मंगलवार, 26 अप्रैल 2022

जिन्‍दगी का असली मजा

 

(संजय भट्ट)

 

फालतुचंद, फोकटनन्‍दन काम न धाम बस चारो पहर आराम यही आलम था उनकी जिन्‍दगी का। दोनों टाईम खाना मिल जाता था, कभी-कभी कामकाजी दोस्‍तों की मेहरबानी हुई तो शाम को पीने का भी इंतजाम हो जाता था। कसम से भाई साहब बाप कमाई का जो मजा है, जो वह खुद की जिम्‍मेदारी में कहां। हां वैसे कोई यह भी नहीं कह सकता कि कोई काम नहीं करते, क्‍योंकि उनके पिताजी अपनी जांघ उघाड़ने से डरते थे, सो कह देते बेटा अभी पढ़ाई कर रहा है और साथ में थोड़ा अपना काम भी कर लेता है। शादी ब्‍याह में उनको नए कपड़े चाहिए थे, जूते भी बदल-बदल कर पहनने का शौक रखते थे। उनके अपने शौक वैसे काफी अजीब थे। क्‍या करते फोकटनन्‍दन जो ठहरे। कुल मिला कर मस्‍त लाईफ थी भाई साहब

अब आदमी के पास काम हो तो विचार कम आते हैं,लेकिन काम नहीं हो तो विचारों की ऐसी श्रंखला चलती है कि रूकने का नाम नहीं लेती। गंगा से भी तेज धार और ब्रहृमपुत्र से लम्‍बा विस्‍तार होता है विचारों में। हां काम करते रहे तो सृजनात्‍मक विचार आते हैं, किसे कैसे बनाना है, कैसे संवारना है, काम कैसे होगा यही सोंचता है आदमी, लेकिन काम नहीं हो तो विचारों का प्रवाह दुर्गम रास्‍तों से गुजरते हुए विध्‍वंसक हो जाता है। यह कैसे टूटेगा, इसे कैसे तोड़ा जाए और यह टूट जाता है तो कितना मजा आएगा। सारा मतलब बस मजे से जुड़ा हुआ है। यह मजा नहीं तो जिन्‍दगी का क्‍या मतलब, ऐसे ही आए थे, ऐसे ही चले जाएंगे दुनिया से। वहॉं भगवान ने पूछा कि क्‍या किया धरती पर तो क्‍या जवाब देंगे।

कुछ दिनों तक तो वे घर में रहे फिर उन्‍होंने अपने श्री चरण बाहर निकाले तो पता चला कि उनकी बिरादरी के लोगों की संख्‍या अधिक है और हमारा देश तो लोकतंत्र वाला है यहां बहुमत वालों की जीत होती है। यह सब पढ़ा था तो काम आ गया कि अपनी संख्‍या बढ़ रही है तो निश्चिततौर पर हमारा ही बहुमत होगा। इनको खुद पर शंका होने लगी थी, कि ये पढ़े लिखे भी है। मतलब ये कि फोकटनन्‍दन रहते हुए भूल चुके थे कि वे शिक्षित है और उनकी समझ भी काम करती थी। अब वे सिर्फ और सिर्फ भीड़ का हिस्‍सा हुआ करते थे। उनका रिमोट कंट्रोल किसी ओर के हाथ में था। जैसा बटन दबाया जाता वैसा ही नाच लेते थे। इनके नाच पर मिलने वाली वाह-वाही ने इनका दिमाग सातवें आसमान पर कर दिया था। अब ये अपने कामकाजी मित्रों से श्रेष्‍ठ थे और अपनी श्रेष्‍ठता का बखान भी खुलकर करने लगे थे। भूल गए है कि वह सिर्फ भीड़ का एक हिस्‍सा मात्र है, जिसका संचालन किसी के इशारे पर अपने लाभ के लिए हो रहा है।

यह बीमारी थी और बीमारी कभी भी लिंग भेद नहीं करती सभी में समान रूप से पाई जाती है, लेकिन इसके भी वेरिएंट है। यह अलग-अलग प्रकारांतर से पाई जाती है। पहला वेरिएंट किसी रिमोट से संचालित होता है तो दूसरा वेरिएंट भावनाओं और घर परिवार की सुख शान्ति और समृद्धि के टोटकों से चलता है। यहां परिवार को लेकर ऐसे-ऐसे टोटके बताए जाते हैं कि सभी को लगता है कि बस लक्ष्‍मीजी उनके दरवाजा खोलने का इंतजार कर रही हो और वरदान सिर्फ इन्‍हें ही मिलेगा। ये भी जब शामिल होते हैं तो भूल जाते हैं कि यह भी उसी भीड़ का हिस्‍सा है जो सब यहां इसी उद्देश्‍य को लेकर आएं हैं, जिस उद्देश्य को लेकर वे यहां है। इस वेरिएंट की एक खासियत और है, यह बिना विचार किए चार अन्‍य लोगों को भी संक्रमित कर देते हैं। इस बीमारी वायरस भी ऐसे ही काम करता है, जैसे सभी को वह कुबेर के समान धनी और इन्‍द्र के समान सुखी राजा जैसा जीवन बना देगा।

किसी ने ठीक ही कहा है भीड़ में सिर होते हैं, दिमाग नहीं। यदि दिमाग होता तो भीड़ नहीं होती और भीड़ के पास काम होता तो क्‍या वे फोकटनन्‍दन कहलाना पसन्‍द करते। बस अपना काम करते और उन्‍हीं के कामकाजी जीवन की कमाई से जीवन को धन्‍य कर लेते, लेकिन जीवन की धन्‍यता और श्रेष्‍ठता फोकटनन्‍दन रहने में हैं, क्‍योंकि कामकाजी जीवन में मजा नहीं है और जीवन का मजा है तो फोकटनन्‍दन कहलाने में भी शर्मिन्‍दगी नहीं होगी। वे तो अपने जीवन का असली आनन्‍द ले रहे और इन आनन्‍द के क्षणों के लिए उन्‍हें कोई कुछ भी कहे कोई फर्क नहीं पड़ता है। 


शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

काम का आदमी

 

(संजय भट्ट)

 

काम का आदमी भी बड़े काम का होता है, लेकिन जब तक काम का होता है, तभी तक काम का होता है बाद में बेकाम का हो जाता है। वास्‍तव में आदमी या तो काम का होता है या बिना काम का। जब यह काम का होता है, इसकी खूब इज्‍जत की जाती है। घर में भी सबका लाड़ला रहता है और अगर बाहर वालों के काम करे तो बाहर वालों का भी। बस इसकी किस्‍मत में कुछ ऐसा लिखा होता है, यही काम का आदमी है और बा‍की जगत में सब बेकाम के। इसको काम सौंप कर सब निश्चिंत हो जाते हैं और यह भी इतना बेवकुफ होता है कि अपनी थोथी इज्‍जत की पोटली सिर पर रख कर अपनी जिम्‍मेदारी से ज्‍यादा काम कर देता है।
दरअसल एक चने के झाड़ की कहावत है, जो इस काम के आदमी पर फिट बैठती है। यह काम का आदमी इस चने के झाड़ पर बैठ कर यह सोंचता है कि यहीं से दुनिया दिखती है, लेकिन इसे पता भी नहीं चलता कि इस चने के झाड़ का तना बहुत ही पतला होता है। मामूली सी हवा के चलने से हिल जाता है और इस पर बैठने वाला गिर जाता है। यह सब उस समय पता चलता है जब इस काम के आदमी को किसी की सहायता की जरूरत पड़ती है। कहने को तो सब इसी के बहुत करीबी हुआ करते है, लेकिन बस यही सबका करीबी होता है इसका करीबी कोई भी नहीं होता है। यह काम,काम और सिर्फ काम के लिए बना होता है, जैसे ही किसी काम से इसकी हिम्‍मत जवाब देने लग जाती है, इसको भी जवाब मिलने लग जाते हैं। यह किसी के काम करे तो वह इसको खूब मान सम्‍मान देता है, लकिन जैसे ही किसी काम से इसको उस आदमी की जरूरत पड़ती है, जिसका यह काम करता है तो वह इसे हर मौके से अपनी परेशानी बता कर निकल लेता है।
काम के आदमी की एक परेशानी यह भी है कि यह भावुक किस्‍म का होता है। किसी के भी बहकावे में आकर काम करने लगता है। ऐसा नहीं है कि इसका मन कभी काम नहीं करने का नहीं होता लेकिन यह कभी अपनी शान, कभी अपने खास की इज्‍जत और कभी काम बताने वाले की मजबूरी को समझ कर काम कर देता है। इसकी इसी भावनाओं को लोग इसकी बेवकुफी समझने लगते हैं और फिर यह शोषण का शिकार होता रहता है। यह काम का आदमी सलमान खान के उस डॉयलाग की तरह होता है, जिसमें यह कहा गया है कि ‘’एक बार कमीटमेंट कर दी तो खुद की भी नहीं सुनता हॅू।‘’ काम करना इसका शौक होता है, इसको समझाओ तो भी नहीं समझता। वास्‍तविकता यह है कि जब यह काम का नहीं रहता या इसको किसी से काम होता है तो लोगों की पीठ ही देखने को मिलती है।
इस काम के आदमी के कहीं से जाने और कहीं पर जाने मात्र से लोगों की चिन्‍ता बढ़ती घटती है, लेकिन यह होता है हरफनमौला पानी की तरह, जिस बरतन में फिट करना चाहो  आसानी से हो जाता है। कई बार यह हंसी का पात्र भी बन जाता है, क्‍योंकि इसको नीचा दिखाने वालों की फौज होती है। दरअसल यह रूपए की तरह बार-बार गिर कर संभलने का भी हुनर रखता है, इसलिए इसको कोई फर्क नहीं पड़ता। यह कई बार औंधे मॅुह गिर कर ऐसे उठ खड़ा होता है जैसे शेयर मार्केट हो। हमेशा नए नए प्रयोगों और गिर कर उठने की कला के कारण ही यह समाज के विभिन्‍न स्‍थानों पर विभिन्‍न मौकों पर अगल-अलग स्‍वरूप में पाया जाता है। जिस दिन समाज, परिवार, देश और इसके विभिन्‍न कार्यस्‍थल इसकी भावनाओं को समझ कर इसकी वास्‍तविक इज्‍जत करने लगेगा और इसको भी इतना ही सहयोग देने लगेगा, जितना यह सब को बिना किसी लाभ की भावना के देता है, उस दिन सिर्फ यही नहीं हर आदमी का आदमी हो जाएगा। 


रविवार, 17 अप्रैल 2022

समझ का फेर

 (संजय भट्ट)
जब भी  देखो पराई थाली में घी ज्‍यादा ही दिखाई देता है। अपनी अपनी खिचड़ी सब को सूखी ही दिखती है। अब ये काई छोटी मोटी समस्‍या नहीं है। इससे हर आदमी दुखी है। घर में परिवार में यहां तक की खाने की एक टेबल पर पति पत्‍नी भी। क्‍या करें अब दिखाई देता है तो न‍जरिया बदल लो, लेकिन यह स्‍वाभविक प्रकिया है, इसमें सुधार का मतलब भगवान की कृति पर संदेह करना।  जो भी बनाया भगवान ने ही ऐसा बनाया, अब किसी कंपनी डिफेक्‍ट का क्‍या सुधार जो वहीं से खराबी आई है उसको रिप्‍लेस ही किया जा सकता है। चूंकि मानव भगवान की कृति है और नो वारंटी, नो गारंटी, जैसा है रखना पड़ेगा और एक बार भेजे गए आइटम में वापसी की कोई शर्त शामिल ही नहीं होती है। उसमें जो है, वह मुझमें क्‍यों नहीं, क्‍या मैं नहीं कर सकता, मुझे चैलेन्‍ज मत करना ऐसी भावनाएं सभी के अंतर मन में कभी न कभी उद्वेलित होती है।  बस सब भावनाओं का खेल ही तो है। कुछ समझदार इस खेल के माहिर होते हैं, कब, कैसे और किसके साथ खेलना है, कैसे जीतना और किसको जितवाना है, सब गणित बैठा कर खेल की शुरूआत कर देते हैं। खासियत यह कि यह खेल खुद नहीं खेलते बल्कि इनकी तरफ से इनके खिलाड़ी खेलते हैं, खिलाड़ी क्‍या मोहरा कहो, जो शह और मात को समझे बिना मैदान में उतर जाते हैं और फिर नतीजा जो भी हो, इसकी परवाह नहीं करते।

पराई थाली हो या पराया कोई भी अपनो से इतर कोई पसन्‍द भी नहीं आता है। अपना तो अपना होता है और परया, परया होता है। इन परायों से कैसी सहानुभूति जब ये अपनो से सहानुभूति नहीं रखते तो इनसे हम सहानुभूति क्‍यों रखे। क्‍या मिलेगा इस सहानुभूति से हमें। एसे ही सवालों से घिरे हुए वो घर लौट रहे थे, कहीं से एक पत्‍थर आकर उनको लग गया। अब पत्‍थर लगा तो चोंट आना स्‍वाभाविक ही थी। उनको शारीरिक चोंट तो लगी थी, मानसिक रूप से चोंटग्रस्‍त हो गए थे। उन्‍हें लगा उन्‍होंने जिन्‍दगी में किसी का नुकसान नहीं किया, किसी की भलाई-बुराई में नहीं रहते। सीधा ऑफिस से घर और घर से ऑफिस ही आना जाना था। न किसी से राम-राम और न हीं किसी से दुआ सलाम की दरकार रखते थे। उनको शारीरिक चोंट का दर्द कम और मानसिक चोंट का दर्द अधिक सता रहा था। बुझा हुआ सा चेहरा लेकर घर पहॅुचे तो पत्‍नी ने पूछा- क्‍या हुआ, कहां से पीट कर आ रहे हो। दरअसल पीटने पर एकाधिकार उनकी पत्‍नी का ही था, सो लगा किसने उनके अधिकार पर हमला कर दिया। इसी सोंच विचार न जाने कब बच्‍चों को पता चल गया कि पापा को किसी ने पत्‍थर मार दिया है। बस बच्‍चे तो थे ही, निकल पड़े पत्‍थरबाज की तलाश में आखिर उनके पिता की अस्मिता और माता के एकाधिकार का मामला था। फिर किसी पराए ने ही मारा है तो सबक सिखाने की धून सवार हो गई।

पापा से सभी की पूछताछ चल रही थी। सवालों का बवाल सा मचा हुआ था, पत्‍नी, बच्‍चे और बच्‍चों के दोस्‍त सभी के सवालों-सवाल चल रहे थे। कहां से गुजर रहे थे, आपके आगे-पीछे कौन चल रहा था। क्‍या पहना था, कैसा दिख रहा था। उसके हाथ में क्‍या था, आपको किसने बचाया, आप को और तो कहीं चोंट नहीं आई। सवालों से घिरे वे हमेशा की तरह चुपचाप अपना मुँह बंद किए हुए थे। किसी ने झकझोर कर पूछा- आखिर हम आप से पूछ रहे हैं, कुछ तो बताओ किसने पत्‍थर चलाया। वे समझदार थे, शिक्षित थे, बच्‍चों की नादानियों से ऊपर की सोंच रखते थे, उन्‍हें पत्‍थर की चोंट खटक रही थी, लेकिन उससे कहीं ज्‍यादा टीस उन सवालों से हो रही थी जो अपने हीं पूछे जा रहे थे। उन्‍होंने मुँह खोला तो सिर्फ चंद लफ्ज ही फूटे जिसमें उन्‍होंने कहा गलती मेरी थी। पेड़ के नीचे से गुजर रहा था और कच्‍ची केरियों से सजे आम के पेड़ पर तो उन्‍होंने भी बचपन में खूब पत्‍थर बरसाएं हैं, शायद उन्‍हीं में से कोई एक आज उन्‍हें लग गया। दरअसल वे जानते थे कि उन्‍हें पत्‍थर किसी पराए ने नहीं बल्कि अपने ने मारा है, लेकिन अपनी जुबान को खोल कर वे कोई बवाल नहीं चाहते थे। आज उनको अपनी थाली में घी ज्‍यादा दिख रहा था, यह उनकी शिक्षा और समझ का परिणाम था कि किसी के बहकावे में आए बगैर वे सभी का सम्‍मान और खुद के निर्णय लेते थे।  

शनिवार, 16 अप्रैल 2022

चर्चा पर चर्चा

  (संजय भट्ट)

दरअसल इन दिनों चर्चाओं का प्रचलन सा चल गया था। इसपर चर्चा, उसपर चर्चा, हर बात पर चर्चा और चर्चा के नाम पर वार्ता। सुना था चर्चा दो व्‍यक्तियों के बीच का वह संवाद है, जिसमें एक सार्थकता का भाव छिपा होता है। यहां सार्थकता का कोई मायने नहीं रखती है, बस चर्चा होना चाहिए और चर्चा भी ऐसी कि जिसका कोई अंत नहीं हो। एक बार बोलना शुरू करें तो बस बोलते ही चले जाएं। इसमें जिसके लिए चर्चा हो रही होती है, वह चर्चा को सुनता नहीं और जिनकों चर्चा से कोई लेना देना ही नहीं वे चर्चा में उपस्थित लोगों के आंकड़े जुटाने लगे होते हैं। मतलब यह कथित चर्चा बनाम वार्ता बेनतीजा और बेमतलब होती है। इसमें सुनने वालों को अपनी चर्चा से फुर्सत नहीं होती है और बोलने वाले को उपस्थिति के आंकड़ों से मतलब होता है। इस बीच पीसता है वह तीसरा जिसकी जिम्‍मेदारी उपस्थिति के आंकड़े जुटाने लेकर चर्चा का प्रचार करने तथा उपस्थिति के लिए लोगों को आमंत्रित करने की होती है।

लोगों का क्‍या है, वे तो फुर्सत में होते हैं तथा ऐसेी चाय, नाश्‍ता और फोकट की खातिरदारी वाली चर्चा सुनने के लिए कहीं भी जा सकते हैं। वैसे चर्चा किसी भी विषय की हो, सिर्फ उपस्थिति की जरूरत होती है और उपस्थिति में हर बार वे ही व्‍यक्ति शामिल होते हैं, जिनकों उन चर्चाओं से कोई लेना देना नहीं होता है। उनका मकसद ही सिर्फ वाह-वाही होता है और अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने से होता है। चर्चा की घोषणा होती है, प्रचार होता है, चर्चा करने वाले की ओर चर्चा में सुनने वालों की उपस्थिति का आदेश होता है, लेकिन फिर भी इस चर्चा के लिए कुछ चुनिन्‍दा लोग है, जिन्‍हें नहीं बुलाया गया तो ऐसे रूठ जाते हैं, जैसे कोई गर्लफ्रेंड अपने बॉयफ्रेंड से रूठ जाती है। ये आते सभी है, लेकिन फिर भी इनको बुलाया जाना आवश्‍यक होता है। यदि गलती से कोई बुलावे में छूट जाए तो बकायदा नाराजगी व्‍यक्‍त कर देख लेने तक की धमकी भी दी जाती है। कई बार तो देख भी लिया जाता है। शुरू-शुरू में किसी को पता नहीं चला कि किसको बुलवाया जाए और किसको छोड़ा जाए लेकिन कुछ ही दिनों में उपस्थिति के आंकड़ों से पता चलने पर ऊपर से ही आदेश हो गया कि चर्चा कोई भी हो, किसी के भी लिए हो लेकिन फलां-फलां को बुलाया जाना प्रोटोकॉल होगा। इनमें से किसी उपस्थिति में कमी का हिसाब भी रखा जाने लगा और अगली बार से उनकी रेटिंग भी की जाने लगी। इस रेटिंग का नतीजा यह हुआ कि चाहे कितना भी जरूरी काम हो चर्चा वाले दिन उपस्थित होना जरूरी हो गया।

इस तरह की रेटिंग और इसके लाभ को देखते हुए कुछ और फुरसतियों की भीड़ जुटने लगी। कहीं एक के साथ एक फ्री के विज्ञापन वाला आलम होने लगा। जिनकों भी चर्चा में आमंत्रण दिया जाता उनके साथ एक दो व्‍यक्ति ऐसे होने लगे जो रेटिंग के कारण उपस्थित होते थे। पहले ही साफ हो चुका है कि  न तो चर्चा की सार्थकता से कोई लेना देना है और न ही क्‍या कहा जा रहा है यह कहने और सुनने से मतलब है। कहने वाला भी कुछ भी कह जाता और सुनने वाले भी चुपचाप इस कान से सुनकर उस कान से निकाल देते हैं। जब सिर्फ सुनने में उपस्थिति ही मायने रखती है तो सुन लिया करते हैं, क्‍योंकि इस चर्चा का इतनी सारी चर्चा टीवी, अखबार और सोशल मीडिया पर हो जाती है कि सुनने वाले अनसुना कर चर्चा के दौरान अपने मोबाईल पर बतियाते रहे या आपस में अपनी चर्चा करते रहे, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। इन सभी चर्चाओं में उपस्थिति का एक फोटो भी होता है और उसका भी प्रचार किया जाता है। चर्चा में एक खास बात और होती है कि जिससे चर्चा की जा रही है वह सम्‍मुख ही नहीं होता सिर्फ ऑनलाइन अपनी बात रख रहा होता है। धन्‍य है आज का डिजीटल युग जिससे ऐसी चर्चा संभव हो सकी है, अन्‍यथा चर्चा में आमने-सामने होकर ध्‍यानपूर्वक सुनना होता और पूछने पर जवाब भी देना पड़ सकता था। इसमें प्रमुख चर्चाकर्ता भी बहुत मजेदार किस्‍सागोई कर रहा होता है, दरअसल उसने कभी किया ही नहीं होता है, जिसका कोई सबूत भी नहीं होता है उसको अपने नाम के कारनामें के साथ प्रस्‍तुत कर देता है और दूसरे दिन सुनने वाले भी इसकी चटकारे लेकर तारीफ कर रहे होते हैं, क्‍योंकि बोलने वाले की सिर्फ तारीफ का अधिकार है, प्रमाण मांगने का अधिकार किसी के पास नहीं है। विचार कर रहा हॅूं मै भी इस तरह की चर्चाओं का हिस्‍सा बन जाऊँ और वो सारी तकलीफें उन सुनने वालों की तरह भूल जाऊॅ जो आज मेरे और मेरे जैसे करोड़ों लोगों के सामने अपना मुँह फैलाए खड़ी है, जिसका हल मेरे सामने नहीं है। काश मेरे भी भूखे बच्‍चे ऐसी चर्चा की प्रेरणा से ही अपना पेटभर लेते।

गुरुवार, 14 अप्रैल 2022

बदलाव की बयार और मॉ की कोख

 ■ संजय भट्ट  

युद्ध की घोषणा होने के तुरंत बाद बदलाव की बयार चल रही थीहर कोई अपना पुराना चौला उतार कर नया रंग चढ़ाने को आतुर था। सब कुछ बदल जाने का डर सता रहा थाअर्श से फर्श पर आने का भय मन में जम चुका था। कोई प्रतिष्‍ठा बचाने के लिए तो कोई प्रतिष्‍ठा बनाने के लिए अपनी निष्‍ठा को दॉव पर लगा चुका था। हर आदमी बदलाव की बयार में बहने को तैयार था। लग रहा था इस बार कोई नहीं बचेगापुरा का पुरा मंज़र ही बदल जाएगा। बरसों से जिसके साथ थेजिसके हम निवाला हम प्‍याला थेउन्‍हीं से नफरत होने लगी थी। मन कर रहा था कि जैसे भाग जाएं। जैसे की भागने की प्रथा की शुरूआत हुई डूबते जहाज से चूहों की तरह भागने वालों की होड़ लग गई। हर आदमी भागने की चर्चा करने लगा था। उसे अपना दम घुटते नज़र आ रहा था। घर का माहौल ही खराब हो चला था। सभी बड़े सोंच रहे थेकि क्‍या किया जाए किसको कैसे रोका जाए ? कैसे अपना घर बचाया जाए? घर में जो सेंध लगी हैउसके लिए क्‍या उपाय किया जाए?  

इतने सारे सवालों के बीच किसी ने सलाह दीउनके तरफ का कोई अपने पाले में लिया जाए ! बस फिर क्‍या थाअंधेरे में एक चिंगारी मिल गई। सारी की सारी फौज यह तलाश करने में जुट गई कि वह कमजोर कड़ी कौन होगा? आखिर ''हिम्‍मत ए मर्दा तो मदद ए खुदा'' एक कमजोर ही सही पर कड़ी मिल गईउसे अपनी ओर मिलाया गया। सभी को युद्ध में जीतना थाकिसी को हार का कड़वा रस नहीं पीना था। वे लगातार यह घोषणाएं कर रहे थे कि हमने सब के लिए सब कुछ किया हैलेकिन सामने वालों की दलीलों में भी दम था। दोनों ओर से आरोपों प्रत्‍यारोपों की तोपेंतीरतलवार और गोलियों की बौछार हो रही थी। इस बीच निर्णायक ने युद्ध का नियम ही बदल दिया। कोई आमने सामने कुछ नहीं बोलेगाबस छिप कर वार करना होगा। जैसे ही युद्ध के नियम बदले उनकी ओर से बोलने वालों के वारे न्‍यारे हो गए। लगातार ऑनलाइन काम करने वाले अनुभवी सैनिकों को तलाशा जाने लगा। वहां गरीबीबेरोजगारी और अपनी टीम के लिए काम करने वाले सैनिकों की कमी नहीं थी।  

सैनिकों की फौज़ बनाने और बनने को कई तैयार थेलेकिन सेना की रसद का इंतजाम कर पाना सभी के बस की बात नहीं थी। सब को पता था कि रसद किसके पास है और कौन किसकी रसद को रोक सकता है। नियम बनाने वाले भी एक ओर मिल गएक्‍या करते बैचारे रसद का सवाल उनके भी सामने था। उन्‍हें कहा गया कि दूसरी सेना की रसद को काटना हैध्‍यान रहे कोई उनको किसी भी प्रकार की मदद नहीं करे। यदि मदद की तो उसको इस लायक बनाओ कि वह भविष्‍य में किसी की मदद करने के लायक नहीं रहे। इसी उधेड़बुन में रसद पहॅुंचाने वालों की तलाश होने लगीपता ही नहीं चला कि कौन किसको रसद पहॅुचा रहा है। बस एक ही धून थी रसद रोकना है। अब इसी गलतफहमी में दूसरी सेना के स्‍थान  पर अपनी सेना के रसद देने वालों को ही धर लिया। यह सब चल रहा थालेकिन निर्णायक को यह भी साबित करना था कि वह किसी से मिला हुआ नहीं है। सो धर लिए गए उनके बारे में प्रचार को रोका गया।  

इतना सब चल रहा था मैदान में कई तारे-सितारेयोद्धा-महायोद्धा और इन योद्धाओं को ज्ञान देने वाले ज्ञानचंदों की भी निष्‍ठा खरीदी जाने लगी। खरीदी बिक्री के इसदौर में सब कुछ बदल रहा था। कहीं कोई टूटे बल्‍ब खरीद रहा था तो कोई नई एलईडी कोलेकिन चमकेगा कौन यह किसी को पता नहीं था। बदलाव के इस नाटकीय खेल में वो सब कुछ बदल गयाजिसका अनुमान भी नहीं लगा सकते थे। अपनी निष्‍ठाप्रतिष्‍ठा तो कई लोग बदल चुके थेलेकिन मामला उस समय गंभीर हो गया जब एक गर्भस्‍थ शिशु ने अपने मॉं की कोख ही बदल ली। उस मॉं को कितना भरोसा था अपने मॉ होने पर लेकिन बदलाव की बयार थी और जब सब कुछ बदल रहा थासब को लग रहा था कि यहां अपना भविष्‍य ही सुरक्षित नहीं है, तो उस गर्भस्‍थ को भी लगा यहां मेरा जन्‍म ही सुरक्षित नहीं है।  

 


मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

फारवर्डिंग ऑफिसर

(संजय भट्ट)

 

ये पढ़े लिखे काममाजी लोग भी अपनी सुविधा के लिए नए-नए प्रयोग करते रहते हैं। बस इन आविष्‍कारों से इनको सुविधा हो जाना चाहिए, चाहे किसी को भी कोई परेशानी हो या परेशानी बढ़ जाए। ऐसे ही कोरोना महामारी के चलते इन्‍होंने जीवन में बड़ें बदलाव किए हैं, इनमें से एक बड़ा बदलाव है- वर्क फ्राम होम। घर बैठे अभी तक ऑनलाइन सामान मिलने से लोग ठीक से परिचित भी नहीं हुए थे कि एक और नया फार्मूला सामने आ गया, घर बैठे काम। इसमें कुछ को बड़ा फायदा हुआ तो कुछ को नुकसान भी हुआ। अब सिक्‍का उछलेगा तो खड़ा तो रहेगा नहीं, किसी को फायदा तो किसी को नुकसान भी स्‍वाभाविक ही है। ऐसे ही और नया-सा शब्‍द सामने आया फावरर्डिंग ऑफिसर।
नाम तो कामकाजी लोगों का है, लेकिन लगता है किसी ऑनलाइन गैम जैसा। इस शब्‍द को अभी किसी डिक्‍शनरी में स्‍थान नहीं मिला है और राजभाषा के विभाग से मान्‍यता प्राप्‍त है, फिर भी प्रचलन में है। इस शब्‍द ने ठेठ अंतिम रूप से काम करने वालों को मुसीबत में डाला हुआ है। यह इन दिनों व्‍हाटसएप, टैलीग्राम और ई मैल जैसे गजेट्स के साथ काम कर रहा है। व्‍हाट्सएप पर तो इसका प्रभाव बहुत है। इसके कारण काम भी प्रभावित हुआ है और ऑखें भी लेकिन कौन मानता है, सभी के जुंबा पर एक शब्‍द रटा दिया गया है, मुझे व्‍हाट्सएप पर भेज दो। सुविधा के लिए इजाद किया गया यह फार्मूला यह बता कर उपयोगी बना दिया गया है कि इससे समय तथा धन की बचत होती है, लेकिन इससे कितनी मुसीबत हो जाती है, इसका किसी को भी अंदाजा नहीं है।
ऐसे ही एक लेटर चला और जहां से चला वहीं के कार्यालय में ही इसका उपयोग भी होना था, लेकिन इस फारवर्डिंग ने ऐसी आदत बिगाड़ी कि यह ठेठ नीचे के कार्यालय में पहॅुच गया, जहां इस लेटर की कोई जरूरत भी नहीं थी। अब यह फारवर्ड की बीमारी के कारण पहॅुच ही गया तो नीचे के कार्यालय वालों ने भी सोंचा इसका उपयोग नहीं है, डिलिट कर दिया जाए। बस ऐसे ही एक और नया आविष्‍कार हो गया डिलिट। ऊपर के कार्यालय वाले आदेश जारी करते, बीच वाले बिना देखे फारवर्ड करते और नीचे वाले उसे डिलिट कर देते। महत्‍वपूर्ण मामलों में भी यही होने लगा, कुछ मामलों में जांच हुई तो सामने आया कि जिसने वह आदेश बनाया था उसने पढ़ा और किसी को पता भी नहीं कि क्‍या हुआ। लेटर बनाया उसे व्‍हाट्सएप पर भेजा भी लेकिन फारवर्ड होते होते वह कब डिलिट की श्रेणी में आ गया पता भी नहीं चला। इस ऑनलाइन काम की एक बड़ी खासियत यह भी है कि इसमें आसानी से झूठ बोला जा सकता है और अपनी जिम्‍मेदारी से बचा जा सकता है, क्‍योंकि इसका कोई रिकार्ड नहीं होता है और रिकार्ड होता भी है तो साइबर फारेंसिक जैसी लम्‍बी जांच के बाद पता चल पता है।और अब ऐसे में रिस्‍क कौन ले सब यह सोंच कर टाल देते हैं।
इसी टालू प्रवृत्ति के चलते काम टालने की परंपरा का भी जन्‍म हो गया। बड़े ने अपने से छोटे को काम सौंपा, उसने बीच वालों को और बीच वाले ने छोटों को सौंप दिया। इसी तरह सब एक दूसरे से पूछते रहते हैं और काम काम की जगह बना रहता है। ऊपर से लेकर नीचे तक के सभी ने एक और इजाद की है, इसका नाम है- ‘’आप सभी निर्णय के लिए स्‍वतंत्र है’’ लेकिन स्‍वतंत्र कौन हुआ यह तो वह ही जानता है जो इसको कह रहा है। मामले टलते रहते और फारवर्डिंग का काम भी चल रहा है। इसके प्रभाव से बीच के काम करने वालों को अत्‍यन्‍त सुविधा हुई है और इसी के कारण इन बीच के काम करने वाले अधिकारियों का नाम फारवर्डिंग ऑफिसर हो गया है, लेकिन इनको यह नहीं भूलना है कि यहां सैर के सवा सैर मौजूद है, जिन्‍होंने फारवर्डिंग का तौड़ डिलिट के रूप में निकाल लिया है। 


साहब की नाराजगी

 

संजय भट्ट  

बसंत के पीले-पीले फूल भी उनके क्रोध को शांत नहीं कर सके। वे हमेशा किसी-न-किसी बात को लेकर नाराजगी व्‍यक्‍त करने से नहीं चूकते थे। उनको एहसास हो चला था कि उनके नाराज होने से काम हो जाते हैं, लेकिन वे भूल रहे थे कि चाणक्‍य ने कहा है 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' । उनका गुस्‍सा अब आम हो चला था। वे नाराज होते, थोड़ी भोंहे तानते, लेकिन जानते थे कि काम तो कल को इन्‍हीं से करवाना है। बस उनको को तो नाराजगी इसलिए व्‍यक्‍त करना होती थी कि चलता काम दौड़ने लग जाए और सरकारी दौड़ में खुद को सबसे आगे पेश कर सके। इसी आदत के कारण कई बार वे रात को नींद में भी नाराज हो जाते। सुबह पत्‍नी बताती कि आप रात में नाराजगी व्‍यक्‍त कर रहे थे। ऐसा भी नहीं था कि वे हमेशा ही नाराज होते थे, उन्‍होंने एक दिन तय कर रखा था, जिसमें खासतौर से नाराजगी व्‍यक्‍त करते थे। अब तो अखबार वालों को भी खबर हो गई थी कि आज साहब नाराज होंगे, बस यह पता नहीं होता था कि किससे और क्‍यों नाराजगी व्‍यक्‍त करेंगे और उस नाराजगी का क्‍या असर होगा।  
वैसे वो नाराज किस बात से इसका अंदाज किसी को भी नहीं होता था, लेकिन उनका सामना करने में सभी डरने लगे थे। यही खौफ तो वे पैदा करना चाहते थे। लक्ष्‍य कोई भी हो हमेशा सौ प्रतिशत की पूर्ति होना संभव नहीं थी। ये सभी को पता था, वे भी जानते थे और उनके ऊपर वाले भी जानते थे, लेकिन जो काम बिना नाराजगी के कम होता था, वह नाराजगी सहित भी कम ही होता था। पहले लोगों को लगता था कि वे गर्मी को सहन नहीं कर सकते इसलिए किसी पर भी गरम हो जाते है, फिर लगा शायद सर्दी का असर होगा कि गर्मी पैदा करने के लिए नाराज होकर अपना तथा अपने साथ वालों का ब्‍लड प्रेशर बढ़ा कर उन्‍हें ठण्‍डा पड़ने से रोकने के‍ लिए नाराज होते हों। अब तो बसंत ऋतु आ गई थी, न ज्‍यादा गर्मी थी और न ही सर्दी फिर भी उनकी नाराजगी लगातार बनी रहने लगी। तब सभी को पता चला उनकी नाराजगी का राज। उन पर उनसे ऊपर वाले नाराजगी व्‍यक्‍त करते वे यहां नाराजगी व्‍यक्‍त कर देते और उनकी नाराजगी सहने वाले उनसे नीचे वालों पर नाराज हो जाते। यह नाराजगी का क्रम ठेठ नीचे पहॅुच कर ही शांत होता था। नीचे वालों को आदत हो गई थी नाराजगी की। उनको पता था नाराज होकर भी कुछ बिगाड़ नहीं सकते हैं, क्‍योंकि अगला काम उन्‍हीं से पड़ेगा, वे नाराजगी से काम ठप्‍प कर देंगे तो यही क्रम उल्‍टा हो जाएगा तथा कोई सार नहीं निकलेगा। काम तो जिसे करना है, जब करना है, जैसे करना है- ठीक वैसे ही होगा, लेकिन फिर भी नाराजगी का अपना महत्‍व है, जो कम नहीं होना चाहिए।  
सूबे में सभी को पता रहना चाहिए कि साहब नाराज रहते हैं, क्‍योंकि उनके मातहत काम नहीं करते। इसी बहाने मातहतों की शिकायत और उनके काम करने के तरीकों पर भी साहब की नजर रह जाती थी। इस नाराजगी में एक छोटा-सा राज और भी था, लेकिन यह सार्वजनिक होने से साहब भी डरते थे। इसको शिष्‍टाचार की श्रेणी में रखा जाता था। सिर्फ मातहतों को पता था कि साहब की नाराजगी का दूसरा मतलब क्‍या है, इसलिए वे भी डरते थे कि साहब नाराजगी व्‍यक्‍त कर दे वहां तक ठीक है, लेकिन उस नाराजगी का दूसरा असर नहीं होना चाहिए। साहब भी प्रति सप्‍ताह एक पर ही नाराज होते थे और दूसरे सप्‍ताह उनको शाबाशी भी दे देते थे। इस साप्‍ताहिक नाराजगी का हिस्‍सा ऊपर तक पहॅुच जाता था और ऊपर से नीचे तक की कुर्सी बरकरार रहती। यह नाराजगी भी ऊपर से नीचे आते समय विकेन्‍द्रीत हो जाती थी, इससे पता भी नहीं चलता कि नाराजगी का कितना हिस्‍सा किसके हिस्‍से में आया। ऐसे में नाराजगी सब पर समान रूप से बरसती थी और उसकी उपज पर भी कोई असर नहीं पड़ता था। सब को इतना जरूर पता था कि मौसम गर्म हो, सर्द हो या वासंती फूल खिल रहे हो नाराजगी सब पर समान बरसेगी और उसकी बौछारों से भीगने वाले भी ऐसे ही बिना छतरी के निकलते रहेंगे, क्‍योंकि उनको भी कहीं से नाराजगी प्राप्‍त करना होगी।  


कुकुरमुत्ता का मशरूम हो जाना

 (संजय भट्ट)

शब्द जब खामोशी धारण कर लें तो मौन मुखर होकर बोलने लगता है, लेकिन इसे समझ पाना सभी के बस की बात नहीं होती। वक्त का नियम है बदलते रहना, इसलिए इसे हमेशा ही बदलने देना चाहिए। वैसे हर कुकुरमुत्ता की चाहत होती है कि वह मशरूम हो जाए, लेकिन ये कुछ के ही भाग्य में होता है। कुछ कुकुरमुत्ते बरसात में उगते हैं और बस बरसात के बाद खतम हो जाते हैं, लेकिन कुछ पाॅली हाउस में उगते हैं, कुछ मेहनत की खेती से उगाए जाते हैं और वही मशरूम हो जाते है। किसको पता था कि हर छोटी बड़ी जगह बरसात में उगने वाला कुकुरमुत्ता भी कभी मशरूम हो जाएगा तथा फाईव स्टार हाॅटल के साथ ही बड़े घरानों के किचन की शोभा बढ़ाएगा।
वैसे जगह का अपना महत्व होता है, हर कहीं उग आए तो कुकुरमुत्ता और पाॅली हाउस या खेत में उगाया जाए तो मशरूम। कोई बच्चों के खेल का साधन तो कोई किचन की शान। जिन्दगी का फलसफा भी कुछ इसी तरह का है। हर आदमी की अपनी अहमियत है, लेकिन कोई समाज में पूजनीय और वंदनीय हो जाता है तो कोई दयनीय हो जाता है। कुकुरमुत्ता का मशरूम हो जाना और आदमी का वंदनीय या दयनीय हो जाना रहट की तरह है। जो उपर भी जाता है, नीचे भी आता है और सवारी बैठाने के दौरान काफी देर तक बीच में ही अटका भी रह जाता है। जब रहट उपर जाता है तो भय मिश्रित आनंद की अनुभूति देता है, लेकिन जब नीचे आने लगता है तो सिर्फ भय का अनुभव होता है।
जिन्दगी में कोई भी लम्बे समय तक कुकुरमुत्ता बन कर नहीं रहना चाहता सभी के मन की भावना होती है वह मशरूम हो जाए। रहट का खेल और हवा का मेल किसी को भी हमेशा उपर की ओर नहीं रखता। इसी उपर नीचे के समामेलन में रहट का समय खतम हो जाता है। इसी तरह सफलता-असफलता और जिन्दगी जीवन तमाम हो जाता है। लालसा, इच्छा और मनोभिलाषा व्यक्ति को कभी शांत नहीं बैठने देती। हर समय प्रेरित करती है कि वह कुछ करे। इसी करने न करने के चक्कर में कभी ठीक तो कभी गलत भी हो जाता है। जब वह सफलता के शिखर पर होता है तो लगता है कि उसके अलावा कोई भी नहीं है, दुनिया में जो भी है बस वही हैैैै। खुद के सामने सारा जगत उसे महत्वहीन लगने लगता है। ऐसा हमेशा कभी धन, बल या पद के कारण होता है।
जैसे जैसे कुकुरमुत्ता मशरूम होने लगता है, उससे समाज की अपेक्षाएं भी बढ़ जाती है। हर कोई चाहता है कि उसकी थाली की शान बने उसके स्वाद का हिस्सा बने, लेकिन न तो यह मशरूम के बस में होता है और न ही उस गरीब के बस। यहाॅं मशरूम का उॅंचा होना आड़े आ जाता है। वह भूल जाता है कि वह भी कभी कुकुरमुत्ता हुआ करता था। व्यवहार में इसी बदलाव के कारण वह मशरूम असफलताओं की ओर बढ़ने लगता है, जैसे रहट का समय समाप्त होने के साथ ही वह गति धीमी कर नीचे की ओर आने लगता है और अपनी सवारियों को उतार कर दूसरी सवारियों को बैठाने का इंतजार करता है।
अक्सर फलों से लदे वृक्षों को पत्थर खाने के आदत हो जाती है। वह पत्थर की मार खा कर भी मारने वाले को अपने फल देता है, लेकिन कभी-कभी उसकी छाया में बैठे हुए को भी उसके पके हुए खट्टे मीठे फलों का आनंद मिल जाता है। अब यह फल न्युटन को मिले तो विज्ञान का नियम और शबरी को मिले तो भगवान का प्रसाद हो जाता है। कई के पत्थर तो दूसरों के सिर भी फोड़ देते हैं और फल ही नहीं मिलता।
बदलते समय, बदलते समाज और बदले हालातों में सभी का रवैया भी बदल रहा है। अब लोगों को मशरूम और कुकुरमुत्तों का अंतर भी पता चलने लगा है। उपयोग और जरूरत के हिसाब से किचन की शान तथा सड़क किनारे उगने का मतलब निकालने लगे हैं। उपर जाते रहट को हरसत भरी निगाह से देखते हैं तो नीचे आते हुए से दूर भागने लगते हैं। फिर भूल जाते हैं कि कभी भी कुकुरमुत्ता से मशरूम और कड़वा होने पर मशरूम से कुकुरमुत्ता होते देर नहीं लगती।  

शनिवार, 9 अप्रैल 2022

आपदा में अवसर की तलाश

                             (संजय भट्ट)

भाई साहब को आपदा में अवसर ढॅूढने में महारत हांसिल थी। वे किसी भी आपदा में अवसर को तलाश कर ही लेते थे। यदि किसी की आपदा नहीं हो तो अपने अवसर के लिए वे आपदा को पैदा करने में भी पीछे नहीं रहते थे। मतलब येन केन प्रकारेण अपना अवसर किसी भी आपदा में तलाश कर ही लेते थे। कोई पुलिस से परेशान हो, राजस्‍व संबंधी मामला हो या किसी की पैदाईश हो या मरने से पैदा हुई आपदा वे अपना अवसर ऐसे तलाश करते थे कि लोगों को लगता यही उनके सच्‍चे हितचिंतक है। लालाजी के रहते गांव में एक ही दुकान थी, मनचाहे दामों पर सामान मिलता था, लेकिन जैसे ही लालाजी चल बसे उन्‍होंने न सिर्फ अपने लिए बल्कि पूरे गांव के लिए एक प्रति‍स्‍पर्धी माहौल पैदा कर दिया। लालाजी के दोनों बेटों को एक महिने में ही दो दुकानें करवा दी। रम्‍मु के यहां बेटी पैदा हुआ तो भाई साहब इतने दुखी हुए कि उन्‍होंने रम्‍मु की पत्‍नी का तलाक ही करवा दिया। अब हर किसी की आपदा में उनका कोई न कोई योगदान तो होता ही था। मामला कोई भी हो वे अवसर की तलाश करने से कभी पीछे नहीं रहते थे।

हर समस्‍या का समाधान था उनके पास, बस थोड़ी सी फीस लगती थी, लेकिन काम सोलह आने होने की गारंटी र‍हती थी। भाई साहब ईमानदार भी इतने थे कि हमेशा पहले आओ पहले पाओ के सिद्धान्‍त पर काम करते थे। जो उनके पास पहले आया, वह भले ही गलत हो या सही एक बार उन्‍होंने उसके साथ देने की बात कह दी तो किसी भी माई के लाल में ताकत नहीं थी कि उनके फैसला बदल दें। वे एक बार कोई काम हाथ में ले लेते तो फिर दिन-रात, सुबह-शाम कुछ भी नहीं देखते जब तक मंजिल नहीं मिले वे उसी काम को अंजाम तक पहॅुचाने में लगे रहते थे। हाथ में लिए काम के लिए दिन की छोडि़ए रात को सपना भी उसी के पक्ष का देखते थे।

गांव में कई बार लोगों ने उन्‍हें सरपंच बनने का न्‍यौता दिया, लेकिन भाई साहब जानते थे। कभी राजनीति में आए ही नहीं। ऐसा नहीं कि उनका राजनीति से कोई वास्‍ता नहीं था, लेकिन बस किसी पद पर नहीं रहते थे। कोई उनकी इच्‍छा के बगैर किसी पद पर रह भी नहीं सकता था। क्‍योंकि उनकी फितरत ही ऐसी थी कि वे आपदा में अवसर को तलाश कर लेते थे और आपदा नहीं हो तो पैदा कर देते थे। इसीलिए सभी उनसे डरते भी थे, लेकिन वे किसी के बाप से भी नहीं डरते थे। यही एक दबदबा था उनका। उनकी एक खासियत और थी, जिससे सब डरते हैं वह भूत कभी पाला ही नहीं मतलब उनका ब्‍याह नहीं हुआ था। बस इसी खासियत के चलते उनका कोई खर्चा भी नहीं था। सुबह की चाय से लेकर रात की शराब तक का इंतजाम करने वालों की फौज भाई साहब के पास थी। वे भी अपनी ईमानदारी के चलते, उनकी सेवा का मैवा अवश्‍य प्रदान करते थे।

यूँ तो वे अच्‍छे वाले समाज सेवक भी हो सकते थे, लेकिन उसके लिए अपनी जेब का खर्चा होता है और मज़ा कुछ नहीं आता है। वे कथित समाज-सेवक थे, जो समाज सेवा की आड़ में किसी भी आपदा में अवसर को तलाश कर लेते और आपदा न हो अवसर के लिए आपदा पैदा कर देते। उनकी बातों का गांव भर में बड़ा सम्‍मान था। कोई भी बात इतने अच्‍छे तरीके से कहते थे कि सुनने वाले के अंतर्मन तक उतर ही जाती थी। चाहे कोई कितना भी शातिर हो लेकिन उनका वार इतना अचूक होता था कि बचना मुश्किल था।

कहा जाता है कि कोई भी हवाई जहाज ज्‍यादा देर तक हवा में नहीं रह सकता, उसे जमीन पर आना ही पड़ता है। बस अब ठीक यही हालत भाई साहब की थी, उनका हवा में उड़ता जहांज जमीन पर आने वाला था। उम्र भी लगभग हो ही गई थी, लेकिन जोश बरकरार था। उनकी पैदा की गई आपदाओं का गांव में इतना रैला हो गया था कि अब वे खुद ही फिसलने लगे थे। बस ऐसे ही एक मामले में वे फिसल गए और इतना फिसले कि उनके सारे अंग चोंटग्रस्‍त हो गए थे। उन्‍होंने कभी सपने में भी नहीं सोंचा होगा कि जिस रम्‍मु की बेटी के पैदा होने के दुख में तलाक करवाया था, वहीं बेटी बड़ी होकर उनके लिए आपदा बन कर टूटेगी। अब पढ़े लिखे बच्‍चे उनके झांसे में नहीं आते थे। सभी को धीरे-धीरे पता चलने लगा कि जो-जो आपदाएं गांव में आई उनके लिए कोई और नहीं बल्कि भाई साहब ही जिम्‍मेदार है। इससे आहत भाई साहब खुद ही आपदाओं के शिकार होने लगे। आए दिन कोई-न-कोई आरोप उन पर लगता रहता था। इसलिए भाई साहब ने भलाई समझी और गांव छोड़ कर दूसरे गांव के लोगों की आपदा में अवसर तलाश करने को निकल गए, क्‍योंकि वे जानते थे कि आपदाओं और अवसर की कोई कमी नहीं है। 


गुरुवार, 7 अप्रैल 2022

सुरसा के मुँह में फंसे हनुमान

 

(संजय भट्ट)


‘जस जस सुरसा बदन बढ़ावा तासु दुन कपि रूप दिखावा’ पता नहीं यह पंक्तियां लिखते हुए गोस्‍वामी तुलसीदास ने क्‍या सोंचा होगा। राम भक्ति में खोए हुए उनके मन में क्‍या विचार चल रहे होंगे यह तो राम जी ही जाने ,लेकिन इन दिनों सुरसा के मुँह खुलने पर कपि पुत्र मानव अपना रूप दुगना नहीं कर पा रहे हैं। उन्‍हें जामवंत भी नहीं जगा पा रहे हैं और न ही उनकी शक्ति को याद दिला पा रहे हैं। जामवंत की एकतरफा खामोशी हनुमान के लिए बहुत भारी पड़ रही है। जामवंत भी क्‍या करे, वे इस कलयुग में रामजी की कृपा पर ही जीवन यापन कर रहे हैं। हनुमान भी राम भक्‍त है, राम जी की दी हुई सारी जिम्‍मेदारियां उनको इतनी सरल लगती है कि वे हमेशा ही उससे पार पा जाते हैं। लेकिन इस बार हनुमान थोड़ी कठिनाई में थे। सुरसा प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा कर अपना बदन बढ़ा रही थी और हनुमान अपनी अंतिम सीमा को छू चुके थे। सुरसा का मुँह रोज रात को बारह बजे बढ़ जाता। उसके मुँह बढ़ाने का असर दूसरे दिन ही दिखाई देता था। सुरसा की इस मायावी हरकत का हनुमान के पास कोई तोड़ नही था। ज्‍यों ही सुरसा का मुँह बढ़ता हनुमान अपनी पुरी क्षमता से उसका मुकाबला करने की कोशिश करते, लेकिन जैसे ही हनुमान अपनी शक्ति बढ़ाते सुरसा मुँह फिर से बढ़ जाता। आखिर कब तक मुकाबला करते। कलयुग में यूँ भी असुरों  की ताकत दुगनी हो जाती है, देवत्‍व का असर थोड़ा देर होता है। फिर यह कष्‍ट हनुमान को दिया तो राम ने था कैसे कह पाते कि भगवन कष्‍ट है। सुरसा के मुकाबले मैं कमजोर पड़ रहा हूँ। जैसें ही वह कमजोरी मेहसुस करते जामवंत उन्‍हें लंका में रावण की हरकतों, जंबू द्वीप में चलने वाली अन्‍य गतिविधियों में बहला देते। इधर राम जी लगातार सुरसा मुँह फैलाए जा रही थी और हनुमान पर अपनी भक्ति का पूर्ण विश्‍वास करने वाले रामचंद्र जी को भरोसा था‍ कि सुरसा असुर है और कितना भी मुँह फैलाए जामवंत हनुमान को उसका एहसास तक नहीं होने देंगे। कभी रावण की हरकतों, कभी सीता माता के कष्‍टों तथा कभी जंबुद्वीप के खतरों को लेकर जामवंत जी लगातार हनुमान की भक्ति को कमजोर नहीं होने दे रहे थे।


थके हुए हनुमान ने रामचंद्रजी से कहने वाले थे कि हे भगवन् अब सुरसा के मुँह को भेद पाने की क्षमता में वृद्धि कर दीजिए, तो तमतमाए जामवंत जी ने हनुमान को फटकारते हुए कहा वानरराज आपको श्रीराम के कष्‍टों का अनुभव है कि नहीं,माता सीता पर रावण अधिकार करना चाहता है और हमने रामचंद्र जी को वचन दिया है कि हम उनके कष्‍टों को अपना कष्‍ट समझ कर उसे दूर करने में मदद करेंगे। आपको जो जिम्‍मेदारी दी है वह पूर्ण कीजिए, जब श्रीराम राजा बनेंगे, जब लंका पर विजय प्राप्‍त कर लेंगे, जब सुग्रीव जी को खोया राज मिल जाएगा तब आपकी ही तो ख्‍याति होगी। आपने हर मौके पर श्रीराम का साथ दिया है, अपनी शक्ति को पहचानो और सुरसा का मुकाबला करो। मतलब मामला रामजी तक पहॅुचने के पहले ही जामवंत ने निपटा दिया। इस तरह जब भी हनुमान को कोई कष्‍ट होता जामवंत जी ही बीच में आकर उनकी बात को रामचंद्रजी तक पहुँचने से पहले ही उनका ब्रेनवाश कर देते। हनुमानजी फिर से रामभक्ति में लीन हो जाते और अपने कष्‍टों को भूल कर रामजी की तकलीफों, माता सीता पर आए संकट को मेहसुस करने लग जाते। इन्‍हीं दिक्‍कतों के कारण न चाहते हुए भी हनुमान सारी परेशानियों को झेल जाने पर मजबूर थे।


उनकी बिरादरी के कुछ वानर कभी कभी विरोध के सुर अपनाना चाहते थे, लेकिन जामवंत ने रामचंद्रजी और शेष सभी के बीच ऐसी माया बना रखी थी कि उन विद्रोही वानरों की बात रामचंद्रजी तक पहॅुच ही नहीं पाती थी। ऐसा नहीं कि रामचंद्रजी को कुछ पता नहीं था वे त्रिकाल दर्शी थे, उन्‍हें पल पल की खबर थी आगे होने वाले पलों को भी वे पहचान लिया करते थे, लेकिन जब जामवंतजी सारी परेशानियों को स्‍वयं उनकी ओर से हल करने का काम रहे थे, तो उन्‍हें  किस बात की चिन्‍ता थी।  रामचंद्रजी को एक मूल मंत्र मिल गया था, जब तक लक्षमण जैसा भाई, जामवंत जैसा वफादार और हनुमान जैसे भक्‍त है, किसी की भी ताकत नहीं थी कि उनका बाल भी बांका कर सकता है। इसी कारण वे हनुमान को ह‍थियार व शक्ति देने के बदले सुरसा का मुँह खोलने की इजाजत देते जा रहे थे, क्‍योंकि उनको भरोसा था कि सुरसा कितना भी मुँह खोल ले हनुमान अपना लघु रूप धारण कर बिना उसे क्षति पहॅुचाए सुरसा के मुँह से बाहर निकल जाएंगे।

रविवार, 3 अप्रैल 2022

बिना डिग्री के प्रबंधक

 

(संजय भट्ट)


किसी ने एक दम सही ही कहा- सीखने की कोई उम्र नहीं होती कहीं से भी सीखा जा सकता है। ऐसे ही शख्स है हमारे मित्र उन्होंने बाजे वालों से मैनेजमेंट के गुण को सीख लिया, अपनी नौकरी के अनुभव के साथ। मामला उनके यहां बेटी के विवाह का था। सारा काम उन्होंने ऐसे निपटा दिया जैसे जैसे कहीं से बिजनेस मैनेजमेन्ट का कोर्स किया हो। सारा प्रबंधन एक कुशल प्रबंधक की तरह, किसी को कोई शिकायत का मौका ही मिला। वो भी ऐसी बारात में जिसमें दुल्हे के पिता को छोड़ कर कोई भी अनुभवी और जिम्मेदार व्यक्ति नहीं हो। सारे युवाओं के जोश से भरी बारात को देखकर लग रहा था कि कोई न कोई तो गड़बड़ होगी ही। लेकिन मामला इतनी शांति से निपटाने पर सभी हैरान थे। किसी ने मेरे मित्र और लड़की के पिता से पूछा-आपने इतना कुशल प्रबंध कैसे किया? कोई गड़बड़ नहीं हुई। सारे युवाओं के जोश को कैसे सम्हाला? मेरे मित्र ने कहा भाई साहब 25 साल की नौकरी में यही तो सीखा है। मेरे कुछ समझ में नहीं आया! मैंने कहा- थोड़ा विस्तार से समझाओ यार। आखिर यह कुशल प्रबंधन का तरीका नौकरी में कहां से पाया? उन्होंने कहा- आप बारात के साथ थे ना, देखा आपने बैंड बाजे वालों की हालात? बस यही कुशल प्रबंधन का तरीका है। मुझे मेरा ही मित्र बड़ा रहस्यमयी लग रहा था। उसे कभी इस तरह बातें करते हुए नहीं सुना था। उसकी बातें मेरे सिर के उपर से निकल रही थी। मैंने फिर कहा भाई कब से ऐसी रहस्यमयी बातें करने लगे हो? उन्होंने समझाया- देखों महोदय आप ठहरे व्यापारी आप क्या समझ पाएंगे हम नौकरी करने वालों की कला को। और अब तो आदत हो गई है। बिना बात डांट खाना गलती नहीं होने पर भी मान लेना और बैंडवालों की तरह ‘‘कूल’’ रहकर सभी के नखरों को सहन कर लेना। मैंने कहा- भाई साहब आप तो सरकारी नौकरी में हो मौज है आपकी तो। फिर आप किसके नखरों को सहन करते हो, आपका तो विभाग भी ऐसा है, जहां कोई झांकता भी नहीं पूछता भी नहीं!
मत पूछो मेरे मित्र के जितने आंसू उसकी बेटी के विदाई में नहीं आए उससे कहीं आधिक आंसू उनकी आंखों में थे। रूआसे होकर बोले भाई साहब आप एक दिन आकर देखो मेरे साथ वक्त गुजार कर देखो। सकय से जाना होता है। सबसे पहले पहॅंुच कर अपने हस्ताक्षर करो या न करो लेकिन थम्ब इंप्रेशन और मैसेज नहीं भूल सकते। इसके बाद शुरू होती है, कागजों की घिसाई। खुद को साबित करने की कला, सभी से अच्छे से बातचीत तथा अपना छोड़ कर उनके कामों पर ज्यादा ध्यान। प्रार्थना, पढ़ाई से ज्यादा जरूरी है समय पर जानकारी भेजना। बच्चों के पालक तो जैसे उनको पैदा करके भूल ही गए। सरकार ने पैदा होने पर माता पिता को पैसा दिया, बहुरिया के लिए पोषक लड्डूओं की व्यवस्था की, फिर आंगनवाड़ी में सारी देखभाल के साथ उसके पोषण कुपोषण का खयाल रखा गया। वह बच्चा स्कूल आया नहीं हमारे द्वारा लाया गया है, इसलिए अब से सारी जिम्मेदारी हमारी है। उसको निर्धारित दक्षताएं पूर्ण करवाओ, उसका मन चाहे खेत में लगता हो या खेलने में, उसको सब कुछ आना चाहिए यह जिम्मेदारी हमारी है। फिर सरकार का क्या है? हमारी एक जिम्मेदारी पूर्ण हुई नहीं कि दूसरी आ जाती है। सारी जिम्मेदारी ठीक उसी तरह से आती है, जैसे बैण्ड वालों के पास बारातियों की फरमाईश आती है गाना बजाने के लिए। वे भी बेझिझक सभी की फरमाईश पूर्ण करते है। एक की फरमाईश का गाना बजा नहीं कि दूसरा बीच में टपक जाता है। नागिन की धून चली न चली कि फरमाईश आ जाती है चल ‘‘काका बाबा ना पोरिया’’ बजा, तीसरा भी तैयार ही खड़ा होता है, भाई डीजे वाले बाबू चला दो। इसी बीच कोई बुजुर्ग आ जाता है, चल बे क्या लगा रखा है, मुन्नी शीला अब ‘‘तु छूपी है कहां’’ बजाओ। थोड़ी देर गाना चलता है कि बीच में एक सौ का नोट दिखा कर पांच का पकड़ा दिया जाता है। कुल मिला कर जैसे सारी बारात को सम्हालने का दायित्व उस बाजे वाले पर होता है, ठीक उसी तरह जैसे हमारे बड़े बारात को बिन्दोली पर भेज कर घर की व्यवस्था में लगे होते हैं, दुल्हन बारात के इंतजार में होती है। बस यही हालत हमारे हो गए हैं। सारी जिम्मेदारियां हमारे आसपास घूम रही है। इनमे से एक काम खतम होता नहीं और दूसरा काम सामने आ जाता है और मानोगे नहीं इतनी अच्छी प्रेक्टिस हो गई है कि सब बिना प्रबंधन की डिग्री के सफल हो जाता है। बस इसी तरह से शादी को भी निपटा दिया। मैने कहा धन्य हो भाई और धन्य है वो सभी जिन्होंने आप जैसे लाखों लोगों को बिना डिग्री के कुशल प्रशासक व प्रबंधक बना दिया। 


शनिवार, 2 अप्रैल 2022

नए साल की मुबारकबाद

 

                                                                                          (संजय भट्ट)

एक बार फिर से साल बदल गया। जो चल रहा था वह नया हो गया। कुछ ने कहा यह मेरा है, तुम्‍हारा नहीं, कुछ ने ठीक उल्‍टा कह दिया यह तुम्‍हारा है, हमारा नहीं। बस इसी तेरा मेरा चक्‍कर में साल का मजा किरकरा हो गया। था तो नया लेकिन रह गया वही पुराना बन कर। बरसों से यह तुम्‍हारा-मेरा के चक्‍कर में साल बरबाद होते चले जा रहे हैं। कभी इनका नया साल आ जाता है, कभी उनका नया साल आ जाता है। कोई इसे नहीं मानता कोई उसे नहीं मानता, लेकिन यह सब सिर्फ दिखावे का माहौल है। दरअसल मानते सभी है, मनाते सभी है, लेकिन अंदर ही अंदर। जैसे ही बाहर दिखाने मौका आता है, वह तेरा मेरा होकर रह जाता है।

साल का बदलना, दिन का बदलना, मौसम का बदलना, ऋतुओं का बदलना और भी बहुत से बदलाव प्रकृति की सत्‍ता के अधीन होते हैं,  लेकिन इसमें हम लोग तेरा मेरा ढूंढ ही लेते हैं। मान्‍यता किसी की कुछ भी हो सकती है, सत्‍ता, संस्‍कृति और स्‍वभाव भी अलग हो सकता है, लेकिन साल की क्‍या गलती वह तो दिन के साथ ही पुराना और नया हो जाता है। इस मामले में दिन बहुत ही भाग्‍यशाली है, वह हर दिन नया होता और कोई भी इसे तेरा या मेरा में नहीं बांटता।

इसबार साल के बदलने के एक दिन पहले ही सरकारी साल बदल गया।  वैसे इस साल के बदलाव के एक दिन पहले ही बहुत से बदलाव सामने आ गए। किसी ने कुछ नहीं कहा, यहां तक कि बताया भी नहीं कि क्‍या-क्‍या और क्‍यों बदल रहा है। सवाल भी करना पाप जैसा है, किस से पूछे और क्‍यों पूछे क्‍या सवाल करने के सामाजिक सरोकारों से पेट भरता है,इसलिए बस इसी में खैर मना ली कि जो मिला वह ही बहुत है।  जो मिला उससे पहले ही लूटने लग गया था, लेकिन इस लूट का किया भी क्‍या जा सकता है। यह तो मामूली सी बात है, बधाईयां मिलना शुरू हुई और हमारी जेब पर कटौतियों के बादल मंडराने लगे। बादल मंडराने क्‍या लगे इतने जम कर बरसने लगे कि  बाढ़ ही आ गई। इस बाढ़ में हमारा सब कुछ बह कर जाने लगा, इसे रोकने के लिए हमे ही सिमटना था तो समेटने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

हमारे नए साल और इसकी खुशियों से ज्‍यादा सरकारी साल बदलने का गम था, लेकिन क्‍या करते उन्‍हें यह अधिकार भी हमने ही दिया था। अब बताओ भला कोई माई बाप के सामने भी कोई बोलता है। साल तो हर साल बदलता है और साल में दो बार भी बदलता है, लेकिन इस बार का यह बदलाव बहुत भारी पड़ा। जब साल बदला तो वाह की जगह आह निकली। इस हाथ ले उस हाथ दे की कहावत चरितार्थ हो गई, लेकिन जैसे ही मोटा-मोटा हिसाब लगाया, इस हाथ जो मिला उस हाथ से दौगुना निकल गया। अब व्‍हाटस्एप्‍प और सोशल मीडिया के जमाने में सामाजिक ताना बाना और प्रत्‍यक्ष बधाई की परंपरा तो रही नहीं बस दिनभर टन-टन और मोबाईल की मैमोरी फुल होती गई। वैसे सभी को समझ आ गया कि इस जमाने में किसी के यहां जाकर प्रत्‍यक्ष बधाई दे देने से उस पर एक कप चाय और पैकेट में कम होते बिस्किट का बोझ ही बढ़ाना है। हमने भी यही सोंचा कि इस दौर में कोई हमारे यहां आकर बधाई देगा तो उसका पेट्रोल का खर्च ही बढ़ेगा, इससे बेहतर है कि वह ऑनलाइन को ही अपनाएं और अपने आप को बदलते साल में बदलने का एक प्रयोजन करें। बहरहाल आप सभी को यह नया साल मुबारक हो, जिसने हमारी जिन्‍दगी के अर्थशास्‍त्र को बदलकर रख दिया और हमारी उफ्फ तक नहीं निकल पाई आखिर उन्‍नति और विकास भी मायने रखता है और हम नए साल की मुबारकबाद में भी तो उन्‍नति और विकास की ही कामना करते।                                                      

शुक्रवार, 1 अप्रैल 2022

एकान्तोत्सव

 

(संजय भट्ट)
एकान्त, अकेलापन और सिंगल कुछ ऐसे शब्द है, जिसका जिक्र कई महान लोगों से लेकर आजकल के युवाओं के बीच प्रसिद्ध है। हमारे ऋषि मुनियों तथा वैज्ञानिकों ने अपनी सिद्धि अपने शोध से आविष्कार सभी एकान्त में रह कर हांसिल किया है। एकान्त में की गई तपस्या का परिणाम ध्रुव ने भगवान विष्णु को प्राप्त कर पाया था। अभी यह शब्द आमलोगों के बीच फिर से प्रचलन में आ गया है।
वैसे तो मनुष्य को सामाजिक प्राणी कहा गया है तथा बिना समाज के मनुष्य का कोई उद्धार नहीं है। समाज में रह कर ही मनुष्य समाज के लिए काम करता है और सामाजिक कहलाता है। मनुष्य की समाजिकता का पैमाना यही है कि वह समाज में क्या काम करता है तथा उसी काम से अपनी पहचान बनाता है। इसी सामाजिकता के गुण के कारण मनुष्य आज अपना अस्तित्व बचाने में सफल हुआ है।
एकान्त में रह कर उत्सव और उत्साह की अनुभूति को प्राप्त करना थोड़ा कठिन है, लेकिन हाल में जो अदृश्य जंग चल रही है, उसमें एकान्त किसी उत्सव से कम नहीं। जीवन की सारी कठिनाईयों के बीच आनंद की अनुभूति जीवन को बचाने में है। कहा गया है कि एकान्त में रहकर व्यक्ति खुद के बारे में सोंचता है, लेकिन विचार करो हम सामाजिक जीवन में कभी खुद के बारे में कितना सोंच पाते हैं। हमारे शास्त्र कहते हैं, जिसने खुद को पहचान लिया उसने भगवान को पा लिया। एकान्त में रह कर व्यक्ति जीवन के विभिन्न पहलुओं पर विचार करता है। विचार शुन्य होकर वह अच्छा, बुरा कुछ भी पता नहीं कर सकता है, लेकिन विचारवान होकर वह स्वयं के सभी प्रकार के व्यवहार को समझ पाता है।
उच्छृंखल स्वभाव की विद्रोही मानसिकता के कारण उन्हें एकान्त में रहने को मजबूर होना पड़ा तो खुद ही समाज और सोशल नेटवर्किंग से दूरी बना ली। एकान्त ही नहीं नितान्त एकान्त में स्वयं को खोजने की चाह मन में जाग गई। लगातार अपने परायों को खोने का दर्द इतना सता रहा था कि वे बेचैन हो गए। उन्हें संसार से विरक्ति होने लगी। मौका मिला था खुद का एक एनालेसिस कर लेते कि वे क्या है?, समाज के लिए वे जितना करते हैं उसका उनके जीवन में कितना महत्व है? जीवन में वे क्या करना चाहते हैं तथा उस मंजिल के कितने करीब पहॅुच गए हैं? ऐसे सवालों ने उनकों घेर लिया था। अब वे निराशा और आशा के बीच स्वयं को फंसा हुआ अनुभूत कर रहे थे।
चूंकि आदमी सामाजिक थे, इसलिए उन्हें लगा कि खुद को पहचान लिया जाए। इसलिए उन्होेंने एकान्त में स्व चिन्तन को अपनाया। जीवन के विभिन्न पहलूओं को परखा तथा पाया कि वे अपनी छवि चमकाने के लिए क्या-क्या नहीं करते हैं! उन्होंने अपने जीवन में कितने कष्ट दिए तथा उनका प्रचार कैसे किया है। वे समाज में प्रतिष्ठित बन जाने के लिए क्या-क्या नहीं करते हैं!
कभी महाकवि रवीन्द्रनाथ टैगोर ने ‘एकला चालो’ गीत की रचना की, पं. दीनदयाल उपाध्याय ने एकात्म मानवतावाद का सिद्धान्त दिया तो नए जमाने में कई फिल्मों में अकेले ही सब कुछ कर जाने की प्रेरणा दी। एक फिल्मी गीत है, ‘अकेले हैं तो क्या गम है, चाहें तो हमारे बस में क्या नहीं’ इसी से प्रेरणा पाकर आजकल एकल परिवार की अवधारणा भी आ गई है। बस मैं, मेरी पत्नी और मेरे बच्चे। वह समय बीत गया जब दादा-दादी, ताउ-ताईजी, चाचा-चाची सहित भरा पुरा परिवार हुआ करता था।
आज हर तरफ अकेलेपन का माहौल है, सामाजिकता व सामाजिक समरसता समाप्त होती जा रही है। कोई जात-पात में उलझा है तो कोई समाज की उॅच नीच में, कोई पद प्रतिष्ठा का प्रश्न बना बैठा है तो कोई मान सम्मान में स्वयं को बरबाद करने में लगा है। जिसे मौका मिला वह दूसरों को नीचा दिखाने में कोई कोर कसर बाकी नहीं छोड़ रहा। ऐसे में एक छोटे से वायरस ने सभी को सीखा दिया कि चैदह दिन का एकान्तोत्सव मना कर स्वयं को पहचान लो। मैं अदृश्य हॅू, लेकिन फिर भी धरती को तपा देने व मौत के आभास के नजदीक पहॅुचा देने के योग्य हूॅ।


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