(संजय भट्ट)
दरअसल इन दिनों चर्चाओं का प्रचलन सा चल गया था। इसपर चर्चा, उसपर चर्चा, हर बात पर चर्चा और चर्चा के नाम पर वार्ता। सुना था चर्चा दो व्यक्तियों के बीच का वह संवाद है, जिसमें एक सार्थकता का भाव छिपा होता है। यहां सार्थकता का कोई मायने नहीं रखती है, बस चर्चा होना चाहिए और चर्चा भी ऐसी कि जिसका कोई अंत नहीं हो। एक बार बोलना शुरू करें तो बस बोलते ही चले जाएं। इसमें जिसके लिए चर्चा हो रही होती है, वह चर्चा को सुनता नहीं और जिनकों चर्चा से कोई लेना देना ही नहीं वे चर्चा में उपस्थित लोगों के आंकड़े जुटाने लगे होते हैं। मतलब यह कथित चर्चा बनाम वार्ता बेनतीजा और बेमतलब होती है। इसमें सुनने वालों को अपनी चर्चा से फुर्सत नहीं होती है और बोलने वाले को उपस्थिति के आंकड़ों से मतलब होता है। इस बीच पीसता है वह तीसरा जिसकी जिम्मेदारी उपस्थिति के आंकड़े जुटाने लेकर चर्चा का प्रचार करने तथा उपस्थिति के लिए लोगों को आमंत्रित करने की होती है।
लोगों का क्या है, वे तो फुर्सत में होते हैं तथा ऐसेी चाय, नाश्ता और फोकट की खातिरदारी वाली चर्चा सुनने के लिए कहीं भी जा सकते हैं। वैसे चर्चा किसी भी विषय की हो, सिर्फ उपस्थिति की जरूरत होती है और उपस्थिति में हर बार वे ही व्यक्ति शामिल होते हैं, जिनकों उन चर्चाओं से कोई लेना देना नहीं होता है। उनका मकसद ही सिर्फ वाह-वाही होता है और अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने से होता है। चर्चा की घोषणा होती है, प्रचार होता है, चर्चा करने वाले की ओर चर्चा में सुनने वालों की उपस्थिति का आदेश होता है, लेकिन फिर भी इस चर्चा के लिए कुछ चुनिन्दा लोग है, जिन्हें नहीं बुलाया गया तो ऐसे रूठ जाते हैं, जैसे कोई गर्लफ्रेंड अपने बॉयफ्रेंड से रूठ जाती है। ये आते सभी है, लेकिन फिर भी इनको बुलाया जाना आवश्यक होता है। यदि गलती से कोई बुलावे में छूट जाए तो बकायदा नाराजगी व्यक्त कर देख लेने तक की धमकी भी दी जाती है। कई बार तो देख भी लिया जाता है। शुरू-शुरू में किसी को पता नहीं चला कि किसको बुलवाया जाए और किसको छोड़ा जाए लेकिन कुछ ही दिनों में उपस्थिति के आंकड़ों से पता चलने पर ऊपर से ही आदेश हो गया कि चर्चा कोई भी हो, किसी के भी लिए हो लेकिन फलां-फलां को बुलाया जाना प्रोटोकॉल होगा। इनमें से किसी उपस्थिति में कमी का हिसाब भी रखा जाने लगा और अगली बार से उनकी रेटिंग भी की जाने लगी। इस रेटिंग का नतीजा यह हुआ कि चाहे कितना भी जरूरी काम हो चर्चा वाले दिन उपस्थित होना जरूरी हो गया।
इस तरह की रेटिंग और इसके लाभ को देखते हुए कुछ और फुरसतियों की भीड़ जुटने लगी। कहीं एक के साथ एक फ्री के विज्ञापन वाला आलम होने लगा। जिनकों भी चर्चा में आमंत्रण दिया जाता उनके साथ एक दो व्यक्ति ऐसे होने लगे जो रेटिंग के कारण उपस्थित होते थे। पहले ही साफ हो चुका है कि न तो चर्चा की सार्थकता से कोई लेना देना है और न ही क्या कहा जा रहा है यह कहने और सुनने से मतलब है। कहने वाला भी कुछ भी कह जाता और सुनने वाले भी चुपचाप इस कान से सुनकर उस कान से निकाल देते हैं। जब सिर्फ सुनने में उपस्थिति ही मायने रखती है तो सुन लिया करते हैं, क्योंकि इस चर्चा का इतनी सारी चर्चा टीवी, अखबार और सोशल मीडिया पर हो जाती है कि सुनने वाले अनसुना कर चर्चा के दौरान अपने मोबाईल पर बतियाते रहे या आपस में अपनी चर्चा करते रहे, किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता है। इन सभी चर्चाओं में उपस्थिति का एक फोटो भी होता है और उसका भी प्रचार किया जाता है। चर्चा में एक खास बात और होती है कि जिससे चर्चा की जा रही है वह सम्मुख ही नहीं होता सिर्फ ऑनलाइन अपनी बात रख रहा होता है। धन्य है आज का डिजीटल युग जिससे ऐसी चर्चा संभव हो सकी है, अन्यथा चर्चा में आमने-सामने होकर ध्यानपूर्वक सुनना होता और पूछने पर जवाब भी देना पड़ सकता था। इसमें प्रमुख चर्चाकर्ता भी बहुत मजेदार किस्सागोई कर रहा होता है, दरअसल उसने कभी किया ही नहीं होता है, जिसका कोई सबूत भी नहीं होता है उसको अपने नाम के कारनामें के साथ प्रस्तुत कर देता है और दूसरे दिन सुनने वाले भी इसकी चटकारे लेकर तारीफ कर रहे होते हैं, क्योंकि बोलने वाले की सिर्फ तारीफ का अधिकार है, प्रमाण मांगने का अधिकार किसी के पास नहीं है। विचार कर रहा हॅूं मै भी इस तरह की चर्चाओं का हिस्सा बन जाऊँ और वो सारी तकलीफें उन सुनने वालों की तरह भूल जाऊॅ जो आज मेरे और मेरे जैसे करोड़ों लोगों के सामने अपना मुँह फैलाए खड़ी है, जिसका हल मेरे सामने नहीं है। काश मेरे भी भूखे बच्चे ऐसी चर्चा की प्रेरणा से ही अपना पेटभर लेते।
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Very nice