(संजय भट्ट)
रविवार, 15 जनवरी 2023
पराई थाली में झलकता घी
जब भी देखो पराई थाली में घी ज्यादा ही दिखाई देता है। अपनी अपनी खिचड़ी सब को सूखी ही दिखती है। अब ये काई छोटी मोटी समस्या नहीं है। इससे हर आदमी दुखी है। घर में परिवार में यहां तक की खाने की एक टेबल पर पति पत्नी भी। क्या करें अब दिखाई देता है तो नजरिया बदल लो, लेकिन यह स्वाभविक प्रकिया है, इसमें सुधार का मतलब भगवान की कृति पर संदेह करना। जो भी बनाया भगवान ने ही ऐसा बनाया, अब किसी कंपनी डिफेक्ट का क्या सुधार जो वहीं से खराबी आई है उसको रिप्लेस ही किया जा सकता है। चूंकि मानव भगवान की कृति है और नो वारंटी, नो गारंटी, जैसा है रखना पड़ेगा और एक बार भेजे गए आइटम में वापसी की कोई शर्त शामिल ही नहीं होती है। उसमें जो है, वह मुझमें क्यों नहीं, क्या मैं नहीं कर सकता, मुझे चैलेन्ज मत करना ऐसी भावनाएं सभी के अंतर मन में कभी न कभी उद्वेलित होती है। बस सब भावनाओं का खेल ही तो है। कुछ समझदार इस खेल के माहिर होते हैं, कब, कैसे और किसके साथ खेलना है, कैसे जीतना और किसको जितवाना है, सब गणित बैठा कर खेल की शुरूआत कर देते हैं। खासियत यह कि यह खेल खुद नहीं खेलते बल्कि इनकी तरफ से इनके खिलाड़ी खेलते हैं, खिलाड़ी क्या मोहरा कहो, जो शह और मात को समझे बिना मैदान में उतर जाते हैं और फिर नतीजा जो भी हो, इसकी परवाह नहीं करते।
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Very nice