बुधवार, 30 नवंबर 2022

उधड़ते ख्‍वाब

 (संजय भट्ट)

ख्‍वाब देखना अच्‍छा है, लेकिन उसको साकार करना बेहद मुश्किल है। ख्‍वाबों में स्‍वर्ग की सीढि़यों का एहसास हो जाता है, लेकिन हकीकत जब सामने आती है तो बड़ा बुरा लगता है। ख्‍वाबों को देखने के बाद उनको समझने की जरूरत होती है, क्‍योंकि अगर नहीं समझे और ख्‍वाबों में बहक गए तो फिर लम्‍बे समय तक पछताना पड़ता है। कई युवाओं को ख्‍वाब पालने तथा उनकों साकार करने का जुनून रहता है, लेकिन कुछ लोगों के ख्‍वाब हकीकत की मेहफिल में अपना स्‍थान बना पाते हैं। ऐसा ही उनके साथ भी हो गया। वे बैंक गए थे। उनके खाते में कुल जमा 5 हजार मे से कुछ राशि निकलवाने के लिए, लेकिन वहां से ख्‍वाब पाल आए और रात में वही सब उनको दिखने भी लगा।
वह तो बैंक था सुबह से लाइन में लगे तब कहीं जाकर उनका नम्‍बर दोपहर को आया। बस लंच टाईम का बोर्ड लगने ही वाला था, लेकिन उनकी दशा देख कर तरस खाते हुए उनके बैंक खाते से राशि मिल गई। वे भी धन्‍य हो गए कि चलो आज बैंक से पैसा निकालने में उनका आधे दिन का ही काम प्रभावित हुआ। दोपहर को छूट्टी दिहाड़ी मिल जाएगी तो कुछ और कमाई हो जाएगी। वैसे वे काई बड़े आदमी नहीं थे, मकान बनाने वाले ठेकेदार के यहां मजदूरी का काम करते थे। बैंक में उन्‍होंने देखा, जिस पर लाखों का बकाया था, उसकी बैंक में मैनेजर के कक्ष में आवभगत हो रही थी। वे लाइन में लगे-लगे यही सोंच रहे थे कि उनका जमा है,जिसे निकलवाने के लिए लाइन में लगे हैं, लेकिन जिस पर बकाया है, उसकी आवभगत हो रही है। उसके लिए चाय पानी मंगवाया जा रहा है।
ऐसा ही एक लोन उन्‍होंने भी लिया था, उसकी एक किश्‍त बकाया हो गई थी तो बैंक वालों ने वसूली के लिए नोटिस भेज कर कुर्की का आदेश जारी कर दिया था। वह सोंच रहे थे कि मेरा तो कुछ ही बकाया था, उसके लिए सख्‍ती से कुर्की का आदेश आया था और जब वह कहीं से जुगाड़ कर जमा करवाने पहुँचे तो काफी खरी खोटी सुनना पड़ी थी। उस बकायादार की इतनी आवभगत क्‍यों हो रही है। बाद में पता चला वह बड़ा आदमी है, उसके राजनीतिक कनेक्‍शन भी है और उसने जो लोन लिया है वह उद्योग कों बढ़ाने के लिए लिया है। उसके इस लोन से सैकड़ों लोगों को रोजगार मिलना था। उसकी इतनी साख है कि कभी भी जमा करवा देगा यह बैंक को भरोसा है। वह ठहरा मजदूर आदमी भला उसकी क्‍या साख और उसको मिले लोने से कौनसा किसी का फायदा होने वाला है। लेकिन ख्‍वाब तो ख्‍वाब है चाह कर बुलवाओ तो नहीं और अनचाहे भी आ ही जाते हैं।
दिन का बड़ा हिस्‍सा बैंक में बिताया था और लाखों करोड़ों की बाते सुन कर रात को ख्‍वाब आ ही गया। ख्‍वाब भी ऐसा कि उसके बैंक खाते में लाखों जमा हो गए हैं। ख्‍वाब में ही सही लेकिन जब पैसा आता है तो योजनाएं भी स्‍वत: सामने आने लगती है। उन्‍होने भी कई सारी योजनाओं को मूर्त रूप अपने ख्‍वाब में दे दिया था। मकान बनाने की मजदूरी करते थे तो ख्‍वाब भी कुछ बनाने का ही आया। रातभर में चार-पांच मंजिला शॉपिंग मॉल खड़ा हो गया और वह उसके मालिक बन बैठे। शॉपिंग मॉल के मालिक थे और सैकड़ों दुकानों का कारोबार देख रहे थे तो छोटी मोटी गाड़ी उनको शोभा नहीं देती थी। दिन में वे बैंक की लाइन में थे और वह कर्जदार बड़ा आदमी मैनेजर के कमरे में सौफे पर बैठा तो उनको को इसी रईसी का एहसास होने लगा। रातभर गहरी नींद में वे करोड़ों का कारोबार कर अपने अच्‍छे दिनों का ख्‍वाब देखते रहे।
इधर सुबह होते ही पत्‍नी ने चाय के लिए उठाया तो झल्‍ला उठे। उनकी झल्‍लाहट भी वाजिब थी, क्‍योंकि करोड़पति आंख खुलते ही उस टूटी सी खटिया पर, कवेलू से आती सूरज की किरण को देख रहे थे। उनका ख्‍वाब रेशे-रेशे होकर उधड़ रहा था। एक-एक रेशा उनकों अपनी हकीकत का एहसास करवा रहा था। एक दिन काम पर नहीं जाने के कारण घर के बाहर ठेकेदार गालियां दे रहा था। उनको वास्‍तविकता का एहसास होने लगा था कि वे ख्‍वाब में बहक गए थे, बस इसी कारण उनका ख्‍वाब हकीकत में उधड़ता हुआ दिखाई दे रहा था। वे लाचार थे, लेकिन अपनी वास्‍तविकता को छिपा भी तो नहीं सकते थे। जल्‍दी से पत्‍नी का पहले से बनाया हुए खाने की पोटली बगल में दबाए चुपचाप गालियां देते ठेकेदार के पीछे चल पड़े।

शनिवार, 26 नवंबर 2022

साहित्‍य और मन की बात

 (संजय भट्ट)

क्‍योंकि मैं साहित्‍यकार नहीं हॅूं और न ही मेरा कोई ऐसा वजुद है, जिसको सब पहचानते हो। बस मन की बात को संवेदना के साथ कह देता हूँ। मैं कोई मुंशी प्रेमचंद भी नहीं कि यथार्थ को कहानी की तरह लिख कर खुद को स्‍थापित कर लूँ। वैसे साहित्‍य में मन की बात का स्‍थान नहीं और मन की बात साहित्यिक हो यह कतई जरूरी नहीं है।
कुछ लोग पढ़े लिखे होते हैं और कुछ लोग लिखे पढ़े। ये लिखे पढ़े लोगों की संख्‍या बहुतायत में पाई जाती है, जिन्‍हें सिर्फ लिखा हुआ पढ़ना होता है। यह हमारी शिक्षा का भी अभिन्‍न अंग है। जो पुस्‍तकों में लिखा होता है उसको कोई चैलेन्‍ज नहीं सिर्फ पढ़ना मात्र है। पढ़ कर समझ लिया तो सवाल करेंगे और सवाल करने का अधिकार शिक्षा में सिर्फ मास्‍साब के पास होता है। उन्‍हीं के जैसे कुछ बड़े मास्‍साब प्रश्‍न बनाते हैं और छोटे मास्‍साब उसका जवाब लिखाते फिरते हैं। फिर इस लिखे में लाख गलती हो, सम सामयिक भी नहीं हो, तथ्‍यपरक भी नहीं हो, लेकिन कोई सवाल करने का अधिकार किसी को भी नहीं होता। यदि कोई बच्‍चा गलती से सवाल कर भी दे तो मास्‍साब कहते हैं, तु जिस क्‍लास में पढ़ रहा है ना उस क्‍लास से कई ऊपर की पढाई करने वाले ने इसे लिखा है। बच्‍चे की जिज्ञासा की वहीं मौत हो जाती है। इसके बाद वह सोंचने लगता है कि वास्‍तव में जो लिखा है,वही सच है, बाकी तो सब उसके मन की बात है। मन तो चंचल है, कुछ भी सोंच लेता है। फिर मन की बात का क्‍या महत्‍व है।
फिर भी मुझे आदत हो गई मन की बात लिखने की। मन की बात में भले ही साहित्‍य नहीं हो, बिना किसी के सुझाव को आमंत्रित किए लिखा हो, लेकिन है तो विशुद्ध मेरे ही मन की बात। अगर मन की ही बात कहना है, तो फिर किसी से सुझाव की क्‍या जरूरत है। जो मेरे मन में आ रहा है कह दूँ, जिसे अच्‍छा लगे वह अपने मन में बसा लें और जिसे बुरा लगे वह देखें पढ़े या एक कान से सुने और दूसरे से निकाल दे। हर लिखे हुए शब्‍द के मायने सब अपने-अपने हिसाब से निकालते हैं। किसी को अच्‍छा लगता है, किसी को बुरा भी लग जाता है। मंशा कितनी ही सही हो, यदि मन की बात सुनने या पढ़ने वाले की मंशा ठीक नहीं हो उसकी भावना से मेल नहीं खाता हो तो वह बुरा लगेगा ही। अच्‍छाई और बुराई के फैर में पड़ कर मैं अपने मन की बात कहने से खुद को कैसे रोक सकता हूँ, जबकि मुझे मन की बात कहने और सुनने के लिए किसी प्रमोशन, किसी इंविटेशन या इवेंट की जरूरत ही नहीं है। मैं कोई बहुत बड़ा आदमी तो हूँ तो नहीं कि मेरे मन की बात को गंभीरता से लिया जाए। उसके चर्चा अखबार में हो और टीवी चैनल पलट-पलट कर उसे ही मेरे फोटो के साथ दिखाते रहे। फिर मुझे क्‍या डर मैं अपने मन की बात कह सकता हूँ।
जो साहित्‍यकार हो उसे अपनी भाषा, लेखनी, शैली और विचार प्रस्‍तुतीकरण को साध कर चलना होता है। यदि थोड़ा भी गलत हुआ तो उसकी साहित्‍यकार की छवि पर आंच आने लगती है। लेकिन मेरे जैसे लोगों का क्‍या, कुछ भी कहो मन की बात कहो। यथार्थ को सामने रखो और भविष्‍य की कल्‍पना करो। बस लोगों से जुड़े रहो। उनकी बातो को अपने शब्‍दों में कहते रहो। क्‍योंकि वास्‍तव में उनको उस समय बोलने, लिखने से रोक दिया गया, जब वे पढ़ाई कर रहे थे। उनको बोलने और लिखने का मौका मिलता तो मुझे मन की बात कहने का मौका बिल्‍कुल नहीं मिलता, क्‍योंकि न तो मैं साहित्‍यकार हॅू और न ही दूसरों के सुझाव लेकर उसे अपनी मन की बात बना कर कहने वाला। मेरे तो मन में आता है, मुझे जो लगता है, वही यथार्थ है, वही सत्‍य है।

मंगलवार, 22 नवंबर 2022

आन्‍दोलन का रेंगता कीड़ा

(संजय भट्ट)

वो हर बात को लेकर आंदोलित हो जाते थे। उनके मन में आंदोलन के विचारों की श्रंखला चलती रहती थी। वे हमेशा आंदोलन के बारे में सोंचते थे। उन्‍हें लगता था कि बिना आंदोलन कोई भी कोई भी सफलता नहीं मिल सकती है। हमेशा कोई न कोई आंदोलन की रूपरेखा चलती ही रहती है। वे नए-नए आंदोलनों को ऐसा स्‍वरूप प्रदान कर देते कि काम की सफलता की गारंटी नजर आने लगती। इसी आंदोलन की आदत के कारण लोग उनको आंदोलनजीवी कहने से नहीं चुकते। उनको भी यह पता था, लेकिन वे इससे घबराए बिना हमेशा ही नए आंदोलन की ओर बढ़ जाते थे। आंदोलन जब चरम पर होता तो वे इससे अपनी दूरी बना लेते और दूसरे आंदोलन में अपनी रूचि दिखाने लगते थे। उनकी रूचि का कोई ठिकाना नहीं था, वे कब क्‍या कर बैठे किसी को खबर नहीं होती थी। उनके मन में किस आंदोलन को लेकर क्‍या रूपरेखा बन रही है, कोई नहीं जानता था, लेकिन यकीनन आंदोलन की रूपरेखा उनसे बेहतर कोई नहीं बना सकता था।
हर समस्‍या को वे बातचीत के स्‍थान पर आंदोलन के माध्‍यम से समाधान चाहते थे। उन्‍हें मलाल इस बात का था कि आंदोलन वे खड़ा करते, लेकिन आंदोलन का लाभ किसी ओर को मिल जाता था। उन्‍होंने अपने आन्‍दोलनों से कई नेता तैयार कर दिए थे, लेकिन आज भी उनको नेता का दर्जा नहीं मिल पाया था। दरअसल वे रणनीतिकार थे, लेकिन उनके मन में भी कहीं न कहीं किसी कोने में एक नेता का अंतर्मन जन्‍म ले चुका था। वे राजनीति नहीं करते थे, लेकिन राजनीति से दूर भी नहीं रह पाते थे। हर कहीं उनकी चर्चा थी, वे पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए एक साथ काम करते थे, उनकी यही राजनीति उनको आंदोलन के लिए प्रेरित करती थी।
वास्‍तव में वह पीडि़त शोषित वर्ग का एक चेहरा थे। उनके मन में पीड़ा का कीड़ा हमेशा रेंगता रहता था, उसने उन्‍हें आज तक काटा नहीं था। बस रेंगता रहता था और उसी की सलवलाहट का परिणाम था कि वे नए-नए आंदोलन की रूपरेखा बनाते रहते थे। जब भी किसी को परेशानी हो उनकी ओर रूख कर लो वे आंदोलन की रूपरेखा बना कर दे देते, जिससे समस्‍या का समाधान हो सके। उनके आंदोलनजीवी स्‍वरूप के कारण उन्‍हें हर कहीं पीड़ा और दर्द ही दिखाई देता था। वे हर अच्‍छाई में भी बुराई का विकल्‍प चुन लेते थे। मतलब यह कि उनकों कमी ही दिखाई देती थी। वे 'निंदक नीयरे राखिए आंगन कुटी छबाए। बिनु पानी बिनु साबना निर्मल करे सुभाय।।' दोहे का जीता जागता उदाहरण थे। वे खुद निर्मल नहीं थे, लेकिन उनके विचारों को जानने के बाद हर ओर बस कमी ही कमी दिखाई देती थी। मतलब कहा जाए तो वे अच्‍छे काम में भी इतने प्रभावी तरीके से बुराई ढूंढ लेते थे कि सभी के सामने अच्‍छाई छिप जाती और बुराई ही दिखाई देने लगती थी।
उनकी विशेषता यह थी कि वे खुद कुछ करते नहीं थे, लेकिन जो करवाते थे उससे हर किसी को तकलीफ होने लगती। कई बार सरल समस्‍याओं को भी उन्‍होंने कठिन बना कर हांसिल किया था। खुद के जीवन में भी आंदोलित र‍हते थे, घर में भी उनका आंदोलनजीवी कीड़ा कुलबुलाता रहता था। खाने में, पानी में, हवा में, रहने में, सोने में कहीं भी उन्‍हें संतोष नहीं लगता था। वे आधी रात को उठ जाते थे और सपने में भी कई बार आंदोलन के नारे लगाते हुए पकड़े गए है। इससे उन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ता था लेकिन घर के लोग उनकी इस आदत से परेशान थे। आंदोलन की रूपरेखा वह बनाते थे, आंदोलन खड़ा वे करते थे, लेकिन उसका नतीजा घर वालों को भुगतना पड़ता था। जो उनके आंदोलन से प्रभावित होते थे वह उनके आंदोलन का बदला उनके घर वालों से लिया करते थे।
सभी परेशान थे, लेकिन उनके जीवन का आनंद सिर्फ आंदोलन में था। वे आंदोलन की रूपरेखा बना कर और आंदोलन की सफलता में अपनी खुशियों को तलाश करते थे। खुद को शांति और अहिंसा का बड़ा पुजारी बताते थे, लेकिन उनके आंदोलन की आदत के कारण अंतर्मुखी अशांति प्रिय हो चुके थे। वे इसको नकारते थे। कई बार उनको भी इसका नुकसान हो चुका था, लेकिन दिल है कि मानता नहीं की तर्ज पर फिर किसी भी पीडि़त शोषित के लिए आंदोलन की रूपरेखा बनाने में जुट जाते थे, क्‍योंकि आंदोलन ही उनका जीवन था और आंदोलन के बिना वे जीवित नहीं रह सकते थे। वे मरते-मरते भी उनकी रहस्‍यमयी मौत का आंदोलन खड़ा कर गए थे।

गुरुवार, 10 नवंबर 2022

नाराजगी का ठींकरा

 

संजय भट्ट

आखिर कितना भी कर लो कुछ-न-कुछ कमी रह ही जाती है। शादी-व्‍याह हो या कोई अन्‍य कार्यक्रम। शादी ब्‍याह में फूफा-जीजा नाराज तो कार्यक्रम में आयोजक या अतिथि नाराज। सब को मनाना एक के बस की बात नहीं होती है। ऐसा ही किसी कार्यक्रम के संचालक के साथ होता है। वह एक और उसके आगे पीछे कई। कोई न कोई तो नाराज हो ही जाता है। यह प्रोफेशनल संचालनकर्ताओं का ही धैर्य है,कि सभी को साध लेते हैं।
ऐसे ही एक कार्यक्रम का संचालन करने वाले के साथ घटा। चूंकि पहलीबार ऐसा हुआ था, इसलिए उसका मन खिन्‍न हो गया था, लेकिन धीरे-धीरे अभ्‍यस्‍ता हो गई और अब वह हंस कर सहन कर लेता था। सभी ने कहा कार्यक्रम बहुत अच्‍छा था, लेकिन वे उदास मन से घर लौट रहे थे। कार्यक्रम में संचालन करते हुए भी उनके मन में यही चल रहा था कि कार्यक्रम कब समाप्‍त हो और वे अपने घर को लौट जाए। वास्‍तविकता यह है कि वे इस कार्यक्रम को करना ही नहीं चाहते थे। वे ऐसे कार्यक्रम में शरीक ही होना नहीं च‍ाहते थे, लेकिन अचानक उनको पता चला कि कार्यक्रम का संचालन ही उनको करना है। मन व्‍यथित तो ही मन में कुछ ठीक भी नहीं लग रहा था। उनको लगा था कि चलो सब बेहतर हो जाएगा, लेकिन कार्यक्रम की समाप्ति तक उनका मन और अधिक उद्धेलित हो उठा।
कार्यक्रम में दो ही लोगों की भूमिका का महत्‍व होता है, एक आयोजक और दूसरा संचालनकर्ता आयोजक तो वे थे नहीं संचालन का भार भी अचानक उनको मिल गया। आयोजको को पूर्ण भरोसा था कि कार्यक्रम में जो भी होगा बहुत अच्‍छा होगा। उन्‍होंने ने भी इसके लिए बहुत कुछ इंतजाम किए थे, लेकिन होनी को कौन टाल सकता है। सभी की निगाह में कार्यक्रम भले ही अच्‍छा रहा हो लेकिन उनका मन नहीं मान रहा था। उनको लग रहा था कि कोई कमी रह गई है। इस कमी को वे पहचान ही नहीं पा रहे थे। कार्यक्रम के बीच से लेकर अंत तक और घर लौटते हुए भी वे इसी परेशानी से जुझ रहे थे कि जिस कार्यक्रम की सफलता की सभी बात कर रहे हैं, आखिर उसमें उनको क्‍या कमी लगी। कौन-सी कमी थी जो उनको अन्‍दर तक उनको उखाड़ रही थी। बार-बार मन में यही विचार आ रहा था कि अब कोई संचालन नहीं करना चाहिए। वैसे यह निर्णय तो वे कभी का ले चुके थे और किसी-न-किसी बहाने से कार्यक्रमों को टालते आ रहे थे, लेकिन इस मौके पर जब उनको अचानक कहा गया और कोई विकल्‍प भी नहीं दिख रहा था तो वे इस प्रस्‍ताव को टाल नहीं पाए।
कार्यक्रम का संचालन करने वाला कितना भी अच्‍छा कर ले, कार्यक्रम की हर छोटी-बड़ी गलती का ठीकरा उसी के माथे पर फोड़ा जाता है। वैसे तो उनकी आदत थी कि जिस कार्यक्रम का संचालन करने की जिम्‍मेदारी मिले उसके आयोजको के साथ बैठ कर कार्यक्रम को समझना और उसकी रूपरेखा पर अपने खुले विचारों से उनको अवगत करवाना, लेकिन इस बार अचानक से जिम्‍मेदारी मिलने के कारण न तो मीटिंग हुई और न ही वे कुछ समझ पाए। फिर जहां सौ समझदार इकट्ठे होते हैं वहां सब अपनी राय देते हैं और मामला एक भी राय से अलग हुआ तो समझा बवाल हो जाता है। कोई संतुष्‍ट तो कोई रूष्‍ट हो जाता है। सबसे पहला विवाद तो यही होता है कि उसको मंच पर कैसे बिठा दिया। इसको नीचे क्‍यों रखा। स्‍वागत में इसका नाम ऊपर कैसे आ गया उसका नाम पीछे क्‍यों रह गया। इनको क्‍यों बोलने  का मौका दिया, उनको क्‍यों नहीं दिया। यह कोई नहीं सोंचता है कि सैकड़ों की भीड़ में माईक थामे अप्रत्‍यक्ष संचालकों (पीछे से संचालक को कहने वाले), मंच तथा उसके सामने बैठी भीड़ को वह कैसे नियंत्रित कर रहा होता है, यह वह और उसकी आत्‍मा ही जानती है, लेकिन एक छोटी सी बात पर सारा दोष उसके माथे पर आ जाता है।
कार्यक्रम सरकारी हो तो सब कुछ प्रोटोकॉल के मुताबिक तय होकर हो जाता है, लेकिन जब कार्यक्रम आत्‍मीय हो तो संचालक को काफी मशक्‍कत करना होती है। उसके मन की व्‍यथा को कोई नहीं समझता है। फिर सबका नजरिया एक जैसा हो जरूरी तो नहीं, सबका अपना ढंग होता है देखने का। कोई उसमें अपनी सफलता देखता है तो कोई कार्यक्रम की सफलता और कुछ ऐसे भी होते हैं, जिनको कार्यक्रम की कमियों का शौक होता है। कुछ इसलिए की इनकी तादाद ज्‍यादा नहीं होती, लेकिन इनके तर्क ऐसे होते हैं कि वह कमिया सभी को दिखाई देने लगती है। भले ही सब अच्‍छा कहते रहे, लेकिन उन दो चार व्‍यक्तियों के तर्कों से सभी सहमत हो जाते हैं। फिर भीड़ में सभी को संतुष्‍ट कर पाना अकेले संचालनकर्ता के बस के बात नहीं होती। किसी को तो असंतुष्‍ट करना ही पड़ता है। यह असंतुष्‍टी की उस संचालनकर्ता के लिए परेशानी का सबब हो जाती है। सभी लोगों के फोटो छपते हैं अखबार में, उनके भाषणों का भी उल्‍लेख भी होता है, लेकिन संचालनकर्ता को सिर्फ बात से संतुष्‍ट होना पड़ता है कि कार्यक्रम का संचालन फलां ने किया। अंत होने के कारण कई बार तो यह छप भी नहीं पाता है।
जिस कार्यक्रम से घर लौटे थे, उसमें उनका मन नहीं था, लेकिन आयोजकों का दबाव और व्‍यवहार में उनको जाना भी पड़ा। गए तो गए संचालन का टोकरा उनके माथे आन पड़ा। बेमन से किया हुआ काम सफलता की सीढि़यों पर चढ़ तो जाता है, लेकिन उस ऊंचाई से लुढ़कता है, जहां से उसका कुछ भी बाकी नहीं बचता। यही हाल उनका था। उन्‍होंने कार्यक्रम का संचालन किया, सभी को साधने का प्रयास किया, योजना मन ही मन थी कि किसको कितना महत्‍व देना है, कहां उसका उपयोग करना है, ले‍किन आयोजक हो और उसका स्‍वागत से नाम गायब हो जाए जो बुरा लगना स्‍वाभाविक है। चाहे उनके लिए संचालनकर्ता ने महत्‍व का काम देख रखा हो, स्‍वागत से ज्‍यादा सम्‍मान का मामला सोंच रखा हो। आयोजक को तो यही लगेगा कि उसने इतना सब किया और सारे स्‍वागत कर रहे हैं और उसका नाम अंत तक भी नहीं आया। अब ऐसा कार्यक्रम या तो बिगड़ता है या किसी को शिकायत हो जाती है। कई बार यह शिकायत सार्वजनिक रूप से प्रकट हो जाती है और कई बार यह संचालक को अकेले में झेलने पड़ती है। यहां इनके साथ दोनों हो गया था। मन उद्धेलित था, व्‍यथित था। सभी का सम्‍मान पाकर भी वे उदासमना घर लौटे थे कि उन्‍होंने अनचाहे ही सही किसी को तो नाराज कर ही दिया और नाराज हो भी क्‍यों नहीं सुबह से लगे थे और स्‍वागत से चंद घंटे के लिए आए माईक पकड़ने वाले ने उनका नाम ही गायब कर दिया।

गुरुवार, 3 नवंबर 2022

सेल्‍फ स्‍टार्ट


                          (संजय भट्ट) 

जिस तरह से अस्‍त्र-शस्‍त्र, हथियार और मुख्तियार हुए उसी तरह से सेल्‍फ स्‍टार्ट का भी उदय हुआ। इसी श्रेणी से धीरे-धीरे मानव भी पहचाने जाने लगे। कुछ लोग रिमोट से चलते हैं और कुछ सेल्‍फ स्‍टार्ट होते हैं। जो सेल्‍फ स्‍टार्ट होते हैं, उन्‍हें रचनाधर्मी या क्रिएटिव कहा जाता है। कुछ लोग इनको एक्टिव भी कह देते हैं। लेकिन समाज में इनके दुश्‍मन भी बहुत होते हैं। जो सेल्‍फ स्‍टार्ट होते हैं, वह किसी की सुने बगैर जो जचे वही काम करते हैं और लगभग बहुमुखी प्रतिभा के धनी के होते हैं। वैसे यह अलग बात है कि इनका उपयोग सिर्फ एक स्‍टेपनी की तरह होता है, जो काम कोई नहीं करे, वहां इनको अटका दो, काम निकल जाएगा। जैसे ही काम निकला इनको स्‍टेपनी की तरह अगले काम के लिए सुरक्षित रख लो। सीधी भाषा में कहे तो माचिस की तीली की तरह इनको तत्‍काल बाहर कर दो। यदि इनको काम के बाद बाहर नहीं किया तो यह उस व्‍यक्ति पर भारी हो जाते हैं, जिसका संचालन इनके रिमोट से हुआ है।जब ये अपने सेल्‍फ स्‍टार्ट मोड में होते हैं तो सभी मुख्‍य आदमी को भूल कर इनसे ही सब पूछते हैं। जब इनसे पूछने लगते हैं, तो यह अपने आप को ही प्रमुख समझने लगते हैं। उसी प्रमुख की तरह सभी निर्णय लेना और अपने निर्णय से सभी को चलाना इनकी फितरत बन जाती है। बस इसी फितरत के कारण ही इनका उपयोग स्‍टेपनी की तरह होता है। 

यूं तो यह फुल प्रुफ प्रोटेक्‍शन देते हैं,लेकिन इनकी फितरत के कारण मात खा जाते हैं। इनका उपयोग डिस्‍पोज़ल की तरह होने लगा है। अपने काम के बॉस को कोई भी इस श्रेणी में पसन्‍द नही करते, क्‍योंकि कोई बॉस हो और सेल्‍फ स्‍टार्ट भी तो उसको चकमा देना कठिन ही नहीं नामुमकिन होता है। ये अपने हिसाब से चलते हैं और चाहते हैं कि सभी इनके हिसब से चलें, लेकिन काम करने वालों की तादाद में ज्‍यादातर काम को टालने की प्रवृत्ति वाले लोग पाए जाते हैं। इनको यह पसन्‍द नहीं होता है। सभी चाहते हैं एक एैसा बॉस हो जो किसी रिमोट से चले, जिसका कंट्रोल उनके हाथों में हो। किसी का भी कंट्रोल करना इतना आसान नहीं होता है। 

दरअसल सभी कार्यालयों में ऐसे दो-चार रिमोट होते हैं, जो अपने हिसाब से कंट्रोल करते हैं। सेल्‍फ स्‍टार्ट बॉस से सबसे ज्‍यादा समस्‍या इन्‍हीं रिमोट कंट्रोल को होती है। सेल्‍फ स्‍टार्ट बॉस के आने से ये कमजोर हो जाते हैं। वैसे ऐसा भी देखा गया है कि जो सेल्‍फ स्‍टार्ट होता है, उसको तेज चलने वाला या फिर फास्‍ट कार्ड के नाम से आजकल जाना जाने लगा है। इनको काम करने में काफी मशक्‍कत करना पड़ती है। क्‍योंकि जो रिमोट होते हैं जब उनका वजन कम हो जाता है तो वह अपने प्रभाव का दुरूपयोग कर इनके खिलाफ ऐसा माहौल पैदा कर देते हैं, जिससे लगता है कि यह जो कर रहे हैं या निर्णय ले रहे हैं वह गलत ही है। पीठ के पीछे तो सभी बॉस के कुछ-न-कुछ कानाफुसी चलती रहती है, लेकिन नेता टाइप के लोग इनको मुँह पर ही कह जाते हैं'साहब बहुत तेज चल रहे हो' अपना ध्‍यान रखना। यह भी देखा गया है कि सेल्‍फ स्‍टार्ट को उनके ऊपर के लोग भी ज्‍यादा पसन्‍द नहीं करते हैं, क्‍योंकि उनको लगता है अगर यह इतना अच्‍छा काम करके आगे बढ़ गया तो उनकी पूछपरख कम हो जाएगी। बस यही कारण होता है कि सेल्‍फ स्‍टार्ट किसी भी स्‍थान पर ज्‍यादा दिन का मेहमान नहीं रहता। इसे स्‍टेपनी की तरह चारों पहियों में कहीं-न-कहीं लगा कर काम निकाल लिया जाता है और फिर हटा दिया जाता है। 

इन दिनों टारगेट बेस्‍ड जॉब हो गए हैं और सेल्‍फ स्‍टार्ट की कमी। इसीलिए रिमोट की मार्केट वैल्‍यु इनसे ज्‍यादा है। चूंकि रिमोट- रिमोट होता है, वह किसी को भी बदल सकता है। यह भी कारण है कि जब रिमोट को तकलीफ होने लगती है, तो वह जुगाड़ भिड़ा कर सेल्‍फ स्‍टार्ट को हटवा देता है। ये सेल्‍फ स्‍टार्ट थोड़े अलग टाइप की प्रजाति के होते हैं, इनका उपयोग कहीं भी किया जा सकता है, यह बहुमुखी प्रतिभा को रखते हैं, तो इनका उपयोग भी बहुत है। जब आदमी में खासियत होती है तो खामियां भी होती है। इनमें भी एक बहुत बड़ी खामी यह होती है कि इनको प्रदर्शन दिखावा बहुत पसन्‍द होता है। तारीफ पसन्‍द भी होते हैं, इसलिए कुछ रिमोट का मानना है कि इनको बेवकुफ बनाना भी इतना ही आसान है, जितना कि नहीं बनाना। ये अपने आप को बहुत बड़ा समझदार समझते हैं और लोग इनको बेवकुफ तभी तो स्‍टेपनी की तरह युज एण्‍ड थ्रो की तरह उपयोग होते हैं। अब आप तय कर लें कि आपको सेल्‍फ स्‍टार्ट बनना है, रिमोट बनना है या फिर सेल्‍फ स्‍टार्ट का उपयोग कर अपनी गाड़ी को आगे धका कर इसे भूल जाना है।

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...