मंगलवार, 22 नवंबर 2022

आन्‍दोलन का रेंगता कीड़ा

(संजय भट्ट)

वो हर बात को लेकर आंदोलित हो जाते थे। उनके मन में आंदोलन के विचारों की श्रंखला चलती रहती थी। वे हमेशा आंदोलन के बारे में सोंचते थे। उन्‍हें लगता था कि बिना आंदोलन कोई भी कोई भी सफलता नहीं मिल सकती है। हमेशा कोई न कोई आंदोलन की रूपरेखा चलती ही रहती है। वे नए-नए आंदोलनों को ऐसा स्‍वरूप प्रदान कर देते कि काम की सफलता की गारंटी नजर आने लगती। इसी आंदोलन की आदत के कारण लोग उनको आंदोलनजीवी कहने से नहीं चुकते। उनको भी यह पता था, लेकिन वे इससे घबराए बिना हमेशा ही नए आंदोलन की ओर बढ़ जाते थे। आंदोलन जब चरम पर होता तो वे इससे अपनी दूरी बना लेते और दूसरे आंदोलन में अपनी रूचि दिखाने लगते थे। उनकी रूचि का कोई ठिकाना नहीं था, वे कब क्‍या कर बैठे किसी को खबर नहीं होती थी। उनके मन में किस आंदोलन को लेकर क्‍या रूपरेखा बन रही है, कोई नहीं जानता था, लेकिन यकीनन आंदोलन की रूपरेखा उनसे बेहतर कोई नहीं बना सकता था।
हर समस्‍या को वे बातचीत के स्‍थान पर आंदोलन के माध्‍यम से समाधान चाहते थे। उन्‍हें मलाल इस बात का था कि आंदोलन वे खड़ा करते, लेकिन आंदोलन का लाभ किसी ओर को मिल जाता था। उन्‍होंने अपने आन्‍दोलनों से कई नेता तैयार कर दिए थे, लेकिन आज भी उनको नेता का दर्जा नहीं मिल पाया था। दरअसल वे रणनीतिकार थे, लेकिन उनके मन में भी कहीं न कहीं किसी कोने में एक नेता का अंतर्मन जन्‍म ले चुका था। वे राजनीति नहीं करते थे, लेकिन राजनीति से दूर भी नहीं रह पाते थे। हर कहीं उनकी चर्चा थी, वे पक्ष और विपक्ष दोनों के लिए एक साथ काम करते थे, उनकी यही राजनीति उनको आंदोलन के लिए प्रेरित करती थी।
वास्‍तव में वह पीडि़त शोषित वर्ग का एक चेहरा थे। उनके मन में पीड़ा का कीड़ा हमेशा रेंगता रहता था, उसने उन्‍हें आज तक काटा नहीं था। बस रेंगता रहता था और उसी की सलवलाहट का परिणाम था कि वे नए-नए आंदोलन की रूपरेखा बनाते रहते थे। जब भी किसी को परेशानी हो उनकी ओर रूख कर लो वे आंदोलन की रूपरेखा बना कर दे देते, जिससे समस्‍या का समाधान हो सके। उनके आंदोलनजीवी स्‍वरूप के कारण उन्‍हें हर कहीं पीड़ा और दर्द ही दिखाई देता था। वे हर अच्‍छाई में भी बुराई का विकल्‍प चुन लेते थे। मतलब यह कि उनकों कमी ही दिखाई देती थी। वे 'निंदक नीयरे राखिए आंगन कुटी छबाए। बिनु पानी बिनु साबना निर्मल करे सुभाय।।' दोहे का जीता जागता उदाहरण थे। वे खुद निर्मल नहीं थे, लेकिन उनके विचारों को जानने के बाद हर ओर बस कमी ही कमी दिखाई देती थी। मतलब कहा जाए तो वे अच्‍छे काम में भी इतने प्रभावी तरीके से बुराई ढूंढ लेते थे कि सभी के सामने अच्‍छाई छिप जाती और बुराई ही दिखाई देने लगती थी।
उनकी विशेषता यह थी कि वे खुद कुछ करते नहीं थे, लेकिन जो करवाते थे उससे हर किसी को तकलीफ होने लगती। कई बार सरल समस्‍याओं को भी उन्‍होंने कठिन बना कर हांसिल किया था। खुद के जीवन में भी आंदोलित र‍हते थे, घर में भी उनका आंदोलनजीवी कीड़ा कुलबुलाता रहता था। खाने में, पानी में, हवा में, रहने में, सोने में कहीं भी उन्‍हें संतोष नहीं लगता था। वे आधी रात को उठ जाते थे और सपने में भी कई बार आंदोलन के नारे लगाते हुए पकड़े गए है। इससे उन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ता था लेकिन घर के लोग उनकी इस आदत से परेशान थे। आंदोलन की रूपरेखा वह बनाते थे, आंदोलन खड़ा वे करते थे, लेकिन उसका नतीजा घर वालों को भुगतना पड़ता था। जो उनके आंदोलन से प्रभावित होते थे वह उनके आंदोलन का बदला उनके घर वालों से लिया करते थे।
सभी परेशान थे, लेकिन उनके जीवन का आनंद सिर्फ आंदोलन में था। वे आंदोलन की रूपरेखा बना कर और आंदोलन की सफलता में अपनी खुशियों को तलाश करते थे। खुद को शांति और अहिंसा का बड़ा पुजारी बताते थे, लेकिन उनके आंदोलन की आदत के कारण अंतर्मुखी अशांति प्रिय हो चुके थे। वे इसको नकारते थे। कई बार उनको भी इसका नुकसान हो चुका था, लेकिन दिल है कि मानता नहीं की तर्ज पर फिर किसी भी पीडि़त शोषित के लिए आंदोलन की रूपरेखा बनाने में जुट जाते थे, क्‍योंकि आंदोलन ही उनका जीवन था और आंदोलन के बिना वे जीवित नहीं रह सकते थे। वे मरते-मरते भी उनकी रहस्‍यमयी मौत का आंदोलन खड़ा कर गए थे।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Very nice

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...