बुधवार, 15 मार्च 2023

जिन्‍दगी बन गए हो तुम

आजकल मोबाईल के बिना एक पल भी गुजरना थोड़ा मुश्किल हो गया है। हर काम में मोबाईल की जरूरत पड़ने लगी है। ऐसा लगने लगा है, जैसे इसके बिना जिन्‍दगी अधूरी है। अब कोई भी काम हो बिना मोबाईल की सहायता के नहीं होता है। स्‍मार्ट फोन आने से जैसे जीवन में क्रांति ही आ गई है। युवा पीढ़ी तो इतनी पंगु हो गई है कि बिना मोबाईल अपना कोई काम नहीं कर पाते। कुछ लोग कहते हैं मोबाईल जिन्‍दगी का हिस्‍सा है, लेकिन ऐसा लगता है कि मोबाईल ही जिन्‍दगी बन गए है।
मोबाईल बिना इंटरनेट के कुछ भी नहीं, आज आम आदमी के पास घर में आटा नहीं तो चल जाएगा, लेकिन मोबाईल में डाटा नहीं हो तो उसकी जिन्‍दगी खतम लगने लगती है। इंटरनेट आने के पहले ही बता दिया गया था कि यह इक्‍कीसवीं सदी की सबसे बड़ी क्रांति होगी और हुआ भी वही। यह रोजमर्रा के कामों में इतनी दखल देने लगा है, जितनी दखल किसी जमाने में भी पत्नियों ने नहीं दी होगी। पत्‍नी जिन्‍दगी का हिस्‍सा है और इंटरनेट वाला मोबाईल जिन्‍दगी। मोबाईल, इंटरनेट, सोशल मीडिया और मेल के जमाने में सब कुछ आसान और तेज तो हुआ है, लेकिन इतनी ही शिथिलता भी जिन्‍दगी में आ गई है। इस मोबाईल ने जितना जिन्‍दगी को आसान किया है उतना ही आलस्‍य को बढ़ावा दिया है।
सोशल मीडिया के इस दौर में कई दोस्‍त है, लेकिन वह दोस्‍ती नहीं कि घंटों एक दूसरे के आमने सामने बैठ कर गप्पियाते रहे और सुख दुख के समय हाजिर होकर खुशी और गमों को साथ-साथ निभाते रहे। जीने मरने की कसमें खाने वाले भी मुसीबत के समय में साथ नहीं देते हैं। मोहल्‍लों में त्‍यौहारों पर मस्‍ती और सम्‍मान की बहारों का दौर गुजर गया। अब मोबाईल आधारित सोशल मीडिया में संदेश को प्रमुखता दी जाने लगी है। हालांकि इसको लेकर कई तरह के चुटकुले भी चल पड़े हैं, लेकिन यह इतना ढीठ है कि इसे कोई फर्क नहीं पड़ता है। किसी के हाथ में मोबाईल नहीं हो तो उसकी बेइज्‍जती का एहसास वही समझ सकता है।
छोटी-से-छोटी सूचनाएं तलाशना हो तो याद नहीं रखते गुगल कर लेते हैं। घर के पड़ौस में क्‍या चल रहा है, किसी को पता नहीं, लेकिन जमाने में क्‍या चल रहा है यह सब जानने को उत्‍सुक रहते हैं। आलस्‍य का आलम तो यह हो गया है कि किचन से पत्‍नी कमरे बैठे पति को खाना खाने के लिए न तो बुलाने जाती है और न ही आवाज लगाती है, सिर्फ उसके मोबाईल पर घंटी कर देती है। यही आलम पतियों का भी हो गया है, ऑफिस जाते समय सामने रखे मौजे और टाई न मिले तो तलाशने की कोशिश नहीं करते उसके लिए भोजन तैयार करने में व्‍यस्‍त पत्‍नी को मोबाईल करता है। पहले किसी का नम्‍बर नाम और सामान्‍य ज्ञान की बातों को याद रखा जाता था, लेकिन अब सिर्फ सेव किया जाता है और उसे मोबाईल याद रखता है। घरों का आलम यह है कि दो भाई एक ही कमरे में बैठ कर अपने-अपने मोबाईल के सोशल मीडिया में व्‍यस्‍त रहते हैं।
याददाश्‍त तो इतनी कमजोर हो गई है कि शादी की सालगिरह और बेटे-बेटियों के जन्‍मदिन को मोबाईल में सेव कर रिमांडर में डाला जाता है। हर तरफ सिर्फ एक ही जलवा दिखाई देता है, मोबाईल और इंटरनेट इसके बिना जिन्‍दगी का वजूद खतम हो गया है। कभी अपनी प्रेयसी के लिए फिल्‍मों गाया गया गाना जिन्‍दगी बन बए तो तुम, अब प्रेयसी के लिए कम और मोबाईल के लिए परफेक्‍ट लगता है।
              संजय भट्ट

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Very nice

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