■संजय भट्ट
मंगलवार, 12 अप्रैल 2022
साहब की नाराजगी
बसंत के पीले-पीले फूल भी उनके क्रोध को शांत नहीं कर सके। वे हमेशा किसी-न-किसी बात को लेकर नाराजगी व्यक्त करने से नहीं चूकते थे। उनको एहसास हो चला था कि उनके नाराज होने से काम हो जाते हैं, लेकिन वे भूल रहे थे कि चाणक्य ने कहा है 'अति सर्वत्र वर्जयेत्' । उनका गुस्सा अब आम हो चला था। वे नाराज होते, थोड़ी भोंहे तानते, लेकिन जानते थे कि काम तो कल को इन्हीं से करवाना है। बस उनको को तो नाराजगी इसलिए व्यक्त करना होती थी कि चलता काम दौड़ने लग जाए और सरकारी दौड़ में खुद को सबसे आगे पेश कर सके। इसी आदत के कारण कई बार वे रात को नींद में भी नाराज हो जाते। सुबह पत्नी बताती कि आप रात में नाराजगी व्यक्त कर रहे थे। ऐसा भी नहीं था कि वे हमेशा ही नाराज होते थे, उन्होंने एक दिन तय कर रखा था, जिसमें खासतौर से नाराजगी व्यक्त करते थे। अब तो अखबार वालों को भी खबर हो गई थी कि आज साहब नाराज होंगे, बस यह पता नहीं होता था कि किससे और क्यों नाराजगी व्यक्त करेंगे और उस नाराजगी का क्या असर होगा।
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Very nice