शुक्रवार, 21 जुलाई 2023

जल संरक्षण के आध्‍यात्मिक और वैज्ञानिक आधार

संसार के अधिकतर भाग पर जल और कुछ भाग पर पृथ्‍वी है। पृथ्‍वी पर जीवन जल के कारण है, यह आध्‍यात्‍मिक तथा वैज्ञानिक दोनों आधारों पर परखा गया है तथा प्रमाणित भी हुआ है। बिना जल के मानव तथा अन्‍य जीवों के जीवन का कोई आधार नहीं है। जीवन की मुख्‍य आवश्‍यकता जल है तथा इसका भी मात्र 1 प्रतिशत भाग उपयोग के योग्‍य है। इतना सब जानने के बाद भी हम जल की उपयोगिता तथा महत्‍ता को समझ पाने में सक्षम नहीं हो रहे हैं।
हम इन्‍द्रदेव तथा वरूण देव को जल का अधिष्‍ठाता देवता के रूप में मानते हैं तथा जल की प्राप्ति के लिए हमेशा हम इनकी पूजा-आराधना करते हैं। जबकि इन्‍द्रदेव वर्षा के देवता है और वरूण देव जलराशि के प्रमुख है। ऋग्‍वेद के अनुसार इन्‍द्रदेव अंधकार तथा अनावृष्टि रूपी दैत्‍यों से युद्ध कर जल तथा प्रकाश को मुक्‍त करवाया है। उन्‍होंने ‘वृत्र’ और ‘अहि’ नामक दैत्‍य जो अकाल तथा अनावृष्टि के प्रतीक के रूप में थे का वध कर जल को प्रदान किया है। इन दैत्‍यों का निवास पर्वत मेघों में था तथा भारी शिलाओं से भी इन्‍होंने जल को रोक रखा था। यह दोनों दैत्‍य इन मेघों से सूर्य के प्रकाश को भी पृथ्‍वी से वंचित कर देते थे। इन्‍द्रदेव ने ही कम्‍पायमान धरती और चलित पर्वतों को भी स्थिर किया है। इन्‍द्रदेव को ऋग्‍वेद में सर्वप्रधान देवता बताया गया है तथा पूर्व आध्‍यात्मिक वैज्ञानिक मैक्‍समूलर ने सूर्य का वाची, रॉथ ने मेघों तथा विद्युत का देवता, बेनफे ने वर्षाकालिक आकाश का प्रतीक, ग्रॉमसन ने उज्‍जवल आकाश का प्रतीक,हापकिन्‍स ने विद्युत का प्रतिरूप और मैकडॉनल तथा कीथ ने वर्षा का देवता माना है। इन्‍द्रदेव ने ही गंगा सहित 7 नदियों को प्र‍वाहित किया है। ऋग्‍वेद के 9 सूक्‍तों में वरूण तथा इन्‍द्रदेव के संयुक्‍त वर्णन है। दानों ने सरिताओं के पथ खोजे,खोदे तथा उनकों प्रवाहित होने में मदद प्रदान की है। सप्‍त सिन्‍धु तथा औषधियों की उत्‍पन्‍नता जल से ही संभव हो सकी है और यह वरूणदेव के मुख में प्रवाहित है, इसलिए वरूणदेव को जल का प्रमुख माना गया है।
पृथ्‍वी पर बर्फ, समुद्र और भूमिगत जल के रूप में जल की उपलब्‍धता है। सभी अलग-अलग स्‍थानों पर अपनी महत्‍ता के साथ उपलब्‍ध है। समुद्र में जीव तथा औषधियों का खजाना है तथा बर्फ से प्रकृति और पर्यावरण का संतुलन। भूमिगत जल सिंचाई और पेयजल के रूप में अधिकांश भू भाग पर मिलता है। हम देव आराधना करते हैं और अपनी समस्‍या का समाधान होने पर देवताओं के उपकार को भूल जाते हैं। हमें पर्याप्‍त जल उपलब्‍ध हो जाता है तो इन्‍द्रदेव की वृष्टि कृपा तथा वरूण देव की संचय कृपा का भान नहीं रहता।
जल का संरक्षण और पर्यावरण का संतुलन बनाने में मानव का महत्‍वपूर्ण योगदान है। जल का संचयन कर मानव जीवन के साथ ही संपूर्ण जैव विविधता को बचाया जा सकता है। जल के दुरूपयोग के कई उदाहरण हमारे सामने प्रतिदिन आते हैं। हम अपनी इस जिम्‍मेदारी को न तो स्‍वयं निभा पाते हैं और न ही प्रेरित कर पाते हैं कि जल की महत्‍ता को समझाएं। पृथ्‍वी पर अनेक प्रकार के जीवों सहित मानव का जीवन इसी जल पर आधारित है। एक बड़ा भू भाग जल की कमी के कारण विभिन्‍न प्रकार की समस्‍याओं और प्रा‍कृतिक संकटों का सामना कर रहा है। पृथ्‍वी पर पाए जाने वाले अन्‍य जीव बुद्धि विवेक से शून्‍य माने जाने के कारण जल को किसी प्रकार से नुकसान नहीं पहुँचाते हैं, लेकिन मानव अपने बुद्धिबल के कारण ही जल का अतिदोहन, दुरूपयोग तथा जल के नष्‍टीकरण की दिशा में आगे बढ़ रहा है।
पहले मालवा की धरती को ‘पग-पग नीर’ की संज्ञा दी जाती थी, लेकिन अतिदोहन व दुरूपयोग  के कारण ही मालवा क्षेत्र में  भूजल का स्‍तर लगातार नीचे जाता जा रहा है। इन्‍द्रदेव तथा वरूणदेव के प्रयासों से मानव जीवन तथा अन्‍य जीवों के लिए असूरों के बन्‍धन से मुक्‍त जल को फिर से असूरी शक्तियों के हवाले करने जा रहे हैं। अतिवृष्टि, अनावृष्टि तथा मेघों का असमय बरस जाना जैसी घटनाएं देखने को मिलने लगी है। दुनियाभर में जलवायु परिवर्तन तथा पर्यावरण के संरक्षण को लेकर बातों का सिलसिला चल रहा है, लेकिन अब भी आम मानव जाति जल की इस अद्भुत अनुकृति को समझ पाने में सक्षम नहीं हो रहा है। अपनी आवश्‍यकताओं की पूर्ति तथा विभिन्‍न वैज्ञानिक खोजों के बल पर जल का दुरूपयोग कर रहा है और इसी से प्रकृति विनाश की ओर बढ़ती जा रही है। सभी धर्म ग्रंथों में पृथ्‍वी की नष्‍टता जल प्‍लावन अर्थात जल में डूब कर लिखी गई है। समुद्र अपना दायरा बढ़ाते जा रहे हैं और पर्वतों पर जमी बर्फ पिघलती जा रही है। जितने आवश्‍यक समुद्र है, उतनी ही आवश्‍यक पर्वतों पर जमी बर्फ है। सबसे ज्‍यादा जरूरी है- नदियों का वर्षभर प्रवाहित होते रहना। बड़ी नदियों को छोड़ दिया जाए तो सहायक नदियों में जल सिर्फ वर्षा काल में ही दिखाई देता है। जब तक नदियों का प्रवाह वर्षभर नहीं होगा, भूजल का स्‍तर सिकुड़ता जाएगा और जब भू जल नहीं होगा तो मानव को पेयजल उपलब्‍ध नहीं होगा और पेयजल के बिना मानव जीवन की कल्‍पना को साकार रूप दिया जाना संभव नहीं है।
अरावलि और सतपुड़ा की छो‍टी पहाडि़यां तथा माउंट आबू के कारण मालवा और संपूर्ण मध्‍यप्रदेश में वर्षा के कारण जल की उपलब्‍धता है। यही स्थिति हिमालय के कारण भारत की है। भारत भूमि पर पर्वत, नदियां और समुद्र की पर्याप्‍तता है। इसी का लाभ हमें जीवन के रूप में मिल रहा है। दक्षिणी समुद्र से उठते मेघ (बादल) अरावलि तथा माउंट आबू से टकरा कर लौटते हुए मालवा में तथा हिमालय से टकरा कर लौटते हुए संपूर्ण भारतवर्ष में वर्षा करते हैं। विश्‍व के कई देश है, जहां वर्षा का अनुभव किया जाना संभव नहीं है। तपते रेगिस्‍तान के कारण भीषण गर्मी और हिम आच्‍छादित पर्वतों और पठारों के कारण शीत का अनुभव तो मिलता है, लेकिन वर्षा का अनुभव कभी-कभी ही होता है। हम यदि जल को लेकर आज नहीं जागे तो संभव है, पृथ्‍वी के विनाश में भारत का महत्‍वपूर्ण योगदान हो।
                                            संजय भट्ट


रविवार, 9 जुलाई 2023

मक्‍कारों की दरकार

सुनने में थोड़ा अजीब ही लगता है, लेकिन इन दिनों काम कोई करना नहीं चाहता और यह चाहता है कि उसके उदरपूर्ति (पेट भरने) का इंतजाम कहीं से हो जाए। इसके लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार है। बस थोड़ा सा प्रयास और जिन्‍दगीभर का आराम। समाज का वह हिस्‍सा जो सभी को भोजन देता है, इन‍ दिनों चाहता है कि कोई उसका कर्जा माफ कर दे। वह महिलाएं जो दिनभर घर में बिना रविवार का अवकाश लिए रात दिन देखे बिना मकान को घर बनाने में अपने जीवन की आहूति दे देती है, उसको लगता है कि उसके पास भी कुछ धन हो, जिससे उसे किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़े। वह बच्‍चे जो इन दिनों व्‍हाट्सएप्‍प, फेसबुक और इंस्‍टाग्राम की इंटरनेशनल युनिवर्सिटी के अध्‍ययन में अपने का ज्ञान को बढ़ा रहे हैं, वह भी चाहते हैं कि कोई काम किए बिना उनके खाते का बैलेन्‍स बढ़ता रहे। किसी को भी अपने पिता, पति और स्‍वयं की मेहनत पर भरोसा नहीं रहा। सभी की चाहत है कि हिंग लगे न फिटकिरी और रंग चौखा आए।
हर व्‍यक्ति अपने सारे मौज शौक को पूर्ण करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। कुछ काम चाहते हैं, उनके पास काम नहीं है। जो काम है उसमें मेहनत है और बस यही तो सबसे बड़ी दिक्‍कत है कि मेहनत किए बिना यदि सब कुछ हांसिल हो रहा है तो मेहनत क्‍यों की जाए। हर आदमी अपने आप को दूसरे से गरीब बताने में अपनी शान समझता है। हमारे पुरातनकाल से यह बात चली आ रही है कि सांई इतना दीजिए जा में कुटुंब समाए, मैं भी भूखा न रहूं , साधु भूखा न जाए। अब ये दोहा बदल गया है। सांई देते रहिए कुटुंब की परवाह काय, साधु भूखा रहे तो रहे, मेरा जुगाड़ हो जाए।
सबको अपने ही जुगाड़ की पड़ी है, किसी को भी यह देखने की फुरसत नहीं है कि दूसरे की स्थिति क्‍या हो रही है। उससे क्‍या लेना देना मेरा जुगाड़ हो गया तो समझो सब का कल्‍याण हो गया। काम की तलाश सभी को है, लेकिन ऐसे काम की जिसमें काम नहीं करना पड़े और बैंक खाते का बैलेन्‍स बढ़ता रहे। ऐसे ही मक्‍कारों की फौज इकट्ठा हो रही है लगतार सभी को बिना काम के पैसों की दरकार है और जिनके पास काम है, वह भी काम में मक्‍कारी के बहानों की तलाश में रहते हैं, जिससे वे भी समाज में समान रूप से मक्‍कारों की फौज का हिस्‍सा बने रहे।
जैसे जैसे जनसंख्‍या में बढ़ोत्‍तरी हो रही है, वैसे वैसे कर्मशीलता में कमी आती जा रही है। पहले पढ़ाया जाता रहा है कि व्‍यक्ति की पहचान उसके काम से होती है, लेकिन अब जो व्‍यक्ति अपनी पहचान बनाना चाहता है उसे मक्‍कारी के पाठ में शत प्रतिशत अंक प्राप्‍त करना जरूरी होता है। मेहनत, लगन और इमानदारी से काम करने वालों का मजाक बनाया जाता है और उन्‍हें टेंशन का नाम दे दिया जाता है। यह शब्‍द अब धीरे-धीरे ही सही शब्‍दकोश से गायब होने लगे हैं। जिसको लगता है कि मेहनत से बहुत कुछ किया जाता है वह अपनी ऊर्जा को मक्‍कारी कैसे की जाए, इसमें खपाने लगा है। अब कर्मठ व्‍यक्ति वही माना जाता है, जिसके पास कोई काम नहीं हो और ज्ञान का भंडार लिए मेहफिलों को जमा कर अपने ज्ञान को सभी के सामने ऐसा प्रस्‍तुत करता है, जैसा उसके पास जो ज्ञान है वह किसी के पास नहीं है। सबको बांटना है, किसी को काम के लिए प्रेरित करने के स्‍थान के पर उसे सीधा निवाला मुँह में दे दिया जाए तो वह काम क्‍यों करेगा।
हमारे युवाओं के प्रेरणास्रोत शुरू से ही फिल्‍मों के नायक रहे हैं। अब वह भी कई तरह के विज्ञापनों के माध्‍यम से युवाओं को आगे बढ़ाने का काम रहे हैं, कोई कहता है ‘दाने-दाने में केसर का दम’ तो कोई उन्‍हें इंटरनेट गेम के माध्‍य‍म से कमाई करने के तरीकों को अपनाने पर जोर देता है। किसी को परवाह नहीं कि युवा पीढ़ी पढ़ाई करे, अपने कैरियर पर ध्‍यान दे, माता-पिता का हाथ बंटाए, कोई काम की ओर प्रेरणा देने के लिए उन्‍हें मक्‍कारी का सबब सिखाया जा रहा है। सभी को सिर्फ मक्‍कारों की दरकार है, जिससे उनका काम चलता रहे।
-संजय भट्ट

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...