शनिवार, 4 मार्च 2023

नम्‍बरों में खोई पहचान

 

इन दिनों हमारी पहचान या तो नम्‍बरों से होने लगी है या कागजों के टूकड़ों में फंस गई है। इन सब चक्‍करों में हम असली पहचान ही खो चुके हैं। पहले हमारी पहचान हमारे नाम, गौत्र, गांव, पिता के नाम और काम से होती थी, लेकिन जमाने में बदलाव के साथ ही हम लगातार हमारी पहचान नम्‍बरों में दस्‍तावेजों में उलझा कर रह गए हैं। हमारी पहचान को गोपनीय बनाने के चक्‍कर में हमें इतना सार्वजनिक कर दिया है कि अब हर कोई हमें अलग-अलग नम्‍बरों से जानता है। इन नम्‍बरों ने आदमी तो आदमी जमीनों तक को नहीं छोड़ा, यहां भी प्‍लाट नम्‍बर और खसरा नम्‍बर हो गए हैं। पुराने मोहल्‍ले अब वार्ड क्रमांक से पहचाने जाते हैं, गलियों के भी अपने नम्‍बर हो गए हैं। शुक्र है अभी नालियों को पहचान का नम्‍बर नहीं मिला है।
सरकारी लोग भी दोहरा चरित्र रखते हैं। एक और कहते हैं कि अपनी पहचान को गोपनीय रखे किसी के साथ साझा नहीं करें, लेकिन दूसरी तरफ खुद ही हमको अलग-अलग स्‍थानों पर अलग-अलग नम्‍बरों से पहचान बनाने को मजबूर करती है। स्‍कूल में जाओ तो स्‍कॉलर नम्‍बर, आधार नम्‍बर, समग्र आई डी नम्‍बर, नौकरी लग जाए तो यह नम्‍बर कोड में बदल जाते हैं। कहीं युनिक कोड, कहीं ट्रेजरी कोड, डाइस कोड, संस्‍था कोड, ऑफिस कोड और न जाने कौन-कौन से कोड। यह शुरूआत पोस्‍ट ऑफिस से हुई थी, जहां पिन कोड नम्‍बर दिए जाते थे, जिससे एक ही नाम के ग्रामों को पहचानने में सुविधा हो सके, लेकिन अब तो इन नम्‍बरों का साथ नहीं हो तो कोई पहचानता तक नहीं है। जगह-जगह नम्‍बर और अलग-अलग नम्‍बर जबकि पता है आधी से ज्‍यादा आबादी इतनी पढ़ी लिखी नहीं है कि इन नम्‍बरों के मायाजाल को समझ सके या इसे काट कर अपनी जिन्‍दगी काट सके। इसके लिए हमेशा, उसे एक कागज के टूकड़े से पंगु बना कर रखा जाता है।
स्‍कूल में जैसे स्‍कॉलर नम्‍बर, रोल नम्‍बर होते हैं, बैंक में खाता नम्‍बर हो जाते हैं। आपकी पहचान का नम्‍बर आधार नम्‍बर और समग्र नम्‍बर होता है, अब तो कहीं-कहीं आपकी पहचान मोबाईल नम्‍बर से भी होने लगी है। हर पहचान के नम्‍बर के साथ एक तरफ सूचना मिलती रहती है कि यह नम्‍बर आपका अपना है इसे किसी के साथ साझा नहीं किया जाए, लेकिन दूसरी तरफ इन नम्‍बरों को बताए बिना कोई काम ही चलता है।
वास्‍तव में इस नम्‍बरों के युग को ही डिजिटल युग कहा जाता है। भारत के विद्वानों ने शून्‍य की खोज करके दुनिया को डिजिटल बनाने की शुरूआत कर दी थी। इसी शून्‍य के आधार पर कम्‍पयुटर की प्रोगामिंग होती है और यही कम्‍युटरों में उलझे नम्‍बर आपको नई-नई पहचान देने का काम करते रहते हैं। कहा जाता है कि कम्‍पयुटर का अपना कोई दिमाग नहीं होता, लेकिन इसको जैसे हांका जाए वह ऐसे ही चलता है। इसको क्‍या दिखाना है, क्‍या ढंकना है और किसकी पहचान करना है किसी पहचान को छिपाना है सब अच्‍छे से आता है, क्‍योंकि यह सब इसे दिमाग वाले समझाते हैं। यह भी इतना नालायक है कि गरीबों के तो पहचान के कोई काम नहीं करता। मामूली बैंक खाता खुलवाने, जिसमें उसके खुद के कमाए धन को वह जमा करता है, उसके लिए भी किसी भी गवाह के साथ ही उसकी पहचान के सारे नम्‍बरों का जखीरा ले लेता है और जिसको-जिसको यह पैसा ऋण के रूप में अपनी कमाई के लिए देता है उसकी कोई पहचान किसी को नहीं बताता।
अपने पहचान नम्‍बरों की गोपनीयता के लिए संदेश भेज कर कहता रहता है कि किसी से साझा नहीं करे, इसका सीधा मतलब होता है कि आपकी पहचान हमारे पास गिरवी रखी है और हम अपनी पहचान किसी के साथ साझा नहीं करते हैं। रोज नए-नए घोटाले सामने आने से और हमरी गाढ़ी कमाई के हजारों रूपए हमारी बिना जानकारी के स्‍वाहा हो जाने से कुछ जागरूक और पढे लिखे लोग जो वास्‍तव में सिर्फ लिखे पढे होते हैं। मतलब जो लिखा है पढ लेते हैं और उसे कहीं भी कॉपी पेस्‍ट कर भेज देते हैं या बक देते हैं। अब मांग उठाने लगे हैं कि उनकी कमाई का जो हिस्‍सा कहीं भी जमा है, किसी भी उद्देश्‍य से जमा है चाहे वह जीवन, बचत या मजबूरी से जुड़ा हो उसका उपयोग करने के पहले उनसे पूछा जाए। यह मांग करने वाले यह नहीं समझते हैं कि फिर गोपनीयता किस बात की और हमारे लिए तो हमारा नाम ही साख है बैसाखी (बिना साख वाला) तो आप है, इसलिए आपको अपनी साख का परिचय देना है उनको नहीं जिसका सिर्फ नाम ही काफी है। फिर आप जाते हो अपनी मजबूरी या गरज से उनके पास वह आपके पास नहीं आते हैं तो फिर अपनी पहचान सार्वजनिक करने की जरूरत उनको क्‍या है। हम आशावादी लोग है और उम्‍मीद तो कर ही सकते हैं कि कभी के वाय सी (अपने ग्राहक को जाने) की तरह ही केवायए (सब को पहचाने) जैसी कोई व्‍यवस्‍था होगी तब हम जान सकेंगे कि जिस साख पर हम भरोसा कर रहे हैं वह कितनी बैसाखी है।
              - संजय भट्ट

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Very nice

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