गुरुवार, 19 जनवरी 2023

क्रिकेट में धोती की एंट्री

 क्रिकेट यूँ तो अंग्रेजों का खेल है, लेकिन हमारे यहां भी गली-गली में छा गया है। गलियों का बादशाह बनने के बाद भी यह खेल अपनी अंग्रेजियत को नहीं छोड़ पा रहा था। इसको लेकर फिल्‍मों में भी जिक्र किया गया, लेकिन अब इसे धरातल पर उतार दिया गया है। इस खेल का धोती कुर्तें में भारतीय सं‍स्‍कृति का नया वर्जन सामने आया है। इस खेल में गेंद बनाने के लिए यूँ तो पहले कठोर चमड़े और कॉक जैसे पदार्थो का उपयोग किया जाता रहा है, लेकिन जब से यह खेल गली मोहल्‍लों की शान बना है, इसमें भी संशोधन हो गया है। अब कठोर गेंद का स्‍थान एक और विदेशी खेल टेनिस का समावेश करते हुए गेंद का रूपांतर कर दिया गया है। खास बात यह है कि पहले गेंद को मारने के लिए हाथों में जोर और मन में भी बॉल जितनी कठोरता का जोश होना जरूरी था। इतने पर भी चौकों-छक्‍कों की बरसात नहीं होती थी और यह बहुत ही तामझाम वाला खेल हो गया था। कई तरीके के साधनों की जरूरत होती थी, मुँह को, हाथ को, पैर को और अन्‍य नाजुक स्‍थानों को बचाने के लिए विभिन्‍न प्रकार के महंगे उपकरणों के साथ यह खेल अंग्रेजियत का ही परिचारक रहा है।
हम ठहरे भारतीय और भारत की आत्‍मा तो गांवों में बसती है। ग्रामीण स्‍तर पर ही हमारी संस्‍कृति बची हुई भी है, नहीं तो शहरों में अंग्रेजी स्‍कूलों और अंग्रेजी में पहचान बनाने के लिए अंग्रेजियत के रंग में रंगते जा रहे हैं। हमारे ग्रामीण क्षेत्रों में भी प्रतिभाओं की कमी तो है नहीं उनमें भी चस्‍का तो रहता ही है। फिर काम्‍पीटिशन की भावना भी हमारे बीच कूट-कूट कर भरी होती है। किसी के मुकाबले कम समझने की बिल्‍कुल आदत नहीं है और कम समझे भी क्‍यों, जो वो कर रहे हैं, हम क्‍यों नहीं कर सकते आखिरकार वे भी तो हमारी तरह हाड़ मास के पूतले ही है। ये दिगर बात है कि उनके पास पैसा और सुविधा हम से ज्‍यादा है। मुकाबला करना और अपने शौक को जिन्‍दा रखते हुए उसे अपने तरीके से जीना हमारे खून में रच-बस गया है। हम सब कुछ कर सकते हैं, लेकिन अपने खून और स्‍वभाव से गद्दारी नहीं कर सकते।
हमने पहले दो अंग्रेजी खेलों को मिला कर अपना नया क्रिकेट शुरू कर दिया। इसमें मौज मस्‍ती और उसी उल्‍लास के साथ चौकों-छक्‍कों की बरसात ने जीवन में नया आनन्‍द ला दिया। नया करना भी कोई हमसे सीखे। अब शौक भी था, क्रिकेट भी था और खेलने के लिए सुविधाओं अभाव में तामझाम कम करने का जुनून भी था। हमने गेंद बदल दी, बल्‍ले की जगह कपड़ों को कूटने वाले धौने के दे दी, विकेट के लिए स्‍टम्‍प का स्‍थान पेड़ों की लकडि़यों को दे दिया। इतना सब करने के बाद भी लग रहा था, खेल तो विदेशी ही है। इसको देसी कैसे बनाया जाए। हमारी भाषा और संस्‍कृति से कैसे जोड़ा जाए बस यही जोश और जुनून बढ़ता गया।
कुछ दिनों पहले हिन्‍दी भाषा में डॉक्‍टर बनने लगे तो हमारे दिमाग की बत्‍ती जल उठी। कॉमेन्‍ट्री को अपनी भाषा और वह भी प्राचीन भाषा संस्‍कृ‍त में कर संस्‍कृति को बचाने का प्रयास होने लगा। हमने सोंचा पेन्‍ट, शर्ट और अन्‍य तामझाम को भी दूर क्‍यों नहीं किया जा सकता है। ठेठ हमारी संस्‍कृति से जोड़कर हमने इसको नया स्‍वरूप दे दिया। हमारी ग्रामीण संस्‍कृति में धोती-कुर्ता हमारी पहचान है, फिर कुछ ज्‍यादा तामझाम और सामान की जरूरत भी नहीं हमने धोती कुर्ते में क्रिकेट का खेल शुरू कर दिया। जब सब कुछ बदल सकता है तो धोती कुर्ते में क्रिकेट क्‍यों नहीं खेला जा सकता है। कॉपी पेस्‍ट के जमाने में इसे अपना लिया गया तो डर है घायल खिलाडि़यों की संख्‍या को देखते हुए इसमें ग्‍यारह की जगह बाईस खि‍लाडि़यों को लेकर जाना पड़ेगा, क्‍योंकि ग्रामीण प्रतिभाओं की तरफ तो कोई झांकता नहीं और बिना तामझाम के दूसरे लोग इसे खेल नहीं पाऐंगे। जब दूसरे नहीं खेल पाऐंगे तो राष्‍ट्रीय और विश्‍व विजेता हम ही होंगे। वैसे भी हमने आज तक जो भी किया है, उसकी पहचान दुनियाभर में हुई है।  
                                         - संजय भट्ट

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Very nice

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