सोमवार, 16 मई 2022

सड़कों पर रेंगते नाम


(संजय भट्ट)
कल लक्ष्‍मीनारायण जी का फोन आया बोल रहे थे, कुछ रूपए की आवश्‍यकता है! मैंने भी अपना सजेशन दिया कि सेठ गरीबचंद लेनदेन का धन्‍धा करते हैं, किसी बात की चिन्‍ता नहीं मेरे अच्‍छे परिचित है, आपकी व्‍यवस्‍था हो जाएगी। पत्‍नी ने पूछा इतनी रात किसका फोन था और लेनदेन का क्‍या मामला है? मैंने विश्‍वास दिलाया कि ऐसा कुछ नहीं लक्ष्‍मीनारायण जी को थोड़े पैसे की आवश्‍यकता है, तो सेठ गरीबदास जी से व्‍यवस्‍था करवाई है। वह हँस दी! मुझे भी कुछ अजीब लगा।पूछ ही लिया हँसी का क्‍या कारण है? वह बोली देखो क्‍या जमाना आ गया है, लक्ष्‍मीनारायण की मदद गरीबदास कर रहे हैं ! अब मेरे दिमाग की बत्‍ती जल चुकी थी। मुझे भी लगा वास्‍तव में नाम की क्‍या महत्‍ता हैक्‍या सोंच कर नाम रखा जाता है और आखिर उसका अंजाम क्‍या होता हैलगातार सवालों के सिलसिले ने मेरी रात की नींद खराब कर दी। सोने की कोशिश करता और नया नाम सामने आ जाता। अब नामों की उलझन में पड़ा मैं समझ गया कि विदेश मशहुर नाटककार की भी ऐसे ही नींद खराब हुई होगी तभी उसने कह दिया कि ‘’ नाम में क्‍या रखा है’’  दरअसल इन दिनों नाम को लेकर घमासान मचा हुआ है। इसका नाम ऐसा है तो क्‍यों हैकिसने रखाक्‍या सोंच कर रखाइस नाम रखने के पीछे की मंशा क्‍या रही?
सवालों पर सवाल ने मन को विचलित कर दिया, खुद के नाम पर सोंचने को मन हुआ यह नाम तो महाभारत काल का है, तब क्‍या सोंच कर रखा होगा, शाब्दिक अर्थ भी कोंधने लगा, जीत जिसके साथ हमेशा हो, विचारों में खोया रात को बर्बाद करने का मन हुआ। कई नामों पर नाम सामने आते गए, जमाने के हिसाब से भी बेमतलब वाले नाम भी, मतलब के खिलाफ प्रकृति वाले नाम भी, मतलबी नाम भी। ऐसे ही कहीं किसी कक्षा में पढ़ाया गया था यह नाम संज्ञा होते हैं, जो किसी व्‍यक्ति या स्‍थान का बोध करवाता है। अब स्‍थानों के नाम से तो दिमाग ही घूम गया। कभी किसी शहर का क्‍या नाम था आज क्‍या है। जो जब आया,जिसका मन किया नाम रख दिया। हॉं घर परिवार में भी ऐसा ही होता है, सबके अपने संबोधन का तरीका अ‍लग होता है। कोई बिट्टू कह गया, कोई बाबू कह गया, कोई लाला कह गया, कोई चिन्‍टू हो गया, कोई मोन्‍टू हो गया, कहीं बबलू तो कहीं बबली हो गया, लेकिन यह सब बचपन के नाम एक पहचान बन गए। वास्‍तविक नाम तो गुम हो गया।
एक विश्‍व सुन्‍दरी को इसी बात के लिए खिताब मिल गया कि उसका जवाब था मरने के बाद भी नाम रह जाता है। तब थोड़ी राहत मिली कि दरअसल मामला मरने के बाद का है। जिन्‍दा जी तो किसी भी नाम से पुकार लिया जाए, कोई फर्क नहीं पड़ता है। मरने के बाद अपनी याद बनाए रखने के लिए लोग क्‍या-क्‍या जतन नहीं करते रहे हैं, कभी अपना नाम शहर को दे दिया, कभी किसी इमारत को दे दिया, कभी किसी संस्‍थान को दे दिया और अब कुछ नहीं बचा तो सड़कों को भी नाम दिया जाने लगा है। कुछ दिनों बाद उनकी संतान, पौत्र, प्रपौत्र दावा करने में लग जाएंगे कि यह सड़क उनके पूर्वजों की है। यह संस्‍थान, शहर, इमारत उनका ही है। तब एक नया झमेला पैदा हो जाएगा। खुद से फिर सवाल किया- क्‍या नाम वास्‍तव में इतना महत्‍वपूर्ण हैखुद ही जवाब मिल गया। नाम से सोंच बनती है, सोंच संस्‍कृति को प्रभावित करती है और संस्‍कृति तथा सामाजिक बदलाव बड़ी मुश्किल से बदलते हैं। बस यही कारण है कि आपके नाम में तब तक कुछ नहीं रखा जब तक साधारण हो, जैसे ही किसी सड़क, संस्‍थान, इमारत और शहर से जुड़ता है तो नाम सिर्फ नाम नहीं रह जाता यह संस्‍कृ‍ति, सभ्‍यता और सोंच का परिचायक बन जाता है। इसलिए नाम तो नाम है, इसी से आपकी पहचान है। नाम को सोंच कर रखो, समझ कर रखो और इसे बनाए भी रखो,नहीं तो कहीं निक नेम, प्‍यार के नाम और बे बात के बाबू शोना बन कर नाम को गंवाने में मत रहो। इतना सब होने के बाद भी मसला ज्‍यों का त्‍यों रहा, लक्ष्‍मीनारायण जी उधार पैसे मांग रहे हैं और गरीबचंद जी उनकी मदद कर रहे हैं, तो वास्‍तव में नाम क्‍या रखा है कि नाम में ही सबकुछ रखा है, समझ नहीं आ रहा।  


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Very nice

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