संजय भट्ट
बुधवार, 28 दिसंबर 2022
बन्द का खुलापन
उनका अपनी एक दुकान थी, छोटा सा व्यापार था। बरसों से धंघा कर रहे थे, लेकिन अब बुढ़ापे में काम धंधा बेटे को सौंप कर थोड़ा फ्री हो गए थे। सामाजिक उत्तरदायित्वों के निभाने के लिए उन्हें इधर-उधर भी जाना पड़ता था। जब तक दुकान वह सम्हालते थे तब तक घर-परिवार और नाते रिश्तेदारों सहित किसी भी सामाजिक कार्यक्रम की परवाह नहीं की, लेकिन इससे बेटे के विवाह में आई परेशानी के बाद उन्हें समझ में आने लगा था कि समाज का अपना महत्व है तथा किसी के खुशी और दुख में शामिल होना पड़ता है।
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Very nice