(संजय भट्ट)
मंगलवार, 22 नवंबर 2022
आन्दोलन का रेंगता कीड़ा
वो हर बात को लेकर आंदोलित हो जाते थे। उनके मन में आंदोलन के विचारों की श्रंखला चलती रहती थी। वे हमेशा आंदोलन के बारे में सोंचते थे। उन्हें लगता था कि बिना आंदोलन कोई भी कोई भी सफलता नहीं मिल सकती है। हमेशा कोई न कोई आंदोलन की रूपरेखा चलती ही रहती है। वे नए-नए आंदोलनों को ऐसा स्वरूप प्रदान कर देते कि काम की सफलता की गारंटी नजर आने लगती। इसी आंदोलन की आदत के कारण लोग उनको आंदोलनजीवी कहने से नहीं चुकते। उनको भी यह पता था, लेकिन वे इससे घबराए बिना हमेशा ही नए आंदोलन की ओर बढ़ जाते थे। आंदोलन जब चरम पर होता तो वे इससे अपनी दूरी बना लेते और दूसरे आंदोलन में अपनी रूचि दिखाने लगते थे। उनकी रूचि का कोई ठिकाना नहीं था, वे कब क्या कर बैठे किसी को खबर नहीं होती थी। उनके मन में किस आंदोलन को लेकर क्या रूपरेखा बन रही है, कोई नहीं जानता था, लेकिन यकीनन आंदोलन की रूपरेखा उनसे बेहतर कोई नहीं बना सकता था।
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Very nice