गुरुवार, 25 मई 2023

दावेदारी का प्रमोशन

 

जमाना प्रजेन्‍टेशन का है। जब तक अपने आप को प्रस्‍तुत करने का तरीका नहीं होगा तब तक कोई आपको पूछेगा तक नहीं, भले ही आप में कितनी ही योग्‍यताओं का खजाना भरा पड़ा हो। तारिफ हो या बुराई खुद की ही करना पड़ेगी। बुराई करना भी आजकल शगल हो गया है। खुद को सब‍के सामने कैसा रखना है, यह आपको तय करना पड़ता है। जब आप खुद को सबके सामने अच्‍छा प्रस्‍तुत करते हो तो आपके आसपास वाले भले ही आपकी बुराई करे, लेकिन दूर से देखने वाले को लगता है आप बहुत अच्‍छे हैं। सोशल मीडिया के जमाने में अपना प्रस्‍तुतीकरण खुद ही करना पड़ता है। लोगों की पसन्‍द ना पसन्‍द का खयाल समझ में आते ही जिसके सामने जैसा प्रस्‍तुत होना हो आसानी से हो सकते हो। अपने स्‍टेटस पर भगवान के फोटो चस्‍पा कर उनकी भक्ति के विडियो का प्रसारण करने वाले के दिल कितने काले हैं, दूर बैठा व्‍यक्ति इसका अंदाजा भी नहीं लगा सकता और इसी का फायदा मिलता है अपनी छवि गढ़ने के लिए।
पहले लोगों का मूल्‍यांकन दूसरे करते थे और जिसका मूल्‍यांकन हो रहा होता था वह गर्व अनुभव करता था, लेकिन अब बदलते जमाने में खुद का मूल्‍यांकन खुद ही करके सबके सामने रखना पड़ता है। भले ही घर में पिताजी गालियां देते हो, बिस्‍तर पड़े मॉं-बाप को दवाई नसीब नहीं हो रही हो, लेकिन स्‍टेटस रहता है, सबकी सेवा में हाजिर आपका भाई। भले ही घर में किसी को एक गिलास भर पानी नहीं दिया हो, लेकिन जमाने में ढिंढोरा पीटा जाता है, भाई ने प्‍याऊ खुलवाई है। हाथी को लेकर प्रसिद्ध था कि उसके खाने और दिखाने के दांत अलग-अलग होते हैं, लेकिन आज आदमी का चरित्र दोगला हो गया है। वास्‍तविकता से परे झूठ परोसने की दुकाने खुल गई है। जो जितना सफेद झूठ परोसेगा उसे उतना सम्‍मान मिलेगा।
कल ही एक आमंत्रण पत्र मिला, देखा तो भाईजी का सम्‍मान हो रहा है। वह भाई जी जिनको मैं व्‍यक्तिगत रूप से जानता हूँ कि उनकी समाज और घर परिवार में कोई उपलब्धि नहीं है, लेकिन पैसों के दम पर अपने चमचों के बीच अपना सम्‍मान बना रखा है। समारोह के लिए लिखा था, उनकी उपलब्धियों और समाज के लिए किए गए कार्यों के लिए सम्‍मान किया जा रहा है। बाद में पता चला कि भाइ जी स्‍वयं ही इसका सारा खर्च उठा रहे हैं और उन्‍हीं के माध्‍यम से सारा कार्यक्रम रखा जा रहा है। निवेदक में आप और हम लिखा था। समझ नहीं आया ये आप और हम कौन है। किसी से तलाश की तो पता चला कि हम तो सिर्फ कुर्सी पर बैठकर भाई जी के सम्‍मान में तालियां बजाने वाले हैं और आप स्‍वयं भाई जी है, जिनका सम्‍मान हो रहा है। उपलब्धियों का खाखा भी ऐसा रखा गया था कि उनके बराबर कोई दानवीर और समाज सेवक कोई दूसरा नहीं हो।
जिज्ञासावश कार्यक्रम में चला गया। देखा बड़ा तामझाम था, कथिततौर पर स्‍वसम्‍मानित श्री कार्यक्रम के अतिथि थे, जो भाई जी का सम्‍मान करने वाले थे। कई लोगों या कहे भाई जी के अपने चमचों का भाषण हुआ इसमें भाई जी के तारिफों के पूल बांधे गए। अब बारी थी भाई जी की उन्‍होंने कहा- मैं तो छोटा सा आदमी हूँ, आप सभी की दुआओं और भगवान की कृपा का परिणाम है कि मुझे इस लायक समझा गया। बाकि सब आप लोगों ने जो कहा उसको मैं हृदय से स्‍वीकार करता हूँ। हृदय से स्‍वीकार करने वाली बात हमारे मन को चुभ गई। भले ही उन्‍होंने खुद को छोटा आदमी कहा हो, लेकिन चमचों की चाटूकारिता को हृदय से स्‍वीकार करने का अर्थ समझ में आ गया। अगले दिन हर अखबार, पोर्टल और न्‍युज चैनल पर भाई जी के सम्‍मान को बढ़ा चढ़ा कर दिखाया गया। समझ में आ गया इस बार भाई जी की दावेदारी है, इसीलिए भले मानुष बन कर समाज को दिशा देने का काम करने लगे हैं और सम्‍मान समारोह के मायने भी यही थे कि भाई जी को सबके सामने प्रमोट करना था। क्‍योंकिजब तक सार्वजनिक प्रमोशन नहीं होगा, किसकी निगाहों में आएंगे।                                                                             -संजय भट्ट

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Very nice

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...