मंगलवार, 3 मई 2022

सुविधाजनक चुप्‍पी

 

                             (संजय भट्ट)
वे मसलों और मामलों के बादशाह हैं। कोई भी मामला पैदा करना और उस पर विवाद की स्थिति को पैदा कर देना उनके बांए हाथ का खेल है। हर होनी अनहोनी उनके ही हाथ में है, बस अनहोनी हो जाने पर वे सुविधाजनक चुप्‍पी की चादर ओढ़ लेते हैं। सबके सामने सब‍के साथ होकर भी ऐसे विरत हो जाते हैं कि किसी को खबर तक नहीं होती है कि इस अनहोनी का मुख्‍य कारण यह ही है। हां लेकिन होनी का श्रेय लेने में उनका कोई सानी पैदा ही नहीं हुआ है। वे अच्‍छे काम को इतनी श्रेष्‍ठता के साथ अपने नाम कर लेते हैं कि उनके धूर विरोधी भी नहीं समझ पाते। इनका चयन जिस काम को करने के लिए किया गया है, उसे छोड़ कर सारे काम इतने बेहतरी से करते हैं कि किसी को कानों कान खबर नहीं होने देते। इनमें लोगों की आस्‍था और विश्‍वास ऐसा है कि यह तपती दोपहरी में भी कह दें कि रात में कितनी शीतलता है तो इनके आस्‍थावान तथास्‍तु कह कर स्‍वीकार कर लेते हैं।
वैसे इनका मसला थोड़ा अलग है, यह कुछ भी करने में ठीक उसी तरह से सक्षम है, जैसे कलयुग के पूर्व की कथाओं में मायावी राक्षसगण कर लेते थे। इनकी माया ही ऐसी है कि इनसे कोई नहीं बच पाया। जब भी इन पर उंगली उठाने की कोई बात आती है, यह लोगों का ध्‍यान भटका देते है। भटके ध्‍यान में लोग अपनी चिन्‍ता छोड़ उस ओर ध्‍यान मग्‍न हो जाते हैं, जिससे उनका कोई लेना देना नहीं होता है। इनकी एक खासियत यह भी है कि ये शेर की तरह झपट्टा मार देते हैं और उसी की तरह शिकार को अपनी पेटपूर्ति इतना खाकर अन्‍य के लिए छोड़ देते हैं। इनकी इसी आदत से सभी खुश है, सभी को कुछ न कुछ तो मिल ही जाता है।
मीठा खाकर मीठा बोलने वाले तो सुने होंगे लेकिन नीम चढ़ा करेला खिला कर मीठा बोलवाने की कला के भी माहिर है। इनके शागिर्द भी इतने पक्‍के हैं कि लोग लाख चिल्‍लाते रहे लेकिन इनको तब तक सुविधाजनक चुप्‍पी की चादर ओढ़ा कर रखते हैं, जब तक कि कोई खास मसला नहीं हो जाए। अपनी झूठ की सल्‍तनत में इनके खिलाफ आवाज पसन्‍द नहीं की जाती है। क्‍योंकि सभी को पता है, जब भी कोई खिलाफत में मुँह खोलेगा तो मीठा तो बोलेगा नहीं। इसलिए सभी की कुण्‍डली अपने पास रख कर जवाब तलबी करते हैं। वैसे बोलने से किसी को रोकते नहीं है, लेकिन बोलने भी किसी को देते नहीं। क्‍योंकि इनके शागिर्दों का एक ही उद्देश्‍य है कि होनी की सारी प्रशंसा इनके खाते में और अनहोनी की सारी जिम्‍मेदारी इनके विराधियों के हिस्‍से में जानी चाहिए।
अपनी गलतियों पर चुप रह कर सुनने की आदत तो कई लोगों की हो जाती है, लेकिन सुविधाजनक चुप्‍पी का मामला थोड़ा अलग है। यहां बोलने के मौके को छोड़ना नहीं और जहां बोलने की खास जरूरत हो वहां चुप रहना होता है। ऐसा करने का भी कॉपी राइट होने लगा है, और कोई ऐसा करे तो उसे मौनी बाबा जैसे जुमलों से प्रचारित कर दिया जाता है। यह ठीक वैसा ही मामला है, जिसमें रोम जल रहा हो और नीरों अपनी बांसूरी की धून में खोया रहता है। बांसूरी भी ऐसी कि जब तक रोम का ‘रोम-रोम’ नहीं जल जाए तब तक धून बजाती ही र‍हती है।
सुविधाजनक चुप्‍पी की शिक्षा सभी को देना चाहिए क्‍योंकि वास्‍तव में जब तक जरूरी नहीं हो न बोले और जब भी मुँह खोले ऐसा बोले कि सब को प्रेरणा मिले। बात मेरे समझ में आ गई थी, अब मैं भी सुविधाजनक चुप्‍पी को आधार बना चुका हूँ। मसला पैदा करना और सीखना है, जब यह कला आ जाएगी तब मैं भी इस कॉपीराइट वाले ग्रुप में शामिल हो जाउंगा। अभी ट्रेनिंग चल रही है, लेकिन सच बोलने की बरसो पुरानी आदत को भुला नहीं पा रहा हूँ। बस इसीलिए इस सुविधाजनक चुप्‍पी के प्रशिक्षण में फैल हो रहा हूँ, लेकिन मुझे पुरा विश्‍वास है, ऐसा ही माहौल मिलता रहा तो सुविधाजनक चुप्‍पी का माहिर मैं भी बन कर दिखलाउंगा। बस भगवान से इतनी सी प्रार्थना जरूर है कि सुविधाजनक चुप्‍पी जरूर सिखा दे, लेकिन मामलों और मसलों को पैदा करने की महारत नहीं दे, क्‍योंकि मामलों को पैदा करने के लिए आग की चिंगारी चाहिए और आग को बुझाने के लिए अब पानी की भी कमी होने लगी है।    


कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Very nice

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...