सोमवार, 19 दिसंबर 2022

चस्‍का सोशल मीडिया का

 संजय भट्ट 
वे अपनी छोटी सी दुकान के कारोबार में व्‍यस्‍त थे, लेकिन अचानक स्‍मार्ट फोन हाथ में आते ही उनका मिजाज बदल गया। मोबाइल से उनका ऐसा जुड़ाव हुआ कि वे सारी दुनियादारी भूल कर मोबाइल के दीवाने हो गए। उनकी दिवागनी भी इस हद तक जा पहुँची कि उसके आगे सब बेकार लगने लगा। उन्‍हें प्रसिद्धि का शौक था, पहचान बनाने में वे माहिर थे, लेकिन उनको अब अपने लाइक और कमेन्‍ट की कमी का दुख और ज्‍यादा होने पर अत्‍यधिक खुशी होने लगी। उनकी दिवानगी का आलम यह था कि अपनी दुकान पर आने वाले हर ग्राहक को अपनी पोस्‍ट दिखाते और लाइक, कमेन्‍ट का इंतजार करते। कर्ह बार तो वे अपने सामने ही लाइक और कमेन्‍ट करवाने लगे थे। हर किसी को अपने सोशल मीडिया एकाउंट की जानकारी देते और लोगों को उससे जुड़ने का आग्रह करते। हर किसी को उनके इस स्‍वभाव से कोफ्त होने लगी थी, लेकिन मजबूरी थी उनके पास सामान लेने जाने की। इसी सोशल मीडिया एकाउंट के बल पर उन्‍होंने दूर-दूर तक अपनी पहचान का विस्‍तार कर लिया था। वे अपनी पोस्‍ट के लिए लड़ाई भी  कर लेते थे और कई लोगों को उन्‍होंने इसी से अपना मुरीद भी बना लिया था। जैसे ही कोई विचार या कोई विडियो उनके पास आता वे तुरंत उसे सोशल मीडिया पर अपलोड करने के लिए उतावले हो उठते थे।
दर असल उनको खुद कुछ भी नहीं आता था, लेकिन अपनी जान-पहचान वालों से उस विडियो या पोस्‍ट के लिए भूमिका जरूर लिखवा लेते थे। उनको किसी से कोई मतलब नहीं था, कोई क्‍या कर रहा है, कहां व्‍यस्‍त है, किसके साथ है कोई लेना देना नहीं उनको मतलब था तो अपनी सोशल मीडिया पोस्‍ट के लिए भूमिका लिखवाने का। कई बार वे अन्‍य किसी मैसेज के माध्‍यम से विडियो भेज कर उसकी भूमिका बनाने को कहते तो कई बार फोन कर आग्रह करते कि भूमिका बना दी जाए। कौन सी पोस्‍ट कैसी है, इसका क्‍या प्रभाव होगा, कैसा लगेगा इससे बेखबर बस उन्‍हें अपनी पोस्‍ट करना अच्‍छा लगता था।
कुछ ऐसे समझदार भी थे, जो उनकी पोस्‍ट के लिए भूमिका बना देते थे। बस हो गई उनकी बल्‍ले-बल्‍ले वे भूमिका पाकर इतने खुश हो जाते थे कि तत्‍काल पोस्‍ट बना कर अपलोड कर देते। किसी का जन्‍मदिन हो, मृत्‍यु हो गई हो, कोई उपलब्धि हांसिल की हो वे तपाक से बधाई और शोक संदेश भेज देते थे। बदले में अपनी पोस्‍ट के लाइक कमेन्‍ट और किसने देखा नहीं देखा इस बात की भी गिनती बखुबी करते थे। किसी ने देख लिया और याद नहीं रहे तो वे मिलने पर उसके बारे में चर्चा जरूर करते थे। कुल मिला कर स्‍मार्ट और उनका सोशल मिडिया एकाउंट उनके लिए सबसे बड़ी पूंजी हो गया था।
मंदी के कारण ग्राहकों की इतनी आवाजाही तो होती नहीं थी, अब उनकी व्‍यस्‍तता में कमी आने से सोशल मीडिया फ्रेण्‍डली ज्‍यादा हो गए थे। दिन में एक जैसी 10 से ज्‍यादा पोस्‍ट अलग-अलग ग्रुप में करते और सभी के सामने डंका पीटते कि उनकी पोस्‍ट ग्रुपों में सबसे ज्‍यादा होती है। अपने आप को आगे रखने की होड़ सी उनके भीतर शुरू से थी। उन्‍होंने काफी गरीबी में जीवन की शुरूआत की और खुद अपने बूते उन्‍होंने इज्‍जत और दौलत दोनों कमाई थी। बस यही कारण था कि उनकी संग्रह करने की आदत सी थी। किसी सोशल मीडिया पर उनको अंक मिलने लग गए। फिर क्‍या था, दिवानगी पागलपन की हद तक पहुँच गई। बस ज्‍यादा से ज्‍याद अंक हांसिल करना उनका शगल सा हो गया था। आभासी अंक उन्‍हें उनकी बढ़ती इज्‍जत और कभी कभी तो दौलत का भी एहसास करवाने लगी।
वे इस आभासी अंकों के जीवन में इतना खो गए कि इसके आगे उनको कुछ दिखता ही नहीं था। बस पोस्‍ट, लाइक और कमेन्‍ट उनकी जिन्‍दगी बन कर रह गए। शौक से शुरू हुआ यह आभासी जीवन अब पागलपन की सीमाओं को लांघ कर आगे जाने लगा। रात दिन, सोते जागते उनको लाइक, कमेन्‍ट और पोस्‍ट ही दिखाई देने लगी। बच्‍चे बड़े हो गए थे, तो व्‍यापार संभाल लिया था, उसकी इतनी चिन्‍ता नहीं थी, लेकिन लाइक, कमेन्‍ट और पोस्‍ट से मिले अंकों की पूंजी को वे लगातार बढ़ाना चाहते थे। कई बार तो इस आभासी अंको के सम्‍मान को भी अपने स्‍टेटस पर लगा कर लोगों को दिखाते कि उनके इतने अंक हो गए हैं। मुंशी प्रेंमचंद ने कहा कि बुढ़ापा बहुधा बचपन का पुनरागमन होता है, उनके साथ भी वही घट रहा था।
वे सोशल मीडिया के आभासी जीवन में मानसिक रूप से थोड़े विकृत हो चुके थे, लेकिन किसी मानसिक रोगी को कब लगता है कि वह मानसिक रूप से विकृत हो चुका है। उसे तो बस उसकी दुनिया ही सबसे बेहतर और बाकी दुनिया अलग लगती है। कोई भी नशेड़ी अपना नशा आसानी से नहीं छोड़ता इसी तरह वे भी सोशल मीडिया के नशे के आदी हो चुके थे, लेकिन उनको इसका एहसास तक नहीं था। वे तो उनकी तरह के उन हजारो लाखों को देखते थे, जो दिन रात सोशल मीडिया के आभासी जीवन को अपना असली जीवन मान बैठे हैं।
                            

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Very nice

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