बुधवार, 30 नवंबर 2022

उधड़ते ख्‍वाब

 (संजय भट्ट)

ख्‍वाब देखना अच्‍छा है, लेकिन उसको साकार करना बेहद मुश्किल है। ख्‍वाबों में स्‍वर्ग की सीढि़यों का एहसास हो जाता है, लेकिन हकीकत जब सामने आती है तो बड़ा बुरा लगता है। ख्‍वाबों को देखने के बाद उनको समझने की जरूरत होती है, क्‍योंकि अगर नहीं समझे और ख्‍वाबों में बहक गए तो फिर लम्‍बे समय तक पछताना पड़ता है। कई युवाओं को ख्‍वाब पालने तथा उनकों साकार करने का जुनून रहता है, लेकिन कुछ लोगों के ख्‍वाब हकीकत की मेहफिल में अपना स्‍थान बना पाते हैं। ऐसा ही उनके साथ भी हो गया। वे बैंक गए थे। उनके खाते में कुल जमा 5 हजार मे से कुछ राशि निकलवाने के लिए, लेकिन वहां से ख्‍वाब पाल आए और रात में वही सब उनको दिखने भी लगा।
वह तो बैंक था सुबह से लाइन में लगे तब कहीं जाकर उनका नम्‍बर दोपहर को आया। बस लंच टाईम का बोर्ड लगने ही वाला था, लेकिन उनकी दशा देख कर तरस खाते हुए उनके बैंक खाते से राशि मिल गई। वे भी धन्‍य हो गए कि चलो आज बैंक से पैसा निकालने में उनका आधे दिन का ही काम प्रभावित हुआ। दोपहर को छूट्टी दिहाड़ी मिल जाएगी तो कुछ और कमाई हो जाएगी। वैसे वे काई बड़े आदमी नहीं थे, मकान बनाने वाले ठेकेदार के यहां मजदूरी का काम करते थे। बैंक में उन्‍होंने देखा, जिस पर लाखों का बकाया था, उसकी बैंक में मैनेजर के कक्ष में आवभगत हो रही थी। वे लाइन में लगे-लगे यही सोंच रहे थे कि उनका जमा है,जिसे निकलवाने के लिए लाइन में लगे हैं, लेकिन जिस पर बकाया है, उसकी आवभगत हो रही है। उसके लिए चाय पानी मंगवाया जा रहा है।
ऐसा ही एक लोन उन्‍होंने भी लिया था, उसकी एक किश्‍त बकाया हो गई थी तो बैंक वालों ने वसूली के लिए नोटिस भेज कर कुर्की का आदेश जारी कर दिया था। वह सोंच रहे थे कि मेरा तो कुछ ही बकाया था, उसके लिए सख्‍ती से कुर्की का आदेश आया था और जब वह कहीं से जुगाड़ कर जमा करवाने पहुँचे तो काफी खरी खोटी सुनना पड़ी थी। उस बकायादार की इतनी आवभगत क्‍यों हो रही है। बाद में पता चला वह बड़ा आदमी है, उसके राजनीतिक कनेक्‍शन भी है और उसने जो लोन लिया है वह उद्योग कों बढ़ाने के लिए लिया है। उसके इस लोन से सैकड़ों लोगों को रोजगार मिलना था। उसकी इतनी साख है कि कभी भी जमा करवा देगा यह बैंक को भरोसा है। वह ठहरा मजदूर आदमी भला उसकी क्‍या साख और उसको मिले लोने से कौनसा किसी का फायदा होने वाला है। लेकिन ख्‍वाब तो ख्‍वाब है चाह कर बुलवाओ तो नहीं और अनचाहे भी आ ही जाते हैं।
दिन का बड़ा हिस्‍सा बैंक में बिताया था और लाखों करोड़ों की बाते सुन कर रात को ख्‍वाब आ ही गया। ख्‍वाब भी ऐसा कि उसके बैंक खाते में लाखों जमा हो गए हैं। ख्‍वाब में ही सही लेकिन जब पैसा आता है तो योजनाएं भी स्‍वत: सामने आने लगती है। उन्‍होने भी कई सारी योजनाओं को मूर्त रूप अपने ख्‍वाब में दे दिया था। मकान बनाने की मजदूरी करते थे तो ख्‍वाब भी कुछ बनाने का ही आया। रातभर में चार-पांच मंजिला शॉपिंग मॉल खड़ा हो गया और वह उसके मालिक बन बैठे। शॉपिंग मॉल के मालिक थे और सैकड़ों दुकानों का कारोबार देख रहे थे तो छोटी मोटी गाड़ी उनको शोभा नहीं देती थी। दिन में वे बैंक की लाइन में थे और वह कर्जदार बड़ा आदमी मैनेजर के कमरे में सौफे पर बैठा तो उनको को इसी रईसी का एहसास होने लगा। रातभर गहरी नींद में वे करोड़ों का कारोबार कर अपने अच्‍छे दिनों का ख्‍वाब देखते रहे।
इधर सुबह होते ही पत्‍नी ने चाय के लिए उठाया तो झल्‍ला उठे। उनकी झल्‍लाहट भी वाजिब थी, क्‍योंकि करोड़पति आंख खुलते ही उस टूटी सी खटिया पर, कवेलू से आती सूरज की किरण को देख रहे थे। उनका ख्‍वाब रेशे-रेशे होकर उधड़ रहा था। एक-एक रेशा उनकों अपनी हकीकत का एहसास करवा रहा था। एक दिन काम पर नहीं जाने के कारण घर के बाहर ठेकेदार गालियां दे रहा था। उनको वास्‍तविकता का एहसास होने लगा था कि वे ख्‍वाब में बहक गए थे, बस इसी कारण उनका ख्‍वाब हकीकत में उधड़ता हुआ दिखाई दे रहा था। वे लाचार थे, लेकिन अपनी वास्‍तविकता को छिपा भी तो नहीं सकते थे। जल्‍दी से पत्‍नी का पहले से बनाया हुए खाने की पोटली बगल में दबाए चुपचाप गालियां देते ठेकेदार के पीछे चल पड़े।

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Very nice

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