रविवार, 7 मई 2023

डूबते भविष्‍य के संस्‍कार

 

नौकरी में आकर ईमानदारी से काम शुरू किया था, लेकिन जैसे-जैसे उम्र बढ़ती गई उसे अपने भविष्‍य की चिन्‍ता सताने लगी। नौकरी की शुरूआत में विवाह नहीं हुआ था, तो जिम्‍मेदारियों का बोझ भी कम था।  पिता भी सेवा में थे तो इतनी परेशानी नहीं हुई। घर का काम अच्‍छे से चल रहा था, लेकिन अब जब बच्‍चे बड़े होने लगे थे, घर परिवार की जिम्‍मेदारियों का बोझ भी आने लगा था और पिता भी सेवा से निवृत्‍त हो चुके थे। ऐसी परिस्थिति में उसका मन डावाडोल होने लगा था। कुछ स्‍वास्‍थ्‍यगत परेशानियों ने भी उसे घेरना शुरू कर दिया था। उसके अपने काम में महारत भी होने लगी थी। बदलते स्‍थानों पर उसके लोगों से सम्‍बन्‍ध भी बढ़ने लगे थे और समझ भी विकसित हो गई थी। वह न चाह कर भी अब वह नहीं कर पा रहा था, जो वह करना चाहता था। नौकरी की शुरूआत में उसके मन में सेवा का भाव था, लेकिन जैसे-जैसे समय और जिम्‍मेदारियों के बोझ में वेतन कम लगने लगा, उसका विचार बदलता गया।
अपने ही ऑफिस में उसने दो तरीके के लोगों को देखा। एक वह जो लम्‍बे समय से काम कर रहे हैं तथा उनका भविष्‍य सुरक्षित है। उन्‍हें पेन्‍शन की राशि मिलेगी और उनका अन्तिम जीवन भी सुधर जाएगा। दूसरे उसके जैसे जिनका कोई भविष्‍य नहीं और पेन्‍शन के नाम पर उसकी बचत ही काम आएगी। दिन-पर-दिन उसे अपनी आय कम लगने लगी थी। वह अपने भविष्‍य और बच्‍चों के भविष्‍य को लेकर चिन्तित रहने लगा था। उसके पास अपनी नौकरी के अलावा आय का कोई और स्रोत नहीं बचा था। पिता के पुश्‍तेनी मकान में दो भाई और एक बहन की हिस्‍सेदारी का खयाल उसे रातों को सोने से रोकता था। उसके काम से सभी प्रभावित थे, लेकिन उसे लगता था कि वह जो कर रहा है और दूसरे जो कर रहे हैं उसमें अन्‍तर है। जिनका भविष्‍य सुरक्षित है वे भी काम के बदले कुछ अतिरिक्‍त पैसा चाहते हैं और कोई मौका नहीं छोड़ते है, जिससे अतिरिक्‍त आय हो सके, चाहे फिर उससे किसी का भी नुकसान हो उन्‍हें कोई फर्क नहीं पड़ता।
इस देखा-देखी ने उसे भी अपनी जमात में शामिल कर लिया। जो ईमानदारी से अपनी सेवा भाव से लोगों का काम करता था, हर पीडि़त की सुन कर समझ कर उसकी मदद को अपना सब कुछ मानता था, अब वही उसे खराब लगने लगा था। उसे लगता था कि इस सेवाभाव से उसका भविष्‍य सुरक्षित नहीं हो सकता है। उसे सड़कों पर रोजगार की तलाश में घूमते युवाओं में उसके बच्‍चे भी दिखाई देने लगे थे। वह रात-दिन विचार करता कि उसकी सेवा समाप्‍त होने के बाद उसका क्‍या होगा। वह जब अखबारों में माता-पिता के विरूद्ध बच्‍चों के व्‍यवहार को पढ़ता तो उसका मन उद्वेलित हो जाता। उसे डर सताने लगा था कि उसके बुढ़ापे में उसका क्‍या होगा। उसके नहीं रहने पर पत्‍नी का क्‍या होगा।
बच्‍चों को अच्‍छे संस्‍कार दिए थे, लेकिन वह सोंचता था कि संस्‍कार तो उसके भी अच्‍छे ही थे। उनका उसे क्‍या लाभ हुआ। वह कोल्‍हू के बैल की तरह रात-दिन की मशक्‍कत कर सिर्फ बच्‍चों की पढ़ाई और अपने घर का खर्चा चला पाता था, महिने के बीच में ही उसे उधार की जरूरत भी होने लगी थी। उधार लेना उसके संस्‍कारों में शामिल नहीं था, लेकिन मजबूरी में उसे वह सब करना पड़ता था। अब मन बैठने लगा था, संस्‍कार उधड़ते हुए स्‍वेटर की तरह रेशा-रेशा होकर बिखरने लगे थे। वह चाहता था कि उसका भी अपना घर हो, समाज में कुछ इज्‍जत हो, पर्याप्‍त पैसा हो और भविष्‍य में कोई परेशानी नहीं आए बुढ़ापे की स्थिति ठीक से निकल जाए। कम से कम खुद की बीमारियों के इलाज के लिए तो धन हो जिससे वह अपना बुढ़ापा काट सके, किसी के भरोसे पर तो नहीं रहना पड़े, लेकिन बचत हो नहीं रही थी और न ही सेवानिवृत्‍त होने पर इतना कुछ मिलने का भरोसा कि उससे बाद का जीवन आसानी से कट जाए। उसकी बढ़ती उम्र तथा बच्‍चों की पढ़ाई पुरी होने के बाद भटकाव ने उसे झकझोर दिया।
न चाहते हुए अब वह लोगों के काम अटका कर उनसे वसूली की गला काट प्रतियोगिता में शामिल हो गया था। यह सब वह नहीं चाहते हुए भी सिर्फ अपने भविष्‍य को सुरक्षित करने की चाहत से करने लगा था। लगातार उसकी इज्‍जत घटती जा रही थी, लेकिन पद, प्रतिष्‍ठा और सेवा के बदले मिले मान-सम्‍मान से जीवन में पेट नहीं भरता। बड़ी-बड़ी बातें करने वाला समाज भी उसकी पूछपरख करता है, जिसके पास पर्याप्‍त धन हो। जब कुछ नहीं होता तो समाज तो ठीक है परिवार वाले भी हाल नहीं पूछते। उसके संस्‍कारों और माता-पिता की सीख को उसने एक कौने में टांग दिया था, जिसमें सेवा और ईमानदारी का पाठ था। उसे अपनी सेवा के बढ़ते चरणों में अनुभव हो गया था कि बिना अर्थ सब व्‍यर्थ है।
                                                                        -संजय भट्ट

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