मंगलवार, 12 अप्रैल 2022

साहब की नाराजगी

 

संजय भट्ट  

बसंत के पीले-पीले फूल भी उनके क्रोध को शांत नहीं कर सके। वे हमेशा किसी-न-किसी बात को लेकर नाराजगी व्‍यक्‍त करने से नहीं चूकते थे। उनको एहसास हो चला था कि उनके नाराज होने से काम हो जाते हैं, लेकिन वे भूल रहे थे कि चाणक्‍य ने कहा है 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' । उनका गुस्‍सा अब आम हो चला था। वे नाराज होते, थोड़ी भोंहे तानते, लेकिन जानते थे कि काम तो कल को इन्‍हीं से करवाना है। बस उनको को तो नाराजगी इसलिए व्‍यक्‍त करना होती थी कि चलता काम दौड़ने लग जाए और सरकारी दौड़ में खुद को सबसे आगे पेश कर सके। इसी आदत के कारण कई बार वे रात को नींद में भी नाराज हो जाते। सुबह पत्‍नी बताती कि आप रात में नाराजगी व्‍यक्‍त कर रहे थे। ऐसा भी नहीं था कि वे हमेशा ही नाराज होते थे, उन्‍होंने एक दिन तय कर रखा था, जिसमें खासतौर से नाराजगी व्‍यक्‍त करते थे। अब तो अखबार वालों को भी खबर हो गई थी कि आज साहब नाराज होंगे, बस यह पता नहीं होता था कि किससे और क्‍यों नाराजगी व्‍यक्‍त करेंगे और उस नाराजगी का क्‍या असर होगा।  
वैसे वो नाराज किस बात से इसका अंदाज किसी को भी नहीं होता था, लेकिन उनका सामना करने में सभी डरने लगे थे। यही खौफ तो वे पैदा करना चाहते थे। लक्ष्‍य कोई भी हो हमेशा सौ प्रतिशत की पूर्ति होना संभव नहीं थी। ये सभी को पता था, वे भी जानते थे और उनके ऊपर वाले भी जानते थे, लेकिन जो काम बिना नाराजगी के कम होता था, वह नाराजगी सहित भी कम ही होता था। पहले लोगों को लगता था कि वे गर्मी को सहन नहीं कर सकते इसलिए किसी पर भी गरम हो जाते है, फिर लगा शायद सर्दी का असर होगा कि गर्मी पैदा करने के लिए नाराज होकर अपना तथा अपने साथ वालों का ब्‍लड प्रेशर बढ़ा कर उन्‍हें ठण्‍डा पड़ने से रोकने के‍ लिए नाराज होते हों। अब तो बसंत ऋतु आ गई थी, न ज्‍यादा गर्मी थी और न ही सर्दी फिर भी उनकी नाराजगी लगातार बनी रहने लगी। तब सभी को पता चला उनकी नाराजगी का राज। उन पर उनसे ऊपर वाले नाराजगी व्‍यक्‍त करते वे यहां नाराजगी व्‍यक्‍त कर देते और उनकी नाराजगी सहने वाले उनसे नीचे वालों पर नाराज हो जाते। यह नाराजगी का क्रम ठेठ नीचे पहॅुच कर ही शांत होता था। नीचे वालों को आदत हो गई थी नाराजगी की। उनको पता था नाराज होकर भी कुछ बिगाड़ नहीं सकते हैं, क्‍योंकि अगला काम उन्‍हीं से पड़ेगा, वे नाराजगी से काम ठप्‍प कर देंगे तो यही क्रम उल्‍टा हो जाएगा तथा कोई सार नहीं निकलेगा। काम तो जिसे करना है, जब करना है, जैसे करना है- ठीक वैसे ही होगा, लेकिन फिर भी नाराजगी का अपना महत्‍व है, जो कम नहीं होना चाहिए।  
सूबे में सभी को पता रहना चाहिए कि साहब नाराज रहते हैं, क्‍योंकि उनके मातहत काम नहीं करते। इसी बहाने मातहतों की शिकायत और उनके काम करने के तरीकों पर भी साहब की नजर रह जाती थी। इस नाराजगी में एक छोटा-सा राज और भी था, लेकिन यह सार्वजनिक होने से साहब भी डरते थे। इसको शिष्‍टाचार की श्रेणी में रखा जाता था। सिर्फ मातहतों को पता था कि साहब की नाराजगी का दूसरा मतलब क्‍या है, इसलिए वे भी डरते थे कि साहब नाराजगी व्‍यक्‍त कर दे वहां तक ठीक है, लेकिन उस नाराजगी का दूसरा असर नहीं होना चाहिए। साहब भी प्रति सप्‍ताह एक पर ही नाराज होते थे और दूसरे सप्‍ताह उनको शाबाशी भी दे देते थे। इस साप्‍ताहिक नाराजगी का हिस्‍सा ऊपर तक पहॅुच जाता था और ऊपर से नीचे तक की कुर्सी बरकरार रहती। यह नाराजगी भी ऊपर से नीचे आते समय विकेन्‍द्रीत हो जाती थी, इससे पता भी नहीं चलता कि नाराजगी का कितना हिस्‍सा किसके हिस्‍से में आया। ऐसे में नाराजगी सब पर समान रूप से बरसती थी और उसकी उपज पर भी कोई असर नहीं पड़ता था। सब को इतना जरूर पता था कि मौसम गर्म हो, सर्द हो या वासंती फूल खिल रहे हो नाराजगी सब पर समान बरसेगी और उसकी बौछारों से भीगने वाले भी ऐसे ही बिना छतरी के निकलते रहेंगे, क्‍योंकि उनको भी कहीं से नाराजगी प्राप्‍त करना होगी।  


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Very nice

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