सोमवार, 31 अक्टूबर 2022

बाबूजी की नौकरी

 (संजय भट्ट)

उसकी योग्‍यताओं में कोई कमी नहीं थी। पढ़ाई भी पूर्ण कर चुका था और उम्र के उस पड़ाव पर था जहां उसे एक अदद काम की तलाश थी। बाबूजी की नौकरी के किस्‍से सुन कर उसे उत्‍साह था कि वह भी कुछ बन कर दिखाएगा। इसके लिए सभी जगह हाथ पैर मार रहा था, लेकिन न तो उसकी सुनवाई भगवान कर रहे थे और न ही जहां आवेदन कर रहा था वहां कोई सुन रहा था। हमेशा निराशा ही हाथ लग रही थी, काम था तो बस इतना कि घर में सब्‍जी लाना, खाना, सोना और इधर-उधर नौकरी के लिए हाथ पैर मारना।

पिताजी अक्‍सर उसे यह बता कर बेरोजगारी का एहसास कराते कि उनके पिताजी मतलब उसके दादाजी गांव में अपने समय के इकलौते इंटर पास व्‍यक्ति थे। उनको सरकार के नुमाइ्ंदे घर तक लेने आए थे पॉलीटेक्निक करने के लिए। जब उन्‍होंने पॉलिटेक्निक की परीक्षा पास की तो तीन-तीन विभाग से नौकरी के लिए बुलावे आए। उन्‍होंने अपनी च्‍वाईस से नौकरी की। दादाजी की काबिलियित के आधार पर उन्‍हें लगातार प्रमोशन मिलते चले गए और अपने विभाग के प्रदेश में सबसे बड़े इंजीनियर के पद से रिटायर हुए। दादाजी के बाद उनकी बारी आई तो उन्‍होंने भी इंजीनियरिंग के लिए प्रयास किया, नम्‍बर हालांकि कम आए थे, लेकिन इंजीनियर तो बन गए। घर में दो जून की रोटी से समस्‍या से जूझता परिवार अब सम्‍पन्‍न परिवारों की गिनती मे आ गया था। उनका अपना रूतबा भी पैसों से बढ़ गया था, नौकरी में रहते कई अपने-परायों को उनकी योग्‍यता के मुताबिक काम दिलवाया, लेकिन आज उनका अपना बेटा ही नौकरी के लिए हाथ पैर मार रहा है और कोई सामने नहीं आ रहा कि उसको कोई काम ही मिल जाए।

लक्ष्‍मी तो हमेशा से चलायमान रही और जो चलायमान है उसे ज्‍यादा दिन तक रोक पाना किसी के बस में नहीं है। धीरे-धीरे जमा पूँजी और पेन्‍शन के सहारे उनका घर खर्च चल रहा था। जो कभी ब्रॉडेड बोतलबंद पानी के बिना कोई ऐसा-वैसा पानी नहीं पीते थे, आज वह अपने घर के नलकूप का पानी पी रहे थे। उनको लगता था कि चलो लोन से ही सही, लेकिन सही समय पर मकान बनाने की अकल आ गई थी, नहीं तो आज फिर लौट कर उसी झोपड़ी में जाना पड़ता जहां उनके पिताजी का बचपन गुजरा था। सब तरह से ठीक थे, लेकिन एक पिता की सबसे बड़ी चिन्‍ता उसके बेटे को सेटल करने की होती है। उम्र हो गई थी, लेकिन जहां भी शादी की बात करने जाते एक ही सवाल सामने आ जाता, बेटा करता क्‍या है। बस इसी सवाल ने उनकी रातों की नींद को छीन लिया था। वे दिन-ब-दिन कमजोर हो रहे थे। तमाम इलाज और अच्‍छे डॉक्‍टर की सलाह भी उनकी शुगर को नियंत्रित नहीं कर पा रही थी। कहा जाता है तनाव सबसे बड़ी बीमारी है, यह सैकड़ो उन बीमारियों को आमंत्रित कर लेता है, जिसका आपको पता भी नहीं होता। उनके साथ भी कुछ ऐसा ही चल रहा था।

सोंचते थे बेटे को किसी व्‍यापार में डाल दें, लेकिन व्‍यापार के लिए व्‍यापारी के गुण भी होना चाहिए, जो किसी शिक्षा से नहीं अनुभव से ही मिलते हैं। बिरले ही होते हैं, जो व्‍यापार और उद्योग में अपनी पढ़ाई के बलबूते पर सफलता पा लेते हैं। जब युवा थे तो लगता था कि बच्‍चे को पढ़ा लिखा कर योग्‍य बना देंगे और उनकी तरह कहीं नौकरी पा जाएगा तो बुढ़ापा अच्‍छे से गुजर जाएगा, लेकिन आने वाले समय का किसको पता होता है। सोंचने लगते थे उनके कितने व्‍यापारी मित्र थे समय के साथ बेटे को किसी व्‍यापारी के साथ काम सिखाया होता तो आज मारा-मारा न भटकना पड़ता। कुछ नहीं तो अपनी दाल रोटी का इंतजाम खुद तो कर लेता। अब उनकी पेंशन पर ही सारा दारोमदार था। पढ़ लिख कर योग्‍य बनने के साथ ही आज के जमाने में हुनरमंद होना भी जरूरी हो गया था, लेकिन हुनर भी ऐसा हो कि खुद कुछ कर सके, किसी के आसरे वाला नहीं हो। फिर आजकल पढ़ लिख कर कोई ऐसा काम करना पसन्‍द नहीं करता जो उसकी पढ़ाई की योग्‍यता को नकारता हो। हालांकि पढ़ाया तो यही जाता है कि कोई भी काम छोटा यो बड़ा नहीं होता, लेकिन फिर भी योग्‍यताधारियों को लगता है कि यह काम उनकी योग्‍यता को कम करता है तो उसे करना थोड़ा परेशान कर देता है।

बुधवार, 19 अक्टूबर 2022

ये शौक गजब की चीज है

(संजय भट्ट)

हर आदमी का अपना शौक होता है। किसी को मजेदार, किसी को सेहत खराब करने वाला तो किसी को रसहीन पर कोई माने या ना माने शौक सब को होता ही है। यह गरीब-अमीर, ऊॅंच-नीच और जात पात के साथ धर्म और समाज भी नहीं देखता। यह देखता है तो सिर्फ इंसान और उसकी आदत। वैसे यह शौक पैदाईशी भी होता है और बाद में बेवफा भी हो जाता है। कई लोग कई काम सिर्फ शौक से करते हैं और कहते भी है कि यह तो शौक है अन्‍यथा मेरा तो मुख्‍य काम यह नहीं है।


हर किसी को जो शौक होता है वह बड़ा ही अजीब और निराला होता है। कोई काम से बचने के लिए शौक रख लेता है तो कोई काम करने के लिए शौक वापरता है। उन्‍हें अजीब तरीके का शौक हुआ बीमार पड़ने का और उस बीमारी के जरिए से दोस्‍तों को परखने का। वे आए दिन बीमार हो जाते। कभी किसी बीमारी से तो कभी किसी बीमारी से। उनको सर्दियों के दिनों में एकाएक एहसास हुआ कि सर्दियों के सीजन में सर्दी नहीं हुई तो क्‍या हुआ।


उन्‍होंने बकायदा इसका इंतजाम कर लिया। सर्दी कैसे न होती जब आ बैल मुझे मार कर ही लिया तो सर्दी को तो होना ही था। उनका काम इधर उधर घूमने का था। जानबुझकर सर्दियों में उन्‍होंने कनटोप और स्‍वेटर ले जाना उचित नहीं समझा। पत्‍नी ने याद भी दिलाया तो उसे कह दिया मैं इतना भी गया गुजरा नहीं कि सर्दी मुझे छू भी ले। फिर उन्‍होंने अपने इंतजाम के मुताबिक काम किया। गर्मियों के दिनों में वे काफी घूम लेते थे, लेकिन सर्दियों में ज्‍यादा दूर नहीं जाते। उन्‍होंने उस दिन रात को देर से घर पर पहुँचने की ठानी और निकल पड़े अपनी मोटर साईकिल पर। चलते हुए दिन में पहुँच ही गए अपने गंतव्‍य तक, लेकिन रात को देर में आना था तो सुनसान सड़क देखी और खोल दिए शर्ट के बटन। अब ठंड तो लग रही थी, लकिन शौक का मजा भी निराला था।


उन्‍हें अगले दिन सर्दी हो गई। बीमार पड़ गए। नाक बहने लगी और सिर दर्द करने लगा। किसी काम में मन नहीं लगता था। इधर उधर नाक साफ करते और फिर पानी की धार शुरू हो जाती। सर्दी से परेशान थे, लेकिन सभी को पता था कि उनकी बीमारी में हाल नहीं जाना तो खैर नहीं होगी। जिसको भी पता चलता कि वे बाजार से गायब हो गए है, तो उनके पक्‍का ही होता था कि वे बीमार पड़े होंगे। हर कोई उनका हाल पूछने उनके घर की ओर रूख कर देता। एक तो सर्दियों से सिर भारी और दोस्‍तों, परिचितों को आना जाना। न बात हो रही है और न हाल बता पा रहे हैं। जो भी हाल है वह सबके सामने है। परिचित खबरचियों ने भी खबर फैला दी कि श्रीमान को सर्दी हो गई है। नाक बह रहा है और दर्द के मारे सिर फटा जा रहा है। सभी ने हाल जानने की कोशिश की, लेकिन हाल था कि खुद ही बयां हो रहा था। उनकी चिड़चिड़ाहट बढ़ती जा रही थी और पत्‍नी के ताने उसको और बढ़ा रही थी। वो आने जाने वालों से घबराने लगे थे। उनके शौक को पलीता लग रहा था। शौक शौक में बीमारी को बुलवा तो लिया, लेकिन बीमारी ने जब रंग दिखाना शुरू किया तो उनका पारा बढ़ने लगा। उन्‍होंने सर्दी को निमंत्रण दिया था, लेकिन सर्दी के साथ कफ, खांसी और बुखार का पैकेज मुफ्त में मिल गया।


लोगों की पूछताछ के बाद शुरू हुआ डॉक्‍टरों के चक्‍कर का दौर। कभी इसको तो कभी उसको बताते फिर रहे थे, लेकिन सर्दी ने भी ठान लिया था कि किसी ने इतने प्‍यार से बुलवाया है तो इतनी जल्‍दी कैसे चले जाएं। पूछताछ वालों की सलाह अगल सिर खुजाने पर मजबूर कर रही थी। कोई कह गया दोस्‍त हल्‍दी वाला दूध पियो, दो दिन में सर्दी साफ। किसी ने कहा छूआरे(खजूर-खारक) का दूध पियो सर्दी पास नहीं आएगी। पहले बीमारी का इंतजाम किया था अब उसे दूर करने का इंतजाम करना पड़ रहा है। सारा हिसाब बिठाया गया, लेकिन सर्दी ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी। डॉक्‍टर भी हैरान थे कि आखिर यह मामला क्‍या है।


बीमारी को ठीक करने और दूध के चक्‍कर में खाना पिना कम हो गया। खर्चा लगातार बढ़ रहा था और काम पर नहीं जाने से आमदनी लगतार कम हो रही थी। वो कहीं के रईस तो थे नहीं जो घर बैठे सारा काम हो जाता और खर्चा भी बेपरवाह कर देते। परेशानी को बुलावा मंहगा पड़ने लगा था। अब उनको अपने शौक का अंदाजा हो गया था कि उन्‍होंने बड़ा मंहगा शौक पाला है। शौक तो फिर शौक है, जो भी हो उसका मज़ा अलग ही होता है।

शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

चश्‍में की क्लियरिटी

 

(संजय भट्ट)
कुछ लोगों को चश्‍में के बाद भी दिखाई नहीं देता और कुछ को बिना चश्‍में के। बहुत कुछ होता है आसपास ही, लेकिन दिखाई दे तो दुख नहीं दिखाई दे और देखने वाला वर्णन कर दे तो नहीं देखने का दुख। ऑखों की माया भी गजब की है। हर किसी को हर कुछ दिखाई नहीं देता और कुछ लोागों को साफ दिखाई नहीं देता। जिनको साफ दिखाई नहीं देता उनकी देता ऐसे लोग दो क्‍वालिटी के होते है, पहले जिनको पास का दिखाई नहीं देता और दूसरे जिनको दूर का दिखाई नहीं देता। इन सभी को डॉक्‍टर चश्‍मा लगाने की सलाह देते हैं। अब चश्‍मा चढ़ जाता है तो चश्‍मा जो दिखाई वही साफ होता है, चाहे दूसरे को खुली ऑंख से दूसरा ही कुछ दिखाई दे। 
अभी कुछ ऐसी ही बहस चल रही थी। कुछ लोग माता के भक्‍त थे तो कुछ पुजारी अब भक्‍तों और पुजारियों को अलग-अलग दिखाई दे रहा था। भक्‍तों को माता दिखाई दे रही थी तो पुजारियों को भक्‍तों में माता का स्‍वरूप दिखाई दे गया। किसी ने हार फूल और मंत्रोच्‍चार से माता की आराधना की तो किसी ने उच्‍च शब्‍दों वाली गालियों और तेल पिलाए लट्ठ से पूजा की। दोनों की भक्तिमय आराधना थी। माता के भक्‍त माता को बचाने में लगे थे तो पूजारियों के भक्‍त पूजारियों की भक्ति के माध्‍य‍म से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने में। माता का नवरात्रि दरअसल थी तो शक्ति की ही पूजा, दशहरे को ना सही बीच मे सही कई भक्‍तों ने अपने हिसाब से शस्‍त्र पूजा कर ली। कुछ बेचारे शास्‍त्रों के चक्‍कर में पड़े रहे। जो शास्‍त्रों के चक्‍कर में थे उनको अपनी आराधना से मतलब था और जो शस्‍त्रों के चक्‍कर में थे उनको अपनी शक्ति और असल भक्ति का परिचय देना था। 
जिसका जैसा चश्‍मा था उसको माता का वैसा स्‍वरूप दिखाई दिया। बहस चश्‍में की क्लियरिटी पर भी थी। भक्‍त मान रहे थे कि उनकी आराधना के तपोबल से सब कुछ हो रहा है, लेकिन दूसरों को व्‍यवस्‍था में आराधना दिखाई दे रही थी। कुल मिला कर सभी को अपना चश्‍मे की क्लियरिटी पर पूर्ण विश्‍वास था। कोई टस से मस होने को तैयार नहीं था कि किसी को सही भी दिखाई दे रहा हो। इनमें सबसे ज्‍यादा फजीहत तो उनकी थी जिनको बिना चश्‍में के सही दिखाई दे रहा था। उन्‍हें माता के दोनों स्‍वरूपों के दर्शन साफ-साफ हो रहे थे, लेकिन चश्‍मे धारियों का अपना तर्क था। वास्‍तव में बिना चश्‍में वाले दर्शकदीर्घा में ही थे मुख्‍य कार्यक्रम तो चश्‍में वालों का ही था। बिना चश्‍में वाले वैसे भी चश्‍मेंवालों से थोड़ी दूरी बनाना ही पसन्‍द करते हैं, क्‍योंकि उनको पता होता है कि चश्‍मे वाले उनकी बात कभी नहीं मानेंगे और जब उनके पास न दूर का चश्‍मा है और न ही पास का तो पता नहीं उनको भी अपनी ऑंख टेस्‍ट करवाना चाहिए या नहीं। 
हरेक चश्‍में वाला चश्‍मा लगाने के बाद यह मानने लगता है कि उसके चश्‍में से जो दिख रहा है वही सही है। दूसरे चाहे जो वर्णन कर दें, कानूनी पाठ भी पढ़ा दे, लेकिन उनको डॉक्‍टर और चश्‍में पर इतना भरोसा होता है कि किसी दूसरे की बात मानने को तैयार नहीं होते। कुछ अगर यह मानने भी लगे कि उनके चश्‍में का नम्‍बर बदल गया होगा तो उसी नम्‍बर के चश्‍में वाला अपना चश्‍मा उतार कर उसे टेस्‍ट कर लेने का कह देता है और उसको भरोसा दिलवा देता है कि उसका चश्‍में जो दिख रहा है उससे बेहतर सच कोई हो ही नहीं सकता। जब सच पर भरोसा पक्‍का हो जाए तो अपने चश्‍में की क्लियरिटी पर भी पूर्ण विश्‍वास जाग जाता है। 
चश्‍में को लेकर भी अलग-अलग विद्वानों के अलग-अलग मत सामने आए हैं, कुछ का मानना है कि जब जरूरत हो तो चश्‍मा लगा लो जब जरूरत नहीं हो हटा लो। लेकिन इसी के ठीक उलट दूसरे विद्वानों का मानना है कि जब आपने एक बार अपना चश्‍मा धारण कर ही लिया है तो उसे उतारना नहीं चाहिए क्‍या पता रात को सपने में भी कुछ देखने की जरूरत पड़ जाए और चश्‍में के बिना आप कुछ अलग देख बैठे और आपकी अंतरात्‍मा में परिवर्तन आ जाए। तीसरा पक्ष और भी है,जिसका मनाना है कि समय-समय पर ऑंखों की जॉंच करवाते रहना जरूरी है, क्‍योंकि चश्‍मा तो कृत्रिम है कभी भी नम्‍बर बदल सकता है और आपको साफ दिखने वाली वस्‍तु भी धूंधली हो सकती है। इसलिए चश्‍में की क्लियरिटी पर कम और ऑंखों की क्लियरिटी पर ज्‍यादा विश्‍वास रखना जरूरी है।

शनिवार, 8 अक्टूबर 2022

ये वो और काम की तलाश

 संजय भट्ट 

एक ये थे और एक वो ये को काम के आगे फुरसत नहीं थी और वो को फुरसत के सिवाय कोई काम नहीं था। दोनों एक दूसरे से जलन रखते थे। ये सोंचते देखो इसे कितनी फुरसत है और वो सोंचता काश मेरे पास भी कोई काम होता। दिनभर मारा मारा फिरता हँ काम की तलाश में और ये है कि काम से इतना भी समय नहीं अपने परिवार के साथ समय बीता सके। दोनों ही काम को लेकर ताने सुनते'सुनते थक गए थे। ये अपने बॉस से काम पुरा नहीं होने का ताना सुनता था तो वो समाज का कि कुछ करता क्‍यों नहीं। दोनों की अच्‍छी बात यह थी कि दोनों एक ही परिवार के सदस्‍य थे और बाप की कमाई होने के कारण दोनों को तकलीफ नहीं थी। 

लगातार काम के ताने सुनकर यह दोनों परेशान थे। फुरसतिया वो कभी सो कर तो कभी इधर-उधर घूम कर अपना समय बीताता था तो ये दिनभर अपने काम में इतना मशरूफ रहता था कि उसे सोने का समय कभी-कभी ही मिल पाता था। ये जब घर आता तो वो को सोया देख बड़ी जलन का अनुभव करता था, लेकिन दरअसल उसे वो से काफी सहायता मिलती थी। वो फुरसत में था तो घरेलू सामान, सब्‍जी आदि लाने से लेकर सारा काम कर लेता था। उसे बाजार का अच्‍छा खासा अनुभव हो गया था,लेकिन ये को पता ही नहीं था कि आटा-दाल का क्‍या भाव है। 

 ऐसा नहीं कि पारिवारिक काम करना कोई काम नहीं है, लेकिन समाज और ये जैसे लोग सिर्फ कमाई के काम को ही काम समझते हैं। ये और वो जैसे कई परिवार हमारे समाज में बिखरे पड़े हैं। दोनों की अपनी एहमियत है, लेकिन ये जैसे लोगों तथा समाज का मानना है कि लड़का है तो उसे कोई कमाई का काम करना चाहिए। इसी धारणा के कारण ही ये के दो बच्‍चे थे लेकिन वो की उमर होने के बाद भी उसका विवाह नहीं हो रहा था। मामला बस यहीं अटक जाता कि लड़का करता क्‍या है। जैसे उसका घर में काम करना कोई काम ही नहीं हो। वो अगर नहीं हो तो ये को इतनी परेशानी आ जाए कि घर बाहर काम करते-करते वह थक जाए। 

दरअसल काम नहीं होने के कारण उसकी समाज तथा घर में कोई वैल्‍यु ही नहीं समझता था। लेकिन जब कभी घर का कोई भी काम हो समाज में कहीं आना-जाना हो ये को फुरसत नहीं थी, जबकि फुरसत में होने के कारण यह सारी जिम्‍मेदारी वो को ही निभाना पड़ती थी। समाज के ज्‍यादातर लोग यही समझते कि वो ही उनके परिवार में है। इस मामले में ये की कोई पहचान नहीं है। समाज के रिश्‍ते नाते निभाना तथा और आना-जाना भी एक परम्‍परा है, लेकिन ये को काम के आगे फुरसत नहीं होने के कारण वह चाह कर भी नहीं आ-जा पाता था। यहां तक कि उसके ससुराल में कोई काम होता तो भी पत्‍नी या तो अ‍केले या वो के साथ ही जा पाती थी।

दोनों का अपना दुख था, लेकिन अब वो को इस आने जाने से भी कोफ्त होने लगी थी, क्‍योंकि सभी का एक ही सवाल होता था क्‍या काम करते हो। वह मजाकिया होने का ढोंग करते हुए कह देता था काम की तलाश। सभी उसकी इस बात पर ठहाका मार देते थे, लेकिन यही ठहाके उसको अन्‍दर तक झकझोर देते थे। वह खुद से ही सवाल करता क्‍या घर परिवार की देखभाल करना, पारिवारिक रिश्‍ते नातों को निभाना तथा पारंपरिक व्‍यवहार में शामिल होना कोई काम नहीं है। लेकिन इसका कोई उत्‍तर उसे नहीं मिल पा रहा था। 

समाज की मानसिकता से परेशान वह काम और कमाई के चक्‍कर में खुद ही पिसता चला जा रहा था। सभी जानते थे कि ये और वो में उमर का कितना अंतर है। समय के कारण ये को बिना किसी हुनर के आसानी से एक दफ्तर में काम मिल गया, लेकिन वो का समय आया तो काफी सारी योग्‍यताओं के बाद भी उसके तकदीर में मारे-मारे भटकना ही लिखा था। ये चार पैसे कमाता है तो घर में परिवार में उसकी अलग इमेज है और वो घर का इतना सारा काम करता है, हर किसी की मदद को तैयार रहता है तो उसकी कोई इज्‍जत ही नहीं करता। 

दरअसल सारा खेल धन माया का है। लक्ष्‍मी जिस पर मेहरबान है सब उसकी पूजा करते हैं,लेकिन घर में दिनभर पिसते रहने वालों को कोई नहीं पूछता है। सब कुछ छोड़कर वो ने अपना खुद का काम शुरू करने की ठानी, लेकिन किस्‍मत का भी अपना रोल हुआ करता है। घाटे के कारण छोटी-सी परचुनी दुकान भी ऑनलाइन खरीदी के इस दौर में फेल हो गई। वो पढ़ाई में ये से कई गुना तेज और आगे था, हरबार टॉप करने के बाद भी उसके पास एदद काम की कमी थी। 

यह सब समय का चक्र था कि अब ये और वो के सिर से पिता का साया उठ गया। अब ये के पास काम था, पैसा था और इसी पैसे की इज्‍जत थी, लेकिन वो को अब एहसास होने लगा था वह वास्‍तविक अनाथ हो गया है। जिसके पास कोई काम नहीं उसकी समाज और परिवार में कोई एहमियत नहीं। अभी तक बाप कमाई पर घरेलू काम देखने और दो वक्‍त की रोटियों का इंतजाम मुफ्त में करने वाले वो के ताने बढ़ थे। पिता की मातमपुर्सी के लिए जो भी आता उसे सिर्फ वो ही दिखता था, ये तो बस एक दिन पिता की मौत पर रूका और दूसरे ही दिन उठावना होते ही काम पर चला गया। यहां सभी वो को देखते और वो सभी को काम की निगाह से।

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...