रविवार, 3 अप्रैल 2022

बिना डिग्री के प्रबंधक

 

(संजय भट्ट)


किसी ने एक दम सही ही कहा- सीखने की कोई उम्र नहीं होती कहीं से भी सीखा जा सकता है। ऐसे ही शख्स है हमारे मित्र उन्होंने बाजे वालों से मैनेजमेंट के गुण को सीख लिया, अपनी नौकरी के अनुभव के साथ। मामला उनके यहां बेटी के विवाह का था। सारा काम उन्होंने ऐसे निपटा दिया जैसे जैसे कहीं से बिजनेस मैनेजमेन्ट का कोर्स किया हो। सारा प्रबंधन एक कुशल प्रबंधक की तरह, किसी को कोई शिकायत का मौका ही मिला। वो भी ऐसी बारात में जिसमें दुल्हे के पिता को छोड़ कर कोई भी अनुभवी और जिम्मेदार व्यक्ति नहीं हो। सारे युवाओं के जोश से भरी बारात को देखकर लग रहा था कि कोई न कोई तो गड़बड़ होगी ही। लेकिन मामला इतनी शांति से निपटाने पर सभी हैरान थे। किसी ने मेरे मित्र और लड़की के पिता से पूछा-आपने इतना कुशल प्रबंध कैसे किया? कोई गड़बड़ नहीं हुई। सारे युवाओं के जोश को कैसे सम्हाला? मेरे मित्र ने कहा भाई साहब 25 साल की नौकरी में यही तो सीखा है। मेरे कुछ समझ में नहीं आया! मैंने कहा- थोड़ा विस्तार से समझाओ यार। आखिर यह कुशल प्रबंधन का तरीका नौकरी में कहां से पाया? उन्होंने कहा- आप बारात के साथ थे ना, देखा आपने बैंड बाजे वालों की हालात? बस यही कुशल प्रबंधन का तरीका है। मुझे मेरा ही मित्र बड़ा रहस्यमयी लग रहा था। उसे कभी इस तरह बातें करते हुए नहीं सुना था। उसकी बातें मेरे सिर के उपर से निकल रही थी। मैंने फिर कहा भाई कब से ऐसी रहस्यमयी बातें करने लगे हो? उन्होंने समझाया- देखों महोदय आप ठहरे व्यापारी आप क्या समझ पाएंगे हम नौकरी करने वालों की कला को। और अब तो आदत हो गई है। बिना बात डांट खाना गलती नहीं होने पर भी मान लेना और बैंडवालों की तरह ‘‘कूल’’ रहकर सभी के नखरों को सहन कर लेना। मैंने कहा- भाई साहब आप तो सरकारी नौकरी में हो मौज है आपकी तो। फिर आप किसके नखरों को सहन करते हो, आपका तो विभाग भी ऐसा है, जहां कोई झांकता भी नहीं पूछता भी नहीं!
मत पूछो मेरे मित्र के जितने आंसू उसकी बेटी के विदाई में नहीं आए उससे कहीं आधिक आंसू उनकी आंखों में थे। रूआसे होकर बोले भाई साहब आप एक दिन आकर देखो मेरे साथ वक्त गुजार कर देखो। सकय से जाना होता है। सबसे पहले पहॅंुच कर अपने हस्ताक्षर करो या न करो लेकिन थम्ब इंप्रेशन और मैसेज नहीं भूल सकते। इसके बाद शुरू होती है, कागजों की घिसाई। खुद को साबित करने की कला, सभी से अच्छे से बातचीत तथा अपना छोड़ कर उनके कामों पर ज्यादा ध्यान। प्रार्थना, पढ़ाई से ज्यादा जरूरी है समय पर जानकारी भेजना। बच्चों के पालक तो जैसे उनको पैदा करके भूल ही गए। सरकार ने पैदा होने पर माता पिता को पैसा दिया, बहुरिया के लिए पोषक लड्डूओं की व्यवस्था की, फिर आंगनवाड़ी में सारी देखभाल के साथ उसके पोषण कुपोषण का खयाल रखा गया। वह बच्चा स्कूल आया नहीं हमारे द्वारा लाया गया है, इसलिए अब से सारी जिम्मेदारी हमारी है। उसको निर्धारित दक्षताएं पूर्ण करवाओ, उसका मन चाहे खेत में लगता हो या खेलने में, उसको सब कुछ आना चाहिए यह जिम्मेदारी हमारी है। फिर सरकार का क्या है? हमारी एक जिम्मेदारी पूर्ण हुई नहीं कि दूसरी आ जाती है। सारी जिम्मेदारी ठीक उसी तरह से आती है, जैसे बैण्ड वालों के पास बारातियों की फरमाईश आती है गाना बजाने के लिए। वे भी बेझिझक सभी की फरमाईश पूर्ण करते है। एक की फरमाईश का गाना बजा नहीं कि दूसरा बीच में टपक जाता है। नागिन की धून चली न चली कि फरमाईश आ जाती है चल ‘‘काका बाबा ना पोरिया’’ बजा, तीसरा भी तैयार ही खड़ा होता है, भाई डीजे वाले बाबू चला दो। इसी बीच कोई बुजुर्ग आ जाता है, चल बे क्या लगा रखा है, मुन्नी शीला अब ‘‘तु छूपी है कहां’’ बजाओ। थोड़ी देर गाना चलता है कि बीच में एक सौ का नोट दिखा कर पांच का पकड़ा दिया जाता है। कुल मिला कर जैसे सारी बारात को सम्हालने का दायित्व उस बाजे वाले पर होता है, ठीक उसी तरह जैसे हमारे बड़े बारात को बिन्दोली पर भेज कर घर की व्यवस्था में लगे होते हैं, दुल्हन बारात के इंतजार में होती है। बस यही हालत हमारे हो गए हैं। सारी जिम्मेदारियां हमारे आसपास घूम रही है। इनमे से एक काम खतम होता नहीं और दूसरा काम सामने आ जाता है और मानोगे नहीं इतनी अच्छी प्रेक्टिस हो गई है कि सब बिना प्रबंधन की डिग्री के सफल हो जाता है। बस इसी तरह से शादी को भी निपटा दिया। मैने कहा धन्य हो भाई और धन्य है वो सभी जिन्होंने आप जैसे लाखों लोगों को बिना डिग्री के कुशल प्रशासक व प्रबंधक बना दिया। 


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Very nice

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