मंगलवार, 31 जनवरी 2023

आर्टिफिशल जिन्दगी

    -संजय भट्ट

जमाना लगातार बदल रहा है। सामाजिक, आर्थिक, राजनीतिक और व्‍यवहारिक हर तरीके से बदलाव देखा जा रहा है। इस बदलाव के दौर में कुछ भी ऑरिजनल नहीं रहा। सब कुछ आर्टिफिशल होता जा रहा है। महिलाओं को गहनों से बहुत लगाव होता है, लेकिन यहां भी सोने-चांदी की जगह आर्टिफिशल ऑर्नामेन्‍ट ने अपना जो स्‍थान बनाया है वह ऑरिजनल को कहीं पीछे छोड़ देता है। धीरे-धीरे ही सही लेकिन सब कुछ आर्टिफिशल होता जा रहा है। समाज में रिश्‍ते भी होते थे, लेकिन मनचाहे जीवन साथी की तलाश में मॉ-बाप को छोड़ कर कोई रिश्‍ता ऑरिजनल नहीं रहा, जिसे निभाया जा रहा हो। सारे रिश्‍तों में गहनों की तरह ही आर्टिफिशल का महत्‍व बढ़ गया है। समाज भी आर्टिफिशल की ओर इतना आकर्षित है कि ऑरिजनलिटी लुप्‍त ही होती जा रही है। अब तो प्‍यार की प्‍यास में अपने महत्‍व को प्रतिपादित करने के लिए माता-पिता का रिश्‍ता भी अपनी मौलिकता से बाहर आ गया है। दिखावे के प्रचलन ने सारी मौलिकता समाप्‍त कर आर्टिफिशल को स्‍थान देना शुरू कर दिया है। हजारों किलोमीटर की दूरी पर बैठा फेसबुक मित्र घर परिवार के ऑरिनल रिश्‍ते से ऊपर हो गया है।
समाज बदलता है तो वह निश्चित ही विकास के पथ पर आगे बढ़ता है। क्‍योंकि कहा भी गया है, परिवर्तन सदैव जीवन को प्रेरणा देता है, लेकिन यह कैसा बदलाव हो रहा है। हर कोई बदल रहा है। जमाना भी इस बदलाव को कंप्‍युटर में इंटरनेट की गति से स्‍वीकार करता जा रहा है। सब कुछ बदलाव की बयार में ऐसे बहते जा रहे हैं, जैसे आंधी-तुफान के साथ सूखे पत्‍तों का कांरवा हो। अब कारवां सूखे पत्‍तों का है तो उनमे निश्चित ही हल्‍कापन होगा। उनका पानी भी उतर चुका होगा। इस उतरे हुए पानी के साथ एकदम खुलापन और चकाचौंध से अंधियाई युवा पीढ़ी किसी को कुछ समझने को तैयार नहीं है।
परिवार में रहते हैं, खाते हैं, पीते हैं, घर में सोते हैं, लेकिन घर का उपयोग मकान या धर्मशाला की तरह ही करते हैं। जहां सब सुविधा तो है, लेकिन कोई अपना नहीं। सब एक दूसरे से ऊपर दिखाने की कोशिश में समन्‍वय की व्‍यवस्‍था से बाहर आ चुके हैं। पिता किसी जमाने में प्रेरणास्रोत और आइडियल हुआ करते थे, लेकिन आज पिता एक ऐसा निरीह प्राणी है, जिसका घर में सिर्फ इसलिए महत्‍व है कि वह कमाता है और अपनों बच्‍चों का पालन-पोषण का कर्तव्‍य निर्वाह करता है। बच्‍चे इसे अपना अधिकार समझते हैं और पिता को एक एटीएम की तरह यूज करते हैं। जब पिता की यह स्थिति है तो बाकी रिश्‍ते तो स्‍वत: ही आर्टिफिशल हो जाएंगे।
अब सारा समाज यूज एण्‍ड थ्रो के सिद्धान्‍त पर काम करता है। थाली कटोरी गिलास की जगह जैसे पत्‍तल, दौने और डिस्‍पोजल ने ले ली है, उसी तरह सारी भावनाएं और व्‍यवहार हो गए हैं। जब तक काम है, वह व्‍यक्ति काम का है, लेकिन जैसे ही काम निकला उसे पहचानते तक नहीं। एहसान नाम की भावना का विलोप हो गया है। फेसबुक, वाट्सएप तथा इंस्‍टाग्राम जैसे सोशल मीडिया के तंत्र पर परिवार के लोगों को ब्‍लॉक कर दूर देशों में बैठे अनजान लोगों से अपनापन बढ़ाने का प्रचलन चल गया है। वो दूर बैठा अनजान शख्‍स हमारी हर हरकत पर तारीफों के पूल बांधता है और हम खुशी से फुले नहीं समाते हैं। पत्‍नी और मॉ के हाथों का स्‍वाद खाने पर पता चलता है, लेकिन फोटो में सजी थाली पर बिना चखे ही सैकड़ों लाइक और डिलिशियस के कमेन्‍ट देख कर खुश होने की परंपरा सी चल पड़ी है।
यही सब समाज में होते देख कंप्‍युटर की दुनिया में भी नया प्रयोग आ गया है। लगातार बदलते समाज और ढब्‍बूपन को कंप्‍युटर ने परख लिया है। अब हमारे मन की बात को भी समझा जाने लगा है। जैसे ही सर्च इंजन में कुछ एक बार सर्च करो वह बार-बार हमारे सामने आने लगता है। कंप्‍युटर और सर्च इंजन को पता करते देर नहीं लगती कि हमारी मंशा क्‍या है। लिखने पढ़ने से कतराने वाले लोगों के लिए यह वरदान माना जा रहा है। एक शब्‍द लिखो और आगे का पुरा मजमुन हमारे सामने आने लगता है। हमारी बुद्धि तक को इस निर्भरता ने समझ लिया है। पहले व्‍यक्ति इं‍टलिजेंट हुआ करते थे, विद्यार्थियों को इसका तमगा उनके शिक्षक देते थे, लेकिन आजकल यह भी आर्टिफिशल हो गया है। इसे आर्टिफिशल इंटलिजेंस का नाम दिया गया है। डर है कहीं आर्टिफिशल जमाने में यह हमारी बुद्धि को ही आर्टिफिशल नहीं बना दे, नहीं तो जमाने में कौन कितना बुद्धिमान है, इसका पता ही नहीं चलेगा।

           

गुरुवार, 19 जनवरी 2023

क्रिकेट में धोती की एंट्री

 क्रिकेट यूँ तो अंग्रेजों का खेल है, लेकिन हमारे यहां भी गली-गली में छा गया है। गलियों का बादशाह बनने के बाद भी यह खेल अपनी अंग्रेजियत को नहीं छोड़ पा रहा था। इसको लेकर फिल्‍मों में भी जिक्र किया गया, लेकिन अब इसे धरातल पर उतार दिया गया है। इस खेल का धोती कुर्तें में भारतीय सं‍स्‍कृति का नया वर्जन सामने आया है। इस खेल में गेंद बनाने के लिए यूँ तो पहले कठोर चमड़े और कॉक जैसे पदार्थो का उपयोग किया जाता रहा है, लेकिन जब से यह खेल गली मोहल्‍लों की शान बना है, इसमें भी संशोधन हो गया है। अब कठोर गेंद का स्‍थान एक और विदेशी खेल टेनिस का समावेश करते हुए गेंद का रूपांतर कर दिया गया है। खास बात यह है कि पहले गेंद को मारने के लिए हाथों में जोर और मन में भी बॉल जितनी कठोरता का जोश होना जरूरी था। इतने पर भी चौकों-छक्‍कों की बरसात नहीं होती थी और यह बहुत ही तामझाम वाला खेल हो गया था। कई तरीके के साधनों की जरूरत होती थी, मुँह को, हाथ को, पैर को और अन्‍य नाजुक स्‍थानों को बचाने के लिए विभिन्‍न प्रकार के महंगे उपकरणों के साथ यह खेल अंग्रेजियत का ही परिचारक रहा है।
हम ठहरे भारतीय और भारत की आत्‍मा तो गांवों में बसती है। ग्रामीण स्‍तर पर ही हमारी संस्‍कृति बची हुई भी है, नहीं तो शहरों में अंग्रेजी स्‍कूलों और अंग्रेजी में पहचान बनाने के लिए अंग्रेजियत के रंग में रंगते जा रहे हैं। हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में भी प्रतिभाओं की कमी तो है नहीं उनमें भी चस्‍का तो रहता ही है। फिर काम्‍पीटिशन की भावना भी हमारे बीच कूट-कूट कर भरी होती है। किसी के मुकाबले कम समझने की बिल्‍कुल आदत नहीं है और कम समझे भी क्‍यों, जो वो कर रहे हैं, हम क्‍यों नहीं कर सकते आखिरकार वे भी तो हमारी तरह हाड़ मास के पूतले ही है। ये दिगर बात है कि उनके पास पैसा और सुविधा हम से ज्‍यादा है। मुकाबला करना और अपने शौक को जिन्‍दा रखते हुए उसे अपने तरीके से जीना हमारे खून में रच-बस गया है। हम सब कुछ कर सकते हैं, लेकिन अपने खून और स्‍वभाव से गद्दारी नहीं कर सकते।
हमने पहले दो अंग्रेजी खेलों को मिला कर अपना नया क्रिकेट शुरू कर दिया। इसमें मौज मस्‍ती और उसी उल्‍लास के साथ चौकों-छक्‍कों की बरसात ने जीवन में नया आनन्‍द ला दिया। नया करना भी कोई हमसे सीखे। अब शौक भी था, क्रिकेट भी था और खेलने के लिए सुविधाओं अभाव में तामझाम कम करने का जुनून भी था। हमने गेंद बदल दी, बल्‍ले की जगह कपड़ों को कूटने वाले धौने के दे दी, विकेट के लिए स्‍टम्‍प का स्‍थान पेड़ों की लकडि़यों को दे दिया। इतना सब करने के बाद भी लग रहा था, खेल तो विदेशी ही है। इसको देसी कैसे बनाया जाए। हमारी भाषा और संस्‍कृति से कैसे जोड़ा जाए बस यही जोश और जुनून बढ़ता गया।
कुछ दिनों पहले हिन्‍दी भाषा में डॉक्‍टर बनने लगे तो हमारे दिमाग की बत्‍ती जल उठी। कॉमेन्‍ट्री को अपनी भाषा और वह भी प्राचीन भाषा संस्‍कृ‍त में कर संस्‍कृति को बचाने का प्रयास होने लगा। हमने सोंचा पेन्‍ट, शर्ट और अन्‍य तामझाम को भी दूर क्‍यों नहीं किया जा सकता है। ठेठ हमारी संस्‍कृति से जोड़कर हमने इसको नया स्‍वरूप दे दिया। हमारी ग्रामीण संस्‍कृति में धोती-कुर्ता हमारी पहचान है, फिर कुछ ज्‍यादा तामझाम और सामान की जरूरत भी नहीं हमने धोती कुर्ते में क्रिकेट का खेल शुरू कर दिया। जब सब कुछ बदल सकता है तो धोती कुर्ते में क्रिकेट क्‍यों नहीं खेला जा सकता है। कॉपी पेस्‍ट के जमाने में इसे अपना लिया गया तो डर है घायल खिलाडि़यों की संख्‍या को देखते हुए इसमें ग्‍यारह की जगह बाईस खि‍लाडि़यों को लेकर जाना पड़ेगा, क्‍योंकि ग्रामीण प्रतिभाओं की तरफ तो कोई झांकता नहीं और बिना तामझाम के दूसरे लोग इसे खेल नहीं पाऐंगे। जब दूसरे नहीं खेल पाऐंगे तो राष्‍ट्रीय और विश्‍व विजेता हम ही होंगे। वैसे भी हमने आज तक जो भी किया है, उसकी पहचान दुनियाभर में हुई है।  
                                         - संजय भट्ट

रविवार, 15 जनवरी 2023

पराई थाली में झलकता घी

 

   (संजय भट्ट)
 

जब भी  देखो पराई थाली में घी ज्‍यादा ही दिखाई देता है। अपनी अपनी खिचड़ी सब को सूखी ही दिखती है। अब ये काई छोटी मोटी समस्‍या नहीं है। इससे हर आदमी दुखी है। घर में परिवार में यहां तक की खाने की एक टेबल पर पति पत्‍नी भी। क्‍या करें अब दिखाई देता है तो न‍जरिया बदल लो, लेकिन यह स्‍वाभविक प्रकिया है, इसमें सुधार का मतलब भगवान की कृति पर संदेह करना।  जो भी बनाया भगवान ने ही ऐसा बनाया, अब किसी कंपनी डिफेक्‍ट का क्‍या सुधार जो वहीं से खराबी आई है उसको रिप्‍लेस ही किया जा सकता है। चूंकि मानव भगवान की कृति है और नो वारंटी, नो गारंटी, जैसा है रखना पड़ेगा और एक बार भेजे गए आइटम में वापसी की कोई शर्त शामिल ही नहीं होती है। उसमें जो है, वह मुझमें क्‍यों नहीं, क्‍या मैं नहीं कर सकता, मुझे चैलेन्‍ज मत करना ऐसी भावनाएं सभी के अंतर मन में कभी न कभी उद्वेलित होती है।  बस सब भावनाओं का खेल ही तो है। कुछ समझदार इस खेल के माहिर होते हैं, कब, कैसे और किसके साथ खेलना है, कैसे जीतना और किसको जितवाना है, सब गणित बैठा कर खेल की शुरूआत कर देते हैं। खासियत यह कि यह खेल खुद नहीं खेलते बल्कि इनकी तरफ से इनके खिलाड़ी खेलते हैं, खिलाड़ी क्‍या मोहरा कहो, जो शह और मात को समझे बिना मैदान में उतर जाते हैं और फिर नतीजा जो भी हो, इसकी परवाह नहीं करते।
पराई थाली हो या पराया कोई भी अपनो से इतर कोई पसन्‍द भी नहीं आता है। अपना तो अपना होता है और परया, परया होता है। इन परायों से कैसी सहानुभूति जब ये अपनो से सहानुभूति नहीं रखते तो इनसे हम सहानुभूति क्‍यों रखे। क्‍या मिलेगा इस सहानुभूति से हमें। एसे ही सवालों से घिरे हुए वो घर लौट रहे थे, कहीं से एक पत्‍थर आकर उनको लग गया। अब पत्‍थर लगा तो चोंट आना स्‍वाभाविक ही थी। उनको शारीरिक चोंट तो लगी थी, मानसिक रूप से चोंटग्रस्‍त हो गए थे। उन्‍हें लगा उन्‍होंने जिन्‍दगी में किसी का नुकसान नहीं किया, किसी की भलाई-बुराई में नहीं रहते। सीधा ऑफिस से घर और घर से ऑफिस ही आना जाना था। न किसी से राम-राम और न हीं किसी से दुआ सलाम की दरकार रखते थे। उनको शारीरिक चोंट का दर्द कम और मानसिक चोंट का दर्द अधिक सता रहा था। बुझा हुआ सा चेहरा लेकर घर पहॅुचे तो पत्‍नी ने पूछा- क्‍या हुआ, कहां से पीट कर आ रहे हो। दरअसल पीटने पर एकाधिकार उनकी पत्‍नी का ही था, सो लगा किसने उनके अधिकार पर हमला कर दिया। इसी सोंच विचार न जाने कब बच्‍चों को पता चल गया कि पापा को किसी ने पत्‍थर मार दिया है। बस बच्‍चे तो थे ही, निकल पड़े पत्‍थरबाज की तलाश में आखिर उनके पिता की अस्मिता और माता के एकाधिकार का मामला था। फिर किसी पराए ने ही मारा है तो सबक सिखाने की धून सवार हो गई।
पापा से सभी की पूछताछ चल रही थी। सवालों का बवाल सा मचा हुआ था, पत्‍नी, बच्‍चे और बच्‍चों के दोस्‍त सभी के सवालों-सवाल चल रहे थे। कहां से गुजर रहे थे, आपके आगे-पीछे कौन चल रहा था। क्‍या पहना था, कैसा दिख रहा था। उसके हाथ में क्‍या था, आपको किसने बचाया, आप को और तो कहीं चोंट नहीं आई। सवालों से घिरे वे हमेशा की तरह चुपचाप अपना मुँह बंद किए हुए थे। किसी ने झकझोर कर पूछा- आखिर हम आप से पूछ रहे हैं, कुछ तो बताओ किसने पत्‍थर चलाया। वे समझदार थे, शिक्षित थे, बच्‍चों की नादानियों से ऊपर की सोंच रखते थे, उन्‍हें पत्‍थर की चोंट खटक रही थी, लेकिन उससे कहीं ज्‍यादा टीस उन सवालों से हो रही थी जो अपने हीं पूछे जा रहे थे। उन्‍होंने मुँह खोला तो सिर्फ चंद लफ्ज ही फूटे जिसमें उन्‍होंने कहा गलती मेरी थी। पेड़ के नीचे से गुजर रहा था और कच्‍ची केरियों से सजे आम के पेड़ पर तो उन्‍होंने भी बचपन में खूब पत्‍थर बरसाएं हैं, शायद उन्‍हीं में से कोई एक आज उन्‍हें लग गया। दरअसल वे जानते थे कि उन्‍हें पत्‍थर किसी पराए ने नहीं बल्कि अपने ने मारा है, लेकिन अपनी जुबान को खोल कर वे कोई बवाल नहीं चाहते थे। आज उनको अपनी थाली में घी ज्‍यादा दिख रहा था, यह उनकी शिक्षा और समझ का परिणाम था कि किसी के बहकावे में आए बगैर वे सभी का सम्‍मान और खुद के निर्णय लेते थे। 

बुधवार, 11 जनवरी 2023

दौड़ते घोड़ों का टारगेट

यूँ तो टारगेट कई तरह के होते हैं, लेकिन इन दिनों सभी की नौकरी टारगेट के आधार पर हो गई है। लक्ष्‍य तय करने वाले व्‍यक्ति को यह पता होता है कि काम होना है, लेकिन इसके लिए क्‍या आवश्‍यक सुविधा है, कहॉं आवश्‍यक सुविधा नहीं है, यह लक्ष्‍य कैसे हांसिल होगा इसका कोई अनुमान नहीं होता है। मान लिया जाता है कि सभी के पास सुविधा है और सभी इसको आसानी से हांसिल कर लेंगे, लेकिन ऐसा होता नहीं है। जब ऐसा नहीं होता है तो टारगेट तय करने वाले व्‍यक्ति का कुछ नहीं बिगड़ता। बिगड़ता है तो सिर्फ उसका जो उस टारगेट को हांसिल करने के लिए अपनी पूर्ण शक्ति का उपयोग कर के भी पीछे रह जाता है। सब कुछ घुड़दौड़ जैसा होकर रह गया है। सभी को एक ही लक्ष्‍य की मेरा घोड़ा आगे रहना चाहिए, लेकिन आगे तो सिर्फ एक को ही आना होता है बाकी सभी तो पीछे ही रहना है।
लक्ष्‍य तय करने वाले के लिए यह सबसे सुन्‍दर क्षण होते है, जब इसकी समीक्षा की जाती है कि किसका घोड़ा कितना तेज दौड़ पाया। एक को छोड़ सभी को फटकार लगा कर लक्ष्‍य तय करने वाला बेहद खुश हो जाता है, लेकिन दुखी वे भी नहीं होते जिनके घोड़े इस दौड़ में पिछड़ गए है। सभी के पास अपना एक तर्क होता है और तर्क देने वाले व उस तर्क को सुनने वाले दोनों को पता होता है कि एक दूसरे को संतुष्‍ट नहीं कर पाएंगे, लेकिन फिर भी तर्क तो होते हैं। फटकार सुनने वालों के नीचे भी कुछ काम करने वाले होते हैं, वे उनको फटकार लगा कर अपनी बेइज्‍जती को इज्‍जत दे देते हैं।
कोई भी मशीन है तो मानव निर्मित ही और मानव निर्मित मशीन की भी अपनी क्षमता होती है, वह उससे अधिक का लोड सहन नहीं कर सकती है। यह सभी को पता है, लेकिन फिर भी इस मशीनी युग में सभी कुछ इंटरनेट और मशीनों के भरोसे पर चल रहा है। जो मशीन कह रही है वह सही है, शेष सभी को झूठा साबित कर दिया जाता है। कुछ आंकड़ों के बाजीगर होते हैं, उनको यह वरदान मिला होता है, वह कभी भी अपना घोड़ा उस दौड़ में पिछड़ने नहीं देते हैं। यह आंकड़ों के बाजीगर ही साफ सुथरा, ईमानदारी से किए जाने वाले काम को पछाड़ने में माहिर होते हैं। लक्ष्‍य तय करने वालों को भी पता है कि आंकड़ों के बाजीगर ही सफल होंगे , लेकिन वह भी मशीनों के इतने गुलाम हो गए है कि उनको भी मशीन मिली जानकारी सही लगती है।
मशीनों से लौ लगाने वालों की हालत इस दौर में सबसे कठिन हो गई है, वे अपनी मोमबत्‍ती लेकर बैठे रहते हैं, ईमानदारी का ढोल पीटते हैं, लेकिन उन्‍हें कभी बिजली मईया धोखा दे जाती है तो कभी इंटरनेट की चाल से परेशान हो जाते हैं और सबसे आगे रहते हैं सर्वर भय्या जो अपनी ताकत से सब को हैरान करने से नहीं चूकते हैं। इनकी ताकत के आगे सभी बौने साबित हो जाते हैं। कभी कभी तो यह लक्ष्‍य निर्धारित करने वालों को भी धोखा दे देते हैं। तब कहीं जाकर लक्ष्‍य की अंतिम तिथि बढ़ पाती है। जब लक्ष्‍य की अंतिम तिथि बढ़ जाती है या समीक्षा की तारीखों में इजाफा हो जाता है तो सबसे ज्‍यादा खुशी उनको होती है, जिनके घोड़े पीछे रह जाते हैं। उन्‍हें इतनी खुशी होती है, जैसे हार्ट अटैक के बाद किसी की जान बच जाए। बस सब खेल तो समय का है, समय रहते वे पीछे रह गए थे और समय के साथ वे बराबरी कर लेते हैं।
कछुए और खरगोश वाली कहानी यहां भी जोरों से चलती है। कभी कछुआ आगे तो कभी खरगोश आगे निकल जाता है, अब सभी को इसकी आदत हो गई है, कोई फटकार को अपनी बेइज्‍जती नहीं मानता और कोई आगे निकल आने की खुशी नहीं मनाता। फटकार सुनने वाले कछुओं की खाल पहले से मोटी होती है और इन पर किसी भी फटकार का कोई असर नहीं होता है। सब काम अपनी गति से होता है, लेकिन फिर भी घोड़ों की दौड़ सिर्फ अपने लक्ष्‍य निर्धारण करने वाले मालिक की जी हजूरी और उनकी रेंक में चार चाँद लगाने के लिए होता है। शायद ही कोई ऐसा बचा होगा, जिसको फटकार नहीं लगी होगी। कोई कहीं आगे होकर खुश हो जाता है तो कहीं दूसरी ओर फटकार से बच कर अपनी शेखी बघार रहा होता है। ऐसे में सबसे ज्‍यादा मरण तो उन दौड़ने वाले घोड़ों का है, जिनको यह सारी फटकार का असर सहन करना होती है तथा घर-परिवार, बच्‍चों से दूर कर काम करते हुए भी  फटकार ही सुनने को मिलती है।

-    संजय भट्ट

रविवार, 8 जनवरी 2023

बदलती हवा का रूख

हवा जब चलती है तो अपने साथ खुशबू और कचरा दोनों को लेकर उड़ती है। हवा का अपना कोई रूप रंग नहीं होता वह पानी की तरह निर्मल और साफ होती है, लेकिन वह कहां से गुजर रही है, उसे क्‍या मिला यह सवाल मजबूत होता है। जब वह किसी गुलशन से गुजरती है तो उसके साथ वहां की खुशबू दूर-दूर तक फैल जाती है, लकिन जब वह रेगिस्‍तान से गुजरती है तो अपने में कई बवंडर समेट लेती है।जब वह हमारे फैलाए कचरे से गुजरती है तो वह कचरा अपने साथ उड़ा ले जाती है। यह धूल और कचरा कोई पसन्‍द नहीं करता, लेकिन खुशबू के सभी दिवाने होते हैं। जैसा कि कहा गया है पानी का भी कोई रंग नहीं होता है, उसे जिस रंग के साथ मिला दो वह उस रंग का हो जाता है। पानी को भी हवा एक स्‍थान पर ठहरने नहीं देती। वह अपने साथ उसकी बूंदों को समेट कर कहीं बादलों के साथ मिल जाती है और बरसात कर देती है तो कहीं सूखा छोड़ देती है। यह प्रकृति है, जो कुछ मांगने की चाहत नहीं रखती, उसका सब कुछ देने के लिए ही होता है।

आज का मानव अपनी बुद्धि के बल पर इसे कब्‍जे में करना चाहता है, लेकिन इसकी सुन्‍दरता अपनी आजादी और खुलेपन में ही है। इसे जितना सताओगे वह उतना ही परेशान करेगी, क्‍योंकि यह लेने की नहीं देने की चाहत रखती है और मानव इससे लेना ही जानता है। वह इससे इतना कुछ ले चुका है, लेकिन उसके लेने की चाहत अभी भी बरकरार है। इन्‍सानी फितरत है, ले कर खुश हो जाता है और लौटाने की बारी आती है तो भाग जाता है।
यह हवा जब साधारण चलती है तो किसी को भी परेशान नहीं करती, लेकिन जब हवा का रूख बदलने लगता है तो सभी को बदलना पड़ता है। अब हवा नफरत की डोर के शिकंजे से आजाद होकर खुले में बहने लगी है। हवा के इस बदलते रूख को पहचान लिया गया है, इसीलिए तो तोते की तरह दिनरात एक ही नाम जपने वालों ने भी दूसरे नामों का इज़हार करना चालू कर दिया है। यह हवा अपने साथ अभी तक जो बहा कर ला रही थी वह कहीं सूखे पत्‍तों पर जम गया है। लेकिन निर्मल पानी की बूँदे जब तक नहीं गिरेगी तब तक हवा के साथ बहकर आई धूल और कचरे के गुबारों को हटा पाना संभव नहीं होगा। हवा तो अपनी गति से चलती है और जिसके साथ रहती है उसमें अपने को समाहित कर लेती है, लेकिन इसके साथ समाहित होने वाले थक कर इसका साथ अधूरे में छोड़ देते हैं। यह चलती रहती है, थकती नहीं, लेकिन जिस दिन थक कर रूक गई उस दिन आम आदमी की सांसे बंद हो जाएगी। हर ओर हा हा कार मच जाएगा, जिन्‍दगी मौत से मुकाबला नहीं कर पाएगी।
हवा को कुछ लोगों ने अपने पंजों में दबा लेने की कोशिश की इसमें जहर भर कर इसे उड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा था, लेकिन हवा को अपनी जिम्‍मेदारी का एहसास है और वह अपना रूख बदलना भी जानती है। इसने अपना रूख बदलना शुरू कर दिया है, यह खुले में बह रही है और दबाव से मुक्‍त होकर अपनी उपस्थिति का एहसास करवाने लगी है। कुछ लोग हमेशा हवा के रूख के साथ अपना रूख कर लेते हैं क्‍योंकि वह जानते हैं हवा के साथ रहोगे तो जिन्‍दगी रहेगी, लेकिन अगर इसका साथ छोड़ दिया तो जिन्‍दगी भी साथ छोड़ देगी। हवा अपना रूख बदलने के पहले अपने बदलाव के संकेत जरूर देती है, लेकिन जो इसे समझता है वही सफल होता है और जो इसे नहीं समझ पाता वह लूढ़क जाता है।
हवा भी कई तरह की होती है, यह कभी सियासी रंग में रंग जाती है तो कभी सामाजिक ढंग को अपना लेती है। इसके भी स्‍वरूप बदलते रहते हैं यह बार-बार का बदलाव इसकी फितरत में शामिल है, कुछ ही पंडित है जो इसको समझ जाते हैं और पाला बदल लेते हैं, लेकिन इसको समझ पाना भी इतना आसान नहीं है। यह कब अपना रूख बदल ले, कब अपना सामान्‍य रूख छोड़कर विकराल रूप धारण कर ले, कोई नहीं जानता। कब अपने साथ बर्फीला तुफान ले आए और कब शुष्‍क होकर सांसे अटका दें। इसलिए इसको अपने हिसाब से बहने देने में ही फायदा है, यदि इसको रोकने और इसके साथ छेड़छाड़ का प्रयास किया तो यह कब उखाड़ फैंके कुछ कहना मुश्किल है।
                                          संजय भट्ट

बुधवार, 4 जनवरी 2023

नए साल का जश्‍न

 संजय भट्ट

नए साल का आगाज होने वाला था। युवाओं की प्‍लानिंग हो चुकी थी। सबने अपने-अपने हिसाब से जिम्‍मेदारी लेकर व्‍यवस्‍था जमा कर ली थी, बस सभी को इंतजार था रात का। सूरज अपने ढलान पर था और नए साल का जश्‍न मनाने वाले युवाओं के दिल धड़कनें बढ़ रही थी। सबने मिल कर स्‍थान का चयन कर लिया था। सभी को इस बार दिखाना था कि नए साल का जश्‍न कैसा होता है। जश्‍न मनाने वाले ज्‍यादातर शहरों से पढ़कर आए थे और उन्‍होंने वहां के जश्‍न का अंदाज देखा था। वे अपने गांव वाले कुछ साथियों को बताना चाहते थे कि नए साल का जश्‍न कैसे मनाया जाता है।
शहरी मिजाज में कुछ साल रहने के बाद उनका अंदाज बदल गया था। संस्‍कार और व्‍यवाहर में परिवर्तन को वे खुला महौल और अपनी जीवन जीने की आजादी बताते थे। गांव के दोस्‍तों को निहायत ही पिछड़ा और छोटी मानसिकता के साथ ही गैर विकासवादी समझने लगे थे। उन्‍हें लगता था कि शहरों में जिन्‍दगी गांवों की जिन्‍दगी से बेहतर है। वहां उन्‍हें किसी प्रकार की रोक टोक नहीं थी और न ही किसी हिसाब किताब की चिन्‍ता पिता की कमाई पर अपना आनन्‍द करते थे। उनके माता पिता को भी लगता था कि उनके बच्‍चे बड़े हो गए हैं और अपना भला बूरा समझने लगे हैं। इनको ज्‍यादा छेड़छाड़ की तो कहीं कोई गलत कदम नहीं उठा लें।
बस सभी के माता पिता को एक ही डर था कि जरा भी रोक टोक की या इन्‍हें कुछ और सिखाने की कोशिश की तो बच्‍चे उनको भी पिछड़ा तथा दकियानुसी विचार वाला कह कर नकारने लगेगे। एक बार यदि बच्‍चों ने माता पिता को नकार दिया तो फिर मुश्किल है कि बच्‍चें उनका सम्‍मान भी करें। सम्‍मान खोने का भय और बच्‍चों के गलत कदम उठाने की आशंका से माता पिता उन्‍हें कुछ कहने से कतराने लगे थे।
ग्रामीण जीवन था, ज्‍यादातर खेती बाड़ी से जुड़े लोग मेहनत मजदूरी कर शाम को घर लौट कर ठंड के दिनों में बिस्‍तर की गोद में समा जाते थे या कुछ लोग रात को खेतों में पानी देने के लिए गांव के बाहर ही रहते थे। दिसंबर का आखरी दिन और जनवरी के पहले दिन की शुरूआत से उनकों कोई फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन इन शहरी मिजाज के बच्‍चों को जश्‍न का आनन्‍द लेना था।
रात का आगाज होते ही गांव में सन्‍नाटा सा छा जाता था। कोई इक्‍का दुक्‍का ही इधर-उधर जाते आते थे। दिसंबर की आखरी रात को भी ठीक ऐसा ही होना था, लेकिन जश्‍न की तैयारी में उत्‍साही युवाओं ने चौराहे पर सरकारी खंभे से लाइट लेकर रोशनी का इंतजाम किया, कानफोड़ू डीजे लगाया और लगे थिरकने। देर रात होते होते सन्‍नाटे में डीजे की आवाजें कानों को ककर्श लगने लगी थी, उन पर बजते अंग्रेजी गानों पर थिरकते युवाओं के हाथों में बोतलें भी नांचने लगी थी। ठंड में घरों में दुबके लोग बाहर आने की हिम्‍मत नहीं जुटा पा रहे थे, लेकिन इन युवाओं को जश्‍न का आनन्‍द आने लगा था। पटाखे चलाना, थिरकना, बोतलों में बंद नशे को अपने में समा लेना इन जश्नियों को खूब रास आ रहा था।
देर रात तक यही माहौल चलता रहा, पुराने साल की रात और नए साल का आगाज हो चुका था, लेकिन यह साल गांव में शहर को समेटे अपने संस्‍कारों से दूर एक नई सभ्‍यता की कहानी लेकर आया था, जिसमें शौर, नशा और बेअदबी के साथ ही एक अधनंगापन भी था। यह नए साल का जश्‍न गांव वालों ने पहलीबार देखा था, जिसमें तन और धन की बर्बादी थी, लेकिन युवाओं का तो जश्‍न था।
                  

रविवार, 1 जनवरी 2023

मूर्खता का पैमाना

 

समाज के बदलते स्‍वरूप के साथ मूर्खता और चालाकी का पैमाना बदलता रहता है। कभी सभी की मदद करने वाले, सभ्‍य और सरल व्‍यक्ति को अच्‍छा माना जाता था, लेकिन आज के बदलते स्‍वरूप में यह पप्‍पू और लल्‍लू के नाम से जाना जाता है। कौन कितना मूर्ख है और कितना चतुर है इसके लिए एक उपनिषद वाक्‍य के अनुसार कहा गया है कि मूर्खस्‍य प्रमाणं किं, इदमस्‍य प्रमाणं। अर्थ यह कि कौन कितना मूर्ख है यह किसी से पूछा जाए यही इसका नापतौल है।
मूर्खता और चतुराई के बीच एक बहुत ही महीन सी लकीर है। कोई आपको मूर्ख समझता है और आप किसी और को। दरअसल समाज में एक पैमाना बना है, जो चतुर है, वह अन्‍य को बेवकुफ बनाने में माहिर होता है। वही सभ्‍य है और वह ही समझदार की श्रेणी में आता है। आज के समय में यदि किसी की मदद करते हैं, किसी का बुरा नहीं करते, आपका स्‍वभाव हर किसी के काम आना है तो आपका उपयोग किया जाता रहेगा और उपयोग करने वाला व्‍यक्ति आपको मूर्ख साबित करता रहेगा। समाज का तानाबाना ही कुछ ऐसा हो गया है कि यदि किसी का सहयोगी व्‍यवहार है तो वह व्‍यक्ति समाज में मूर्ख है। उसे जमाने की हकीकत का पता नहीं है। वह अच्‍छा आदमी है लेकिन उसे कुछ नहीं आता है। वह हमेशा दूसरों के लिए अपना जीवन लगा देता है लेकिन जब उसकी बारी आती है तो सभी हाथ खड़ा कर देते हैं। वह सभी की परेशानी में खड़ा मिलता है, लेकिन उसकी परेशानी से किसी को कोई लेना देना नहीं होता है।
समाज के बदलते स्‍वरूप में यह आज की नीयती हो गई है। सभ्‍य और भलमनसाहत का तो जमाना ही नहीं रहा। जो व्‍यक्ति कुछ नहीं करता है, लेकिन अपना काम निकलनवाने में माहिर होाता है, उसे समाज में चतुर और अच्‍छे व्‍यक्ति के रूप में प्रशंसा मिलती है, लेकिन मददगार और परेशान लोगों की सहायता के लिए तत्‍पर रहने वाले, हर किसी का सहयोग करने वाले व्‍यक्ति को समाज में पप्‍पू और लल्‍लू की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया जाता है। यह चालाक लोग अपना सारा काम ऐसे ही भावुक और मददगार लोगों से निकलवा लेते हैं और थोड़ी सी भी गलती होने पर सारा दोष उनके माथे मढ़ने से नहीं चुकते हैं। ये कथित लल्‍लू और पप्‍पू टाईप के जो लोग होते हैं ये बेहद ही भावुक और सामाजिक होते हैं। इनको काम का नशा सा होता है। बस चतुर लोग अपनी चालाकी से ऐसे ही लोगों का उपयोग कर लेते हैं। ये लल्‍लू और पप्‍पू भी हम्‍मालों की तरह दूसरों का बोझ अपने सिर पर लेकर इतने खुश होते हैं कि खुशी-खुशी सारा काम निपटा देते हैं।
ऐसे लोागों को काम नशा तो होता ही है ये झूठी प्रशंसा में से भी खुश हो जाते हैं। इनको पता नहीं होता है कि इनके पीठ पीछे लोग इनको पप्‍पू और लल्‍लू जैसे नामों से पुकारते हैं और इनका मजाक बनाते हैं। इन्‍हें लगता है कि इनके बिना तो यह काम हो ही नहीं सकता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। यह किसी की चालाकी का शिकार हो जाते हैं और वह चालाक व्‍यक्ति अपने हिस्‍से का काम भी इनसे करवा कर अपनी प्रशंसा पा ही लेता है। भावनाओं में बहका कर ऐसे लोगों से कोई भी काम निकलवाया जा सकता है। इनकी झूठी प्रशंसा से खुश होने तथा मदद करके संतुष्‍ट होना ही इनका बेहद दुर्गुण होता है। लाख गुणों के बाद भी इनको लल्‍लू और पप्‍पू बनने में मजा आता है। इनमें एक खामी और होती है, यह किसी को ना नहीं कह सकते हैं, इनकी जुबान पर ना शब्‍द कभी होता ही नहीं है और लोग इसी का फायदा उठाते हैं।
वो जमाना और था जब लोगों में चतुराई के स्‍थान पर मदद करने की भावना थी। आज जमाना इतना बदल गया है कि यह गुण कब दुर्गुण में बदल गया पता नहीं चला। ऐसे लोगों को गंवार(गांव का निवासी) भी कह दिया जाता है, लेकिन यह उपयोग करने वाले चतुर और चालाक लोग जब पकड़ में आते हैं तो सारी चतुराई हवा खाने चली जाती है। किसी की मदद करना या सहयोग की भावना रखना बूरी बात नहीं है, लेकिन यदि लोग इस भावना का दुरपयोग करें और आपका उपयोग करना शुरू कर दें तो समझ जाना चाहिए कि आप लल्‍लू और पप्‍पू की श्रेणी में हो। आपका उपयोग हो रहा है और वह उपयोग करने वाला मजे में है। कभी लोगों की मदद करना, अच्‍छा बन कर रहना और कष्‍ट में सहयोगी की भूमिका निभाने वालों का एहसान माना जाता था, लेकिन आज ऐसे लोगों का मजाक बनाया जाता है।
                -संजय भट्ट

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