(संजय भट्ट)
‘जस जस सुरसा बदन बढ़ावा तासु दुन कपि रूप दिखावा’ पता नहीं यह पंक्तियां लिखते हुए गोस्वामी तुलसीदास ने क्या सोंचा होगा। राम भक्ति में खोए हुए उनके मन में क्या विचार चल रहे होंगे यह तो राम जी ही जाने ,लेकिन इन दिनों सुरसा के मुँह खुलने पर कपि पुत्र मानव अपना रूप दुगना नहीं कर पा रहे हैं। उन्हें जामवंत भी नहीं जगा पा रहे हैं और न ही उनकी शक्ति को याद दिला पा रहे हैं। जामवंत की एकतरफा खामोशी हनुमान के लिए बहुत भारी पड़ रही है। जामवंत भी क्या करे, वे इस कलयुग में रामजी की कृपा पर ही जीवन यापन कर रहे हैं। हनुमान भी राम भक्त है, राम जी की दी हुई सारी जिम्मेदारियां उनको इतनी सरल लगती है कि वे हमेशा ही उससे पार पा जाते हैं। लेकिन इस बार हनुमान थोड़ी कठिनाई में थे। सुरसा प्रतिदिन थोड़ा-थोड़ा कर अपना बदन बढ़ा रही थी और हनुमान अपनी अंतिम सीमा को छू चुके थे। सुरसा का मुँह रोज रात को बारह बजे बढ़ जाता। उसके मुँह बढ़ाने का असर दूसरे दिन ही दिखाई देता था। सुरसा की इस मायावी हरकत का हनुमान के पास कोई तोड़ नही था। ज्यों ही सुरसा का मुँह बढ़ता हनुमान अपनी पुरी क्षमता से उसका मुकाबला करने की कोशिश करते, लेकिन जैसे ही हनुमान अपनी शक्ति बढ़ाते सुरसा मुँह फिर से बढ़ जाता। आखिर कब तक मुकाबला करते। कलयुग में यूँ भी असुरों की ताकत दुगनी हो जाती है, देवत्व का असर थोड़ा देर होता है। फिर यह कष्ट हनुमान को दिया तो राम ने था कैसे कह पाते कि भगवन कष्ट है। सुरसा के मुकाबले मैं कमजोर पड़ रहा हूँ। जैसें ही वह कमजोरी मेहसुस करते जामवंत उन्हें लंका में रावण की हरकतों, जंबू द्वीप में चलने वाली अन्य गतिविधियों में बहला देते। इधर राम जी लगातार सुरसा मुँह फैलाए जा रही थी और हनुमान पर अपनी भक्ति का पूर्ण विश्वास करने वाले रामचंद्र जी को भरोसा था कि सुरसा असुर है और कितना भी मुँह फैलाए जामवंत हनुमान को उसका एहसास तक नहीं होने देंगे। कभी रावण की हरकतों, कभी सीता माता के कष्टों तथा कभी जंबुद्वीप के खतरों को लेकर जामवंत जी लगातार हनुमान की भक्ति को कमजोर नहीं होने दे रहे थे।
थके हुए हनुमान ने रामचंद्रजी से कहने वाले थे कि हे भगवन् अब सुरसा के मुँह को भेद पाने की क्षमता में वृद्धि कर दीजिए, तो तमतमाए जामवंत जी ने हनुमान को फटकारते हुए कहा वानरराज आपको श्रीराम के कष्टों का अनुभव है कि नहीं,माता सीता पर रावण अधिकार करना चाहता है और हमने रामचंद्र जी को वचन दिया है कि हम उनके कष्टों को अपना कष्ट समझ कर उसे दूर करने में मदद करेंगे। आपको जो जिम्मेदारी दी है वह पूर्ण कीजिए, जब श्रीराम राजा बनेंगे, जब लंका पर विजय प्राप्त कर लेंगे, जब सुग्रीव जी को खोया राज मिल जाएगा तब आपकी ही तो ख्याति होगी। आपने हर मौके पर श्रीराम का साथ दिया है, अपनी शक्ति को पहचानो और सुरसा का मुकाबला करो। मतलब मामला रामजी तक पहॅुचने के पहले ही जामवंत ने निपटा दिया। इस तरह जब भी हनुमान को कोई कष्ट होता जामवंत जी ही बीच में आकर उनकी बात को रामचंद्रजी तक पहुँचने से पहले ही उनका ब्रेनवाश कर देते। हनुमानजी फिर से रामभक्ति में लीन हो जाते और अपने कष्टों को भूल कर रामजी की तकलीफों, माता सीता पर आए संकट को मेहसुस करने लग जाते। इन्हीं दिक्कतों के कारण न चाहते हुए भी हनुमान सारी परेशानियों को झेल जाने पर मजबूर थे।
उनकी बिरादरी के कुछ वानर कभी कभी विरोध के सुर अपनाना चाहते थे, लेकिन जामवंत ने रामचंद्रजी और शेष सभी के बीच ऐसी माया बना रखी थी कि उन विद्रोही वानरों की बात रामचंद्रजी तक पहॅुच ही नहीं पाती थी। ऐसा नहीं कि रामचंद्रजी को कुछ पता नहीं था वे त्रिकाल दर्शी थे, उन्हें पल पल की खबर थी आगे होने वाले पलों को भी वे पहचान लिया करते थे, लेकिन जब जामवंतजी सारी परेशानियों को स्वयं उनकी ओर से हल करने का काम रहे थे, तो उन्हें किस बात की चिन्ता थी। रामचंद्रजी को एक मूल मंत्र मिल गया था, जब तक लक्षमण जैसा भाई, जामवंत जैसा वफादार और हनुमान जैसे भक्त है, किसी की भी ताकत नहीं थी कि उनका बाल भी बांका कर सकता है। इसी कारण वे हनुमान को हथियार व शक्ति देने के बदले सुरसा का मुँह खोलने की इजाजत देते जा रहे थे, क्योंकि उनको भरोसा था कि सुरसा कितना भी मुँह खोल ले हनुमान अपना लघु रूप धारण कर बिना उसे क्षति पहॅुचाए सुरसा के मुँह से बाहर निकल जाएंगे।
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Very nice