शुक्रवार, 14 अक्टूबर 2022

चश्‍में की क्लियरिटी

 

(संजय भट्ट)
कुछ लोगों को चश्‍में के बाद भी दिखाई नहीं देता और कुछ को बिना चश्‍में के। बहुत कुछ होता है आसपास ही, लेकिन दिखाई दे तो दुख नहीं दिखाई दे और देखने वाला वर्णन कर दे तो नहीं देखने का दुख। ऑखों की माया भी गजब की है। हर किसी को हर कुछ दिखाई नहीं देता और कुछ लोागों को साफ दिखाई नहीं देता। जिनको साफ दिखाई नहीं देता उनकी देता ऐसे लोग दो क्‍वालिटी के होते है, पहले जिनको पास का दिखाई नहीं देता और दूसरे जिनको दूर का दिखाई नहीं देता। इन सभी को डॉक्‍टर चश्‍मा लगाने की सलाह देते हैं। अब चश्‍मा चढ़ जाता है तो चश्‍मा जो दिखाई वही साफ होता है, चाहे दूसरे को खुली ऑंख से दूसरा ही कुछ दिखाई दे। 
अभी कुछ ऐसी ही बहस चल रही थी। कुछ लोग माता के भक्‍त थे तो कुछ पुजारी अब भक्‍तों और पुजारियों को अलग-अलग दिखाई दे रहा था। भक्‍तों को माता दिखाई दे रही थी तो पुजारियों को भक्‍तों में माता का स्‍वरूप दिखाई दे गया। किसी ने हार फूल और मंत्रोच्‍चार से माता की आराधना की तो किसी ने उच्‍च शब्‍दों वाली गालियों और तेल पिलाए लट्ठ से पूजा की। दोनों की भक्तिमय आराधना थी। माता के भक्‍त माता को बचाने में लगे थे तो पूजारियों के भक्‍त पूजारियों की भक्ति के माध्‍य‍म से अपनी शक्ति का प्रदर्शन करने में। माता का नवरात्रि दरअसल थी तो शक्ति की ही पूजा, दशहरे को ना सही बीच मे सही कई भक्‍तों ने अपने हिसाब से शस्‍त्र पूजा कर ली। कुछ बेचारे शास्‍त्रों के चक्‍कर में पड़े रहे। जो शास्‍त्रों के चक्‍कर में थे उनको अपनी आराधना से मतलब था और जो शस्‍त्रों के चक्‍कर में थे उनको अपनी शक्ति और असल भक्ति का परिचय देना था। 
जिसका जैसा चश्‍मा था उसको माता का वैसा स्‍वरूप दिखाई दिया। बहस चश्‍में की क्लियरिटी पर भी थी। भक्‍त मान रहे थे कि उनकी आराधना के तपोबल से सब कुछ हो रहा है, लेकिन दूसरों को व्‍यवस्‍था में आराधना दिखाई दे रही थी। कुल मिला कर सभी को अपना चश्‍मे की क्लियरिटी पर पूर्ण विश्‍वास था। कोई टस से मस होने को तैयार नहीं था कि किसी को सही भी दिखाई दे रहा हो। इनमें सबसे ज्‍यादा फजीहत तो उनकी थी जिनको बिना चश्‍में के सही दिखाई दे रहा था। उन्‍हें माता के दोनों स्‍वरूपों के दर्शन साफ-साफ हो रहे थे, लेकिन चश्‍मे धारियों का अपना तर्क था। वास्‍तव में बिना चश्‍में वाले दर्शकदीर्घा में ही थे मुख्‍य कार्यक्रम तो चश्‍में वालों का ही था। बिना चश्‍में वाले वैसे भी चश्‍मेंवालों से थोड़ी दूरी बनाना ही पसन्‍द करते हैं, क्‍योंकि उनको पता होता है कि चश्‍मे वाले उनकी बात कभी नहीं मानेंगे और जब उनके पास न दूर का चश्‍मा है और न ही पास का तो पता नहीं उनको भी अपनी ऑंख टेस्‍ट करवाना चाहिए या नहीं। 
हरेक चश्‍में वाला चश्‍मा लगाने के बाद यह मानने लगता है कि उसके चश्‍में से जो दिख रहा है वही सही है। दूसरे चाहे जो वर्णन कर दें, कानूनी पाठ भी पढ़ा दे, लेकिन उनको डॉक्‍टर और चश्‍में पर इतना भरोसा होता है कि किसी दूसरे की बात मानने को तैयार नहीं होते। कुछ अगर यह मानने भी लगे कि उनके चश्‍में का नम्‍बर बदल गया होगा तो उसी नम्‍बर के चश्‍में वाला अपना चश्‍मा उतार कर उसे टेस्‍ट कर लेने का कह देता है और उसको भरोसा दिलवा देता है कि उसका चश्‍में जो दिख रहा है उससे बेहतर सच कोई हो ही नहीं सकता। जब सच पर भरोसा पक्‍का हो जाए तो अपने चश्‍में की क्लियरिटी पर भी पूर्ण विश्‍वास जाग जाता है। 
चश्‍में को लेकर भी अलग-अलग विद्वानों के अलग-अलग मत सामने आए हैं, कुछ का मानना है कि जब जरूरत हो तो चश्‍मा लगा लो जब जरूरत नहीं हो हटा लो। लेकिन इसी के ठीक उलट दूसरे विद्वानों का मानना है कि जब आपने एक बार अपना चश्‍मा धारण कर ही लिया है तो उसे उतारना नहीं चाहिए क्‍या पता रात को सपने में भी कुछ देखने की जरूरत पड़ जाए और चश्‍में के बिना आप कुछ अलग देख बैठे और आपकी अंतरात्‍मा में परिवर्तन आ जाए। तीसरा पक्ष और भी है,जिसका मनाना है कि समय-समय पर ऑंखों की जॉंच करवाते रहना जरूरी है, क्‍योंकि चश्‍मा तो कृत्रिम है कभी भी नम्‍बर बदल सकता है और आपको साफ दिखने वाली वस्‍तु भी धूंधली हो सकती है। इसलिए चश्‍में की क्लियरिटी पर कम और ऑंखों की क्लियरिटी पर ज्‍यादा विश्‍वास रखना जरूरी है।

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