रविवार, 1 जनवरी 2023

मूर्खता का पैमाना

 

समाज के बदलते स्‍वरूप के साथ मूर्खता और चालाकी का पैमाना बदलता रहता है। कभी सभी की मदद करने वाले, सभ्‍य और सरल व्‍यक्ति को अच्‍छा माना जाता था, लेकिन आज के बदलते स्‍वरूप में यह पप्‍पू और लल्‍लू के नाम से जाना जाता है। कौन कितना मूर्ख है और कितना चतुर है इसके लिए एक उपनिषद वाक्‍य के अनुसार कहा गया है कि मूर्खस्‍य प्रमाणं किं, इदमस्‍य प्रमाणं। अर्थ यह कि कौन कितना मूर्ख है यह किसी से पूछा जाए यही इसका नापतौल है।
मूर्खता और चतुराई के बीच एक बहुत ही महीन सी लकीर है। कोई आपको मूर्ख समझता है और आप किसी और को। दरअसल समाज में एक पैमाना बना है, जो चतुर है, वह अन्‍य को बेवकुफ बनाने में माहिर होता है। वही सभ्‍य है और वह ही समझदार की श्रेणी में आता है। आज के समय में यदि किसी की मदद करते हैं, किसी का बुरा नहीं करते, आपका स्‍वभाव हर किसी के काम आना है तो आपका उपयोग किया जाता रहेगा और उपयोग करने वाला व्‍यक्ति आपको मूर्ख साबित करता रहेगा। समाज का तानाबाना ही कुछ ऐसा हो गया है कि यदि किसी का सहयोगी व्‍यवहार है तो वह व्‍यक्ति समाज में मूर्ख है। उसे जमाने की हकीकत का पता नहीं है। वह अच्‍छा आदमी है लेकिन उसे कुछ नहीं आता है। वह हमेशा दूसरों के लिए अपना जीवन लगा देता है लेकिन जब उसकी बारी आती है तो सभी हाथ खड़ा कर देते हैं। वह सभी की परेशानी में खड़ा मिलता है, लेकिन उसकी परेशानी से किसी को कोई लेना देना नहीं होता है।
समाज के बदलते स्‍वरूप में यह आज की नीयती हो गई है। सभ्‍य और भलमनसाहत का तो जमाना ही नहीं रहा। जो व्‍यक्ति कुछ नहीं करता है, लेकिन अपना काम निकलनवाने में माहिर होाता है, उसे समाज में चतुर और अच्‍छे व्‍यक्ति के रूप में प्रशंसा मिलती है, लेकिन मददगार और परेशान लोगों की सहायता के लिए तत्‍पर रहने वाले, हर किसी का सहयोग करने वाले व्‍यक्ति को समाज में पप्‍पू और लल्‍लू की श्रेणी में लाकर खड़ा कर दिया जाता है। यह चालाक लोग अपना सारा काम ऐसे ही भावुक और मददगार लोगों से निकलवा लेते हैं और थोड़ी सी भी गलती होने पर सारा दोष उनके माथे मढ़ने से नहीं चुकते हैं। ये कथित लल्‍लू और पप्‍पू टाईप के जो लोग होते हैं ये बेहद ही भावुक और सामाजिक होते हैं। इनको काम का नशा सा होता है। बस चतुर लोग अपनी चालाकी से ऐसे ही लोगों का उपयोग कर लेते हैं। ये लल्‍लू और पप्‍पू भी हम्‍मालों की तरह दूसरों का बोझ अपने सिर पर लेकर इतने खुश होते हैं कि खुशी-खुशी सारा काम निपटा देते हैं।
ऐसे लोागों को काम नशा तो होता ही है ये झूठी प्रशंसा में से भी खुश हो जाते हैं। इनको पता नहीं होता है कि इनके पीठ पीछे लोग इनको पप्‍पू और लल्‍लू जैसे नामों से पुकारते हैं और इनका मजाक बनाते हैं। इन्‍हें लगता है कि इनके बिना तो यह काम हो ही नहीं सकता है, लेकिन ऐसा होता नहीं है। यह किसी की चालाकी का शिकार हो जाते हैं और वह चालाक व्‍यक्ति अपने हिस्‍से का काम भी इनसे करवा कर अपनी प्रशंसा पा ही लेता है। भावनाओं में बहका कर ऐसे लोगों से कोई भी काम निकलवाया जा सकता है। इनकी झूठी प्रशंसा से खुश होने तथा मदद करके संतुष्‍ट होना ही इनका बेहद दुर्गुण होता है। लाख गुणों के बाद भी इनको लल्‍लू और पप्‍पू बनने में मजा आता है। इनमें एक खामी और होती है, यह किसी को ना नहीं कह सकते हैं, इनकी जुबान पर ना शब्‍द कभी होता ही नहीं है और लोग इसी का फायदा उठाते हैं।
वो जमाना और था जब लोगों में चतुराई के स्‍थान पर मदद करने की भावना थी। आज जमाना इतना बदल गया है कि यह गुण कब दुर्गुण में बदल गया पता नहीं चला। ऐसे लोगों को गंवार(गांव का निवासी) भी कह दिया जाता है, लेकिन यह उपयोग करने वाले चतुर और चालाक लोग जब पकड़ में आते हैं तो सारी चतुराई हवा खाने चली जाती है। किसी की मदद करना या सहयोग की भावना रखना बूरी बात नहीं है, लेकिन यदि लोग इस भावना का दुरपयोग करें और आपका उपयोग करना शुरू कर दें तो समझ जाना चाहिए कि आप लल्‍लू और पप्‍पू की श्रेणी में हो। आपका उपयोग हो रहा है और वह उपयोग करने वाला मजे में है। कभी लोगों की मदद करना, अच्‍छा बन कर रहना और कष्‍ट में सहयोगी की भूमिका निभाने वालों का एहसान माना जाता था, लेकिन आज ऐसे लोगों का मजाक बनाया जाता है।
                -संजय भट्ट

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Very nice

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