शनिवार, 18 मार्च 2023

मच्छर का मतिभ्रम

 मच्छर के बच्चे ने नया-नया उड़ना शुरू किया था। वह जहां भी जाता लोग ताली बजाकर उसे मारने का प्रयास करते और वह समझता कि सब उसका गाना सुनकर खुश होकर तालियां बजा रहे हैं। पहली बार उड़कर जब वह वापस अपने परिवार में लौटा तो उसकी माता को उसने बताया कि लोग मेरा गाना बहुत अच्छे से सुनते हैं और सुनकर खुश हो जाते हैं। लोग जब खुश होकर तालियां बजाते हैं तो मुझे बहुत अच्छा लगता है। यह सब उसकी मां जानती थी, उसका पूरा परिवार जानता था कि वह अपनी जान पर खेलकर आया है। जिंदगी के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है, मच्छर की जिंदगी ही गंदगी में रहकर गुजरती है और लोगों का खून पीकर उसे अपनी भूख को शांत करना पड़ता है। ऐसा ही सब कुछ उस मच्छर के साथ भी हो रहा था, लेकिन यह उसका मतिभ्रम ही था। वह यही समझता रहा कि लोगों को उसका गाना बहुत पसंद आया।
वह जब लोगों के कानों में जाकर अपनी तुन तुन की आवाज सुनता था तो लोग उसे दबोचने के लिए तालियां बजाने का प्रयास करते और वह अपनी चतुराई से बच कर निकल जाता। मच्छर की जिंदगी भी ज्यादा लंबी नहीं होती। कभी धुंए से तो कभी लोगों की तालियों के बीच फंसकर वह अपनी जान दे देता है। उसकी माता यह भली-भांति जानती थी कि उसका भी जीवन उसके पिता की तरह किसी दिन ऐसे ही समाप्त हो जाएगा। वह अपना वैधव्य कैसे काट रही थी, यह सिर्फ वह जानती थी और कोई उसकी पीड़ा को नहीं जान सकता था।
पेट की आग को शांत करना भी तो जरूरी है और इसी के लिए वह मच्छर अपनी जान पर खेलकर लोगों के पास जाता उन्हें काटता उनका खून पीता और अपनी पेट की ज्वाला को शांत करने का प्रयास करता, लेकिन बार-बार वह बच नहीं सकता था। कभी भी किसी की उंगलियों, हाथों या कहीं और फस कर वह अपनी जान गवा सकता था। अब यह उसे भी पता चल गया था कि उसकी जान ज्यादा दिनों की मेहमान नहीं है, लेकिन फिर भी जब तक जिंदा है तो पेट की भूख को शांत करना बहुत जरूरी है। एक भूख ही तो है जो हमेशा सुबह शाम कभी भी अपनी ज्वाला को उफान पर ला देती और ना चाहते हुए भी मच्छर को इधर भागकर कुछ लोगों या जानवरों को तलाश कर उनके खून से अपनी पेट की ज्वाला को शांत करना पड़ता। रात दिन की भागदौड़ एक समय का इंतजार और किसी आदमी की तलाश उसकी जिंदगी का हिस्सा बन गई थी। लगातार इधर-उधर भटकते रहना और उसके पंखों की भिनभिनाहट के कारण होने वाली ध्वनि जिसे वह शुरू में अपना संगीत समझता वही उसकी मृत्यु का कारण बन जाती है।
ऐसा ही मतिभ्रम हम आम इंसानों को भी हो चुका है। लगातार आमजन भी इसी भ्रम जाल में खोए हुए हैं कि जो हम कर रहे हैं वह हमारे लिए बहुत अच्छा है। आज की युवा पीढ़ी भी इसी मतिभ्रम में खोई हुई है कि इस समय जो उसके पास है या जिसे वह पाना चाहता है, उसके लिए जो प्रयास कर रहा है वही उसके लिए अंतिम सत्य है, लेकिन वास्तविकता ठीक विपरीत उस मच्छर की तरह हैं, जो कभी भी उसे अपने जाल में फंसा कर उसकी जान ले सकती है। जिंदगी से खेलता यह युवा अपने आप को और किसी से कमतर मानने को तैयार नहीं, लेकिन यह हकीकत नहीं है। आजीविका के लिए प्रयास करना खुद को जिंदा रखने के लिए लगातार संघर्ष करना जिंदगी का हिस्सा है। जीवन में बहुत कम लोग ही इसे जान पाते हैं कि जिंदगी का यह हिस्सा कितना महत्वपूर्ण है और कितना कमतर।
हमेशा जिंदगी सफलता नहीं देती, लेकिन थोड़ी सी असफलता से निराश होकर जिंदगी को छोड़ भी तो नहीं सकते। इस सत्य को पहचानने में जिंदगी गुजर जाती है, लेकिन मच्छर की तरह मतिभ्रम में खोए हुए हम हमेशा अपने प्रयासों को अच्छा मानते हैं। यह प्रयास कितने अच्छे हैं, कितनी सफलता दिलाते हैं इसका कोई अंदाजा किसी को नहीं होता l मच्छर भी धीरे-धीरे यह समझ जाता है कि उसकी जो भिनभिनाहट है यही उसकी मृत्यु का कारण बनेगी फिर भी वह अपने पंखों को फड़फड़ाए बिना रह भी तो नहीं सकता। वह जब तक उड़ता रहता है तब तक अपनी जिंदगी को बचाए रखता है और जैसे ही कहीं फस जाता है उसकी जान चली जाती है। आदमी को भी यही समझना होगा कि वह जिन ख्वाबों में वह खोया हुआ है उनकी हकीकत उसकी जिंदगी से कहीं अलग है।  वह भी उस मच्छर की ही तरह है जिसके मरने पर किसी मच्छर को दुख नहीं होता किसी मच्छर को कोई आपत्ति नहीं होती। वह अपने पेट की ज्वाला को शांत करने के लिए फिर से उसी और भागता है जहां उसकी जान को खतरा बना हुआ रहता है।
                                                      -संजय भट्ट

कोई टिप्पणी नहीं:

एक टिप्पणी भेजें

Very nice

बजट के गजट की लपट

जब भी बजट बनता है, उसका लिखित प्रारूप होता है। इसके मौखिक और लिखित दो स्‍वरूप होते हैं। पहला मन-मन में बन जाता है, लेकिन दूसरा जब आता है तो ...