शुक्रवार, 22 अप्रैल 2022

काम का आदमी

 

(संजय भट्ट)

 

काम का आदमी भी बड़े काम का होता है, लेकिन जब तक काम का होता है, तभी तक काम का होता है बाद में बेकाम का हो जाता है। वास्‍तव में आदमी या तो काम का होता है या बिना काम का। जब यह काम का होता है, इसकी खूब इज्‍जत की जाती है। घर में भी सबका लाड़ला रहता है और अगर बाहर वालों के काम करे तो बाहर वालों का भी। बस इसकी किस्‍मत में कुछ ऐसा लिखा होता है, यही काम का आदमी है और बा‍की जगत में सब बेकाम के। इसको काम सौंप कर सब निश्चिंत हो जाते हैं और यह भी इतना बेवकुफ होता है कि अपनी थोथी इज्‍जत की पोटली सिर पर रख कर अपनी जिम्‍मेदारी से ज्‍यादा काम कर देता है।
दरअसल एक चने के झाड़ की कहावत है, जो इस काम के आदमी पर फिट बैठती है। यह काम का आदमी इस चने के झाड़ पर बैठ कर यह सोंचता है कि यहीं से दुनिया दिखती है, लेकिन इसे पता भी नहीं चलता कि इस चने के झाड़ का तना बहुत ही पतला होता है। मामूली सी हवा के चलने से हिल जाता है और इस पर बैठने वाला गिर जाता है। यह सब उस समय पता चलता है जब इस काम के आदमी को किसी की सहायता की जरूरत पड़ती है। कहने को तो सब इसी के बहुत करीबी हुआ करते है, लेकिन बस यही सबका करीबी होता है इसका करीबी कोई भी नहीं होता है। यह काम,काम और सिर्फ काम के लिए बना होता है, जैसे ही किसी काम से इसकी हिम्‍मत जवाब देने लग जाती है, इसको भी जवाब मिलने लग जाते हैं। यह किसी के काम करे तो वह इसको खूब मान सम्‍मान देता है, लकिन जैसे ही किसी काम से इसको उस आदमी की जरूरत पड़ती है, जिसका यह काम करता है तो वह इसे हर मौके से अपनी परेशानी बता कर निकल लेता है।
काम के आदमी की एक परेशानी यह भी है कि यह भावुक किस्‍म का होता है। किसी के भी बहकावे में आकर काम करने लगता है। ऐसा नहीं है कि इसका मन कभी काम नहीं करने का नहीं होता लेकिन यह कभी अपनी शान, कभी अपने खास की इज्‍जत और कभी काम बताने वाले की मजबूरी को समझ कर काम कर देता है। इसकी इसी भावनाओं को लोग इसकी बेवकुफी समझने लगते हैं और फिर यह शोषण का शिकार होता रहता है। यह काम का आदमी सलमान खान के उस डॉयलाग की तरह होता है, जिसमें यह कहा गया है कि ‘’एक बार कमीटमेंट कर दी तो खुद की भी नहीं सुनता हॅू।‘’ काम करना इसका शौक होता है, इसको समझाओ तो भी नहीं समझता। वास्‍तविकता यह है कि जब यह काम का नहीं रहता या इसको किसी से काम होता है तो लोगों की पीठ ही देखने को मिलती है।
इस काम के आदमी के कहीं से जाने और कहीं पर जाने मात्र से लोगों की चिन्‍ता बढ़ती घटती है, लेकिन यह होता है हरफनमौला पानी की तरह, जिस बरतन में फिट करना चाहो  आसानी से हो जाता है। कई बार यह हंसी का पात्र भी बन जाता है, क्‍योंकि इसको नीचा दिखाने वालों की फौज होती है। दरअसल यह रूपए की तरह बार-बार गिर कर संभलने का भी हुनर रखता है, इसलिए इसको कोई फर्क नहीं पड़ता। यह कई बार औंधे मॅुह गिर कर ऐसे उठ खड़ा होता है जैसे शेयर मार्केट हो। हमेशा नए नए प्रयोगों और गिर कर उठने की कला के कारण ही यह समाज के विभिन्‍न स्‍थानों पर विभिन्‍न मौकों पर अगल-अलग स्‍वरूप में पाया जाता है। जिस दिन समाज, परिवार, देश और इसके विभिन्‍न कार्यस्‍थल इसकी भावनाओं को समझ कर इसकी वास्‍तविक इज्‍जत करने लगेगा और इसको भी इतना ही सहयोग देने लगेगा, जितना यह सब को बिना किसी लाभ की भावना के देता है, उस दिन सिर्फ यही नहीं हर आदमी का आदमी हो जाएगा। 


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Very nice

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