(संजय भट्ट)
उसकी योग्यताओं में कोई कमी नहीं थी। पढ़ाई भी पूर्ण कर चुका था और उम्र के उस पड़ाव पर था जहां उसे एक अदद काम की तलाश थी। बाबूजी की नौकरी के किस्से सुन कर उसे उत्साह था कि वह भी कुछ बन कर दिखाएगा। इसके लिए सभी जगह हाथ पैर मार रहा था, लेकिन न तो उसकी सुनवाई भगवान कर रहे थे और न ही जहां आवेदन कर रहा था वहां कोई सुन रहा था। हमेशा निराशा ही हाथ लग रही थी, काम था तो बस इतना कि घर में सब्जी लाना, खाना, सोना और इधर-उधर नौकरी के लिए हाथ पैर मारना।
पिताजी अक्सर उसे यह बता कर बेरोजगारी का एहसास कराते कि उनके पिताजी मतलब उसके दादाजी गांव में अपने समय के इकलौते इंटर पास व्यक्ति थे। उनको सरकार के नुमाइ्ंदे घर तक लेने आए थे पॉलीटेक्निक करने के लिए। जब उन्होंने पॉलिटेक्निक की परीक्षा पास की तो तीन-तीन विभाग से नौकरी के लिए बुलावे आए। उन्होंने अपनी च्वाईस से नौकरी की। दादाजी की काबिलियित के आधार पर उन्हें लगातार प्रमोशन मिलते चले गए और अपने विभाग के प्रदेश में सबसे बड़े इंजीनियर के पद से रिटायर हुए। दादाजी के बाद उनकी बारी आई तो उन्होंने भी इंजीनियरिंग के लिए प्रयास किया, नम्बर हालांकि कम आए थे, लेकिन इंजीनियर तो बन गए। घर में दो जून की रोटी से समस्या से जूझता परिवार अब सम्पन्न परिवारों की गिनती मे आ गया था। उनका अपना रूतबा भी पैसों से बढ़ गया था, नौकरी में रहते कई अपने-परायों को उनकी योग्यता के मुताबिक काम दिलवाया, लेकिन आज उनका अपना बेटा ही नौकरी के लिए हाथ पैर मार रहा है और कोई सामने नहीं आ रहा कि उसको कोई काम ही मिल जाए।
लक्ष्मी तो हमेशा से चलायमान रही और जो चलायमान है उसे ज्यादा दिन तक रोक पाना किसी के बस में नहीं है। धीरे-धीरे जमा पूँजी और पेन्शन के सहारे उनका घर खर्च चल रहा था। जो कभी ब्रॉडेड बोतलबंद पानी के बिना कोई ऐसा-वैसा पानी नहीं पीते थे, आज वह अपने घर के नलकूप का पानी पी रहे थे। उनको लगता था कि चलो लोन से ही सही, लेकिन सही समय पर मकान बनाने की अकल आ गई थी, नहीं तो आज फिर लौट कर उसी झोपड़ी में जाना पड़ता जहां उनके पिताजी का बचपन गुजरा था। सब तरह से ठीक थे, लेकिन एक पिता की सबसे बड़ी चिन्ता उसके बेटे को सेटल करने की होती है। उम्र हो गई थी, लेकिन जहां भी शादी की बात करने जाते एक ही सवाल सामने आ जाता, बेटा करता क्या है। बस इसी सवाल ने उनकी रातों की नींद को छीन लिया था। वे दिन-ब-दिन कमजोर हो रहे थे। तमाम इलाज और अच्छे डॉक्टर की सलाह भी उनकी शुगर को नियंत्रित नहीं कर पा रही थी। कहा जाता है तनाव सबसे बड़ी बीमारी है, यह सैकड़ो उन बीमारियों को आमंत्रित कर लेता है, जिसका आपको पता भी नहीं होता। उनके साथ भी कुछ ऐसा ही चल रहा था।
सोंचते थे बेटे को किसी व्यापार में डाल दें, लेकिन व्यापार के लिए व्यापारी के गुण भी होना चाहिए, जो किसी शिक्षा से नहीं अनुभव से ही मिलते हैं। बिरले ही होते हैं, जो व्यापार और उद्योग में अपनी पढ़ाई के बलबूते पर सफलता पा लेते हैं। जब युवा थे तो लगता था कि बच्चे को पढ़ा लिखा कर योग्य बना देंगे और उनकी तरह कहीं नौकरी पा जाएगा तो बुढ़ापा अच्छे से गुजर जाएगा, लेकिन आने वाले समय का किसको पता होता है। सोंचने लगते थे उनके कितने व्यापारी मित्र थे समय के साथ बेटे को किसी व्यापारी के साथ काम सिखाया होता तो आज मारा-मारा न भटकना पड़ता। कुछ नहीं तो अपनी दाल रोटी का इंतजाम खुद तो कर लेता। अब उनकी पेंशन पर ही सारा दारोमदार था। पढ़ लिख कर योग्य बनने के साथ ही आज के जमाने में हुनरमंद होना भी जरूरी हो गया था, लेकिन हुनर भी ऐसा हो कि खुद कुछ कर सके, किसी के आसरे वाला नहीं हो। फिर आजकल पढ़ लिख कर कोई ऐसा काम करना पसन्द नहीं करता जो उसकी पढ़ाई की योग्यता को नकारता हो। हालांकि पढ़ाया तो यही जाता है कि कोई भी काम छोटा यो बड़ा नहीं होता, लेकिन फिर भी योग्यताधारियों को लगता है कि यह काम उनकी योग्यता को कम करता है तो उसे करना थोड़ा परेशान कर देता है।