रविवार, 17 अप्रैल 2022

समझ का फेर

 (संजय भट्ट)
जब भी  देखो पराई थाली में घी ज्‍यादा ही दिखाई देता है। अपनी अपनी खिचड़ी सब को सूखी ही दिखती है। अब ये काई छोटी मोटी समस्‍या नहीं है। इससे हर आदमी दुखी है। घर में परिवार में यहां तक की खाने की एक टेबल पर पति पत्‍नी भी। क्‍या करें अब दिखाई देता है तो न‍जरिया बदल लो, लेकिन यह स्‍वाभविक प्रकिया है, इसमें सुधार का मतलब भगवान की कृति पर संदेह करना।  जो भी बनाया भगवान ने ही ऐसा बनाया, अब किसी कंपनी डिफेक्‍ट का क्‍या सुधार जो वहीं से खराबी आई है उसको रिप्‍लेस ही किया जा सकता है। चूंकि मानव भगवान की कृति है और नो वारंटी, नो गारंटी, जैसा है रखना पड़ेगा और एक बार भेजे गए आइटम में वापसी की कोई शर्त शामिल ही नहीं होती है। उसमें जो है, वह मुझमें क्‍यों नहीं, क्‍या मैं नहीं कर सकता, मुझे चैलेन्‍ज मत करना ऐसी भावनाएं सभी के अंतर मन में कभी न कभी उद्वेलित होती है।  बस सब भावनाओं का खेल ही तो है। कुछ समझदार इस खेल के माहिर होते हैं, कब, कैसे और किसके साथ खेलना है, कैसे जीतना और किसको जितवाना है, सब गणित बैठा कर खेल की शुरूआत कर देते हैं। खासियत यह कि यह खेल खुद नहीं खेलते बल्कि इनकी तरफ से इनके खिलाड़ी खेलते हैं, खिलाड़ी क्‍या मोहरा कहो, जो शह और मात को समझे बिना मैदान में उतर जाते हैं और फिर नतीजा जो भी हो, इसकी परवाह नहीं करते।

पराई थाली हो या पराया कोई भी अपनो से इतर कोई पसन्‍द भी नहीं आता है। अपना तो अपना होता है और परया, परया होता है। इन परायों से कैसी सहानुभूति जब ये अपनो से सहानुभूति नहीं रखते तो इनसे हम सहानुभूति क्‍यों रखे। क्‍या मिलेगा इस सहानुभूति से हमें। एसे ही सवालों से घिरे हुए वो घर लौट रहे थे, कहीं से एक पत्‍थर आकर उनको लग गया। अब पत्‍थर लगा तो चोंट आना स्‍वाभाविक ही थी। उनको शारीरिक चोंट तो लगी थी, मानसिक रूप से चोंटग्रस्‍त हो गए थे। उन्‍हें लगा उन्‍होंने जिन्‍दगी में किसी का नुकसान नहीं किया, किसी की भलाई-बुराई में नहीं रहते। सीधा ऑफिस से घर और घर से ऑफिस ही आना जाना था। न किसी से राम-राम और न हीं किसी से दुआ सलाम की दरकार रखते थे। उनको शारीरिक चोंट का दर्द कम और मानसिक चोंट का दर्द अधिक सता रहा था। बुझा हुआ सा चेहरा लेकर घर पहॅुचे तो पत्‍नी ने पूछा- क्‍या हुआ, कहां से पीट कर आ रहे हो। दरअसल पीटने पर एकाधिकार उनकी पत्‍नी का ही था, सो लगा किसने उनके अधिकार पर हमला कर दिया। इसी सोंच विचार न जाने कब बच्‍चों को पता चल गया कि पापा को किसी ने पत्‍थर मार दिया है। बस बच्‍चे तो थे ही, निकल पड़े पत्‍थरबाज की तलाश में आखिर उनके पिता की अस्मिता और माता के एकाधिकार का मामला था। फिर किसी पराए ने ही मारा है तो सबक सिखाने की धून सवार हो गई।

पापा से सभी की पूछताछ चल रही थी। सवालों का बवाल सा मचा हुआ था, पत्‍नी, बच्‍चे और बच्‍चों के दोस्‍त सभी के सवालों-सवाल चल रहे थे। कहां से गुजर रहे थे, आपके आगे-पीछे कौन चल रहा था। क्‍या पहना था, कैसा दिख रहा था। उसके हाथ में क्‍या था, आपको किसने बचाया, आप को और तो कहीं चोंट नहीं आई। सवालों से घिरे वे हमेशा की तरह चुपचाप अपना मुँह बंद किए हुए थे। किसी ने झकझोर कर पूछा- आखिर हम आप से पूछ रहे हैं, कुछ तो बताओ किसने पत्‍थर चलाया। वे समझदार थे, शिक्षित थे, बच्‍चों की नादानियों से ऊपर की सोंच रखते थे, उन्‍हें पत्‍थर की चोंट खटक रही थी, लेकिन उससे कहीं ज्‍यादा टीस उन सवालों से हो रही थी जो अपने हीं पूछे जा रहे थे। उन्‍होंने मुँह खोला तो सिर्फ चंद लफ्ज ही फूटे जिसमें उन्‍होंने कहा गलती मेरी थी। पेड़ के नीचे से गुजर रहा था और कच्‍ची केरियों से सजे आम के पेड़ पर तो उन्‍होंने भी बचपन में खूब पत्‍थर बरसाएं हैं, शायद उन्‍हीं में से कोई एक आज उन्‍हें लग गया। दरअसल वे जानते थे कि उन्‍हें पत्‍थर किसी पराए ने नहीं बल्कि अपने ने मारा है, लेकिन अपनी जुबान को खोल कर वे कोई बवाल नहीं चाहते थे। आज उनको अपनी थाली में घी ज्‍यादा दिख रहा था, यह उनकी शिक्षा और समझ का परिणाम था कि किसी के बहकावे में आए बगैर वे सभी का सम्‍मान और खुद के निर्णय लेते थे।  

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Very nice

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