बुधवार, 14 जून 2023

फटे में फंसी टांग

फटा देखकर टांग फंसाने में जो आनन्‍द की अनुभू‍ति होती है, उसका अंदाजा लगा पाना मुश्किल है। बस किस्‍मत अच्‍छी हो तो वह फटा भी पजामा बन जाता है और उसे पहन कर आराम से घूमा जा सकता है, लेकिन कभी फटे में टांग फंस जाए और वह बाहर नहीं आए तो बड़ी मुसीबत हो जाती है। ये फटे में टांग फंसाने वाले भी एक प्रकार के विशिष्‍ट मानव श्रेणी के जीव होते हैं। जहां कोई फटा देखा नहीं कि अपनी टांग उसमें डालने का प्रयास करते हैं। कई बार यह पजामा बन जाती है और कई बार यह गले में फांसी के फंदे की तरह अटक जाती है। सोंचने वाली बात यह है कि जब टांग फंसाते हैं तो यह गले तक कैसे पहुँच जाता है। कई बार फटा हुआ संकरा रहता है और टांग फंसाने वाले उसे और अधिक चौड़ा कर देते हैं। जब ज्‍याद चौड़ा हो जाता है और कोई दूसरा भी उसकी देखा-देखी टांग फंसाने की कोशिश करता है तो यह गले तक भी पहुँच जाता है, क्‍योंकि उस दूसरे वाले को फटे की गहराई का अनुमान नहीं होता है। अनुमान तो पहले वाले को भी नहीं होता है, लेकिन दूसरा सिर्फ मजे लेने के लिए यह करता है। उसका यह मजा ही उसके लिए फांसी के फंदे का कारण बन जाता है।
ज्‍यादातर लोग फटा देख कर दूर ही रहने का प्रयास करते हैं, लेकिन कुछ लोगों को सिर्फ फटा ही पसन्‍द होता है। कई बार जिसका फटा होता है वह भी दूसरे को टांग फंसाने के लिए आमंत्रित करता है। जब वह आमंत्रण स्‍वीकार कर लेता है तो समस्‍त जिम्‍मेदारी उस व्‍यक्ति की हो जाती है, जिसने टांग फंसाई है। कुछ को फटे से निकल जाने में महारात हांसिल होती है। यह वह लोग होते हैं जो फटे में टांग तो फसाते हैं, लेकिन जब फंसने की बारी आती है तो उस में से चुपके से बाहर हो कर सारी जिम्‍मेदारी उस फटे पर डाल देते हैं। यह व्‍यावसायिक भाषा में दिखावे के पार्टनर होते हैं। देखने वालों को लगता है कि फटे से इनका ही लेना देना है, लेकिन जैसे ही परिस्थिति बदलने लगती है, यह तुरन्‍त अपना पाला बदल कर दूसरी ओर देखने वाले में शामिल हो जाते हैं। रंग बदलने की यह उत्‍तम कला इन्‍होंने गिरगिट से सीखी होती है। जैसा देश वैसा भेष के सिद्धान्‍त का अनुसरण करने वाले कई मिल जाते हैं। इनको सलाह देने में भी महारत हांसिल होती है। यह ऐसा गले उतारते हैं कि न चाहते हुए व्‍यक्ति इनकी बातों के झांसे में आ जाता है। जब व्‍यक्ति इनके झांसे में आ जाता है तो यह उस फटे को सुधारने की तरकीबों का पीटारा खोल देते हैं।
जब इनका कुछ फटता है और दूसरे टांग फसाने की कोशिश करते हैं तो इनको नागवांर गुजरता है। रास्‍ता नहीं मिलने पर ही यह दूसरों को मौका देते हैं, लेकिन कुछ तो इतने एक्‍सपर्ट होते हैं कि फटा किसी का भी हो अपनी टांग को बीच में डाल ही देते हैं। कूद जाते हैं ऊफनती नदी में और बताने का प्रयास करते हैं कि इनसे बढि़या तैराक मिलना मुश्किल है। पर कभी-कभी इनकी भी टांग फंस जाती है और गले में आकर अटक जाती है। अक्‍सर फटा हुआ मैला कुचैला भी होता है, इसीलिए हमारे बड़े-बुजुर्गों ने कहा है कि फटा पहन लो, लेकिन मैला मत पहनों। जब फटे का पता बाहर वालों को चलता है तो वह जरूर टांग फंसाते हैं, लेकिन सावधान रहने की जरूरत होती है। फटा हो लेकिन बाहर दिखे नहीं। जब भी फटा बाहर दिखने लगता है तो लोग उसे और फाड़ने का प्रयास करते हैं।
बाहर दिखता फटा हुआ भाग आजकल फैशन में आ गया है। शायद यह फैशन इसीलिए निकला होगा कि किसी का भी फटा दिखे लोग उसे फैशन समझे और अपनी टांग नहीं फंसाए,लेकिन इस पर भी लोगों की निगाहें लगी होती है। वे कुछ कमेन्‍ट किए बगैर रहते नहीं है और फंस जाते हैं। अब फैशन के चलते सोंच समझ कर ही टांग फंसाना चाहिए नहीं तो कभी यह फांसी बनने में देर नहीं लगती। जमाना जागरूक हो गया है और बदलते जमाने में खुद को बदल लेना ही सार्थक होता है। अन्‍यथा फटे में टांग कभी निकलती नहीं है।
                                                     संजय भट्ट

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Very nice

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