सोमवार, 5 दिसंबर 2022

वादा तेरा वादा

                                (संजय भट्ट)

वादों का मौसम कभी खत्‍म नहीं होता है। कभी भी किसी से वादा कर सकते हैं। वादों का क्‍या है कभी भी टूट जाते हैं। सपने ही तो दिखाना है और फिर सपने भी किसी के साकार हुए है। रात गई बात गई की तरह होते हैं। वादों का मौसम आता है,खूब वादे होते हैं, खूब सारे सपने दिखाए जाते हैं और मतलब निकल गया तो पहचानते नहीं की तरह वादों को भूलना होता है। कभी कोई याद भी दिला दे तो उसे मजाक में उड़ा दिया जाता है।
वे इसी तरह के सपने दिखाने और वादों के लिए मशहूर थे। उनका काम ही सपनों के सौदागर बन कर वादे करना और काम निकल जाने पर अगले और चार वादे गिनाने की आदत सी हो गई थी। हर बार लोग उनके वादों के झांसे में आ जाते थे और वह अपना काम निकाल कर चल देते थे। लोग उनके वादों में दिखाए सपनों में इस कदर खो जाते थे कि सावन के अंधे की तरह हर तरफ सिर्फ हरा ही हरा दिखाई देता था। जब वे वादा करते थे तो इतने कान्फिडेन्‍स के साथ बात को रखते थे कि लोगों को लगता बस यही हकीकत है। वे वादों में सपनों के साथ खौफ भी परोस देते थे ताकि लोगों को उन पर भरोसा न चाहते हुए भी हो जाता था। कभी लाखों का सपना दिखाते तो कभी सुहाने दिनों की याद दिला देते थे। लोगों को लगने लगा था कि वे ही उनके तारणहार होंगे।
इस दुनिया में कौन ऐसा होगा जिसको परेशानी नहीं होगी, हर आदमी किसी न किसी परेशानी से रूबरू हो रहा होता है। किसी को जरूरत की परेशानी है तो किसी को जो उसके पास है उसे सम्‍हालने की परेशानी हर तरफ परेशानी ही परेशानी और ऐसे में कोई उस परेशानी की दुखती नस को दबा कर कह भर दे कि उसकी परेशानी का हल जानता है और उसका काम हो जाएगा तो वह उसकी परेशानी का भी हल कर देगा। बस यही तकनीक होती है। सपनों में उलझा कर अपने काम को निकलवाने की। आम आदमी बेचारा क्‍या जाने कि किसी के मन में क्‍या है। वह भोला सा निरीह ठगा प्राणी कहीं भी ठगाने को मजबूर होता है। उसे पता होता है कि सब उसे ठगने के लिए ही दिखावा हो रहा है, फिर भी वह खुद को ठग लेने के लिए समर्पित कर देता है। उसे उस ठगोरे में अपने सुहाने दिनों की छवि और भय मिश्रित आनंद की अनुभूति होती रहती है। इसी खुशी के मारे वह हर बार ठगाने को आमादा रहता है। उसे लाख कोई समझाए कि वह तुम्‍हें ठग रहा है, लेकिन वह ठगाने को अपना धर्म समझता है और ठगाकर घर आ जाता है।
जब सपनों की दुनिया से हकीकत में आता है तो उसे पता चलता है कि जो पानी का समन्‍दर उसने देखा था वह तपती रेत में बदल गया है। उसके हाथों में वही सुबह का टिफिन और काम जाने की तत्‍परता के साथ बीबी बच्‍चों के खाली पेट और खुद की खाली जेब दिखाई देने लगती है। जैसे ही नींद से जागता है उसे एहसास हो जाता है कि वह ठगा गया है, लेकिन जब चिडि़या खेत चुग रही होती है तो उसे पता भी नहीं चलता कि उसके खेत का एक भी दाना उसे नहीं मिलेगा। ठगोरा उसकी कमाई पर अपना ऐश कर होता है वह पछताया हुआ सा अपना काम धंधा देख रहा होता है। ठगोरों की दुनिया बहुत ही खुबसूरत होती है, वह किसी जादूगर की भांति अपनी चकाचौध से ऐसे कारनामें प्रस्‍तुत करता है कि बेचारे को ठगाने में आत्‍मसमर्पण करने के अलावा कुछ नहीं दिखता है।
किसी फिल्‍म वाले ने तो बकायदा अपनी फिल्‍म में गाना रख कर समझाने की कोशिश भी कि थी कि और कहा था कि 'वादा तेरा वादा वादे पे तेरे मारा गया बंदा ये सीधा सादा।' लेकिन फिर भी वादों का सब्‍जबाग इतना सुन्‍दर होता है कि मृग मरीचिका की जैसा चारों रेत का संसार भी पानी से लहराता समुद्र दिखाई देने लगता है। अब अंधा क्‍या मांगे एक आंख से दिखने की घोषणा ही उसको अंधे से काणा बनाने के लिए काफी होती है। प्‍यासे को पानी की चार बूंदे भी संसार में बारिश का एहसास करवा देती है। यही हालत ठगोरों की होती है, वे प्‍यासे को चार पानी के छींटे मार कर उसे बारिश में नहाने का एहसास करवा देते हैं और अपना काम निकलवा लेते हैं।
ठगने वालों का बकायदा समूह होता है और सारा समूह इतना एकजूट होकर काम करता है कि कोई भी ठगोरा उस समूह से बाहर दिखाई नहीं देता है। हर किसी का उद्देश्‍य बस इतना होता है कि वह ठगने में कितना सफल होता है। जो सफल हो जाता है वह फिर अपने वादे को भूलने का प्रयास करता है और जो असफल होता है वह दूसरे के किए वादों की याद दिला कर उस ठगे हुए आदमी के जख्‍मों को तब तक हरा करता रहता है, जब तक कि उसे ठगने में सफलता नहीं मिल जाती। वैसे ठगने के मौसम व स्‍थान बदलते रहते हैं और यह समय के इंतजार में र‍हते हैं। इन ठगे हुए व्‍यक्तियों की हालत उस तोते की तरह होती है, जिसे सिखाया और रटाया जाता है कि'शिकारी जंगल में आता है, जाल फैलाता है, उसके जाल में नहीं फंसना है' लेकिन फिर भी वह जाल में फंस कर भी यही रटता र‍हता है।

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Very nice

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