बुधवार, 11 जनवरी 2023

दौड़ते घोड़ों का टारगेट

यूँ तो टारगेट कई तरह के होते हैं, लेकिन इन दिनों सभी की नौकरी टारगेट के आधार पर हो गई है। लक्ष्‍य तय करने वाले व्‍यक्ति को यह पता होता है कि काम होना है, लेकिन इसके लिए क्‍या आवश्‍यक सुविधा है, कहॉं आवश्‍यक सुविधा नहीं है, यह लक्ष्‍य कैसे हांसिल होगा इसका कोई अनुमान नहीं होता है। मान लिया जाता है कि सभी के पास सुविधा है और सभी इसको आसानी से हांसिल कर लेंगे, लेकिन ऐसा होता नहीं है। जब ऐसा नहीं होता है तो टारगेट तय करने वाले व्‍यक्ति का कुछ नहीं बिगड़ता। बिगड़ता है तो सिर्फ उसका जो उस टारगेट को हांसिल करने के लिए अपनी पूर्ण शक्ति का उपयोग कर के भी पीछे रह जाता है। सब कुछ घुड़दौड़ जैसा होकर रह गया है। सभी को एक ही लक्ष्‍य की मेरा घोड़ा आगे रहना चाहिए, लेकिन आगे तो सिर्फ एक को ही आना होता है बाकी सभी तो पीछे ही रहना है।
लक्ष्‍य तय करने वाले के लिए यह सबसे सुन्‍दर क्षण होते है, जब इसकी समीक्षा की जाती है कि किसका घोड़ा कितना तेज दौड़ पाया। एक को छोड़ सभी को फटकार लगा कर लक्ष्‍य तय करने वाला बेहद खुश हो जाता है, लेकिन दुखी वे भी नहीं होते जिनके घोड़े इस दौड़ में पिछड़ गए है। सभी के पास अपना एक तर्क होता है और तर्क देने वाले व उस तर्क को सुनने वाले दोनों को पता होता है कि एक दूसरे को संतुष्‍ट नहीं कर पाएंगे, लेकिन फिर भी तर्क तो होते हैं। फटकार सुनने वालों के नीचे भी कुछ काम करने वाले होते हैं, वे उनको फटकार लगा कर अपनी बेइज्‍जती को इज्‍जत दे देते हैं।
कोई भी मशीन है तो मानव निर्मित ही और मानव निर्मित मशीन की भी अपनी क्षमता होती है, वह उससे अधिक का लोड सहन नहीं कर सकती है। यह सभी को पता है, लेकिन फिर भी इस मशीनी युग में सभी कुछ इंटरनेट और मशीनों के भरोसे पर चल रहा है। जो मशीन कह रही है वह सही है, शेष सभी को झूठा साबित कर दिया जाता है। कुछ आंकड़ों के बाजीगर होते हैं, उनको यह वरदान मिला होता है, वह कभी भी अपना घोड़ा उस दौड़ में पिछड़ने नहीं देते हैं। यह आंकड़ों के बाजीगर ही साफ सुथरा, ईमानदारी से किए जाने वाले काम को पछाड़ने में माहिर होते हैं। लक्ष्‍य तय करने वालों को भी पता है कि आंकड़ों के बाजीगर ही सफल होंगे , लेकिन वह भी मशीनों के इतने गुलाम हो गए है कि उनको भी मशीन मिली जानकारी सही लगती है।
मशीनों से लौ लगाने वालों की हालत इस दौर में सबसे कठिन हो गई है, वे अपनी मोमबत्‍ती लेकर बैठे रहते हैं, ईमानदारी का ढोल पीटते हैं, लेकिन उन्‍हें कभी बिजली मईया धोखा दे जाती है तो कभी इंटरनेट की चाल से परेशान हो जाते हैं और सबसे आगे रहते हैं सर्वर भय्या जो अपनी ताकत से सब को हैरान करने से नहीं चूकते हैं। इनकी ताकत के आगे सभी बौने साबित हो जाते हैं। कभी कभी तो यह लक्ष्‍य निर्धारित करने वालों को भी धोखा दे देते हैं। तब कहीं जाकर लक्ष्‍य की अंतिम तिथि बढ़ पाती है। जब लक्ष्‍य की अंतिम तिथि बढ़ जाती है या समीक्षा की तारीखों में इजाफा हो जाता है तो सबसे ज्‍यादा खुशी उनको होती है, जिनके घोड़े पीछे रह जाते हैं। उन्‍हें इतनी खुशी होती है, जैसे हार्ट अटैक के बाद किसी की जान बच जाए। बस सब खेल तो समय का है, समय रहते वे पीछे रह गए थे और समय के साथ वे बराबरी कर लेते हैं।
कछुए और खरगोश वाली कहानी यहां भी जोरों से चलती है। कभी कछुआ आगे तो कभी खरगोश आगे निकल जाता है, अब सभी को इसकी आदत हो गई है, कोई फटकार को अपनी बेइज्‍जती नहीं मानता और कोई आगे निकल आने की खुशी नहीं मनाता। फटकार सुनने वाले कछुओं की खाल पहले से मोटी होती है और इन पर किसी भी फटकार का कोई असर नहीं होता है। सब काम अपनी गति से होता है, लेकिन फिर भी घोड़ों की दौड़ सिर्फ अपने लक्ष्‍य निर्धारण करने वाले मालिक की जी हजूरी और उनकी रेंक में चार चाँद लगाने के लिए होता है। शायद ही कोई ऐसा बचा होगा, जिसको फटकार नहीं लगी होगी। कोई कहीं आगे होकर खुश हो जाता है तो कहीं दूसरी ओर फटकार से बच कर अपनी शेखी बघार रहा होता है। ऐसे में सबसे ज्‍यादा मरण तो उन दौड़ने वाले घोड़ों का है, जिनको यह सारी फटकार का असर सहन करना होती है तथा घर-परिवार, बच्‍चों से दूर कर काम करते हुए भी  फटकार ही सुनने को मिलती है।

-    संजय भट्ट

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Very nice

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...