बुधवार, 4 जनवरी 2023

नए साल का जश्‍न

 संजय भट्ट

नए साल का आगाज होने वाला था। युवाओं की प्‍लानिंग हो चुकी थी। सबने अपने-अपने हिसाब से जिम्‍मेदारी लेकर व्‍यवस्‍था जमा कर ली थी, बस सभी को इंतजार था रात का। सूरज अपने ढलान पर था और नए साल का जश्‍न मनाने वाले युवाओं के दिल धड़कनें बढ़ रही थी। सबने मिल कर स्‍थान का चयन कर लिया था। सभी को इस बार दिखाना था कि नए साल का जश्‍न कैसा होता है। जश्‍न मनाने वाले ज्‍यादातर शहरों से पढ़कर आए थे और उन्‍होंने वहां के जश्‍न का अंदाज देखा था। वे अपने गांव वाले कुछ साथियों को बताना चाहते थे कि नए साल का जश्‍न कैसे मनाया जाता है।
शहरी मिजाज में कुछ साल रहने के बाद उनका अंदाज बदल गया था। संस्‍कार और व्‍यवाहर में परिवर्तन को वे खुला महौल और अपनी जीवन जीने की आजादी बताते थे। गांव के दोस्‍तों को निहायत ही पिछड़ा और छोटी मानसिकता के साथ ही गैर विकासवादी समझने लगे थे। उन्‍हें लगता था कि शहरों में जिन्‍दगी गांवों की जिन्‍दगी से बेहतर है। वहां उन्‍हें किसी प्रकार की रोक टोक नहीं थी और न ही किसी हिसाब किताब की चिन्‍ता पिता की कमाई पर अपना आनन्‍द करते थे। उनके माता पिता को भी लगता था कि उनके बच्‍चे बड़े हो गए हैं और अपना भला बूरा समझने लगे हैं। इनको ज्‍यादा छेड़छाड़ की तो कहीं कोई गलत कदम नहीं उठा लें।
बस सभी के माता पिता को एक ही डर था कि जरा भी रोक टोक की या इन्‍हें कुछ और सिखाने की कोशिश की तो बच्‍चे उनको भी पिछड़ा तथा दकियानुसी विचार वाला कह कर नकारने लगेगे। एक बार यदि बच्‍चों ने माता पिता को नकार दिया तो फिर मुश्किल है कि बच्‍चें उनका सम्‍मान भी करें। सम्‍मान खोने का भय और बच्‍चों के गलत कदम उठाने की आशंका से माता पिता उन्‍हें कुछ कहने से कतराने लगे थे।
ग्रामीण जीवन था, ज्‍यादातर खेती बाड़ी से जुड़े लोग मेहनत मजदूरी कर शाम को घर लौट कर ठंड के दिनों में बिस्‍तर की गोद में समा जाते थे या कुछ लोग रात को खेतों में पानी देने के लिए गांव के बाहर ही रहते थे। दिसंबर का आखरी दिन और जनवरी के पहले दिन की शुरूआत से उनकों कोई फर्क नहीं पड़ता था, लेकिन इन शहरी मिजाज के बच्‍चों को जश्‍न का आनन्‍द लेना था।
रात का आगाज होते ही गांव में सन्‍नाटा सा छा जाता था। कोई इक्‍का दुक्‍का ही इधर-उधर जाते आते थे। दिसंबर की आखरी रात को भी ठीक ऐसा ही होना था, लेकिन जश्‍न की तैयारी में उत्‍साही युवाओं ने चौराहे पर सरकारी खंभे से लाइट लेकर रोशनी का इंतजाम किया, कानफोड़ू डीजे लगाया और लगे थिरकने। देर रात होते होते सन्‍नाटे में डीजे की आवाजें कानों को ककर्श लगने लगी थी, उन पर बजते अंग्रेजी गानों पर थिरकते युवाओं के हाथों में बोतलें भी नांचने लगी थी। ठंड में घरों में दुबके लोग बाहर आने की हिम्‍मत नहीं जुटा पा रहे थे, लेकिन इन युवाओं को जश्‍न का आनन्‍द आने लगा था। पटाखे चलाना, थिरकना, बोतलों में बंद नशे को अपने में समा लेना इन जश्नियों को खूब रास आ रहा था।
देर रात तक यही माहौल चलता रहा, पुराने साल की रात और नए साल का आगाज हो चुका था, लेकिन यह साल गांव में शहर को समेटे अपने संस्‍कारों से दूर एक नई सभ्‍यता की कहानी लेकर आया था, जिसमें शौर, नशा और बेअदबी के साथ ही एक अधनंगापन भी था। यह नए साल का जश्‍न गांव वालों ने पहलीबार देखा था, जिसमें तन और धन की बर्बादी थी, लेकिन युवाओं का तो जश्‍न था।
                  

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Very nice

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...