बुधवार, 19 अक्टूबर 2022

ये शौक गजब की चीज है

(संजय भट्ट)

हर आदमी का अपना शौक होता है। किसी को मजेदार, किसी को सेहत खराब करने वाला तो किसी को रसहीन पर कोई माने या ना माने शौक सब को होता ही है। यह गरीब-अमीर, ऊॅंच-नीच और जात पात के साथ धर्म और समाज भी नहीं देखता। यह देखता है तो सिर्फ इंसान और उसकी आदत। वैसे यह शौक पैदाईशी भी होता है और बाद में बेवफा भी हो जाता है। कई लोग कई काम सिर्फ शौक से करते हैं और कहते भी है कि यह तो शौक है अन्‍यथा मेरा तो मुख्‍य काम यह नहीं है।


हर किसी को जो शौक होता है वह बड़ा ही अजीब और निराला होता है। कोई काम से बचने के लिए शौक रख लेता है तो कोई काम करने के लिए शौक वापरता है। उन्‍हें अजीब तरीके का शौक हुआ बीमार पड़ने का और उस बीमारी के जरिए से दोस्‍तों को परखने का। वे आए दिन बीमार हो जाते। कभी किसी बीमारी से तो कभी किसी बीमारी से। उनको सर्दियों के दिनों में एकाएक एहसास हुआ कि सर्दियों के सीजन में सर्दी नहीं हुई तो क्‍या हुआ।


उन्‍होंने बकायदा इसका इंतजाम कर लिया। सर्दी कैसे न होती जब आ बैल मुझे मार कर ही लिया तो सर्दी को तो होना ही था। उनका काम इधर उधर घूमने का था। जानबुझकर सर्दियों में उन्‍होंने कनटोप और स्‍वेटर ले जाना उचित नहीं समझा। पत्‍नी ने याद भी दिलाया तो उसे कह दिया मैं इतना भी गया गुजरा नहीं कि सर्दी मुझे छू भी ले। फिर उन्‍होंने अपने इंतजाम के मुताबिक काम किया। गर्मियों के दिनों में वे काफी घूम लेते थे, लेकिन सर्दियों में ज्‍यादा दूर नहीं जाते। उन्‍होंने उस दिन रात को देर से घर पर पहुँचने की ठानी और निकल पड़े अपनी मोटर साईकिल पर। चलते हुए दिन में पहुँच ही गए अपने गंतव्‍य तक, लेकिन रात को देर में आना था तो सुनसान सड़क देखी और खोल दिए शर्ट के बटन। अब ठंड तो लग रही थी, लकिन शौक का मजा भी निराला था।


उन्‍हें अगले दिन सर्दी हो गई। बीमार पड़ गए। नाक बहने लगी और सिर दर्द करने लगा। किसी काम में मन नहीं लगता था। इधर उधर नाक साफ करते और फिर पानी की धार शुरू हो जाती। सर्दी से परेशान थे, लेकिन सभी को पता था कि उनकी बीमारी में हाल नहीं जाना तो खैर नहीं होगी। जिसको भी पता चलता कि वे बाजार से गायब हो गए है, तो उनके पक्‍का ही होता था कि वे बीमार पड़े होंगे। हर कोई उनका हाल पूछने उनके घर की ओर रूख कर देता। एक तो सर्दियों से सिर भारी और दोस्‍तों, परिचितों को आना जाना। न बात हो रही है और न हाल बता पा रहे हैं। जो भी हाल है वह सबके सामने है। परिचित खबरचियों ने भी खबर फैला दी कि श्रीमान को सर्दी हो गई है। नाक बह रहा है और दर्द के मारे सिर फटा जा रहा है। सभी ने हाल जानने की कोशिश की, लेकिन हाल था कि खुद ही बयां हो रहा था। उनकी चिड़चिड़ाहट बढ़ती जा रही थी और पत्‍नी के ताने उसको और बढ़ा रही थी। वो आने जाने वालों से घबराने लगे थे। उनके शौक को पलीता लग रहा था। शौक शौक में बीमारी को बुलवा तो लिया, लेकिन बीमारी ने जब रंग दिखाना शुरू किया तो उनका पारा बढ़ने लगा। उन्‍होंने सर्दी को निमंत्रण दिया था, लेकिन सर्दी के साथ कफ, खांसी और बुखार का पैकेज मुफ्त में मिल गया।


लोगों की पूछताछ के बाद शुरू हुआ डॉक्‍टरों के चक्‍कर का दौर। कभी इसको तो कभी उसको बताते फिर रहे थे, लेकिन सर्दी ने भी ठान लिया था कि किसी ने इतने प्‍यार से बुलवाया है तो इतनी जल्‍दी कैसे चले जाएं। पूछताछ वालों की सलाह अगल सिर खुजाने पर मजबूर कर रही थी। कोई कह गया दोस्‍त हल्‍दी वाला दूध पियो, दो दिन में सर्दी साफ। किसी ने कहा छूआरे(खजूर-खारक) का दूध पियो सर्दी पास नहीं आएगी। पहले बीमारी का इंतजाम किया था अब उसे दूर करने का इंतजाम करना पड़ रहा है। सारा हिसाब बिठाया गया, लेकिन सर्दी ठीक होने का नाम नहीं ले रही थी। डॉक्‍टर भी हैरान थे कि आखिर यह मामला क्‍या है।


बीमारी को ठीक करने और दूध के चक्‍कर में खाना पिना कम हो गया। खर्चा लगातार बढ़ रहा था और काम पर नहीं जाने से आमदनी लगतार कम हो रही थी। वो कहीं के रईस तो थे नहीं जो घर बैठे सारा काम हो जाता और खर्चा भी बेपरवाह कर देते। परेशानी को बुलावा मंहगा पड़ने लगा था। अब उनको अपने शौक का अंदाजा हो गया था कि उन्‍होंने बड़ा मंहगा शौक पाला है। शौक तो फिर शौक है, जो भी हो उसका मज़ा अलग ही होता है।

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Very nice

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...