बुधवार, 28 दिसंबर 2022

बन्‍द का खुलापन

 संजय भट्ट

उनका अपनी एक दुकान थी, छोटा सा व्‍यापार था। बरसों से धंघा कर रहे थे, लेकिन अब बुढ़ापे में काम धंधा बेटे को सौंप कर थोड़ा फ्री हो गए थे। सामाजिक उत्‍तरदायित्‍वों के निभाने के लिए उन्‍हें इधर-उधर भी जाना पड़ता था। जब तक दुकान वह सम्‍हालते थे तब तक घर-परिवार और नाते रिश्‍तेदारों सहित किसी भी सामाजिक कार्यक्रम की परवाह नहीं की, लेकिन इससे बेटे के विवाह में आई परेशानी के बाद उन्‍हें समझ में आने लगा था कि समाज का अपना म‍हत्‍व है तथा किसी के खुशी और दुख में शामिल होना पड़ता है।
किसी कारण से उनको ऐसे ही सामाजिक कार्यक्रम में भाग लेने के लिए दूर जाना था, लेकिन ऐसे में नगर में बंद का आह्वान किया गया। वे नगर में थे नहीं और बेटे के दुकान सम्‍हालने के बाद यह पहला मौका था जब बंद का आह्वान किया गया था। सुबह दिन की शुरूआत से रात को आंखे बंद होने तक दुकान-दुकान और दुकान से ज्‍यादा उसका कोई व्‍यहार तथा दैनिक दिनचर्या थी नहीं। पैसा हाथ में आतें ही पैसे की ओर दौड़ने सा लगा था। दुकान के अलावा कोई भी काम सुझता नहीं था। बंद का आह्वान और पिताजी के पास  में नहीं होने से निर्णय नहीं ले पा रहा था, उसको कोई उपाय ही नहीं सूझ रहा था कि वह दुकान के अलावा क्‍या करेगा।
दुकान बंद होने से उसके पास कोई काम नहीं होगा और जो आदमी दिनभर काम-काम और काम की तलाश में फुरसत को अपना दुश्‍मान मानता हो उसका दिन कटना मुश्किल था। मजबूरी थी कि दुकान को बंद रखे नहीं तो समाजविरोधी होने के साथ ही दुकान बंद करवाने वालों के क्रोध का भी शिकार होना पड़ता। बेमन से उसने दुकान बंद रखने का निर्णय लिया।
दुकान बंद रखने के निर्णय ले तो लिया था रात में ही, लेकिन सुबह आंख खुली और मन ने धोखा दे दिया। चूंकि दुकान घर एक ही थे, बस दरवाजों का फर्क था। इसलिए दुकान भी खोल दी और थोड़ा-सा व्‍यापार भी कर लिया। आवश्‍यक सामग्री की दुकान थी तो लोगों में भी कुछ भूलने वालों की कमी नहीं थी, सामान कुछ तो घर में कम रहता ही है और फिर बंद का सुन कर उसमें और कमी लगने लगती है। उन भुलक्‍कड़ लोगों ने भी मौका देखा कि सुबह दुकान खुली है तो खरीद लो नहीं तो बंद की चपेट में आने के बाद कुछ नहीं मिलना है।
थोड़ी बहुत ग्राहकी हुई ही थी कि बंद करवाने वाली समिति के सदस्‍य का नित्‍य पूजन के लिए उनकी दुकान की ओर से निकलना हुआ। उन्‍होंने लगभग धमकाने वाले अंदाज में दुकान बंद करने का फरमान सुनाते हुए कहा मंदिर से आऊँ तो दुकान खुली नहीं मिलना चाहिए, नहीं तो ठीक नहीं होगा। सुबह-सुबह का समय था इसलिए किसी को पता भी नहीं चला और थोड़ी कमाई भी हो गई़। उसके मन को संतुष्टि थी कि चलो बंद के बाद भी कुछ तो कमा लिया।
दुकान बंद काम भी भोजन के अलावा कोई बाकी नहीं, अब कुछ समय टीवी के सामने बैठ कर समाचार, मनोरंजन और कई सारे चैनल बदल कर देख लिए, लेकिन मन नहीं लग रहा और निठल्‍ला बैठना उसे ठीक भी नहीं लग रहा था। लेकिन थोड़ी देर में माइक पर तेज आवाजों में जिन्‍दाबाद मुर्दाबाद के नारे लगाना शुरू हो गए। वह जिज्ञासावश ही सही लेकिन घर से बाहर आ गया। उसे बंद वालों ने जुलूस में अपने साथ घसीट लिया। नगर भ्रमण के बाद अधिकारी को ज्ञापन दे दिया और मामला शांत हो गया। वह घर में जा रहा था कि पीछे से किसी ने उसके नाम की आवाज लगाई। पुराने दोस्‍तों की टीम हाजिर थी। सभी ने उसको अपने साथ लिया और निकल गए।
बंद से दूर मौज मस्‍ती, डीजे पर बजते गाने और लगभग उत्‍सवी माहौल किसी के फॉर्म हाउस पर। यहां सिर्फ इंजायमेंट हो रहा है, अपने कुछ पुराने दोस्‍तों के साथ ही कुछ नए लोगों से भी संपर्क हुआ और बंद करवाने वाली समिति के कई लोग भी नगर में बंद करवा कर इस खुलेपन का आनन्‍द ले रहे थे। उधर नगर में रोज कमाकर रोज खाने वाले लोग आवश्‍यक सामान के लिए और भटक रहे थे और ये बंद के खुलेपन का आनन्‍द ले रहे थे।
                  

सोमवार, 19 दिसंबर 2022

चस्‍का सोशल मीडिया का

 संजय भट्ट 
वे अपनी छोटी सी दुकान के कारोबार में व्‍यस्‍त थे, लेकिन अचानक स्‍मार्ट फोन हाथ में आते ही उनका मिजाज बदल गया। मोबाइल से उनका ऐसा जुड़ाव हुआ कि वे सारी दुनियादारी भूल कर मोबाइल के दीवाने हो गए। उनकी दिवागनी भी इस हद तक जा पहुँची कि उसके आगे सब बेकार लगने लगा। उन्‍हें प्रसिद्धि का शौक था, पहचान बनाने में वे माहिर थे, लेकिन उनको अब अपने लाइक और कमेन्‍ट की कमी का दुख और ज्‍यादा होने पर अत्‍यधिक खुशी होने लगी। उनकी दिवानगी का आलम यह था कि अपनी दुकान पर आने वाले हर ग्राहक को अपनी पोस्‍ट दिखाते और लाइक, कमेन्‍ट का इंतजार करते। कर्ह बार तो वे अपने सामने ही लाइक और कमेन्‍ट करवाने लगे थे। हर किसी को अपने सोशल मीडिया एकाउंट की जानकारी देते और लोगों को उससे जुड़ने का आग्रह करते। हर किसी को उनके इस स्‍वभाव से कोफ्त होने लगी थी, लेकिन मजबूरी थी उनके पास सामान लेने जाने की। इसी सोशल मीडिया एकाउंट के बल पर उन्‍होंने दूर-दूर तक अपनी पहचान का विस्‍तार कर लिया था। वे अपनी पोस्‍ट के लिए लड़ाई भी  कर लेते थे और कई लोगों को उन्‍होंने इसी से अपना मुरीद भी बना लिया था। जैसे ही कोई विचार या कोई विडियो उनके पास आता वे तुरंत उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने के लिए उतावले हो उठते थे।
दर असल उनको खुद कुछ भी नहीं आता था, लेकिन अपनी जान-पहचान वालों से उस विडियो या पोस्‍ट के लिए भूमिका जरूर लिखवा लेते थे। उनको किसी से कोई मतलब नहीं था, कोई क्‍या कर रहा है, कहां व्‍यस्‍त है, किसके साथ है कोई लेना देना नहीं उनको मतलब था तो अपनी सोशल मीडिया पोस्‍ट के लिए भूमिका लिखवाने का। कई बार वे अन्‍य किसी मैसेज के माध्‍यम से विडियो भेज कर उसकी भूमिका बनाने को कहते तो कई बार फोन कर आग्रह करते कि भूमिका बना दी जाए। कौन सी पोस्‍ट कैसी है, इसका क्‍या प्रभाव होगा, कैसा लगेगा इससे बेखबर बस उन्‍हें अपनी पोस्‍ट करना अच्‍छा लगता था।
कुछ ऐसे समझदार भी थे, जो उनकी पोस्‍ट के लिए भूमिका बना देते थे। बस हो गई उनकी बल्‍ले-बल्‍ले वे भूमिका पाकर इतने खुश हो जाते थे कि तत्‍काल पोस्‍ट बना कर अपलोड कर देते। किसी का जन्‍मदिन हो, मृत्‍यु हो गई हो, कोई उपलब्धि हांसिल की हो वे तपाक से बधाई और शोक संदेश भेज देते थे। बदले में अपनी पोस्‍ट के लाइक कमेन्‍ट और किसने देखा नहीं देखा इस बात की भी गिनती बखुबी करते थे। किसी ने देख लिया और याद नहीं रहे तो वे मिलने पर उसके बारे में चर्चा जरूर करते थे। कुल मिला कर स्‍मार्ट और उनका सोशल मिडिया एकाउंट उनके लिए सबसे बड़ी पूंजी हो गया था।
मंदी के कारण ग्राहकों की इतनी आवाजाही तो होती नहीं थी, अब उनकी व्‍यस्‍तता में कमी आने से सोशल मीडिया फ्रेण्‍डली ज्‍यादा हो गए थे। दिन में एक जैसी 10 से ज्‍यादा पोस्‍ट अलग-अलग ग्रुप में करते और सभी के सामने डंका पीटते कि उनकी पोस्‍ट ग्रुपों में सबसे ज्‍यादा होती है। अपने आप को आगे रखने की होड़ सी उनके भीतर शुरू से थी। उन्‍होंने काफी गरीबी में जीवन की शुरूआत की और खुद अपने बूते उन्‍होंने इज्‍जत और दौलत दोनों कमाई थी। बस यही कारण था कि उनकी संग्रह करने की आदत सी थी। किसी सोशल मीडिया पर उनको अंक मिलने लग गए। फिर क्‍या था, दिवानगी पागलपन की हद तक पहुँच गई। बस ज्‍यादा से ज्‍याद अंक हांसिल करना उनका शगल सा हो गया था। आभासी अंक उन्‍हें उनकी बढ़ती इज्‍जत और कभी कभी तो दौलत का भी एहसास करवाने लगी।
वे इस आभासी अंकों के जीवन में इतना खो गए कि इसके आगे उनको कुछ दिखता ही नहीं था। बस पोस्‍ट, लाइक और कमेन्‍ट उनकी जिन्‍दगी बन कर रह गए। शौक से शुरू हुआ यह आभासी जीवन अब पागलपन की सीमाओं को लांघ कर आगे जाने लगा। रात दिन, सोते जागते उनको लाइक, कमेन्‍ट और पोस्‍ट ही दिखाई देने लगी। बच्‍चे बड़े हो गए थे, तो व्‍यापार संभाल लिया था, उसकी इतनी चिन्‍ता नहीं थी, लेकिन लाइक, कमेन्‍ट और पोस्‍ट से मिले अंकों की पूंजी को वे लगातार बढ़ाना चाहते थे। कई बार तो इस आभासी अंको के सम्‍मान को भी अपने स्‍टेटस पर लगा कर लोगों को दिखाते कि उनके इतने अंक हो गए हैं। मुंशी प्रेंमचंद ने कहा कि बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है, उनके साथ भी वही घट रहा था।
वे सोशल मीडिया के आभासी जीवन में मानसिक रूप से थोड़े विकृत हो चुके थे, लेकिन किसी मानसिक रोगी को कब लगता है कि वह मानसिक रूप से विकृत हो चुका है। उसे तो बस उसकी दुनिया ही सबसे बेहतर और बाकी दुनिया अलग लगती है। कोई भी नशेड़ी अपना नशा आसानी से नहीं छोड़ता इसी तरह वे भी सोशल मीडिया के नशे के आदी हो चुके थे, लेकिन उनको इसका एहसास तक नहीं था। वे तो उनकी तरह के उन हजारो लाखों को देखते थे, जो दिन रात सोशल मीडिया के आभासी जीवन को अपना असली जीवन मान बैठे हैं।
                            

सोमवार, 5 दिसंबर 2022

वादा तेरा वादा

                                (संजय भट्ट)

वादों का मौसम कभी खत्‍म नहीं होता है। कभी भी किसी से वादा कर सकते हैं। वादों का क्‍या है कभी भी टूट जाते हैं। सपने ही तो दिखाना है और फिर सपने भी किसी के साकार हुए है। रात गई बात गई की तरह होते हैं। वादों का मौसम आता है,खूब वादे होते हैं, खूब सारे सपने दिखाए जाते हैं और मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं की तरह वादों को भूलना होता है। कभी कोई याद भी दिला दे तो उसे मजाक में उड़ा दिया जाता है।
वे इसी तरह के सपने दिखाने और वादों के लिए मशहूर थे। उनका काम ही सपनों के सौदागर बन कर वादे करना और काम निकल जाने पर अगले और चार वादे गिनाने की आदत सी हो गई थी। हर बार लोग उनके वादों के झांसे में आ जाते थे और वह अपना काम निकाल कर चल देते थे। लोग उनके वादों में दिखाए सपनों में इस कदर खो जाते थे कि सावन के अंधे की तरह हर तरफ सिर्फ हरा ही हरा दिखाई देता था। जब वे वादा करते थे तो इतने कान्फिडेन्‍स के साथ बात को रखते थे कि लोगों को लगता बस यही हकीकत है। वे वादों में सपनों के साथ खौफ भी परोस देते थे ताकि लोगों को उन पर भरोसा न चाहते हुए भी हो जाता था। कभी लाखों का सपना दिखाते तो कभी सुहाने दिनों की याद दिला देते थे। लोगों को लगने लगा था कि वे ही उनके तारणहार होंगे।
इस दुनिया में कौन ऐसा होगा जिसको परेशानी नहीं होगी, हर आदमी किसी न किसी परेशानी से रूबरू हो रहा होता है। किसी को जरूरत की परेशानी है तो किसी को जो उसके पास है उसे सम्‍हालने की परेशानी हर तरफ परेशानी ही परेशानी और ऐसे में कोई उस परेशानी की दुखती नस को दबा कर कह भर दे कि उसकी परेशानी का हल जानता है और उसका काम हो जाएगा तो वह उसकी परेशानी का भी हल कर देगा। बस यही तकनीक होती है। सपनों में उलझा कर अपने काम को निकलवाने की। आम आदमी बेचारा क्‍या जाने कि किसी के मन में क्‍या है। वह भोला सा निरीह ठगा प्राणी कहीं भी ठगाने को मजबूर होता है। उसे पता होता है कि सब उसे ठगने के लिए ही दिखावा हो रहा है, फिर भी वह खुद को ठग लेने के लिए समर्पित कर देता है। उसे उस ठगोरे में अपने सुहाने दिनों की छवि और भय मिश्रित आनंद की अनुभूति होती रहती है। इसी खुशी के मारे वह हर बार ठगाने को आमादा रहता है। उसे लाख कोई समझाए कि वह तुम्‍हें ठग रहा है, लेकिन वह ठगाने को अपना धर्म समझता है और ठगाकर घर आ जाता है।
जब सपनों की दुनिया से हकीकत में आता है तो उसे पता चलता है कि जो पानी का समन्‍दर उसने देखा था वह तपती रेत में बदल गया है। उसके हाथों में वही सुबह का टिफिन और काम जाने की तत्‍परता के साथ बीबी बच्‍चों के खाली पेट और खुद की खाली जेब दिखाई देने लगती है। जैसे ही नींद से जागता है उसे एहसास हो जाता है कि वह ठगा गया है, लेकिन जब चिडि़या खेत चुग रही होती है तो उसे पता भी नहीं चलता कि उसके खेत का एक भी दाना उसे नहीं मिलेगा। ठगोरा उसकी कमाई पर अपना ऐश कर होता है वह पछताया हुआ सा अपना काम धंधा देख रहा होता है। ठगोरों की दुनिया बहुत ही खुबसूरत होती है, वह किसी जादूगर की भांति अपनी चकाचौध से ऐसे कारनामें प्रस्‍तुत करता है कि बेचारे को ठगाने में आत्‍मसमर्पण करने के अलावा कुछ नहीं दिखता है।
किसी फिल्‍म वाले ने तो बकायदा अपनी फिल्‍म में गाना रख कर समझाने की कोशिश भी कि थी कि और कहा था कि 'वादा तेरा वादा वादे पे तेरे मारा गया बंदा ये सीधा सादा।' लेकिन फिर भी वादों का सब्‍जबाग इतना सुन्‍दर होता है कि मृग मरीचिका की जैसा चारों रेत का संसार भी पानी से लहराता समुद्र दिखाई देने लगता है। अब अंधा क्‍या मांगे एक आंख से दिखने की घोषणा ही उसको अंधे से काणा बनाने के लिए काफी होती है। प्‍यासे को पानी की चार बूंदे भी संसार में बारिश का एहसास करवा देती है। यही हालत ठगोरों की होती है, वे प्‍यासे को चार पानी के छींटे मार कर उसे बारिश में नहाने का एहसास करवा देते हैं और अपना काम निकलवा लेते हैं।
ठगने वालों का बकायदा समूह होता है और सारा समूह इतना एकजूट होकर काम करता है कि कोई भी ठगोरा उस समूह से बाहर दिखाई नहीं देता है। हर किसी का उद्देश्‍य बस इतना होता है कि वह ठगने में कितना सफल होता है। जो सफल हो जाता है वह फिर अपने वादे को भूलने का प्रयास करता है और जो असफल होता है वह दूसरे के किए वादों की याद दिला कर उस ठगे हुए आदमी के जख्‍मों को तब तक हरा करता रहता है, जब तक कि उसे ठगने में सफलता नहीं मिल जाती। वैसे ठगने के मौसम व स्‍थान बदलते रहते हैं और यह समय के इंतजार में र‍हते हैं। इन ठगे हुए व्‍यक्तियों की हालत उस तोते की तरह होती है, जिसे सिखाया और रटाया जाता है कि'शिकारी जंगल में आता है, जाल फैलाता है, उसके जाल में नहीं फंसना है' लेकिन फिर भी वह जाल में फंस कर भी यही रटता र‍हता है।

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...