शनिवार, 26 नवंबर 2022

साहित्‍य और मन की बात

 (संजय भट्ट)

क्‍योंकि मैं साहित्‍यकार नहीं हॅूं और न ही मेरा कोई ऐसा वजुद है, जिसको सब पहचानते हो। बस मन की बात को संवेदना के साथ कह देता हूँ। मैं कोई मुंशी प्रेमचंद भी नहीं कि यथार्थ को कहानी की तरह लिख कर खुद को स्‍थापित कर लूँ। वैसे साहित्‍य में मन की बात का स्‍थान नहीं और मन की बात साहित्यिक हो यह कतई जरूरी नहीं है।
कुछ लोग पढ़े लिखे होते हैं और कुछ लोग लिखे पढ़े। ये लिखे पढ़े लोगों की संख्‍या बहुतायत में पाई जाती है, जिन्‍हें सिर्फ लिखा हुआ पढ़ना होता है। यह हमारी शिक्षा का भी अभिन्‍न अंग है। जो पुस्‍तकों में लिखा होता है उसको कोई चैलेन्‍ज नहीं सिर्फ पढ़ना मात्र है। पढ़ कर समझ लिया तो सवाल करेंगे और सवाल करने का अधिकार शिक्षा में सिर्फ मास्‍साब के पास होता है। उन्‍हीं के जैसे कुछ बड़े मास्‍साब प्रश्‍न बनाते हैं और छोटे मास्‍साब उसका जवाब लिखाते फिरते हैं। फिर इस लिखे में लाख गलती हो, सम सामयिक भी नहीं हो, तथ्‍यपरक भी नहीं हो, लेकिन कोई सवाल करने का अधिकार किसी को भी नहीं होता। यदि कोई बच्‍चा गलती से सवाल कर भी दे तो मास्‍साब कहते हैं, तु जिस क्‍लास में पढ़ रहा है ना उस क्‍लास से कई ऊपर की पढाई करने वाले ने इसे लिखा है। बच्‍चे की जिज्ञासा की वहीं मौत हो जाती है। इसके बाद वह सोंचने लगता है कि वास्‍तव में जो लिखा है,वही सच है, बाकी तो सब उसके मन की बात है। मन तो चंचल है, कुछ भी सोंच लेता है। फिर मन की बात का क्‍या महत्‍व है।
फिर भी मुझे आदत हो गई मन की बात लिखने की। मन की बात में भले ही साहित्‍य नहीं हो, बिना किसी के सुझाव को आमंत्रित किए लिखा हो, लेकिन है तो विशुद्ध मेरे ही मन की बात। अगर मन की ही बात कहना है, तो फिर किसी से सुझाव की क्‍या जरूरत है। जो मेरे मन में आ रहा है कह दूँ, जिसे अच्‍छा लगे वह अपने मन में बसा लें और जिसे बुरा लगे वह देखें पढ़े या एक कान से सुने और दूसरे से निकाल दे। हर लिखे हुए शब्‍द के मायने सब अपने-अपने हिसाब से निकालते हैं। किसी को अच्‍छा लगता है, किसी को बुरा भी लग जाता है। मंशा कितनी ही सही हो, यदि मन की बात सुनने या पढ़ने वाले की मंशा ठीक नहीं हो उसकी भावना से मेल नहीं खाता हो तो वह बुरा लगेगा ही। अच्‍छाई और बुराई के फैर में पड़ कर मैं अपने मन की बात कहने से खुद को कैसे रोक सकता हूँ, जबकि मुझे मन की बात कहने और सुनने के लिए किसी प्रमोशन, किसी इंविटेशन या इवेंट की जरूरत ही नहीं है। मैं कोई बहुत बड़ा आदमी तो हूँ तो नहीं कि मेरे मन की बात को गंभीरता से लिया जाए। उसके चर्चा अखबार में हो और टीवी चैनल पलट-पलट कर उसे ही मेरे फोटो के साथ दिखाते रहे। फिर मुझे क्‍या डर मैं अपने मन की बात कह सकता हूँ।
जो साहित्‍यकार हो उसे अपनी भाषा, लेखनी, शैली और विचार प्रस्‍तुतीकरण को साध कर चलना होता है। यदि थोड़ा भी गलत हुआ तो उसकी साहित्‍यकार की छवि पर आंच आने लगती है। लेकिन मेरे जैसे लोगों का क्‍या, कुछ भी कहो मन की बात कहो। यथार्थ को सामने रखो और भविष्‍य की कल्‍पना करो। बस लोगों से जुड़े रहो। उनकी बातो को अपने शब्‍दों में कहते रहो। क्‍योंकि वास्‍तव में उनको उस समय बोलने, लिखने से रोक दिया गया, जब वे पढ़ाई कर रहे थे। उनको बोलने और लिखने का मौका मिलता तो मुझे मन की बात कहने का मौका बिल्‍कुल नहीं मिलता, क्‍योंकि न तो मैं साहित्‍यकार हॅू और न ही दूसरों के सुझाव लेकर उसे अपनी मन की बात बना कर कहने वाला। मेरे तो मन में आता है, मुझे जो लगता है, वही यथार्थ है, वही सत्‍य है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Very nice

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...