मंगलवार, 25 फ़रवरी 2025

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो उसमें से लपटे निकलने लगती है। इससे कुछ झुलसते हैं तो कुछ जल जाते हैं और कुछ भक्‍त प्रह्लाद की तरह लपटों से साबूत बच निकलते हैं। सब का प्रयास होता है कि वे भक्‍त प्रह्लाद बनें, लेकिन सभी की किस्‍मत ऐसी होती नहीं है। सुनने में आया है कि आजकल किस्‍मत लिखने के लिए भी एक्‍सपर्ट लोगों की सलाह ली जाती है। एक्‍सपर्ट तो आप समझ ही गए होंगे कि वे लोग जिन्‍हें जमीनी स्‍तर की जानकारी नहीं हो और यस सर कहने में माहिर हो। उनको निर्देशित करने के लिए उच्‍चतम योग्‍यता वाले लोगों का सहारा लिया जाता है। अब ये तो स्‍पष्‍ट ही हो गया है कि जिसकी जितनी उच्‍चतम योग्‍यता उसे जमीन का उतना कम अनुभव होना जरूरी होता है। जब अनुभव नहीं होगा तभी तो कोई यस सर करने में माहिर होगा। अनुभव अगर आ गया तो फिर वह अपनी बुद्धि का उपयोग शुरू कर देगा।
जैसे ही किसी अनुभवी का पता चलता है, उसे तुरन्‍त ही बाहर का रास्‍ता दिखा दिया जाता है। समिति में जाते तो हाथी पर बैठ कर हैं, लेकिन रवाना गधे पर बिठा कर किया जाता है। जब वे गधे पर बैठ कर रवाना होते हैं तो किसी को मुँह भी दिखाने के लायक नहीं रहते हैं। इसीलिए अपने अनुभव को ताक में रख कर यस सर को ही अपना अनुभव मान लेते हैं। नकल तकनीक का उपयोग कर कृपा पात्र ही ऐसे स्‍थानों पर अपना स्‍थान बनाने में सफल हो पाते हैं। उनको जमीन का पता होता नहीं, लेकिन आसमान की उड़ानों को भली भांति पहचानते हैं। इंसानी स्‍वभाव है, उसे आसमान की चमक पसन्‍द होती है। जो चमकता है उसे ही सितारा मान कर अपनी जमीनी हकीकत को भूल जाते हैं।
अब भगवान भी इतना फुरसत में तो है नहीं कि छोटो-मोटों सभी का खयाल रख सके। उन्‍होंने भी आजकल खुद करने के स्‍थान पर एक्‍सपर्ट सलाह को महत्‍व देना सीख लिया है। इसलिए प्रह्लाद की पुकार भी वैधानिक मार्ग से आने पर ही सुनाई देती है। नीचे वाले एक्‍सपर्ट ही यह तय कर लेते हैं कि कितनी और किसकी पुकार पहुँचाना है। ऐसे में प्रह्लाद की पुकार तब तक नहीं पहुँच पाती जब तक कि वह पूर्णत: भस्‍म नहीं हो जाए। सारे काम थ्रु प्रॉपर चैनल होना जरूरी हो गया है। थ्रु प्रॉपर चैनल मतलब अब एके साधे सब सधे की कहावत बेमानी हो गई है। अब नीचे से ऊपर तक सब को साधना पड़ता है तब कहीं आवाज में दम पैदा होता है। जिस अर्थ के लिए लड़ाई लड़ रहे हैं उसी अर्थ के बिना सभी व्‍यर्थ सा दिखाई पड़ता है। फिर भी लपटों से बचना है तो कोई सहारा तो होना चाहिए। पहले डूबते को तिनके का सहारा भी बचा जाता था, लेकिन अब तिनकों के सहारे नय्या पार नहीं लगती है। तिनके भी इतने भारी हो गए हैं कि उनका सहारा लेने जाओ वे ही आपको डूबा देते हैं।
बजट कहीं का भी हो उसे बनाए बगैर योजनाओं का क्रियान्‍वयन नहीं हो सकता है। कभी योजनाएं बजट होने के बाद भी अधूरी रह जाती है तो उनके लिए पूरक बजट का इंतजाम करना पड़ता है। जब पूरक बजट का इंतजाम होता है तो दूसरी योजना अधूरी रह जाती है। मौखिक रूप से इंसान कितना ही मंसूबा बना ले, लिखित रूप में आते-आते उस मंसूबे को मंसूबे तक ही सीमित करना पड़ता है। बजट को गजट में आने के बाद उसकी लपटों में कई मंसूबों की होली जल जाती है।
बजट कैसा भी बना लो उसका गजट किसी-न-किसी को तो अपनी लपटों में ले ही लेता है। जो जल जाता है, वह जल (पानी) की तलाश करता है, लेकिन उसकी जलन शांत नहीं हो पाती है। बजट में घाटा जरूरी है, इससे पता चलता है कि आमदनी नहीं होने के बाद भी खर्चा किया जाएगा और इसका लाभ मिलेगा। हर नए बजट के साथ ही पुराने बजट का गजट रद्दी का टोकरा बन जाता है, लेकिन बेकार नहीं होता। इसी की नकल से तो आगामी रास्‍ता खुलता है। इसी से तो पता चलता है कि किसका खयाल रखना है और किसको दरकिनार करना है। हर बजट के गजट की लपटें होती है, जिसमें हमेशा वही जलता है, जिसको सबसे ज्‍यादा जरूरत होती है।
-         संजय भट्ट

सोमवार, 17 फ़रवरी 2025

युवा साहित्‍यकारों का सोशल मीडिया सम्‍मेलन

 युवा साहित्‍यकारों के एक सम्‍मेलन में शामिल होने के लिए निमंत्रण पत्र प्राप्‍त हुआ। इस निमंत्रण पत्र को पढ़कर आश्‍चर्य मिश्रित दु:ख हुआ। सम्‍मेलन में जिनकों साहित्‍यकार कह कर संबोधित किया गया था, उनका असल में साहित्‍य से दूर-दूर का वास्‍ता नहीं था। लिखना तो दूर उन्‍होंने कोई पुस्‍तक कभी पढ़ी होगी इसमें भी संदेह लगा। जिनकों युवा साहित्‍यकार के नाम से अतिथि बनाया गया था, वे सभी सोशल मीडिया पर सक्रिय होकर अपने विडियो बनाते थे।

मैंने इस संदर्भ को लेकर वरिष्‍ठ साहित्‍यकार मित्र को अवगत करवाया। वे खुले विचारों के थे। उन्‍होंने मुझे समझाते हुए कहा- देखो मित्र अब नई पीढ़ी का यही साहित्‍य है। तुम लिखा करो कोई नहीं पढ़ता है। किसी के पास समय ही नहीं है कि तुम्‍हें या मुझे पढ़े। उनका स्‍क्रीन टाइम भी 15 सेकेण्‍ड का ही है। इससे ज्‍यादा युवा पीढ़ी के लोग इनको भी नहीं झेलते। साहित्‍यकार की एक रचना पढ़ने में कम से कम आधा घंटा और समझने में जीवन लग जाता है, लेकिन युवा पीढ़ी का जीवन भी इतना नहीं है कि वे जबरन में अपना समय नष्‍ट करें और रचनाओं को पढ़ कर उनके मर्म को समझते हुए जीवन में उतारे। आज के युवा के पास बस वही 15 से 20 सेकेण्‍ड का समय है, जिसमें वे हास्‍य, करूण और फुहड़ से भरे अर्द्ध नग्‍न नारियों के उघाड़े बदन को देख कर अपना मनोरंजन करते हैं। कवि सम्‍मेलनों में भी वे उन लोगों के लिए जाते हैं जो कविता के नाम पर चुटकुले सुना कर लोगों को उनकी तकलीफों से थोड़ी देर के लिए उन्‍हें दूर कर दें।
उन्‍होंने एक लम्‍बी सांस लेते हुए अपने दर्द को बयां किया कि अब वे भी साहित्‍यकार नहीं रहे। भले ही उनकी कुछ पुस्‍तकें प्रकाशित हो गई हो और बाजार में उपलब्‍ध भी हो, लेकिन जब भी पुस्‍तक मेला लगता है, उन पुस्‍तकों को खरीदने के लिए लोगों को प्रोत्‍साहित करना और खुद का प्रचार सोशल मीडिया के जरिए करना पड़ता है। पुस्‍तकें भी बाजार में कम और ऑनलाइन प्‍लेटफार्म पर ज्‍यादा बिकती है। आजिविका के लिए उन पुस्‍तकों की रॉयल्‍टी से पेट नहीं भरता। अब उनकी आवाज में लगभग आत्मिक रूदन सा लगने लगा था जब वे कहने लगे, मुझे लोग कंटेट रॉयटर के नाम से जानते हैं। मैं ही कथित युवा सोशल मीडिया के कलाकारों के लिए अपने जीवन को चलाने के लिए बेमन से लिखता हूँ। मेरे लिखे आइडियास में जब गालियों की भरमार के साथ कोई विडियो आता है तो मन विचलित हो जाता है, लेकिन पेट का सवाल है, साहित्‍य की आड़ में ऐसा लिखना पड़ रहा है। उन्‍होंने बड़े ही द्रवित अंदाज में लगभग तंज की शैली में कहा तुम भाग्‍यवान हो कि तुमको इन्‍होंने अब भी साहित्‍यकार मान कर इनके कार्यक्रम में बुलवाया है। उन्‍होंने लगभग सलाह भरे वचनों से कहा साहित्‍य में अब लोगों की रूचि नगण्‍य सी हो गई है, तुम भी इनके लिए नए अंदाज के कंटेट लिखने में अपना हृदय परिवर्तन कर लो, नहीं तो वह समय दूर नहीं जब तुम समाज से नकार दिए जाओ।
सम्‍मेलन के नाम में जरूर सोशल है, लेकिन समाज किस ओर जा रहा है, इसे नजदीक से देखने का अवसर मिला है। इसमें सोशल जैसा कुछ नहीं सब कुछ वही मिलेगा, जिसके लिए तुम साहित्‍य में लिख कर लड़ते रहे। उन्‍होंने पूछा- तुमने इतना लिखा, मैंने इतना लिखा क्‍या तुम किसी सरकार के ब्रांड एम्‍बेसेडर बन पाए। तुमको कोई सम्‍मान मिला है। मैं अवाक सा उनकी बातों को सुन रहा था और समाज के बारे में सोंच रहा था। हमने गणित पढ़ाया, विज्ञान पढ़ाया, हिन्‍दी और अंग्रेजी को भाषा के रूप में पढ़ाया लेकिन साहित्‍य के रूप में हिन्‍दी और अंग्रेजी को स्‍थान ही नहीं मिल पाया। मात्र एक विषय बन गया। इसमें लिखी बातों को बच्‍चे पढ़ते तो हैं, लेकिन स्‍कूल तक सीमित रखते हैं और बाद में मौका मिलने पर तुरंत छोड़ देते हैं। साहित्‍य में रूचि पढ़ने का अभ्‍यास वो तकनीक में करने लगे हैं। अब बच्‍चों को भी हर बात विडियो देख कर ही समझ आती है। समय बदल रहा है, हमको भी बदले हुए समय के साथ चलना पड़ेगा नहीं तो आउट ऑफ डेट साहित्‍यकार का तमका लेकर भूखमरी का जीवन काटना। मुझे उनके साहित्‍य प्रेम की कटूता से भरे शब्‍दों में जीवन जीने की कला तो समझ आई, लेकिन प्रेमचंद के उपन्‍यास और महादेवी वर्मा की कहानियां भी याद आई कि उन्‍होंने यथार्थ जीया और लिखा, कहां गए वे लोग जो प्रेमचंद के उपन्‍यासों को प्रेम से पढ़ते थे और उनमें अपने जीवन को तलाशते थे।
मुझे उनके करूणा भरे रूदन के साथ साहित्‍य की वह वेदना भी दिखाई दी जो किसी भी साहित्‍यकार को साहित्‍यकार को साहित्‍यकार होने पर मजबूर करती है। मैंने इतना अपनाया कि जिस सम्‍मेलन का निमंत्रण मिला था, उसमें गया ही नहीं।                                                               -संजय भट्ट

गुरुवार, 27 जून 2024

लीक पर्चों के टॉपर

लगभग झंझोड़ते हुए पिता ने अपने बेटे से कहा- कब तक सोए रहोगे उठो आज तुम्‍हारी परीक्षा है।
बेटे ने अलसाते हुए जवाब दिया-क्‍या पिताजी परीक्षा-परीक्षा की रट लगाए हो परीक्षा का पर्चा तो दो दिन से मोबाईल में लेकर घूम रहा हॅू। सारे उत्‍तर भी रट लिए हैं अब तो।
बेटे की बात सुन कर घबराहट में पसीने पसीने पिता का हाथ पंखे के स्‍थान पर टीवी के बटन पर चला गया। ब्रेकिंग न्‍युज में बड़े-बड़े अक्षरों में पर्चा लीक होने का लिखा होने के साथ ही एंकर लगभग गला फाड़ कर चिल्‍लाते हुए परीक्षा व्‍यवस्‍था पर सवाल दाग रही थी।
पिता को अपना जमाना याद आ गया। क्‍या समय था पीछे मुड़कर देखने पर भी परीक्षा निरीक्षक बिना किसी परवाह के कक्ष से बाहर कर दिया करते थे। परीक्षा के दिनों में नींद तो जैसे गायब ही हो जाती थी और उनका अपना बेटा निश्चिंत होकर परीक्षा के समय तक भी यह सोंच कर सोया पड़ा है कि परीक्षा के सारे सवाल उसकी जेब में हैं।
सुबह से रात तक और रातभर किताबों में आँखे गढ़ाए पिता बमुश्किल परीक्षाओं में दूसरा दर्जा पाया था और बेटे का यह आलम है कि दिनभर मटर-गश्‍ती और रात भर निश्चिंतता की नींद में कब परीक्षा का समय आ गया पता ही नहीं चला।
पिता अब तक सोंच रहे थे कि उनका बेटा होनहार है तथा लगातार परीक्षाओं में टॉप करता आ रहा है, तो उसका ज्ञान भी इतना होगा। अपनी ईमानदारी की नौकरी में पिता को समय ही नहीं मिला कि बेटे की ओर देखें तथा मॉ तो पहले ही कम पढ़ी गृहणी थी। उसे क्‍या पता परीक्षा क्‍या होती है और इसके लिए क्‍या-क्‍या जतन करना पड़ते हैं।
आज पिता की आंखे खूली तो पता चला कि बेटा प्रश्‍नों को रट कर उनके जवाब देकर हमेशा टॉप करता रहा है। जिसे अपनी सेटिंग पर इतना भरोसा था कि वह सालभर स्‍कूल कॉलेज से बंक मार पर आवारागिर्दी में व्‍यस्‍त रहता था। यही उसके आवारा दोस्‍तों के रिलेशन थे कि उसे परीक्षा से पहले ही प्रश्‍नों की जानकारी हो जाती थी और वह टॉप कर लेता था।
पिता सोंच रहे थे कि उसके बेटे जैसे कितने ऐसे और होंगे जो इस तरह परीक्षाओं में टॉप कर लेते होंगे। कितने ऐसे बच्‍चे होंगे जो निरंतर अपने ज्ञान के बल पर पढ़ने का प्रयास करते होंगे जो इनके बेटे जैसे बच्‍चों के कारण अपनी योग्‍यता होने के बाद भी वंचित रह जाते होंगे। सोंच इतनी बढ गई थी कि पिता का ब्‍लड प्रेशर हाई होने लगा था और हल्‍का सीने में भी दर्द उठने लगा था।
पिता के ब्‍लड प्रेशर और दर्द से बेपरवाह बेटा अभी भी सोया था उसे यह पता नहीं चला था कि पर्चा लीक हो चुका है और बड़े अधिकारी उसे नकार रहे हैं।
परीक्षा व्‍यवस्‍था भंग हो चुकी है, लिखने पढ़ने में बच्‍चों का बिल्‍कुल मन नहीं लग रहा है। बस इसी जुगाड़ में कि किसी तरह या तो पर्चा मिल जाए या परीक्षा कक्ष में उनकी मदद हो जाए। बस एक डिग्री की दरकार और फिर नौकरी के लिए होने वाली परीक्षाओं में भी यही जुगाड़ फार्मूला, लीक का खेल, पर्चा निरस्‍त, जांच और परिणाम में ढांक के तीन पात वाली कहावत का सिद्ध हो जाना नियति बन गई है।
योग्‍यता, मेहनत और प्रयास का स्‍थान जुगाड़ टेक्‍नोलॉजी ने ले लिया है। नतीजा बेरोजगारी और दिन-ब-दिन बिगड़ती व्‍यवस्‍था के रूप में सामने आ रहा है।
ज्‍यादातर को हॉ जी वाले युवाओं की भीड़ और मूर्खों का जमावाड़ा पसंद हो गया है, उनका ज्ञान अर्द्धनग्‍न और बदन उगाढ़ कुल्‍हे मटकाऊं रील्‍स में उलझ कर रह गया है।
पिता के माथे पर चिन्‍ता की लकीरों और मॉ के मर्म से दूर बस जुगाड़ टेक्‍नोलॉजी वाला समाज किस ओर जा रहा है, किसी को पता नहीं। आज हम सिर्फ लीक पर्चों के टॉपर को सलाम कर रहे हैं। ज्ञान की पूजा व्‍यर्थ है।                                                                                                              संजय भट्ट

शनिवार, 17 फ़रवरी 2024

विकास का प्रसव काल

विकास की योमे पैदाईश का अवसर था। प्रकृति और मानवीय संवेदनाओं को तकलीफ हो रही थी। वह घर में नए मेहमान की तरह आ रहा था। उसके आने से सभी को उजियारा नजर आ रहा था। प्रकृति को यह तकलीफ थी कि उसकी बरसों की मेहनत से हवा, पानी और विभिन्‍न परेशानियों को झेलते हुए बड़े किए वृक्षों को विकास की राह में बाधा मान कर हटा दिया गया था। वह किसी को छाया देते, किसी को रोजगार देते और किसी गरमी में तपते राहगीर को शीतल हवा के झोंके से तृप्‍त कर देते, लेकिन उनको विकास में बाधा मान कर उस पथ से हटाया जा रहा था। अब भी वे शान्‍त थे, क्‍योंकि उनके हटने से विकास को नई राह मिलेगी और वे किसी मकान की शोभा तो किसी के घर की रोटी पकाने के काम आएंगे।

जब भी कहीं विकास का जन्‍म होता है वह हमेशा दूसरों को दुखी कर ही पैदा होता है। वह अपनी पैदाईश के बाद लाभ देता है, लेकिन प्रसव काल में सभी को काफी तकलीफों का सामना करना पड़ता है। इस बार वह हमारे यहां आ रहा था एक नया पथ लेकर। उसके जन्‍म के बाद उड़ती धूल और गड्ढों से बचाते हुए वह सभी को राहत प्रदान करेगा, लेकिन अभी प्रसव काल चल रहा था, सभी को परेशानी हो रही थी।

विकास के आने से किसी को खुशी थी तो कुछ के पेट में दर्द हो रहा था। कुछ का बना बनाया व्‍यवसाय विकास की आंधी में उजड़ने लगा था तो किसी को उसके पैदा होने तक आवाजाही की परेशानियों से दो चार होना पड़ रहा था। विकास का आना दो धारी तलवार था, कुछ को खुशी थी कि चलो उनको इसका फायदा आगे मिलेगा, लेकिन कुछ को काफी दिक्‍कत थी। अब वे क्‍या करेंगे, कैसे करेंगे, उनका साथ कौन देगा। कैसे उन्‍हें फिर से अपना आशियाना बसाने का मौका मिलेगा। पर क्‍या करें विकास का प्रसव काल तकलीफों का पहाड़ लेकर आता है और जन्‍म में पटाखे फूटने लगते हैं। वह बुढ़ापे में फिर से तकलीफ देता है, लेकिन अपने शैशव काल से लेकर जवानी के दिनों में सभी की ऑंख का तारा बन कर रहता है।

अब विकास हमारे यहां आ रहा था तो कहीं खुशी कहीं गम का माहौल था। मानवीय संवेदनाओं को सभी समझ सके यह हर किसी के बस की बात नहीं। मानवीय संवेदनाएं अंतर्मुखी होती है और चुपके-चुपके एक कमरे में बैंठ कर रो लेती है, किसी से कुछ नहीं पाती है। जब वह कुछ कहना चाहती है तो उसे विकास की चकाचौंध दिखा कर शान्‍त कर दिया जाता है। वह इतनी भोली होती है कि उसकी जुबान खुले उसके पहले ही विकास की चमक उसकी ऑंखों पर ऐसी छा जाती है कि वह सही होकर भी सभी को गलत लगने लगती है। यहां भी विकास के आने से वह रो तो रही थी, लेकिन उसकी जुबान नहीं खुल पा रही थी। सभी समझा रहे थे कि विकास आएगा तो उसकी ही पूछ परख बढ़ेगी, सभी उसका सम्‍मान करेंगे और वह भी दुगनी रफ्तार से आगे बढ़ेगी।

आज मानवीय संवेदना का पेट खाली था और तकलीफ कम होने का नाम नहीं ले रही थी। हर कोई उसका मजाक उड़ा रहा था कि इतने सालों से विकास का इंतज़ार था और अब जब वह प्रसव काल से गुजर रहा है तो तुम व्‍यर्थ में विलाप कर रही हो। विकास को आने तो दो फिर देखना तुम्‍हारा भी रूतबा बढ़ जाएगा। मानवीय संवेदना को आज के पेट की चिन्‍ता सता रही थी और लोग उसे सपने बेंचने में लगे थे। वह भी सपनों में खोना चा‍हती थी, लेकिन खाली पेट का दर्द वह अकेली समझ सकती थी कोई और उसके इस दर्दभरी कराह को मेहसुस भी नहीं कर सकता था।

सबको पता है जब भी विकास आता है वह अपने साथ एक आंधी जरूर लेकर आता है। जिसमें प्रकृति के बसे-बसाए वृक्षों को अपनी आहूति देना पड़ती है और मानवीय संवेदनाओं को स्‍वयं से समझौता करना पड़ता है। यहां भी विकास इन दोनों के लिए परेशानियों का सबब लेकर आया लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। विकास की चकाचौंध ही इतनी खतरनाक होती है कि वह धूमकेतु की चमक को भी फीका कर देती है। सभी विकास के आने का स्‍वागत कर रहे थे और प्रकृति मानवीय संवेदनाओं के साथ चुपचाप अपने पर होते अत्‍याचार सहन कर भी मौन थी।       

                               -संजय भट्ट


                                                                                   -

मंगलवार, 13 फ़रवरी 2024

कुछ तो लोग कहेंगे

 

जो दिखता है, वही बिकता है। किसी ने यह टेग लाइन दी और आज जमाना इसी पर चलने लगा। सब कुछ सिर्फ दिखावे के लिए हो रहा है। हर किसी को अपना सबसे अच्‍छा बताने की होड़ लग गई है। यह तो मानव स्‍वभाव रहा है कि उसे सर्वश्रेष्‍ठ करने की ललक रही है, लेकिन यह ललक पागलपन की इतनी हदें पार कर देगी कभी सोचा नहीं था। सिर्फ और सिर्फ दिखावे के लिए सब कुछ करना चाहे इसमें कुछ भी खर्चा हो या स्थिति दयनीय हो जाए। सबको पता है कि उन्‍हें अपना कमाया खाना है, लेकिन फिर भी अच्‍छा दिखने और दिखाने की होड़ में अपने आप को दांव पर लगाने से बाज नहीं आ रहे हैं।

मैं अपने परिवार के एक शादी समारोह में बढ़ी हुई दाढ़ी के साथ पहुँच गया। कपड़े भी कुछ ऐसे नहीं पहने थे कि कोई नोटिस करे, लेकिन मैं सबके नोटिस करने का कारण बन गया। मेरी पत्‍नी से लेकर सभी का एक ही सवाल था,ऐसे कैसे आ गए। मैं आश्‍चर्य में था कि ऐसे से क्‍या मतलब हो सकता है। क्‍या मुझ में कोई कमी है। मुझ से यहां आ कर कोई गलती हो गई है। ऐसे सवालों से जुझता रहा और कार्यक्रम समाप्‍त होने तक विभिन्‍न कामों को कुशलतापूर्वक निपटाता हुआ घर पहुँचा। वही सवाल था शादी में ऐसे कैसे आ गए। मैं फिर हतप्रभ कि मैंने आखिर गुनाह क्‍या किया है। रहा नहीं गया। पत्‍नी से पूछ लिया ‘ आखिर कौन सी कमी थी, मुझमें’।छूटते ही बोली ऐसी शकल लेकर आ गए मेरी तो इज्‍जत का फालूदा ही बना दिया। मैंने भी पूछ लिया आखिर क्‍या कमी रह गई।

झल्‍लाते हुए बोली- आपसे मुंह लगना बेकार है। आपकी इज्‍जत है, समाज में सब लोग आपको मानते हैं, फिर भी ऐसे ही उठ कर चले आए। मैं अब भी हैरान था कि ऐसा क्‍या हुआ जिसकी वजह से समाज में मेरा और मेरे परिवार के साथ मेरी पत्‍नी की इज्‍जत भी दांव पर लग गई। मैंने अपना सवाल दोहराया- ऐसी कौन सी कमी रह गई, जिससे समाज को, परिवार को और तुम्‍हें नीचा देखना पड़ा। अब पत्‍नी का पारा सातवें आसमान पर था। गुस्‍से में बोली शकल देखी है अपनी कांच में। मैंने कहा देखी है, जैसा हूँ वैसा ही दिख रहा हूँ, मुझे तो कोई कमी नहीं नजर नहीं आ रही मेरी शकल में।  वो बोली यह बढ़ी हुई दाढ़ी और साधारण सा पेंट शर्ट भला कौन शादी में पहन आता है। सब को देखा था कैसे आए थे और एक तुम उठ कर चले आए।

मैंने समझाते हुए कहा- कपड़े अच्‍छे थे और दाढ़ी का क्‍या है आजकल तो फैशन में है। दूल्‍हे को भी दाढ़ी थी। उसने कहा-दूल्‍हे की दाढ़ी और तुम्‍हारी दाढ़ी में फर्क है। वह दाढ़ी को सेट करवा कर आया था और आप ऐसे ही खीचड़ी बालों वाली दाढ़ी के साथ आ गए।
अगली शादी समारोह में जाने का फिर से अवसर मिल गया। इस बार मेरे कपड़ों तथा दाढ़ी का पूर्ण ध्‍यान रखते हुए संपूर्ण नियंत्रण के सा‍थ में शादी में पहुँचा। इस बार पत्‍नी के अनुसार सुन्‍दर और मेरे अनुसार कार्टून नजर आ रहा था। शादी का कार्ड आने के बाद ही सभी कपड़ों की ट्रायल ली गई और मेरी बढ़ी हुई दाढ़ी को समय रहते कटवाया गया। सवाल सब का अब भी वही था अरे आप ऐसे होकर कैसे आ गए। फिर भौचक रह गया कि आखिर इस बार कौन सी गलती कर दी।
इस कार्यक्रम को निपटा कर जैसे ही घर पहुँचा पत्‍नी से बोला- इस बार भी सभी ने वही सवाल किया। पत्‍नी ने कहा हमेंशा ऐसे ही हर कहीं पहुँच जाते हो इस बार थोड़ा टीप टाप होकर पहुँचे तो लोग पूछेंगे ही। तब मैंने पत्‍नी को समझाया कि कुछ तो लोग कहेंगे ही। इसलिए जैसे हो वैसे रहो तो कोई सवाल का असर नहीं पड़ता। जमाने को दिखाने के लिए अपने लिए जियो।
                                                                -    संजय भट्ट

शनिवार, 16 दिसंबर 2023

चूहों का बिल

 

भीषण गर्मी पड़ने लगी थी, चूहों को पता लग गया था कि अब बारिश आने का समय हो गया है। बरसात को सिर पर देख कर चूहों ने अपने ठिकाने के लिए बिल खोदना शुरू कर दिया था। सभी चूहों को रहने के लिए सुरक्षित स्‍थान की तलाश थी। सभी ने कहीं न कहीं अपना बिल खोदना शुरू कर दिया था। सब अपने-अपने बिलों में सुरक्षित अनुभव कर रहे थे। सबका ठिकाना तैयार हो गया था, लेकिन कुदरत को भी पता है, सभी को अपने मन के अनुसार स्‍थान नहीं देती। कुछ स्‍थानों पर पानी भरना शुरू हो गया था। कुछ स्‍थानों से भागने लगे थे और कुछ अभी भी अपनी मेहनत को बेकार नहीं जाने देना चाहते थे। कुछ सड़कों पर गा‍डि़यों के नीचे आकर अपना जीवन समाप्‍त कर चुके थे तो कुछ को सुरक्षित ठिकाना मिल गया था। प्रयास सभी का था,लेकिन सफलता सभी को मिले यह जरूरी नहीं होता। यही हाल सॉंपों का भी था जो चूहों  के बनाए हुए ठिकाने में अपना स्‍थान खोज लेते हैं। कुछ सड़कों पर मारे गए, कुछ युद्ध में शहीद हो गए और कुछ को ही अपना सुरक्षित स्‍थान मिल सका।
चूहों को सुरक्षित स्‍थान मिल जाए तो भी खोदने और कुतरने की आदत जाती नहीं है। कुछ जिन्‍हें गोदामों और घरों में स्‍थान मिल गया था वह अपना किला अति सुरक्षित मान रहे थे, जिन्‍हें खाने से लेकर कुतरने और रहने के लिए स्‍थान सहित सब कुछ मिल गया था। जीवन में संघर्ष कभी खत्‍म नहीं होने वाली प्रक्रिया है। सब कुछ सुरक्षित हो तो भी जीवन को बचाने के लिए हर दिन नया संघर्ष सामने आता है। गोदाम मालिकों ने अपना सामान सुरक्षित करने के लिए दवाई डालना शुरू कर दी तो घरों में चूहों के नुकसान से बचने के लिए पिंजरा लगाने लगे। फिर कुछ दवाई वाला सामान खाने से मर गए तो कुछ पिंजरों में कैद होकर घरों से बाहर कर दिए गए।
चूहों के लिए यह भी खतरनाक हो गया था। अब वे सभी सुरक्षित स्‍थान की तलाश करने लगे थे। उन्‍हें स्‍थान सुरक्षित मिलता तो खाने के लाले थे और खाना मिल जाता तो स्‍थान सुरक्षित नहीं था। ऐसे में जद्दोंजहद चल रही थी। चूहों के सरदारों ने मिल कर योजना सोंचना शुरू की। कौन कहां रहेगा यह सब तय हो गया, लेकिन परेशानियों से निपटने की जिम्‍मेदारी उन चूहों पर ही सौंप दी। कुछ चूहों ने कमाल का काम किया और सुरक्षित स्‍थान के साथ अपना खाना भी जुगाड़ लिया। उन्‍होंने तय किया था कि बरसात के चलते किसी के घर में कुतरने पर थोड़ा नियंत्रण करेंगे। खाने के लालच में नहीं फंसेंगे तो उनका भी जीवन बचने लगा।
जैसे-तैसे संघर्षों की उहापोह के बीच उनका जीवन बचने के साथ ही बरसात का समय भी समाप्‍त हो गया। जैसे ही बरसात का समय समाप्‍त हुआ खेतों में किसानों ने फसलें बो दी। अब चूहों का स्‍वर्णकाल प्रारंभ हो रहा था। वरिष्‍ठ चूहों को पता था कि उनकी रणनीति काम आई है और जिनका भी जीवन बचा है, वे सभी चूहे उनको फिर से अपना वरिष्‍ठ मान कर उनकी सेवा में तत्‍पर हो जाएंगे। उन्‍हें पुराना सम्‍मान फिर से मिलने लगेगा, लेकिन सॉंपों के भी अपने वरिष्‍ठ थे। उन्‍होंने अपनी रणनीति पहले ही बना रखी थी, जैसे ही चूहों ने खेतों के आसपास अपना ठिकाना बनाना चालू किया, साँपों ने उन पर कब्‍जा करने की कार्यवाही प्रारंभ कर दी। वरिष्‍ठ चूहे निश्चिंत थे, उनको पता था कि उनकी रणनीति से बचे चूहे उनके लिए  भोजन का इंतजाम कर देंगे। वे उनके बनाए बिलों में आराम करने लगे थे, लेकिन सॉंपों की रणनीति उन पर भारी पड़ गई। सॉंपों ने सबसे पहले वरिष्‍ठ चूहों को ही अपना शिकार बनाया और खतम कर दिया। वरिष्‍ठ थे, बुजूर्गियत के चलते भाग भी नहीं सकते थे। सॉंपों केआसान शिकार हो गए। अपना पेट भरनेके बाद सॉंपों ने अपनी रणनीति के तहत कनिष्‍ठ चूहों को बागडौर सौंप दी। कनिष्‍ठ चूहों ने भी सोंचा कि उनको वरिष्‍ठ का स्‍थान मिल रहा है तो खुशी-खुशी सॉंपों का सहयोग कर दिया। इस तरह बिल की लड़ाई में अपने ही वरिष्‍ठ चूहों की शहादत पर कनिष्‍ठ चूहों को स्‍थान मिल गया। 
                                                       संजय भट्ट

मंगलवार, 12 दिसंबर 2023

पत्‍नी का मोबाइल

 


पत्नियों के मोबाइल उपयोग करने के तीन तरीके मेरे शोध से समझ में आ पाए हैं। कुछ महारानी, कुछ रानी और कुछ नौकरानी स्‍टाईल में उपयोग करती है। नौकरानी शब्‍द किसी को भी पसन्‍द नहीं है, इसलिए इसको हमने कंवरानी शब्‍द दे दिया है। महारानी स्‍टाईल में मोबाइल का उपयोग करने वाली पत्‍नी को फोन लगाओ तो बच्‍चे ही उठाते हैं। बमुश्किल बच्‍चों की मम्‍मी से बात हो पाती है। वह रात को सोने के पहले मोबाइल को हाथ में लेती है और दिनभर की गतिविधियों को अंजाम देती है। वह डॉक्‍टर के लिखे इलाज की तरह सुबह, दोपहर और रात को मोबाइल का प्रयोग करती है। दिनभर इनका मोबाइल यत्र-तत्र-सर्वत्र विचरण करता है। उसके मोबाइल और उसके डाटा का उपयोग बच्‍चे या परिवार के अन्‍य सदस्‍य ही करते हैं। वह महारानी शैली में दिनभर का अपडेट लेती है और उस पर अपना निर्णय देती है। कई बार तो यह स्थिति उसके सामने उपस्थित हो जाती है कि उसे डाटा में शून्‍य ही मिलता है। वह समझ ही नहीं पाती है कि आज उसके व्‍हाट्सएप्‍प के फोटो क्‍यों नहीं खुल रहे। उन पर गोला क्‍यों घूम रहा। वह सोते हुए पति को जगाती है और पूछती महाराज आज मेरा व्‍हाट्सएप्‍प नहीं चल रहा। मेरी बहन का जन्‍मदिन था और उसे बधाई देना थी। फिर महाराज ऊंघते हुए से देखते हैं और सीधा सा जबाब दे देते हैं, आज दिनभर मोबाइल देखा तो अब कैसे चलेगा। चलो वायफाय से इसे कनेक्‍ट कर देते हैं। तब कहीं जाकर महारानी को संतोष होता है।
दूसरा प्रयोग रानी स्‍टाईल में होता है। रानी अपना मोबाइल अपने पास तो रखती है, लेकिन बात इनसे भी मुश्किल से हो पाती है। यह शैली मोबाइल को साइलेंट कर पर करके अपने रोज के कामों में व्‍य‍स्‍त रखने में माहिर होती है। इनको मोबाइल का म भी पता नहीं होता, लेकिन ये महारानी स्‍टाइल से थोड़ी ऊपर होती है। कभी मन किया तो मोबाइल का उपयोग कर लिया, नहीं किया तो काई लपटन साहब भी फोन करे, इनको कोई फर्क नहीं पड़ता। हां यह अपने ससुराल परिवार से ज्‍यादा पीहर परिवार पर ध्‍यान देती है और उनके सारे जवाब तुरंत देती है। इसे पता होता है कि कब किसका जन्‍मदिन आ रहा है, कब क्‍या करना है। थोड़ी सी फुर्सत का उपयोग यह मोबाइल के साथ दोस्‍ती में बिताती है। इनके भी कुछ डाटा का उपयोग दूसरे कर लेते हैं, लेकिन ज्‍यादातर यह कंपनी को उनका दैनिक डाटा बचा कर ही फायदा देती है। मोबाइल डाटा प्रोवाइडर कंपनियां भी इनके जैसे ग्राहकों से संतुष्‍ट रहता है। बस इनको रिचार्ज और चार्ज में अंतर पता नहीं होता है। इनकी बेट्री खतम हो जाती है तब ही यह चार्जिंग पर लगाती है और रिचार्ज खत्‍म हो जाए तो पता नहीं चलता। इनका भी रिचार्ज वाला काम इनके राजाजी को ही करना पड़ता है।
तीसरे प्रयोग की स्‍टाईल में हमेशा कामकाजी महिलाएं होती है। इनको सब पता होता है कि मोबाईल कैसे चलाना है, कब चलाना है, किसको जवाब देना है, किसको नहीं देना है। यह बहाने बनाने में भी एक्‍सपर्ट होती है। अपने कुंवर साहब को भी बेवकुफ बनाने से नहीं चुकती है। इनका दिनभर मोबाइल के साथ ही गुजरता है। इनको घर का ज्‍यादा पता नहीं होता है। घर में कौन क्‍या कर रहा है, क्‍या नहीं कर रहा है, बच्‍चों की पढ़ाई कैसी चल रही है। वह क्‍या और कैसे कर रहे हैं, इससे ज्‍यादा इनको इनके मोबाइल की चिन्‍ता रहती है। मोबाइल इनका पेट जाया बच्‍चा होता है और बाकि सब डाउनलोड किए होते हैं। ज्‍यादातर तो इनका मोबाइल व्‍यस्‍त रहता है, लेकिन फिर भी कभी-कभी बात कर लेती है। यह कंव‍रानियां अपने कुंवर साहब को फोन लगाती है, कुंवर साहब की हिम्‍मत नहीं कि इनको फोन लगा ले।
ऐसा नहीं कि कंवरानी स्‍टाईल में मोबाइल का उपयोग करने वाली जिम्‍मेदार नहीं होती है, लेकिन यह जिम्‍मेदारी इनके मोबाइल के प्रति ही होती है। यह रोज व्‍हाट्सएप्‍प पर अपना स्‍टेटस बदलती रहती है, दुनिया में कब कहां क्‍या हो रहा है, इनको सब पता होता है, जिसे यह अपने दोस्‍तों से शेयर करती है, लेकिन परिवार में, घर में क्‍या हो रहा है, इसकी जानकारी जरा कम ही रखती है। यह बड़ी ही शातिर स्‍टाईल है। इसमें किसी को भी एहसास नहीं होता है कि मोबाइ्ल का क्‍या उपयोग हो रहा है। यह महारानियों की तरह लापरवाह भी नहीं होती है। रोज सोने के पहले अपने कुंवर साहब की गतिविधियों पर भी ध्‍यान देती है और अपना मोबाइल रात को भी अपने सिरहाने रख कर सोती है। अब आप अंदाज लगा लो कि आपकी वाली किस स्‍टाईल में मोबाइल चलाती है और जो सिंगल है, उनको तो तीसरी स्‍टाईल वाली ही मिलेगी यह पक्‍का है।

- संजय भट्ट

शनिवार, 2 दिसंबर 2023

परिणाम का एक्जिट पोल

एक्जिट पोल दो तरह के होते हैं, पहला एक्जिट पोल का परिणाम तथा दूसरा परिणाम का एक्जिट पोल। एक्जिट पोल का परिणाम विश्‍वनीय नहीं होता है, लेकिन परिणाम का एक्जिट पोल विश्‍वनीय होता है। दोनों की तासीर एक जैसी होती है, दोनों में कहीं खुशी कहीं गम का वातावरण रहता है। एक्जिट पोल का परिणाम आता है तो इसमें संभावनाओं पर चर्चा की जाती है, लेकिन हार जीत किसी की नहीं होती है। इसमें बस दो रातों की नींद उड़ जाती है, लेकिन करने के लिए कुछ नहीं होता है। जो एक्जिट पोल में हार रहा होता है वह हार को नकार देता है तथा जीत रहा होता है वह उसकी जीत की मिठाई उसके अलावा हर कोई बांट रहा होता है। परिणाम चाहे जो भी हो लेकिन एक्जिट पोल की खुशी का अपना ही मजा है। यह सब होता भी टाइम पास के लिए ही है। परिणाम का एक्जिट पोल आते ही सभी के मुगालते दूर हो जाते हैं। आजकल पढ़-लिख कर मतदाता भी इतने विद्वान हो गए हैं कि किसी को भी सही नहीं बताते। किसी एक्जिट पोल में कोई हार रहा होता है तो किसी में जीत रहा होता है। कुछ-कुछ ही ऐसे होते हैं, जो सब जगह हार रहे होते हैं, उनको पहले से ही पता होता है कि उनकी हार तय है। उन्‍हें कोई खुशी और कोई गम नहीं होता है, क्‍योंकि पहले से ही पता होता है कि हार रहे हैं। कई बार एक्जिट पोल में जीतने के बाद भी हार पक्‍की हो जाती है, जब परिणाम का एक्जिट पोल आता है। यह ठीक बच्‍चों की परीक्षा जैसा होता है, इसमें प्रश्‍नपत्र किसी का भी बिगड़ता नहीं, लेकिन परिणाम विपरित आ जाते हैं। अब तो चौकाने वाले परिणाम आने लगते हैं। परीक्षा में परिणाम परिवर्तन नकल पर भी निर्भर करता है, लेकिन चुनावों के एक्जिट पोल में नकल का कोई प्रभाव नहीं होता है। अब एक्जिट पोल का तरीका भी बदल गया है, इसमें फोन पर आप से वह सब पूछ लिया जाता है, जिसके आधार पर आंकलन करना होता है। एक्जिट पोल में विद्वानों की चांदी हो जाती है, वह विभिन्‍न स्‍थानों पर अपने अनुसार वोट शेयरिंग तथा जीत का आंकलन पिछले तथा आने वाले परिणामों पर करके अपना ज्ञान पैलते रहते हैं। उन पर कोई जिम्‍मेदारी नहीं होती है, लेकिन परीक्षा के एक्जिट पोल तथा परिणामों विश्‍लेषण इतना सही होता है कि जिम्‍मेदार पहले ही पता लगा लेते हैं कि परिणाम चौकाने वाले आने वाले हैं या उनकी इच्‍छा के अनुरूप। न तो कोई फैल होने के लिए परीक्षा देता है न ही कोई हारने के लिए चुनाव मैदान में आता है। परीक्षा का परिणाम आने तक सभी बच्‍चे पास हो रहे होते हैं तथा चुनाव का परिणाम आने तक सभी प्रत्‍याशी जीत रहे होते हैं। हार और जीत के इस खेल का परिणाम अच्‍छा खेलने के बाद भी विपरित हो सकता है। एक्जिट पोल का परिणाम चाहे जो रहा हो लेकिन परिणाम का एक्जिट पोल हमेशा अलग ही खुशी और गम का वातावरण बनाता है। इसमें जीतने वाले को सभी पूछ रहे होते हैं तो हारने वाले पीछे के दरवाजे से चुपचाप निकल जाते हैं। मानव मन भी हमेशा अपनी सफलता और असफलता को समय से पहले जानने का इच्‍छुक होता है। इसका फायदा बाजार वाले उठाते हैं, कोई सट्टा बाजार में तो चमक-दमक वाले बाजार में अपनी सफलता खोज रहा होता है। किसी को मिल भी जाती है, लेकिन क्षणिक या एक दो दिन की खुशी भी खुशी ही होती है। एक्जिट पोल भी उस घोषणा की तरह होता है, जो हजारों के लिए की जाती है, लेकिन लाभ कुछ को ही होता है। यह शुटिंग चैम्पियनशीप की तरह भी होती है, जिसमें निशाना तो पक्‍का लगाया जाता है, लेकिन ठीक किसी-किसी का ही बैठता है। कुछ भी हो लेकिन एक्जिट पोल का परिणाम, परिणामों के एक्जिट पोल से बेहतर होता है। इसमें सभी कहीं न कहीं हार रहे होते हैं तो कहीं जीत भी रहे होते हैं, लेकिन परिणामों के एक्जिट पोल में कोई एक ही जीत का सेहरा बांध कर निकलता है और शेष को पीछे का रास्‍ता ही देखना पड़ता है। इसलिए व्‍यक्ति को जीवन में हमेशा परिणामों के एक्जिट पोल पर भरोसा करना चाहिए, एक्जिट पोल के परिणाम तो कुछ भी हो सकते हैं। 
 -संजय भट्ट

शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

जल संरक्षण के आध्‍यात्मिक और वैज्ञानिक आधार

संसार के अधिकतर भाग पर जल और कुछ भाग पर पृथ्‍वी है। पृथ्‍वी पर जीवन जल के कारण है, यह आध्‍यात्‍मिक तथा वैज्ञानिक दोनों आधारों पर परखा गया है तथा प्रमाणित भी हुआ है। बिना जल के मानव तथा अन्‍य जीवों के जीवन का कोई आधार नहीं है। जीवन की मुख्‍य आवश्‍यकता जल है तथा इसका भी मात्र 1 प्रतिशत भाग उपयोग के योग्‍य है। इतना सब जानने के बाद भी हम जल की उपयोगिता तथा महत्‍ता को समझ पाने में सक्षम नहीं हो रहे हैं।
हम इन्‍द्रदेव तथा वरूण देव को जल का अधिष्‍ठाता देवता के रूप में मानते हैं तथा जल की प्राप्ति के लिए हमेशा हम इनकी पूजा-आराधना करते हैं। जबकि इन्‍द्रदेव वर्षा के देवता है और वरूण देव जलराशि के प्रमुख है। ऋग्‍वेद के अनुसार इन्‍द्रदेव अंधकार तथा अनावृष्टि रूपी दैत्‍यों से युद्ध कर जल तथा प्रकाश को मुक्‍त करवाया है। उन्‍होंने ‘वृत्र’ और ‘अहि’ नामक दैत्‍य जो अकाल तथा अनावृष्टि के प्रतीक के रूप में थे का वध कर जल को प्रदान किया है। इन दैत्‍यों का निवास पर्वत मेघों में था तथा भारी शिलाओं से भी इन्‍होंने जल को रोक रखा था। यह दोनों दैत्‍य इन मेघों से सूर्य के प्रकाश को भी पृथ्‍वी से वंचित कर देते थे। इन्‍द्रदेव ने ही कम्‍पायमान धरती और चलित पर्वतों को भी स्थिर किया है। इन्‍द्रदेव को ऋग्‍वेद में सर्वप्रधान देवता बताया गया है तथा पूर्व आध्‍यात्मिक वैज्ञानिक मैक्‍समूलर ने सूर्य का वाची, रॉथ ने मेघों तथा विद्युत का देवता, बेनफे ने वर्षाकालिक आकाश का प्रतीक, ग्रॉमसन ने उज्‍जवल आकाश का प्रतीक,हापकिन्‍स ने विद्युत का प्रतिरूप और मैकडॉनल तथा कीथ ने वर्षा का देवता माना है। इन्‍द्रदेव ने ही गंगा सहित 7 नदियों को प्र‍वाहित किया है। ऋग्‍वेद के 9 सूक्‍तों में वरूण तथा इन्‍द्रदेव के संयुक्‍त वर्णन है। दानों ने सरिताओं के पथ खोजे,खोदे तथा उनकों प्रवाहित होने में मदद प्रदान की है। सप्‍त सिन्‍धु तथा औषधियों की उत्‍पन्‍नता जल से ही संभव हो सकी है और यह वरूणदेव के मुख में प्रवाहित है, इसलिए वरूणदेव को जल का प्रमुख माना गया है।
पृथ्‍वी पर बर्फ, समुद्र और भूमिगत जल के रूप में जल की उपलब्‍धता है। सभी अलग-अलग स्‍थानों पर अपनी महत्‍ता के साथ उपलब्‍ध है। समुद्र में जीव तथा औषधियों का खजाना है तथा बर्फ से प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन। भूमिगत जल सिंचाई और पेयजल के रूप में अधिकांश भू भाग पर मिलता है। हम देव आराधना करते हैं और अपनी समस्‍या का समाधान होने पर देवताओं के उपकार को भूल जाते हैं। हमें पर्याप्‍त जल उपलब्‍ध हो जाता है तो इन्‍द्रदेव की वृष्टि कृपा तथा वरूण देव की संचय कृपा का भान नहीं रहता।
जल का संरक्षण और पर्यावरण का संतुलन बनाने में मानव का महत्‍वपूर्ण योगदान है। जल का संचयन कर मानव जीवन के साथ ही संपूर्ण जैव विविधता को बचाया जा सकता है। जल के दुरूपयोग के कई उदाहरण हमारे सामने प्रतिदिन आते हैं। हम अपनी इस जिम्‍मेदारी को न तो स्‍वयं निभा पाते हैं और न ही प्रेरित कर पाते हैं कि जल की महत्‍ता को समझाएं। पृथ्‍वी पर अनेक प्रकार के जीवों सहित मानव का जीवन इसी जल पर आधारित है। एक बड़ा भू भाग जल की कमी के कारण विभिन्‍न प्रकार की समस्‍याओं और प्रा‍कृतिक संकटों का सामना कर रहा है। पृथ्‍वी पर पाए जाने वाले अन्‍य जीव बुद्धि विवेक से शून्‍य माने जाने के कारण जल को किसी प्रकार से नुकसान नहीं पहुँचाते हैं, लेकिन मानव अपने बुद्धिबल के कारण ही जल का अतिदोहन, दुरूपयोग तथा जल के नष्‍टीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
पहले मालवा की धरती को ‘पग-पग नीर’ की संज्ञा दी जाती थी, लेकिन अतिदोहन व दुरूपयोग  के कारण ही मालवा क्षेत्र में  भूजल का स्‍तर लगातार नीचे जाता जा रहा है। इन्‍द्रदेव तथा वरूणदेव के प्रयासों से मानव जीवन तथा अन्‍य जीवों के लिए असूरों के बन्‍धन से मुक्‍त जल को फिर से असूरी शक्तियों के हवाले करने जा रहे हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि तथा मेघों का असमय बरस जाना जैसी घटनाएं देखने को मिलने लगी है। दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन तथा पर्यावरण के संरक्षण को लेकर बातों का सिलसिला चल रहा है, लेकिन अब भी आम मानव जाति जल की इस अद्भुत अनुकृति को समझ पाने में सक्षम नहीं हो रहा है। अपनी आवश्‍यकताओं की पूर्ति तथा विभिन्‍न वैज्ञानिक खोजों के बल पर जल का दुरूपयोग कर रहा है और इसी से प्रकृति विनाश की ओर बढ़ती जा रही है। सभी धर्म ग्रंथों में पृथ्‍वी की नष्‍टता जल प्‍लावन अर्थात जल में डूब कर लिखी गई है। समुद्र अपना दायरा बढ़ाते जा रहे हैं और पर्वतों पर जमी बर्फ पिघलती जा रही है। जितने आवश्‍यक समुद्र है, उतनी ही आवश्‍यक पर्वतों पर जमी बर्फ है। सबसे ज्‍यादा जरूरी है- नदियों का वर्षभर प्रवाहित होते रहना। बड़ी नदियों को छोड़ दिया जाए तो सहायक नदियों में जल सिर्फ वर्षा काल में ही दिखाई देता है। जब तक नदियों का प्रवाह वर्षभर नहीं होगा, भूजल का स्‍तर सिकुड़ता जाएगा और जब भू जल नहीं होगा तो मानव को पेयजल उपलब्‍ध नहीं होगा और पेयजल के बिना मानव जीवन की कल्‍पना को साकार रूप दिया जाना संभव नहीं है।
अरावलि और सतपुड़ा की छो‍टी पहाडि़यां तथा माउंट आबू के कारण मालवा और संपूर्ण मध्‍यप्रदेश में वर्षा के कारण जल की उपलब्‍धता है। यही स्थिति हिमालय के कारण भारत की है। भारत भूमि पर पर्वत, नदियां और समुद्र की पर्याप्‍तता है। इसी का लाभ हमें जीवन के रूप में मिल रहा है। दक्षिणी समुद्र से उठते मेघ (बादल) अरावलि तथा माउंट आबू से टकरा कर लौटते हुए मालवा में तथा हिमालय से टकरा कर लौटते हुए संपूर्ण भारतवर्ष में वर्षा करते हैं। विश्‍व के कई देश है, जहां वर्षा का अनुभव किया जाना संभव नहीं है। तपते रेगिस्‍तान के कारण भीषण गर्मी और हिम आच्‍छादित पर्वतों और पठारों के कारण शीत का अनुभव तो मिलता है, लेकिन वर्षा का अनुभव कभी-कभी ही होता है। हम यदि जल को लेकर आज नहीं जागे तो संभव है, पृथ्‍वी के विनाश में भारत का महत्‍वपूर्ण योगदान हो।
                                            संजय भट्ट


रविवार, 9 जुलाई 2023

मक्‍कारों की दरकार

सुनने में थोड़ा अजीब ही लगता है, लेकिन इन दिनों काम कोई करना नहीं चाहता और यह चाहता है कि उसके उदरपूर्ति (पेट भरने) का इंतजाम कहीं से हो जाए। इसके लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार है। बस थोड़ा सा प्रयास और जिन्‍दगीभर का आराम। समाज का वह हिस्‍सा जो सभी को भोजन देता है, इन‍ दिनों चाहता है कि कोई उसका कर्जा माफ कर दे। वह महिलाएं जो दिनभर घर में बिना रविवार का अवकाश लिए रात दिन देखे बिना मकान को घर बनाने में अपने जीवन की आहूति दे देती है, उसको लगता है कि उसके पास भी कुछ धन हो, जिससे उसे किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़े। वह बच्‍चे जो इन दिनों व्‍हाट्सएप्‍प, फेसबुक और इंस्‍टाग्राम की इंटरनेशनल युनिवर्सिटी के अध्‍ययन में अपने का ज्ञान को बढ़ा रहे हैं, वह भी चाहते हैं कि कोई काम किए बिना उनके खाते का बैलेन्‍स बढ़ता रहे। किसी को भी अपने पिता, पति और स्‍वयं की मेहनत पर भरोसा नहीं रहा। सभी की चाहत है कि हिंग लगे न फिटकिरी और रंग चौखा आए।
हर व्‍यक्ति अपने सारे मौज शौक को पूर्ण करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। कुछ काम चाहते हैं, उनके पास काम नहीं है। जो काम है उसमें मेहनत है और बस यही तो सबसे बड़ी दिक्‍कत है कि मेहनत किए बिना यदि सब कुछ हांसिल हो रहा है तो मेहनत क्‍यों की जाए। हर आदमी अपने आप को दूसरे से गरीब बताने में अपनी शान समझता है। हमारे पुरातनकाल से यह बात चली आ रही है कि सांई इतना दीजिए जा में कुटुंब समाए, मैं भी भूखा न रहूं , साधु भूखा न जाए। अब ये दोहा बदल गया है। सांई देते रहिए कुटुंब की परवाह काय, साधु भूखा रहे तो रहे, मेरा जुगाड़ हो जाए।
सबको अपने ही जुगाड़ की पड़ी है, किसी को भी यह देखने की फुरसत नहीं है कि दूसरे की स्थिति क्‍या हो रही है। उससे क्‍या लेना देना मेरा जुगाड़ हो गया तो समझो सब का कल्‍याण हो गया। काम की तलाश सभी को है, लेकिन ऐसे काम की जिसमें काम नहीं करना पड़े और बैंक खाते का बैलेन्‍स बढ़ता रहे। ऐसे ही मक्‍कारों की फौज इकट्ठा हो रही है लगतार सभी को बिना काम के पैसों की दरकार है और जिनके पास काम है, वह भी काम में मक्‍कारी के बहानों की तलाश में रहते हैं, जिससे वे भी समाज में समान रूप से मक्‍कारों की फौज का हिस्‍सा बने रहे।
जैसे जैसे जनसंख्‍या में बढ़ोत्‍तरी हो रही है, वैसे वैसे कर्मशीलता में कमी आती जा रही है। पहले पढ़ाया जाता रहा है कि व्‍यक्ति की पहचान उसके काम से होती है, लेकिन अब जो व्‍यक्ति अपनी पहचान बनाना चाहता है उसे मक्‍कारी के पाठ में शत प्रतिशत अंक प्राप्‍त करना जरूरी होता है। मेहनत, लगन और इमानदारी से काम करने वालों का मजाक बनाया जाता है और उन्‍हें टेंशन का नाम दे दिया जाता है। यह शब्‍द अब धीरे-धीरे ही सही शब्‍दकोश से गायब होने लगे हैं। जिसको लगता है कि मेहनत से बहुत कुछ किया जाता है वह अपनी ऊर्जा को मक्‍कारी कैसे की जाए, इसमें खपाने लगा है। अब कर्मठ व्‍यक्ति वही माना जाता है, जिसके पास कोई काम नहीं हो और ज्ञान का भंडार लिए मेहफिलों को जमा कर अपने ज्ञान को सभी के सामने ऐसा प्रस्‍तुत करता है, जैसा उसके पास जो ज्ञान है वह किसी के पास नहीं है। सबको बांटना है, किसी को काम के लिए प्रेरित करने के स्‍थान के पर उसे सीधा निवाला मुँह में दे दिया जाए तो वह काम क्‍यों करेगा।
हमारे युवाओं के प्रेरणास्रोत शुरू से ही फिल्‍मों के नायक रहे हैं। अब वह भी कई तरह के विज्ञापनों के माध्‍यम से युवाओं को आगे बढ़ाने का काम रहे हैं, कोई कहता है ‘दाने-दाने में केसर का दम’ तो कोई उन्‍हें इंटरनेट गेम के माध्‍य‍म से कमाई करने के तरीकों को अपनाने पर जोर देता है। किसी को परवाह नहीं कि युवा पीढ़ी पढ़ाई करे, अपने कैरियर पर ध्‍यान दे, माता-पिता का हाथ बंटाए, कोई काम की ओर प्रेरणा देने के लिए उन्‍हें मक्‍कारी का सबब सिखाया जा रहा है। सभी को सिर्फ मक्‍कारों की दरकार है, जिससे उनका काम चलता रहे।
-संजय भट्ट

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...