रविवार, 9 जुलाई 2023

मक्‍कारों की दरकार

सुनने में थोड़ा अजीब ही लगता है, लेकिन इन दिनों काम कोई करना नहीं चाहता और यह चाहता है कि उसके उदरपूर्ति (पेट भरने) का इंतजाम कहीं से हो जाए। इसके लिए हर संभव प्रयास करने को तैयार है। बस थोड़ा सा प्रयास और जिन्‍दगीभर का आराम। समाज का वह हिस्‍सा जो सभी को भोजन देता है, इन‍ दिनों चाहता है कि कोई उसका कर्जा माफ कर दे। वह महिलाएं जो दिनभर घर में बिना रविवार का अवकाश लिए रात दिन देखे बिना मकान को घर बनाने में अपने जीवन की आहूति दे देती है, उसको लगता है कि उसके पास भी कुछ धन हो, जिससे उसे किसी के आगे हाथ फैलाने की जरूरत नहीं पड़े। वह बच्‍चे जो इन दिनों व्‍हाट्सएप्‍प, फेसबुक और इंस्‍टाग्राम की इंटरनेशनल युनिवर्सिटी के अध्‍ययन में अपने का ज्ञान को बढ़ा रहे हैं, वह भी चाहते हैं कि कोई काम किए बिना उनके खाते का बैलेन्‍स बढ़ता रहे। किसी को भी अपने पिता, पति और स्‍वयं की मेहनत पर भरोसा नहीं रहा। सभी की चाहत है कि हिंग लगे न फिटकिरी और रंग चौखा आए।
हर व्‍यक्ति अपने सारे मौज शौक को पूर्ण करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। कुछ काम चाहते हैं, उनके पास काम नहीं है। जो काम है उसमें मेहनत है और बस यही तो सबसे बड़ी दिक्‍कत है कि मेहनत किए बिना यदि सब कुछ हांसिल हो रहा है तो मेहनत क्‍यों की जाए। हर आदमी अपने आप को दूसरे से गरीब बताने में अपनी शान समझता है। हमारे पुरातनकाल से यह बात चली आ रही है कि सांई इतना दीजिए जा में कुटुंब समाए, मैं भी भूखा न रहूं , साधु भूखा न जाए। अब ये दोहा बदल गया है। सांई देते रहिए कुटुंब की परवाह काय, साधु भूखा रहे तो रहे, मेरा जुगाड़ हो जाए।
सबको अपने ही जुगाड़ की पड़ी है, किसी को भी यह देखने की फुरसत नहीं है कि दूसरे की स्थिति क्‍या हो रही है। उससे क्‍या लेना देना मेरा जुगाड़ हो गया तो समझो सब का कल्‍याण हो गया। काम की तलाश सभी को है, लेकिन ऐसे काम की जिसमें काम नहीं करना पड़े और बैंक खाते का बैलेन्‍स बढ़ता रहे। ऐसे ही मक्‍कारों की फौज इकट्ठा हो रही है लगतार सभी को बिना काम के पैसों की दरकार है और जिनके पास काम है, वह भी काम में मक्‍कारी के बहानों की तलाश में रहते हैं, जिससे वे भी समाज में समान रूप से मक्‍कारों की फौज का हिस्‍सा बने रहे।
जैसे जैसे जनसंख्‍या में बढ़ोत्‍तरी हो रही है, वैसे वैसे कर्मशीलता में कमी आती जा रही है। पहले पढ़ाया जाता रहा है कि व्‍यक्ति की पहचान उसके काम से होती है, लेकिन अब जो व्‍यक्ति अपनी पहचान बनाना चाहता है उसे मक्‍कारी के पाठ में शत प्रतिशत अंक प्राप्‍त करना जरूरी होता है। मेहनत, लगन और इमानदारी से काम करने वालों का मजाक बनाया जाता है और उन्‍हें टेंशन का नाम दे दिया जाता है। यह शब्‍द अब धीरे-धीरे ही सही शब्‍दकोश से गायब होने लगे हैं। जिसको लगता है कि मेहनत से बहुत कुछ किया जाता है वह अपनी ऊर्जा को मक्‍कारी कैसे की जाए, इसमें खपाने लगा है। अब कर्मठ व्‍यक्ति वही माना जाता है, जिसके पास कोई काम नहीं हो और ज्ञान का भंडार लिए मेहफिलों को जमा कर अपने ज्ञान को सभी के सामने ऐसा प्रस्‍तुत करता है, जैसा उसके पास जो ज्ञान है वह किसी के पास नहीं है। सबको बांटना है, किसी को काम के लिए प्रेरित करने के स्‍थान के पर उसे सीधा निवाला मुँह में दे दिया जाए तो वह काम क्‍यों करेगा।
हमारे युवाओं के प्रेरणास्रोत शुरू से ही फिल्‍मों के नायक रहे हैं। अब वह भी कई तरह के विज्ञापनों के माध्‍यम से युवाओं को आगे बढ़ाने का काम रहे हैं, कोई कहता है ‘दाने-दाने में केसर का दम’ तो कोई उन्‍हें इंटरनेट गेम के माध्‍य‍म से कमाई करने के तरीकों को अपनाने पर जोर देता है। किसी को परवाह नहीं कि युवा पीढ़ी पढ़ाई करे, अपने कैरियर पर ध्‍यान दे, माता-पिता का हाथ बंटाए, कोई काम की ओर प्रेरणा देने के लिए उन्‍हें मक्‍कारी का सबब सिखाया जा रहा है। सभी को सिर्फ मक्‍कारों की दरकार है, जिससे उनका काम चलता रहे।
-संजय भट्ट

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Very nice

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