वास्‍तव में सिर्फ लिखे पढे होते हैं। मतलब जो लिखा है पढ लेते हैं और उसे कहीं भी कॉपी पेस्‍ट कर भेज देते हैं या बक देते हैं। अब मांग उठाने लगे हैं कि उनकी कमाई का जो हिस्‍सा कहीं भी जमा है, किसी भी उद्देश्‍य से जमा है चाहे वह जीवन, बचत या मजबूरी से जुड़ा हो उसका उपयोग करने के पहले उनसे पूछा जाए। यह मांग करने वाले यह नहीं समझते हैं कि फिर गोपनीयता किस बात की और हमारे लिए तो हमारा नाम ही साख है बैसाखी (बिना साख वाला) तो आप है, इसलिए आपको अपनी साख का परिचय देना है उनको नहीं जिसका सिर्फ नाम ही काफी है। फिर आप जाते हो अपनी मजबूरी या गरज से उनके पास वह आपके पास नहीं आते हैं तो फिर अपनी पहचान सार्वजनिक करने की जरूरत उनको क्‍या है। हम आशावादी लोग है और उम्‍मीद तो कर ही सकते हैं कि कभी के वाय सी (अपने ग्राहक को जाने) की तरह ही केवायए (सब को पहचाने) जैसी कोई व्‍यवस्‍था होगी तब हम जान सकेंगे कि जिस साख पर हम भरोसा कर रहे हैं वह कितनी बैसाखी है।
              - संजय भट्ट

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...