शनिवार, 2 अप्रैल 2022

नए साल की मुबारकबाद

 

                                                                                          (संजय भट्ट)

एक बार फिर से साल बदल गया। जो चल रहा था वह नया हो गया। कुछ ने कहा यह मेरा है, तुम्‍हारा नहीं, कुछ ने ठीक उल्‍टा कह दिया यह तुम्‍हारा है, हमारा नहीं। बस इसी तेरा मेरा चक्‍कर में साल का मजा किरकरा हो गया। था तो नया लेकिन रह गया वही पुराना बन कर। बरसों से यह तुम्‍हारा-मेरा के चक्‍कर में साल बरबाद होते चले जा रहे हैं। कभी इनका नया साल आ जाता है, कभी उनका नया साल आ जाता है। कोई इसे नहीं मानता कोई उसे नहीं मानता, लेकिन यह सब सिर्फ दिखावे का माहौल है। दरअसल मानते सभी है, मनाते सभी है, लेकिन अंदर ही अंदर। जैसे ही बाहर दिखाने मौका आता है, वह तेरा मेरा होकर रह जाता है।

साल का बदलना, दिन का बदलना, मौसम का बदलना, ऋतुओं का बदलना और भी बहुत से बदलाव प्रकृति की सत्‍ता के अधीन होते हैं,  लेकिन इसमें हम लोग तेरा मेरा ढूंढ ही लेते हैं। मान्‍यता किसी की कुछ भी हो सकती है, सत्‍ता, संस्‍कृति और स्‍वभाव भी अलग हो सकता है, लेकिन साल की क्‍या गलती वह तो दिन के साथ ही पुराना और नया हो जाता है। इस मामले में दिन बहुत ही भाग्‍यशाली है, वह हर दिन नया होता और कोई भी इसे तेरा या मेरा में नहीं बांटता।

इसबार साल के बदलने के एक दिन पहले ही सरकारी साल बदल गया।  वैसे इस साल के बदलाव के एक दिन पहले ही बहुत से बदलाव सामने आ गए। किसी ने कुछ नहीं कहा, यहां तक कि बताया भी नहीं कि क्‍या-क्‍या और क्‍यों बदल रहा है। सवाल भी करना पाप जैसा है, किस से पूछे और क्‍यों पूछे क्‍या सवाल करने के सामाजिक सरोकारों से पेट भरता है,इसलिए बस इसी में खैर मना ली कि जो मिला वह ही बहुत है।  जो मिला उससे पहले ही लूटने लग गया था, लेकिन इस लूट का किया भी क्‍या जा सकता है। यह तो मामूली सी बात है, बधाईयां मिलना शुरू हुई और हमारी जेब पर कटौतियों के बादल मंडराने लगे। बादल मंडराने क्‍या लगे इतने जम कर बरसने लगे कि  बाढ़ ही आ गई। इस बाढ़ में हमारा सब कुछ बह कर जाने लगा, इसे रोकने के लिए हमे ही सिमटना था तो समेटने की प्रक्रिया शुरू कर दी।

हमारे नए साल और इसकी खुशियों से ज्‍यादा सरकारी साल बदलने का गम था, लेकिन क्‍या करते उन्‍हें यह अधिकार भी हमने ही दिया था। अब बताओ भला कोई माई बाप के सामने भी कोई बोलता है। साल तो हर साल बदलता है और साल में दो बार भी बदलता है, लेकिन इस बार का यह बदलाव बहुत भारी पड़ा। जब साल बदला तो वाह की जगह आह निकली। इस हाथ ले उस हाथ दे की कहावत चरितार्थ हो गई, लेकिन जैसे ही मोटा-मोटा हिसाब लगाया, इस हाथ जो मिला उस हाथ से दौगुना निकल गया। अब व्‍हाटस्एप्‍प और सोशल मीडिया के जमाने में सामाजिक ताना बाना और प्रत्‍यक्ष बधाई की परंपरा तो रही नहीं बस दिनभर टन-टन और मोबाईल की मैमोरी फुल होती गई। वैसे सभी को समझ आ गया कि इस जमाने में किसी के यहां जाकर प्रत्‍यक्ष बधाई दे देने से उस पर एक कप चाय और पैकेट में कम होते बिस्किट का बोझ ही बढ़ाना है। हमने भी यही सोंचा कि इस दौर में कोई हमारे यहां आकर बधाई देगा तो उसका पेट्रोल का खर्च ही बढ़ेगा, इससे बेहतर है कि वह ऑनलाइन को ही अपनाएं और अपने आप को बदलते साल में बदलने का एक प्रयोजन करें। बहरहाल आप सभी को यह नया साल मुबारक हो, जिसने हमारी जिन्‍दगी के अर्थशास्‍त्र को बदलकर रख दिया और हमारी उफ्फ तक नहीं निकल पाई आखिर उन्‍नति और विकास भी मायने रखता है और हम नए साल की मुबारकबाद में भी तो उन्‍नति और विकास की ही कामना करते।                                                      

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