रविवार, 9 अप्रैल 2023
देखो.. घुँघट ना खुलने पाए
उनके घर परंपराओं का बोलबाला था। वे हर तरह की परंपराओ में विश्वास करते थे। जरा-सा किसी ने परंपरा का उल्लंघन किया तो उसकी खैर नहीं। सब कुछ अम्माजी के हाथ में ही था। बाबूजी के खुले विचार किसी को नहीं भाते थे। मन ही मन भाते भी हो तो जाहिर नहीं होने देते थे। अम्माजी का घरेलू शासन बिल्कुल तानाशाही प्रवृत्ति का था। उनका कहा पत्थर की लकीर हुआ करता था। किसी में काटने की हिम्मत नहीं थी। अगर कुछ गलत भी हुआ है तो किसी से मदद नहीं मांगी जा सकती थी, किसी की गुहार सुनने का भी कोई अधिकार किसी को नहीं था। सभी को पता था बाबूजी को भी कुछ कहने का फायदा नहीं होगा।
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Very nice