रविवार, 8 जनवरी 2023

बदलती हवा का रूख

हवा जब चलती है तो अपने साथ खुशबू और कचरा दोनों को लेकर उड़ती है। हवा का अपना कोई रूप रंग नहीं होता वह पानी की तरह निर्मल और साफ होती है, लेकिन वह कहां से गुजर रही है, उसे क्‍या मिला यह सवाल मजबूत होता है। जब वह किसी गुलशन से गुजरती है तो उसके साथ वहां की खुशबू दूर-दूर तक फैल जाती है, लकिन जब वह रेगिस्‍तान से गुजरती है तो अपने में कई बवंडर समेट लेती है।जब वह हमारे फैलाए कचरे से गुजरती है तो वह कचरा अपने साथ उड़ा ले जाती है। यह धूल और कचरा कोई पसन्‍द नहीं करता, लेकिन खुशबू के सभी दिवाने होते हैं। जैसा कि कहा गया है पानी का भी कोई रंग नहीं होता है, उसे जिस रंग के साथ मिला दो वह उस रंग का हो जाता है। पानी को भी हवा एक स्‍थान पर ठहरने नहीं देती। वह अपने साथ उसकी बूंदों को समेट कर कहीं बादलों के साथ मिल जाती है और बरसात कर देती है तो कहीं सूखा छोड़ देती है। यह प्रकृति है, जो कुछ मांगने की चाहत नहीं रखती, उसका सब कुछ देने के लिए ही होता है।

आज का मानव अपनी बुद्धि के बल पर इसे कब्‍जे में करना चाहता है, लेकिन इसकी सुन्‍दरता अपनी आजादी और खुलेपन में ही है। इसे जितना सताओगे वह उतना ही परेशान करेगी, क्‍योंकि यह लेने की नहीं देने की चाहत रखती है और मानव इससे लेना ही जानता है। वह इससे इतना कुछ ले चुका है, लेकिन उसके लेने की चाहत अभी भी बरकरार है। इन्‍सानी फितरत है, ले कर खुश हो जाता है और लौटाने की बारी आती है तो भाग जाता है।
यह हवा जब साधारण चलती है तो किसी को भी परेशान नहीं करती, लेकिन जब हवा का रूख बदलने लगता है तो सभी को बदलना पड़ता है। अब हवा नफरत की डोर के शिकंजे से आजाद होकर खुले में बहने लगी है। हवा के इस बदलते रूख को पहचान लिया गया है, इसीलिए तो तोते की तरह दिनरात एक ही नाम जपने वालों ने भी दूसरे नामों का इज़हार करना चालू कर दिया है। यह हवा अपने साथ अभी तक जो बहा कर ला रही थी वह कहीं सूखे पत्‍तों पर जम गया है। लेकिन निर्मल पानी की बूँदे जब तक नहीं गिरेगी तब तक हवा के साथ बहकर आई धूल और कचरे के गुबारों को हटा पाना संभव नहीं होगा। हवा तो अपनी गति से चलती है और जिसके साथ रहती है उसमें अपने को समाहित कर लेती है, लेकिन इसके साथ समाहित होने वाले थक कर इसका साथ अधूरे में छोड़ देते हैं। यह चलती रहती है, थकती नहीं, लेकिन जिस दिन थक कर रूक गई उस दिन आम आदमी की सांसे बंद हो जाएगी। हर ओर हा हा कार मच जाएगा, जिन्‍दगी मौत से मुकाबला नहीं कर पाएगी।
हवा को कुछ लोगों ने अपने पंजों में दबा लेने की कोशिश की इसमें जहर भर कर इसे उड़ने के लिए मजबूर किया जा रहा था, लेकिन हवा को अपनी जिम्‍मेदारी का एहसास है और वह अपना रूख बदलना भी जानती है। इसने अपना रूख बदलना शुरू कर दिया है, यह खुले में बह रही है और दबाव से मुक्‍त होकर अपनी उपस्थिति का एहसास करवाने लगी है। कुछ लोग हमेशा हवा के रूख के साथ अपना रूख कर लेते हैं क्‍योंकि वह जानते हैं हवा के साथ रहोगे तो जिन्‍दगी रहेगी, लेकिन अगर इसका साथ छोड़ दिया तो जिन्‍दगी भी साथ छोड़ देगी। हवा अपना रूख बदलने के पहले अपने बदलाव के संकेत जरूर देती है, लेकिन जो इसे समझता है वही सफल होता है और जो इसे नहीं समझ पाता वह लूढ़क जाता है।
हवा भी कई तरह की होती है, यह कभी सियासी रंग में रंग जाती है तो कभी सामाजिक ढंग को अपना लेती है। इसके भी स्‍वरूप बदलते रहते हैं यह बार-बार का बदलाव इसकी फितरत में शामिल है, कुछ ही पंडित है जो इसको समझ जाते हैं और पाला बदल लेते हैं, लेकिन इसको समझ पाना भी इतना आसान नहीं है। यह कब अपना रूख बदल ले, कब अपना सामान्‍य रूख छोड़कर विकराल रूप धारण कर ले, कोई नहीं जानता। कब अपने साथ बर्फीला तुफान ले आए और कब शुष्‍क होकर सांसे अटका दें। इसलिए इसको अपने हिसाब से बहने देने में ही फायदा है, यदि इसको रोकने और इसके साथ छेड़छाड़ का प्रयास किया तो यह कब उखाड़ फैंके कुछ कहना मुश्किल है।
                                          संजय भट्ट

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Very nice

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