शुक्रवार, 20 मई 2022
सोमवार, 16 मई 2022
सड़कों पर रेंगते नाम
(संजय भट्ट)
कल लक्ष्मीनारायण जी का फोन आया बोल रहे थे, कुछ रूपए की आवश्यकता है! मैंने भी अपना सजेशन दिया कि सेठ गरीबचंद लेनदेन का धन्धा करते हैं, किसी बात की चिन्ता नहीं मेरे अच्छे परिचित है, आपकी व्यवस्था हो जाएगी। पत्नी ने पूछा इतनी रात किसका फोन था और लेनदेन का क्या मामला है? मैंने विश्वास दिलाया कि ऐसा कुछ नहीं लक्ष्मीनारायण जी को थोड़े पैसे की आवश्यकता है, तो सेठ गरीबदास जी से व्यवस्था करवाई है। वह हँस दी! मुझे भी कुछ अजीब लगा।पूछ ही लिया हँसी का क्या कारण है? वह बोली देखो क्या जमाना आ गया है, लक्ष्मीनारायण की मदद गरीबदास कर रहे हैं ! अब मेरे दिमाग की बत्ती जल चुकी थी। मुझे भी लगा वास्तव में नाम की क्या महत्ता है? क्या सोंच कर नाम रखा जाता है और आखिर उसका अंजाम क्या होता है? लगातार सवालों के सिलसिले ने मेरी रात की नींद खराब कर दी। सोने की कोशिश करता और नया नाम सामने आ जाता। अब नामों की उलझन में पड़ा मैं समझ गया कि विदेश मशहुर नाटककार की भी ऐसे ही नींद खराब हुई होगी तभी उसने कह दिया कि ‘’ नाम में क्या रखा है’’ दरअसल इन दिनों नाम को लेकर घमासान मचा हुआ है। इसका नाम ऐसा है तो क्यों है? किसने रखा? क्या सोंच कर रखा? इस नाम रखने के पीछे की मंशा क्या रही?
सवालों पर सवाल ने मन को विचलित कर दिया, खुद के नाम पर सोंचने को मन हुआ यह नाम तो महाभारत काल का है, तब क्या सोंच कर रखा होगा, शाब्दिक अर्थ भी कोंधने लगा, जीत जिसके साथ हमेशा हो, विचारों में खोया रात को बर्बाद करने का मन हुआ। कई नामों पर नाम सामने आते गए, जमाने के हिसाब से भी बेमतलब वाले नाम भी, मतलब के खिलाफ प्रकृति वाले नाम भी, मतलबी नाम भी। ऐसे ही कहीं किसी कक्षा में पढ़ाया गया था यह नाम संज्ञा होते हैं, जो किसी व्यक्ति या स्थान का बोध करवाता है। अब स्थानों के नाम से तो दिमाग ही घूम गया। कभी किसी शहर का क्या नाम था आज क्या है। जो जब आया,जिसका मन किया नाम रख दिया। हॉं घर परिवार में भी ऐसा ही होता है, सबके अपने संबोधन का तरीका अलग होता है। कोई बिट्टू कह गया, कोई बाबू कह गया, कोई लाला कह गया, कोई चिन्टू हो गया, कोई मोन्टू हो गया, कहीं बबलू तो कहीं बबली हो गया, लेकिन यह सब बचपन के नाम एक पहचान बन गए। वास्तविक नाम तो गुम हो गया।
एक विश्व सुन्दरी को इसी बात के लिए खिताब मिल गया कि उसका जवाब था मरने के बाद भी ‘नाम’ रह जाता है। तब थोड़ी राहत मिली कि दरअसल मामला मरने के बाद का है। जिन्दा जी तो किसी भी नाम से पुकार लिया जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता है। मरने के बाद अपनी याद बनाए रखने के लिए लोग क्या-क्या जतन नहीं करते रहे हैं, कभी अपना नाम शहर को दे दिया, कभी किसी इमारत को दे दिया, कभी किसी संस्थान को दे दिया और अब कुछ नहीं बचा तो सड़कों को भी नाम दिया जाने लगा है। कुछ दिनों बाद उनकी संतान, पौत्र, प्रपौत्र दावा करने में लग जाएंगे कि यह सड़क उनके पूर्वजों की है। यह संस्थान, शहर, इमारत उनका ही है। तब एक नया झमेला पैदा हो जाएगा। खुद से फिर सवाल किया- क्या नाम वास्तव में इतना महत्वपूर्ण है? खुद ही जवाब मिल गया। नाम से सोंच बनती है, सोंच संस्कृति को प्रभावित करती है और संस्कृति तथा सामाजिक बदलाव बड़ी मुश्किल से बदलते हैं। बस यही कारण है कि आपके नाम में तब तक कुछ नहीं रखा जब तक साधारण हो, जैसे ही किसी सड़क, संस्थान, इमारत और शहर से जुड़ता है तो नाम सिर्फ नाम नहीं रह जाता यह संस्कृति, सभ्यता और सोंच का परिचायक बन जाता है। इसलिए नाम तो नाम है, इसी से आपकी पहचान है। नाम को सोंच कर रखो, समझ कर रखो और इसे बनाए भी रखो,नहीं तो कहीं निक नेम, प्यार के नाम और बे बात के बाबू शोना बन कर नाम को गंवाने में मत रहो। इतना सब होने के बाद भी मसला ज्यों का त्यों रहा, लक्ष्मीनारायण जी उधार पैसे मांग रहे हैं और गरीबचंद जी उनकी मदद कर रहे हैं, तो वास्तव में नाम क्या रखा है कि नाम में ही सबकुछ रखा है, समझ नहीं आ रहा।
गुरुवार, 12 मई 2022
संबंधों के स्वरूप
(संजय भट्ट)
क्या आपने कभी सोंचा है कि संबंधों के विभिन्न स्वरूप होते हैं। यह कई तरह के रंगों और स्वादों में भी उपलब्ध है। इन दिनों संबंध भारी और हल्के भी होने लगे हैं। समझ नहीं आ रहा है कि यह संबंध है या कोई मायावी जो अपना मनचाहा स्वरूप धारण कर लेता है? सुना था गिरगिट रंग बदलने में माहिर होता है, यह मौका देख कर अपना रंग बदल लेता है, लेकिन ऐसा वह अपनी जान बचाने के लिए करता है और यह कुदरत ने उसे कॉपीराइट करके दिया है। फिर भी सम्बन्ध का पता नहीं यह कैसे इतने स्वरूपों में सामने आने लगा।
अभी कल ही की बात है, वह चर्चा में कह रहे थे-उनके और हमारे संबंध बहुत गहरे हैं कभी भी किसी भी काम में मना नहीं कर सकते, लेकिन देखा है अक्सर उनको इनके बारे में बतियाते हुए। वह हमेशा कहते हैं, यार बहुत ही घटिया आदमी है हमेशा कोई-न-कोई डिमांड चलती ही रहती है। मैंने अंदाजा लगाया वह भले ही इन संबंधों को गहरा मानते हो यह हमेशा ही उन्हें हल्के में लेते हैं। कई दिनों बाद मिले तो फिर उनके संबंधों का नया स्वरूप सामने आया। कहने लगे- अब वे ऐसे नहीं रहे। उनके और हमारे संबंधों में खटास आ गई है, मैने भी चुहलबाजी के लिए पूछ लिया दही वाली या इमली वाली? झल्ला के बोल पड़े ऐसा बोल कर आप अपने संबंधो में कड़वाहट पैदा मत करो यार। मैने भी कह दिया हमारे संबंधों की मिठास कभी कम नहीं हो सकती है। हम चाहे जितना लड़े-झगड़े टांट करें या छेड़खानी आखिर हमारे संबंध काफी पुराने है। बातों-बातों में संबंधों के इतिहास का भी पता चला यह नए और पुराने दोनों तरीकों के होते हैं। फिर छेड़ने के लिए पूछा कल तक तो आपके और उनके संबंध बहुत गहरे थे, आज क्या हुआ? वे फिर टूटते दिल को थामते हुए बोले- हल्के लोगों से गहरे संबंध नहीं रखना चाहिए, उनको घमण्ड आ गया है। वे अपना रंग दिखाने लगे हैं, इसीलिए संबंध अब इतने गहरे नहीं रहे। संबंधों में दूरियां और नजदीकियां भी होती है। कुछ दूर के होकर भी अपने होते हैं और अपने होकर भी दूर ही रह जाते हैं।
गिरगिट की तरह बदलते स्वरूपों को देख कर मैं दंग रह गया। यह कैसा संबंध है जो हर बार बदल जाता है। संबंध अंतरंग और बाहरी भी होता है। अंतरंग संबंध में किसी को कुछ पता नहीं चलता,लेकिन बाहरी संबंध के बारे में सभी को पता चल जाता है। बाहरी संबंध सिर्फ दिखावे के होते हैं और मौके पर काम नही आते, लेकिन अंतरंग संबंध बेहद अंदर तक होते हैं और जब इनका खुलासा होता है तो अच्छे-अच्छों की चूलें हिल जाती है। अक्सर अंतरंग संबंधों को लेकर खूब बाते भी बनाई जाती है। कई लोगों को तो अंतरंग संबंध रास भी नहीं आते,यह लोगों के बीच विवाद का कारण भी बन जाते हैं।
संबंधों में मिट्टी वाला भी गुण होता है यह टूट कर बिखर भी जाते हैं और फिर से जुड़ भी जाते हैं। काफी शोध के बाद पता चल पाया कि संबंधों के कई प्रकार होते हैं, यह वक्त, जरूरत और मौका देख कर अपना स्वरूप बदल लेते हैं। मौका आने पर संबंधों में गधे को भी बाप का दर्जा देना पड़ता है और मौका निकल जाने पर पलटा कर लात भी। बुरा वक्त हो तो किसी से संबंध अच्छे नहीं होते और अच्छे वक्त में हर कोई आप से संबंध बनाना चाहता है। ठीक यही फार्मूला जरूरत के समय भी होता है। आपकी जरूरत हो तो कोई संबंध काम नहीं आता और अपनी जरूरत के लिए हर कोई अपने संबंध निभाने चला आता है। संबंधों की आड़ में क्या-क्या नहीं होता? आपको महान बता दिया जाता है और आपको सबसे घटिया बता दिया जाता है। वैसे संबंध में मिट्टी वाला गुण है तो निश्चित ही इसमें जड़े भी निकल आती होगी। कहा भी जाता है, संबंधों की जड़ें गहरी होती है। पर पता नहीं चलता कब संबंधों की जड़ में दीमक लग जाती है, कब कोई दही उड़ेल कर खटास पैदा कर देता है और कब संबंध टूट कर बिखर जाते हैं। खटास कब कड़वाहट में बदल जाती है और मिठास वाले संबंध में नजदीकियों में कब दूरियां आ जाती है। इसलिए जब संबंध बनाओं तो संबंध में सारे गुणों-अवगुणों को पहचान कर इसको फौलाद की तरह मजबूत और उसी लोहे से बने तार की तरह लचीला रखो, नहीं तो यह संबंध कब अपना कौन-सा स्वरूप दिखा दें कह नहीं सकते।
मंगलवार, 3 मई 2022
सुविधाजनक चुप्पी
(संजय भट्ट)
वे मसलों और मामलों के बादशाह हैं। कोई भी मामला पैदा करना और उस पर विवाद की स्थिति को पैदा कर देना उनके बांए हाथ का खेल है। हर होनी अनहोनी उनके ही हाथ में है, बस अनहोनी हो जाने पर वे सुविधाजनक चुप्पी की चादर ओढ़ लेते हैं। सबके सामने सबके साथ होकर भी ऐसे विरत हो जाते हैं कि किसी को खबर तक नहीं होती है कि इस अनहोनी का मुख्य कारण यह ही है। हां लेकिन होनी का श्रेय लेने में उनका कोई सानी पैदा ही नहीं हुआ है। वे अच्छे काम को इतनी श्रेष्ठता के साथ अपने नाम कर लेते हैं कि उनके धूर विरोधी भी नहीं समझ पाते। इनका चयन जिस काम को करने के लिए किया गया है, उसे छोड़ कर सारे काम इतने बेहतरी से करते हैं कि किसी को कानों कान खबर नहीं होने देते। इनमें लोगों की आस्था और विश्वास ऐसा है कि यह तपती दोपहरी में भी कह दें कि रात में कितनी शीतलता है तो इनके आस्थावान तथास्तु कह कर स्वीकार कर लेते हैं।
वैसे इनका मसला थोड़ा अलग है, यह कुछ भी करने में ठीक उसी तरह से सक्षम है, जैसे कलयुग के पूर्व की कथाओं में मायावी राक्षसगण कर लेते थे। इनकी माया ही ऐसी है कि इनसे कोई नहीं बच पाया। जब भी इन पर उंगली उठाने की कोई बात आती है, यह लोगों का ध्यान भटका देते है। भटके ध्यान में लोग अपनी चिन्ता छोड़ उस ओर ध्यान मग्न हो जाते हैं, जिससे उनका कोई लेना देना नहीं होता है। इनकी एक खासियत यह भी है कि ये शेर की तरह झपट्टा मार देते हैं और उसी की तरह शिकार को अपनी पेटपूर्ति इतना खाकर अन्य के लिए छोड़ देते हैं। इनकी इसी आदत से सभी खुश है, सभी को कुछ न कुछ तो मिल ही जाता है।
मीठा खाकर मीठा बोलने वाले तो सुने होंगे लेकिन नीम चढ़ा करेला खिला कर मीठा बोलवाने की कला के भी माहिर है। इनके शागिर्द भी इतने पक्के हैं कि लोग लाख चिल्लाते रहे लेकिन इनको तब तक सुविधाजनक चुप्पी की चादर ओढ़ा कर रखते हैं, जब तक कि कोई खास मसला नहीं हो जाए। अपनी झूठ की सल्तनत में इनके खिलाफ आवाज पसन्द नहीं की जाती है। क्योंकि सभी को पता है, जब भी कोई खिलाफत में मुँह खोलेगा तो मीठा तो बोलेगा नहीं। इसलिए सभी की कुण्डली अपने पास रख कर जवाब तलबी करते हैं। वैसे बोलने से किसी को रोकते नहीं है, लेकिन बोलने भी किसी को देते नहीं। क्योंकि इनके शागिर्दों का एक ही उद्देश्य है कि होनी की सारी प्रशंसा इनके खाते में और अनहोनी की सारी जिम्मेदारी इनके विराधियों के हिस्से में जानी चाहिए।
अपनी गलतियों पर चुप रह कर सुनने की आदत तो कई लोगों की हो जाती है, लेकिन सुविधाजनक चुप्पी का मामला थोड़ा अलग है। यहां बोलने के मौके को छोड़ना नहीं और जहां बोलने की खास जरूरत हो वहां चुप रहना होता है। ऐसा करने का भी कॉपी राइट होने लगा है, और कोई ऐसा करे तो उसे मौनी बाबा जैसे जुमलों से प्रचारित कर दिया जाता है। यह ठीक वैसा ही मामला है, जिसमें रोम जल रहा हो और नीरों अपनी बांसूरी की धून में खोया रहता है। बांसूरी भी ऐसी कि जब तक रोम का ‘रोम-रोम’ नहीं जल जाए तब तक धून बजाती ही रहती है।
सुविधाजनक चुप्पी की शिक्षा सभी को देना चाहिए क्योंकि वास्तव में जब तक जरूरी नहीं हो न बोले और जब भी मुँह खोले ऐसा बोले कि सब को प्रेरणा मिले। बात मेरे समझ में आ गई थी, अब मैं भी सुविधाजनक चुप्पी को आधार बना चुका हूँ। मसला पैदा करना और सीखना है, जब यह कला आ जाएगी तब मैं भी इस कॉपीराइट वाले ग्रुप में शामिल हो जाउंगा। अभी ट्रेनिंग चल रही है, लेकिन सच बोलने की बरसो पुरानी आदत को भुला नहीं पा रहा हूँ। बस इसीलिए इस सुविधाजनक चुप्पी के प्रशिक्षण में फैल हो रहा हूँ, लेकिन मुझे पुरा विश्वास है, ऐसा ही माहौल मिलता रहा तो सुविधाजनक चुप्पी का माहिर मैं भी बन कर दिखलाउंगा। बस भगवान से इतनी सी प्रार्थना जरूर है कि सुविधाजनक चुप्पी जरूर सिखा दे, लेकिन मामलों और मसलों को पैदा करने की महारत नहीं दे, क्योंकि मामलों को पैदा करने के लिए आग की चिंगारी चाहिए और आग को बुझाने के लिए अब पानी की भी कमी होने लगी है।
रविवार, 1 मई 2022
उनका यूं ब्लॉक हो जाना
(संजय भट्ट)
आजकल के जमाने में तकनीकी कुलांचे मार रही है। रोज कुछ नया और नया सामने आता जा रहा है। अभी मैंने श्रीमान को मोबाइल लगाने की चेष्टा की, मन में आया कि उनसे गपियाया जाए तो मोबाइल उठा कर उनके नम्बर पर उंगलियां रखे जा रहे थे, लेकिन बार-बार दो चार टूक-टूक और घंटी जाने की सूचना नहीं मिल रही थी। मैंने अपने बेटे को बुलाया और बोला जरा देखना तो श्रीमान का नम्बर क्यों नहीं लग रहा। वह तुरन्त समझ गया। सकपकाया हुआ सा बोला बाबूजी उन्होंने आपका नम्बर ब्लॉक कर दिया होगा। अब आप उनको घंटी नहीं कर पाएंगे। मेरे भी समझ में नहीं आया वे मेरी ही उम्र के और मोबाइल का नॉलेज भी मेरे जितना ही, लेकिन फिर भी इतनी बड़ी घटना को कैसे अंजाम दिया होगा।
घर भी कुछ दूरी पर था, लेकिन दोपहर का वक्त था और सूर्य देवता अपना क्रोध बरसा रहे थे। क्रोध तो मुझे भी आ रहा था, लेकिन सूर्य देवता के क्रोध के आगे मुझ तुच्छ मानव के क्रोध की क्या औकात ? तमतमाता हुआ उनके घर पहुँच गया। घर में सूचना पहुँचाई तो पता चला कि वो दोपहर में आराम फरमाते हैं। क्रोध का भरा हुआ घर को लौट आया। लेट कर नींद का नाटक करने चला था, लेकिन क्रोध की ज्वाला बाहर की धूप से कहीं अधिक तेज जल रही थी। इस जलन में नींद नहीं आई। शाम का इंतजार करने लगा, जब घूमने के लिए पार्क में जाना होता था।
शाम भी हुई, घर से समय पर निकल कर पार्क में पहुँच गया, लेकिन उनका आगमन नहीं हुआ। छटपटाहट बढ़ती ही जा रही थी। रात का आगाज होने लगा लेकिन उनका आना नहीं हुआ। अब बताओ मेरी हालत क्या बनी होगी, ठीक उस ब्वाय फ्रेण्ड जैसी जिसकी प्रेयसी ने मिलने का वादा किया और न आई हो। वो गुस्से भरा प्यार बढ़ता ही जा रहा था। मजबुरी भी थी कि पार्क बंद होने का समय हो गया था। अब भूख और प्यास ने भी अपना रंग दिखाना शुरू कर दिया था। मजबूरी के वशीभूत होकर घर को लौट आया, लेकिन ब्लॉक किए जाने का दर्द छिपाए नहीं छिप रहा था।
घर आकर बेटे को फिर से आवाज दी। बेटा जरा देख तो श्रीमान के नम्बर में क्या समस्या हो गई, वे आज पार्क में भी नहीं आए। क्या मामला हुआ है ? बेटे ने फिर एक प्रयास किया और कहा बाबूजी रूकिए मैं अपने नम्बर से कॉल करता हूँ। बेटे ने अपने मोबाइल से उनका नम्बर लगाया तो तुरन्त घंटी चली गई। बेटे ने मुझे पूर्ण आश्वस्त करते हुए कहा पक्का है, उन्होंने आपको ब्लॉक कर दिया है। अब आप उनसे बात नहीं कर पाएंगे। फिर उसने व्हॉटस्एप्प की डीपी चैक की तो वह भी नहीं दिख रही थी। उनको वहां भी कोई मैसेज नहीं जा पा रहा था। हमारा ग्रुप देखा तो वहां से उनके गायब होने की सूचना मिली थी।
अब उनका इस क्रोध का कारण और भी रहस्यमय होता जा रहा था। मैंने बेटे से पूछा- बेटा यह ब्लॉक क्यों किया जाता है। उसने समझाया कि आप किसी से बात नहीं करना चाहे, न कोई सम्पर्क रखना चाहे तो उसे ब्लॉक कर सकते हैं। यह सुविधा मोबाइल के आने के बाद ही मिली है, इससे पहले लेण्डलाइन फोन पर यह सुविधा नहीं थी।
दरअसल मैं अपनी फुरसत का लाभ और उनके काम का महत्व नहीं समझ पाया और जब चाहे मोबाइल पर गपियाना, व्हाट्सएप्प पर मैसेज, फोटो, विडियो भेजा करता था। कई बार तो मेरा कॉल नहीं उठाने या मैसेज का जवाब समय पर नहीं दिए जाने को लेकर मैं नाराज भी हो जाया करता था। श्रीमान ने शुरूआत की और मामला वायरल होते समय नहीं लगा, सभी ने एक स्वर में मुझे ब्लॉक कर दिया था, मुझे तुरन्त समझ में आ गया, मेरा सामाजिक बहिष्कार(सोशल बॉयकाट) हो गया है। क्योंकि न सिर्फ सोशल साइट्स से बल्कि मेरा नम्बर ही लोगों के लिए परेशानी का सबब हो गया था। बेटे ने समझाया कि मोबाइल का डाटा और कॉल फ्री हो गई, इसका मतलब यह कतई नहीं है कि किसी को भी बेवजह परेशान करते रहो। बात मेरी भी समझ में आ गई मैंने भी तुरन्त कुछ माथा खाऊ लोगों को ब्लॉक कर दिया। अब वे भी खुश और मैं भी मस्त।
बजट के गजट की लपट
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