शनिवार, 29 अप्रैल 2023
संभावनाओं के पार
कहीं ये हो गया तो, नहीं हुआ तो, यह ‘तो’ का चक्कर कई सारे कामों को उलझा कर रख देता है। हर काम में संभावनाओं के कारण व्यक्ति तनाव में रहता है। उसका यह तनाव तभी जाता है जब काम पूर्ण हो जाता है। काम में जरा सी भी कमी उसे उन्हीं संभावनाओं को तलाशने में व्यस्त कर देती है, जो उसने पूर्व में सोंच रखी थी। काम का क्या है कभी खतम होता ही नहीं और रोज के काम में संभावनाओं का बना रहना मजबूरी होती है। यही संभावनाएं व्यक्ति के काम में उसके आत्मविश्वास को कम करती है।
रविवार, 9 अप्रैल 2023
देखो.. घुँघट ना खुलने पाए
उनके घर परंपराओं का बोलबाला था। वे हर तरह की परंपराओ में विश्वास करते थे। जरा-सा किसी ने परंपरा का उल्लंघन किया तो उसकी खैर नहीं। सब कुछ अम्माजी के हाथ में ही था। बाबूजी के खुले विचार किसी को नहीं भाते थे। मन ही मन भाते भी हो तो जाहिर नहीं होने देते थे। अम्माजी का घरेलू शासन बिल्कुल तानाशाही प्रवृत्ति का था। उनका कहा पत्थर की लकीर हुआ करता था। किसी में काटने की हिम्मत नहीं थी। अगर कुछ गलत भी हुआ है तो किसी से मदद नहीं मांगी जा सकती थी, किसी की गुहार सुनने का भी कोई अधिकार किसी को नहीं था। सभी को पता था बाबूजी को भी कुछ कहने का फायदा नहीं होगा।
दरअसल इसमें अम्मा की भी कोई गलती नहीं थी और बाबूजी भी एकदम ही सही थे। अम्मा ने सारा कामकाज दादी के अण्डर में रह कर सीखा और बाबूजी की तो नौकरी ही दूर-दूर भटकने की थी। एक जगह टिकने का कम ही काम होता था। वे सरकार के ऑफिसों में जाकर लेखा जोखा देखते और उसमें मीन-मेख निकालने का काम करते थे। बस इसी वजह से एक जगह टिक कर रहने का मौका नहीं मिलता था। बच्चों के स्कूल की छुट्टियां होती और बाबूजी का इयर एण्डिग का काम सबसे ज्यादा व्यस्त वे इसी समय रहते थे। जगह-जगह शहरों और गांवों में घूमते रहे तो उन्होंने दुनिया में होने वाले परिवर्तनों को देखा, लेकिन अम्मा तो घर-की-घर में रही और बच्चों को सम्हालना,घर का काम करना और परंपरानुसार सारे रीति रिवाजों को निभाना जो उन्होंने दादी से सीखे थे।
अम्मा और बाबूजी की उम्र में ज्यादा फर्क नहीं था, लेकिन अम्मा को दादी के जाने के बाद बुजुर्ग का तमगा मिल गया था। अम्मा हम सभी की शैतानियों की शिला और दादी के तानों के बट्टे के बीच चटनी बन कर बुढि़या गई थी। उसका हमेशा तर्क होता था, कि उसी ने हिम्मत रख कर हम सभी को पाल-पोस कर संस्कारित किया है। नहीं तो बाबूजी के पास तो इतना भी वक्त नहीं था कि हमारी पढ़ाई की कक्षाओं का ठीक से याद रख सके।
हम सभी भाई बहनों का विवाह हो गया था, लेकिन अभी भी सारा प्रशासन अम्माजी के हुकुम से ही चलता था। हां घर में हम सब कमाऊ थे, लेकिन घरेलू काम (इसमें छोटे-मोटे बाजारू काम भी शामिल है) सभी महिलओं की जिम्मेदारी में ही थे। हम राजकुमार थे, प्यासे मर जाएं लेकिन एक ग्लास पानी भरने पर हमारी मानहानि हो जाती थी। ऐसे में शाम को सब्जी लेने बाजार जाने का समय और हमारा ऑफिस से लौटने का समय कभी-कभी मिल जाया करता था। छूटकी बहु मौल-भाव में तेज थी, इसीलिए अम्माजी ने बाजार की जिम्मेदारी खासकर सब्जी लाने की उसे ही सौंप रखी थी। छूटकी बाजार में सब्जी लेने जा ही रही थी कि उसकी नजर बड़े भय्या पर पड़ गई। अब घर के बड़े तो बड़े होते हैं ना उनके सामने तत्काल मुँह ढंकना जरूरी होता है। बस छूटकी ने तत्काल घूँघट ओढ़ लिया। घुँघट में थोड़ा ही चली कि सड़क की नाली पर लगी जाली में पैर उलझ गया। औंधे मुँह गिर पड़ी बीच बजार में, लेकिन घुँघट नहीं उघड़ने दिया। गिरने पर उठने की बनी नहीं, क्योंकि टांग टूट गई थी, टखने की हड्डी और लिगामेंट का जोड़ खतम बताया गया। बड़े भाई सा. तो अनदेखा करके जा रहे थे, लेकिन किसी ने कहा कि यह आपकी बहू है। तब थैलागाड़ी बुलवा कर उसमें लेटा कर अस्पताल ले गए।
जैसे ही अम्मा को घटना की जानकारी मिली तत्काल अस्पताल पहुँच गई। डॉक्टरी परीक्षण के पूर्व यही परीक्षण हुआ कि बहू का घुँघट तो नहीं उघड़ा है। इसमें बहू पास भी हो गई। टांग पर पट्टा चढ़ाते हुए डॉक्टर ने छह महीने आराम की सलाह दी। अब सभी एक दुसरे पर मन ही मन नाराजगी व्यक्त करते, लेकिन कहे किससे मामला परंपरा और संस्कार से जो जुड़ा हुआ था।
---- संजय भट्ट
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