गुरुवार, 25 मई 2023
दावेदारी का प्रमोशन
जमाना प्रजेन्टेशन का है। जब तक अपने आप को प्रस्तुत करने का तरीका नहीं होगा तब तक कोई आपको पूछेगा तक नहीं, भले ही आप में कितनी ही योग्यताओं का खजाना भरा पड़ा हो। तारिफ हो या बुराई खुद की ही करना पड़ेगी। बुराई करना भी आजकल शगल हो गया है। खुद को सबके सामने कैसा रखना है, यह आपको तय करना पड़ता है। जब आप खुद को सबके सामने अच्छा प्रस्तुत करते हो तो आपके आसपास वाले भले ही आपकी बुराई करे, लेकिन दूर से देखने वाले को लगता है आप बहुत अच्छे हैं। सोशल मीडिया के जमाने में अपना प्रस्तुतीकरण खुद ही करना पड़ता है। लोगों की पसन्द ना पसन्द का खयाल समझ में आते ही जिसके सामने जैसा प्रस्तुत होना हो आसानी से हो सकते हो। अपने स्टेटस पर भगवान के फोटो चस्पा कर उनकी भक्ति के विडियो का प्रसारण करने वाले के दिल कितने काले हैं, दूर बैठा व्यक्ति इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकता और इसी का फायदा मिलता है अपनी छवि गढ़ने के लिए।
रविवार, 7 मई 2023
डूबते भविष्य के संस्कार
नौकरी में आकर ईमानदारी से काम शुरू किया था, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई उसे अपने भविष्य की चिन्ता सताने लगी। नौकरी की शुरूआत में विवाह नहीं हुआ था, तो जिम्मेदारियों का बोझ भी कम था। पिता भी सेवा में थे तो इतनी परेशानी नहीं हुई। घर का काम अच्छे से चल रहा था, लेकिन अब जब बच्चे बड़े होने लगे थे, घर परिवार की जिम्मेदारियों का बोझ भी आने लगा था और पिता भी सेवा से निवृत्त हो चुके थे। ऐसी परिस्थिति में उसका मन डावाडोल होने लगा था। कुछ स्वास्थ्यगत परेशानियों ने भी उसे घेरना शुरू कर दिया था। उसके अपने काम में महारत भी होने लगी थी। बदलते स्थानों पर उसके लोगों से सम्बन्ध भी बढ़ने लगे थे और समझ भी विकसित हो गई थी। वह न चाह कर भी अब वह नहीं कर पा रहा था, जो वह करना चाहता था। नौकरी की शुरूआत में उसके मन में सेवा का भाव था, लेकिन जैसे-जैसे समय और जिम्मेदारियों के बोझ में वेतन कम लगने लगा, उसका विचार बदलता गया।
अपने ही ऑफिस में उसने दो तरीके के लोगों को देखा। एक वह जो लम्बे समय से काम कर रहे हैं तथा उनका भविष्य सुरक्षित है। उन्हें पेन्शन की राशि मिलेगी और उनका अन्तिम जीवन भी सुधर जाएगा। दूसरे उसके जैसे जिनका कोई भविष्य नहीं और पेन्शन के नाम पर उसकी बचत ही काम आएगी। दिन-पर-दिन उसे अपनी आय कम लगने लगी थी। वह अपने भविष्य और बच्चों के भविष्य को लेकर चिन्तित रहने लगा था। उसके पास अपनी नौकरी के अलावा आय का कोई और स्रोत नहीं बचा था। पिता के पुश्तेनी मकान में दो भाई और एक बहन की हिस्सेदारी का खयाल उसे रातों को सोने से रोकता था। उसके काम से सभी प्रभावित थे, लेकिन उसे लगता था कि वह जो कर रहा है और दूसरे जो कर रहे हैं उसमें अन्तर है। जिनका भविष्य सुरक्षित है वे भी काम के बदले कुछ अतिरिक्त पैसा चाहते हैं और कोई मौका नहीं छोड़ते है, जिससे अतिरिक्त आय हो सके, चाहे फिर उससे किसी का भी नुकसान हो उन्हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
इस देखा-देखी ने उसे भी अपनी जमात में शामिल कर लिया। जो ईमानदारी से अपनी सेवा भाव से लोगों का काम करता था, हर पीडि़त की सुन कर समझ कर उसकी मदद को अपना सब कुछ मानता था, अब वही उसे खराब लगने लगा था। उसे लगता था कि इस सेवाभाव से उसका भविष्य सुरक्षित नहीं हो सकता है। उसे सड़कों पर रोजगार की तलाश में घूमते युवाओं में उसके बच्चे भी दिखाई देने लगे थे। वह रात-दिन विचार करता कि उसकी सेवा समाप्त होने के बाद उसका क्या होगा। वह जब अखबारों में माता-पिता के विरूद्ध बच्चों के व्यवहार को पढ़ता तो उसका मन उद्वेलित हो जाता। उसे डर सताने लगा था कि उसके बुढ़ापे में उसका क्या होगा। उसके नहीं रहने पर पत्नी का क्या होगा।
बच्चों को अच्छे संस्कार दिए थे, लेकिन वह सोंचता था कि संस्कार तो उसके भी अच्छे ही थे। उनका उसे क्या लाभ हुआ। वह कोल्हू के बैल की तरह रात-दिन की मशक्कत कर सिर्फ बच्चों की पढ़ाई और अपने घर का खर्चा चला पाता था, महिने के बीच में ही उसे उधार की जरूरत भी होने लगी थी। उधार लेना उसके संस्कारों में शामिल नहीं था, लेकिन मजबूरी में उसे वह सब करना पड़ता था। अब मन बैठने लगा था, संस्कार उधड़ते हुए स्वेटर की तरह रेशा-रेशा होकर बिखरने लगे थे। वह चाहता था कि उसका भी अपना घर हो, समाज में कुछ इज्जत हो, पर्याप्त पैसा हो और भविष्य में कोई परेशानी नहीं आए बुढ़ापे की स्थिति ठीक से निकल जाए। कम से कम खुद की बीमारियों के इलाज के लिए तो धन हो जिससे वह अपना बुढ़ापा काट सके, किसी के भरोसे पर तो नहीं रहना पड़े, लेकिन बचत हो नहीं रही थी और न ही सेवानिवृत्त होने पर इतना कुछ मिलने का भरोसा कि उससे बाद का जीवन आसानी से कट जाए। उसकी बढ़ती उम्र तथा बच्चों की पढ़ाई पुरी होने के बाद भटकाव ने उसे झकझोर दिया।
न चाहते हुए अब वह लोगों के काम अटका कर उनसे वसूली की गला काट प्रतियोगिता में शामिल हो गया था। यह सब वह नहीं चाहते हुए भी सिर्फ अपने भविष्य को सुरक्षित करने की चाहत से करने लगा था। लगातार उसकी इज्जत घटती जा रही थी, लेकिन पद, प्रतिष्ठा और सेवा के बदले मिले मान-सम्मान से जीवन में पेट नहीं भरता। बड़ी-बड़ी बातें करने वाला समाज भी उसकी पूछपरख करता है, जिसके पास पर्याप्त धन हो। जब कुछ नहीं होता तो समाज तो ठीक है परिवार वाले भी हाल नहीं पूछते। उसके संस्कारों और माता-पिता की सीख को उसने एक कौने में टांग दिया था, जिसमें सेवा और ईमानदारी का पाठ था। उसे अपनी सेवा के बढ़ते चरणों में अनुभव हो गया था कि बिना अर्थ सब व्यर्थ है।
-संजय भट्ट
शनिवार, 6 मई 2023
परेशानी के सलाहकार
भले ही खुद की परेशानी का हल नहीं हो, लेकिन दूसरों की परेशानी के सभी समाधान उनके पास होते हैं। जब खुद परेशान होते हैं तो कोई रास्ता नहीं निकलता जैसे ही दूसरे ने किसी ने अपनी परेशानी को सामने रखा तुरन्त कई सारे समाधान सामने आ जाते हैं। ऐसा इसलिए होता है कि जब खुद परेशान होते हैं तो उसकी सारी कमियां ही सामने आती है, लेकिन जब दूसरे की परेशानी का पता चलता है तो सुझावों के ढेर लग जाते हैं। कैसे हल करना है, कौन मदद कर सकता है, मदद कहां से लेना है, क्या करना होगा सब कुछ ऐसा सामने रखते हैं, जैसे खुद इस परेशानी से जुझ चुके हों। सैकड़ों उदाहरण दूसरों के दे देंगे, कभी अपनी बात नहीं करेंगे। ऐसे परेशानी के सलाहकारों ने आजकल दुकानें भी खोल ली है, वे लोगों को परेशानियों के हल ऐसे बताते हैं, जैसे उनकी आप बीती हो। लोग भी उनमें ज्यादातर युवा जो उनकी बातों को सुन कर तालियां बजाते हैं और ठहाका लगा कर हंसते हैं।
वही युवा जिसे अपने माता-पिता, दादा-दादी की बात समझ नहीं आती, आती भी है तो बुरा लगता है कि मुझे ही क्यों टोंकते रहते हैं, इनके पास कोई काम नहीं है। अपने परिजनों के अनुभवों से सीखने के स्थान पर ऐसी दुकानों पर जाते हैं और उनके घटिया प्रोडक्ट को भी ऐसे खरीदते हैं, जैसे इसी से उनकी अगली कमाई होने वाली है। हर आदमी की अपने परेशानी है और कोई भी ऐसा अछूता नहीं है,जिसे कोई परेशानी नहीं हो। हम सर्वे भवन्तु सुखिन: की बात जरूर करते हैं, लेकिन सुखी व्यक्ति कौन है, कहां मिलेगा, किसी को पता नहीं है। वह दुकानदार जो दूसरों को उनकी परेशानियों के हल बताने का धंधा खोल कर बैठा है, उसे भी कोई-न-कोई परेशानी है, लेकिन मजबूरी यह है कि वह किसी से बयां नहीं कर सकता। मामला धंधे से जो जुड़ा है। यदि वह अपनी परेशानी किसी के सामने रख दे तो उसके धंधे पर असर पड़ जाएगा। सभी को पता चल जाएगा कि उसे भी परेशानी है।
कुछ लोग तो परेशानियों से इतने परेशान हो जाते हैं कि उनको कोई हल ही नहीं मिलता। जब हल नहीं मिलता तो वे अवसाद (डिप्रेशन) में चले जाते हैं। किसी से बात नहीं करना और कोई बात किसी के सामने नहीं रखना, उन्हें लगने लगता है कि उनकी परेशानी इतनी अनोखी है कि उनसे पहले किसी के सामने आई ही नहीं होगी। घूटन भरे माहौल में वे सभी से दूर होने लगते हैं और यही दूरियां उनकी परेशानी को ज्यादा बढ़ा देती है। जब हम परेशान होते हैं, उसका मूल कारण यह है कि हम जैसा चाहते हैं वह वैसा नहीं हो कर दूसरे तरीके से हो रहा होता है। इससे लगने लगता है कि वह नहीं कर पा रहे हैं और यही परेशानी का कारण बन जाता है। आम आदमी की परेशानी यही है कि वह जो चाहता है,वह उसे हांसिल नहीं हो रहा है और कोई दूसरा वही कार्य आसानी से कर रहा होता है।
लोगों को लगता है कि वह सबसे बड़े योग्य है और उनकी योग्यता का कोई मुकाबला नहीं कर सकता है। जब ऐसा लगता है तो परेशानी हो जाती है। जब परेशानी होती है तो रास्ते अपने-आप बन्द होने लगते हैं,क्योंकि दिमाग में ऐसे विचार ही नहीं आते हैं कि किसी से सीखा जाए, किसी के पास के जाया जाए और उनसे अपनी बात बता कर उसका समाधान तलाश किया जाए। वास्तविकता भी कुछ ऐसी ही है, जिसके पास समाधान की तलाश की जाती है वह खुद किसी-न-किसी परेशानी का सामना कर रहा होता है। हर व्यक्ति का स्वाभाविक गुण है कि उसे दूसरे थाली में घी ज्यादा ही दिखाई देता है। जब तक स्वयं की थाली में ध्यान नहीं देगा दूसरों की थाली में घी ज्यादा ही दिखाई देगा। कोई भी अपने आप को कमजोर मानने को तैयार नहीं होता है, यह भूल जाता है कि पांचों ऊंगलियां समान नहीं होती और जब तक पांचों नहीं मिलती कोई भी काम सफल नहीं होता है। लेकिन लोग हमेशा टेढ़ी ऊंगली का उपयोग कर ही घी निकालने का प्रयास करते हैं। उन्होंने पढ़ा होता है कि घी टेढ़ी ऊंगली से ही निकलता है, जबकि सच्चाई यह है कि घी में ऊंगली डालों तो ज्यादा नहीं तो अपनी जरूरत के मुताबिक घी तो निकल ही आता है।
हर आदमी जिद, ज्यादा और जल्दी के चक्कर में वह सब गवां बैठता है, जो उसे समय से मिल जाता है। पढ़ा तो उसने यह भी होता है समय से पहले कुछ नहीं मिलता, लेकिन यह उसके पक्ष की बात नहीं होती है इसलिए वह इंतजार नहीं करता है। जब इंतजार और संतोष नाम के दो गुण व्यक्ति के जीवन में आ जाते हैं तो वह कई तरह की परेशानियों से स्वयं को मुक्त कर लेता है। खुद को तलाश करने का समय किसी के पास नहीं है, हमेशा वह खुद को दूसरे से तुलना कर समझना चाहता है, लेकिन कभी खुद की तुलना अपने आप से नहीं करता है।
होता भी यही है। वह देखो शर्मा जी की लड़की ने टॉप किया है और तुम उससे आधे नम्बर भी नहीं ला सके। यहीं से शुरूआत हो जाती है दूसरों से तुलना करने का मामला। जब तक अपनी तुलना आप से नहीं करोगे, अपनी कमजोरियों को नहीं पहचान पाओगे और जब तक खुद की कमजोरियां पता नहीं होगी, उन्हें दूर नहीं किया जा सकता है। जब तक ऐसा होगा तब तक परेशानियों के सलाहकार और उनकी दुकाने फलती फूलती रहेगी और हर आदमी परेशानी का समाधान दूसरों में ढूंढता रहेगा।
- संजय भट्ट
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