(संजय भट्ट)
फालतुचंद, फोकटनन्दन काम न धाम बस चारो पहर आराम यही आलम था उनकी जिन्दगी का। दोनों टाईम खाना मिल जाता था, कभी-कभी कामकाजी दोस्तों की मेहरबानी हुई तो शाम को पीने का भी इंतजाम हो जाता था। कसम से भाई साहब बाप कमाई का जो मजा है, जो वह खुद की जिम्मेदारी में कहां। हां वैसे कोई यह भी नहीं कह सकता कि कोई काम नहीं करते, क्योंकि उनके पिताजी अपनी जांघ उघाड़ने से डरते थे, सो कह देते बेटा अभी पढ़ाई कर रहा है और साथ में थोड़ा अपना काम भी कर लेता है। शादी ब्याह में उनको नए कपड़े चाहिए थे, जूते भी बदल-बदल कर पहनने का शौक रखते थे। उनके अपने शौक वैसे काफी अजीब थे। क्या करते फोकटनन्दन जो ठहरे। कुल मिला कर मस्त लाईफ थी भाई साहब।
अब आदमी के पास काम हो तो विचार कम आते हैं,लेकिन काम नहीं हो तो विचारों की ऐसी श्रंखला चलती है कि रूकने का नाम नहीं लेती। गंगा से भी तेज धार और ब्रहृमपुत्र से लम्बा विस्तार होता है विचारों में। हां काम करते रहे तो सृजनात्मक विचार आते हैं, किसे कैसे बनाना है, कैसे संवारना है, काम कैसे होगा यही सोंचता है आदमी, लेकिन काम नहीं हो तो विचारों का प्रवाह दुर्गम रास्तों से गुजरते हुए विध्वंसक हो जाता है। यह कैसे टूटेगा, इसे कैसे तोड़ा जाए और यह टूट जाता है तो कितना मजा आएगा। सारा मतलब बस मजे से जुड़ा हुआ है। यह मजा नहीं तो जिन्दगी का क्या मतलब, ऐसे ही आए थे, ऐसे ही चले जाएंगे दुनिया से। वहॉं भगवान ने पूछा कि क्या किया धरती पर तो क्या जवाब देंगे।
कुछ दिनों तक तो वे घर में रहे फिर उन्होंने अपने श्री चरण बाहर निकाले तो पता चला कि उनकी बिरादरी के लोगों की संख्या अधिक है और हमारा देश तो लोकतंत्र वाला है यहां बहुमत वालों की जीत होती है। यह सब पढ़ा था तो काम आ गया कि अपनी संख्या बढ़ रही है तो निश्चिततौर पर हमारा ही बहुमत होगा। इनको खुद पर शंका होने लगी थी, कि ये पढ़े लिखे भी है। मतलब ये कि फोकटनन्दन रहते हुए भूल चुके थे कि वे शिक्षित है और उनकी समझ भी काम करती थी। अब वे सिर्फ और सिर्फ भीड़ का हिस्सा हुआ करते थे। उनका रिमोट कंट्रोल किसी ओर के हाथ में था। जैसा बटन दबाया जाता वैसा ही नाच लेते थे। इनके नाच पर मिलने वाली वाह-वाही ने इनका दिमाग सातवें आसमान पर कर दिया था। अब ये अपने कामकाजी मित्रों से श्रेष्ठ थे और अपनी श्रेष्ठता का बखान भी खुलकर करने लगे थे। भूल गए है कि वह सिर्फ भीड़ का एक हिस्सा मात्र है, जिसका संचालन किसी के इशारे पर अपने लाभ के लिए हो रहा है।
यह बीमारी थी और बीमारी कभी भी लिंग भेद नहीं करती सभी में समान रूप से पाई जाती है, लेकिन इसके भी वेरिएंट है। यह अलग-अलग प्रकारांतर से पाई जाती है। पहला वेरिएंट किसी रिमोट से संचालित होता है तो दूसरा वेरिएंट भावनाओं और घर परिवार की सुख शान्ति और समृद्धि के टोटकों से चलता है। यहां परिवार को लेकर ऐसे-ऐसे टोटके बताए जाते हैं कि सभी को लगता है कि बस लक्ष्मीजी उनके दरवाजा खोलने का इंतजार कर रही हो और वरदान सिर्फ इन्हें ही मिलेगा। ये भी जब शामिल होते हैं तो भूल जाते हैं कि यह भी उसी भीड़ का हिस्सा है जो सब यहां इसी उद्देश्य को लेकर आएं हैं, जिस उद्देश्य को लेकर वे यहां है। इस वेरिएंट की एक खासियत और है, यह बिना विचार किए चार अन्य लोगों को भी संक्रमित कर देते हैं। इस बीमारी वायरस भी ऐसे ही काम करता है, जैसे सभी को वह कुबेर के समान धनी और इन्द्र के समान सुखी राजा जैसा जीवन बना देगा।
किसी ने ठीक ही कहा है भीड़ में सिर होते हैं, दिमाग नहीं। यदि दिमाग होता तो भीड़ नहीं होती और भीड़ के पास काम होता तो क्या वे फोकटनन्दन कहलाना पसन्द करते। बस अपना काम करते और उन्हीं के कामकाजी जीवन की कमाई से जीवन को धन्य कर लेते, लेकिन जीवन की धन्यता और श्रेष्ठता फोकटनन्दन रहने में हैं, क्योंकि कामकाजी जीवन में मजा नहीं है और जीवन का मजा है तो फोकटनन्दन कहलाने में भी शर्मिन्दगी नहीं होगी। वे तो अपने जीवन का असली आनन्द ले रहे और इन आनन्द के क्षणों के लिए उन्हें कोई कुछ भी कहे कोई फर्क नहीं पड़ता है।
कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें
Very nice