सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

युवा साहित्‍यकारों का सोशल मीडिया सम्‍मेलन

 युवा साहित्‍यकारों के एक सम्‍मेलन में शामिल होने के लिए निमंत्रण पत्र प्राप्‍त हुआ। इस निमंत्रण पत्र को पढ़कर आश्‍चर्य मिश्रित दु:ख हुआ। सम्‍मेलन में जिनकों साहित्‍यकार कह कर संबोधित किया गया था, उनका असल में साहित्‍य से दूर-दूर का वास्‍ता नहीं था। लिखना तो दूर उन्‍होंने कोई पुस्‍तक कभी पढ़ी होगी इसमें भी संदेह लगा। जिनकों युवा साहित्‍यकार के नाम से अतिथि बनाया गया था, वे सभी सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर अपने विडियो बनाते थे।

मैंने इस संदर्भ को लेकर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार मित्र को अवगत करवाया। वे खुले विचारों के थे। उन्‍होंने मुझे समझाते हुए कहा- देखो मित्र अब नई पीढ़ी का यही साहित्‍य है। तुम लिखा करो कोई नहीं पढ़ता है। किसी के पास समय ही नहीं है कि तुम्‍हें या मुझे पढ़े। उनका स्‍क्रीन टाइम भी 15 सेकेण्‍ड का ही है। इससे ज्‍यादा युवा पीढ़ी के लोग इनको भी नहीं झेलते। साहित्‍यकार की एक रचना पढ़ने में कम से कम आधा घंटा और समझने में जीवन लग जाता है, लेकिन युवा पीढ़ी का जीवन भी इतना नहीं है कि वे जबरन में अपना समय नष्‍ट करें और रचनाओं को पढ़ कर उनके मर्म को समझते हुए जीवन में उतारे। आज के युवा के पास बस वही 15 से 20 सेकेण्‍ड का समय है, जिसमें वे हास्‍य, करूण और फुहड़ से भरे अर्द्ध नग्‍न नारियों के उघाड़े बदन को देख कर अपना मनोरंजन करते हैं। कवि सम्‍मेलनों में भी वे उन लोगों के लिए जाते हैं जो कविता के नाम पर चुटकुले सुना कर लोगों को उनकी तकलीफों से थोड़ी देर के लिए उन्‍हें दूर कर दें।
उन्‍होंने एक लम्‍बी सांस लेते हुए अपने दर्द को बयां किया कि अब वे भी साहित्‍यकार नहीं रहे। भले ही उनकी कुछ पुस्‍तकें प्रकाशित हो गई हो और बाजार में उपलब्‍ध भी हो, लेकिन जब भी पुस्‍तक मेला लगता है, उन पुस्‍तकों को खरीदने के लिए लोगों को प्रोत्‍साहित करना और खुद का प्रचार सोशल मीडिया के जरिए करना पड़ता है। पुस्‍तकें भी बाजार में कम और ऑनलाइन प्‍लेटफार्म पर ज्‍यादा बिकती है। आजिविका के लिए उन पुस्‍तकों की रॉयल्‍टी से पेट नहीं भरता। अब उनकी आवाज में लगभग आत्मिक रूदन सा लगने लगा था जब वे कहने लगे, मुझे लोग कंटेट रॉयटर के नाम से जानते हैं। मैं ही कथित युवा सोशल मीडिया के कलाकारों के लिए अपने जीवन को चलाने के लिए बेमन से लिखता हूँ। मेरे लिखे आइडियास में जब गालियों की भरमार के साथ कोई विडियो आता है तो मन विचलित हो जाता है, लेकिन पेट का सवाल है, साहित्‍य की आड़ में ऐसा लिखना पड़ रहा है। उन्‍होंने बड़े ही द्रवित अंदाज में लगभग तंज की शैली में कहा तुम भाग्‍यवान हो कि तुमको इन्‍होंने अब भी साहित्‍यकार मान कर इनके कार्यक्रम में बुलवाया है। उन्‍होंने लगभग सलाह भरे वचनों से कहा साहित्‍य में अब लोगों की रूचि नगण्‍य सी हो गई है, तुम भी इनके लिए नए अंदाज के कंटेट लिखने में अपना हृदय परिवर्तन कर लो, नहीं तो वह समय दूर नहीं जब तुम समाज से नकार दिए जाओ।
सम्‍मेलन के नाम में जरूर सोशल है, लेकिन समाज किस ओर जा रहा है, इसे नजदीक से देखने का अवसर मिला है। इसमें सोशल जैसा कुछ नहीं सब कुछ वही मिलेगा, जिसके लिए तुम साहित्‍य में लिख कर लड़ते रहे। उन्‍होंने पूछा- तुमने इतना लिखा, मैंने इतना लिखा क्‍या तुम किसी सरकार के ब्रांड एम्‍बेसेडर बन पाए। तुमको कोई सम्‍मान मिला है। मैं अवाक सा उनकी बातों को सुन रहा था और समाज के बारे में सोंच रहा था। हमने गणित पढ़ाया, विज्ञान पढ़ाया, हिन्‍दी और अंग्रेजी को भाषा के रूप में पढ़ाया लेकिन साहित्‍य के रूप में हिन्‍दी और अंग्रेजी को स्‍थान ही नहीं मिल पाया। मात्र एक विषय बन गया। इसमें लिखी बातों को बच्‍चे पढ़ते तो हैं, लेकिन स्‍कूल तक सीमित रखते हैं और बाद में मौका मिलने पर तुरंत छोड़ देते हैं। साहित्‍य में रूचि पढ़ने का अभ्‍यास वो तकनीक में करने लगे हैं। अब बच्‍चों को भी हर बात विडियो देख कर ही समझ आती है। समय बदल रहा है, हमको भी बदले हुए समय के साथ चलना पड़ेगा नहीं तो आउट ऑफ डेट साहित्‍यकार का तमका लेकर भूखमरी का जीवन काटना। मुझे उनके साहित्‍य प्रेम की कटूता से भरे शब्‍दों में जीवन जीने की कला तो समझ आई, लेकिन प्रेमचंद के उपन्‍यास और महादेवी वर्मा की कहानियां भी याद आई कि उन्‍होंने यथार्थ जीया और लिखा, कहां गए वे लोग जो प्रेमचंद के उपन्‍यासों को प्रेम से पढ़ते थे और उनमें अपने जीवन को तलाशते थे।
मुझे उनके करूणा भरे रूदन के साथ साहित्‍य की वह वेदना भी दिखाई दी जो किसी भी साहित्‍यकार को साहित्‍यकार को साहित्‍यकार होने पर मजबूर करती है। मैंने इतना अपनाया कि जिस सम्‍मेलन का निमंत्रण मिला था, उसमें गया ही नहीं।                                                               -संजय भट्ट

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Very nice

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