सोमवार, 6 फ़रवरी 2023

संदेह में ऋतुराज

 संजय भट्ट

सब कुछ बदलने का रिवाज सा चल रहा है, लेकिन ऋतुओं का बदलाव नहीं हो रहा है। वह अपने समय पर ही आ रही है। उनमें भी अब संदेह के बादल उभरने लगे हैं। हो सकता है कि आने वाले समय में इनमें भी कोई बदलाव आ जाए। सब कुछ तर्कों के सहारे चल रहा है। तर्कों में इतनी ताकत है कि वह विचारों को बदलने में पल भर भी देर नहीं करते। आज का विचार मान्‍यता और मनोदशा कल रहे ना रहे।
बसंत की ऋतु चल रही है और इसे ऋतुओं के राजा का दर्जा मिला हुआ है। पता नहीं कब किसने कैसे और किन परिस्थितियों के कारण ऋतुओं का राजा बता दिया गया। चूंकि बदलाव का दौर है तो इस ऋतुराज पर भी संदेह के बादल छाने लगे हैं, प्रजातंत्र के इस दौर में कब इससे यह तमगा छिन जाए नहीं कह सकते। इसके पीछे तर्क इतने मजबूत है कि यह स्‍वयं भी घबराहट का अनुभव करने लगा है। पहला तर्क तो यह है कि जब ऋतु स्‍त्रीलिंग शब्‍द है तो यह राजा बना ही कैसे इसे तो ऋतुओं की रानी कहा जाना चाहिए। वैसे कोई भी राजा बने सभी पर प्रजा को संदेह रहता ही है। अब वो जमाना बदलने लगा है तब जो किसी ने कह दिया मान लिया जाता था, लेकिन अब तो तर्क पर खरा नहीं उतरे तो उसे तुरन्‍त बदला जा सकता है। यही हाल ऋतुराज पर लागू होने लगा है। इसके ऋतुओं का राजा होने पर संदेह करने लगे हैं।
सबसे पहले लिंग की त्रुटि में उलझाया जा रहा है और इसके बाद की परेशानियां तो और भी बड़ी है। अब इसे राजा माने या रानी यह परेशानी तो है ही यह भी कहा जा रहा है कि यह पुरूषवादी मानसिकता का प्रतीक है। जब ऋतु स्‍त्रीलिंग शब्‍द तय हो चुका है तो इतने वर्षों से इसे राजा क्‍यों माना जा रहा है। यह सरासर स्त्रियों के अधिकार पर हमला है। इसे ऋतुओं की रानी कहा जाए। वह दिन दूर नहीं जब कोई महिला आयोग बकायदा नोटिफिकेशन जारी कर बसंत ऋतु को रानी का दर्जा दे दे या महिलावादी कोई साहित्‍यकार अपनी टीम बना कर इसके विरोध में खड़ी हो जाए और दबाव में सरकार को कहना पड़े कि यह ऋतुराज नहीं रहा। अब इसे ऋतुओं की रानी माना जाएगा।
राजा रानी का विवाद तो है ही, इसके ऊपर से कई तर्क और सामने आए हैं। इसमें कहा जा रहा है कि मौसम में बदलाव हो जाता है ठंड से गर्मी की ओर बढ़ने लगते हैं दिन बड़े हो जाते हैं और जल्‍दी सवेरा होने से जल्‍दी उठना पड़ता है। फिर बसंत की ऋतु आते ही ठंड और गर्मी का पता नहीं चलता। घर से स्‍वेटर पहन कर निकलो और काम पर पहॅुंचते-पहॅुचते गर्मी लगने लगती है। रात में कंबल रखो, रजाई रखो या चद्दर से ही काम चल जाएगा इसका भी अंदाजा नहीं लगता। ऋतु बदलते ही मौसम में बदलाव के साथ बीमारियों की दस्‍तक होने लगती है। जिसे पुरी ठंड में सर्दी खासी का असर नहीं हुआ हो वह इस मौसम में इसका शिकार हो जाता है। तर्क धारियों की बारिश यहीं समाप्‍त नहीं होती। उनका कहना है कि जैसे ही बसंत की ऋतु आती है हरियाली की चादर ओढ़े खड़े वृक्ष नग्‍नता धारण कर पूर्णत: गंजे हो जाते हैं। सूखे पत्‍तों की भरमार से सड़के पट जाती है और उनके घूमने फिरने में परेशानी आने लगती है। इन सूखे पत्‍तों से नालियां चॉक हो जाती है और चारों और गंदगी का आलम हो जाता है। ऐसे में बसंत को ऋतुओं का राजा कैसे कहा जा सकता है। राजा गंदगी का प्रतीक तो नहीं हो सकता है। फिर धूल के गुबार उड़ना शुरू हो जाते हैं दिन में अलसाया सा आलम हो जाता है। काम में मन नहीं लगता है। धूल सूखे पत्‍ते नग्‍न वृक्ष और हरियाली छिनने वाले को राजा कैसे माना जा सकता है।
पुराने जमाने में पता नहीं क्‍या सोंच कर इसे ऋतुराज बता दिया गया। इसके कोई लक्षण राजाओं वाले तो है नहीं। राजा तो सब का रक्षक होता है और उसके राज्‍य में चहॅूंओर खुशहाली होनी चाहिए। यदि यह सब नहीं है तो फिर राजा कैसे मान ले। इस बसंत के आते ही प्रजा बीमारियों से ग्रसित और प्रकृति पर सूखे की मार लगना शुरू हो जाती है तो राजा होने का क्‍या दायित्‍व यह निभाता है। राजा का धर्म कष्‍ट देना नहीं है और प्रजा अगर कष्‍ट अनुभव कर रही हो तो राजा को राजा रहने का कोई नैतिक अधिकार नहीं है। हो सकता है इसने अपने समय में किसी दादागिरी के कारण या मैनुपुलेटेड पद्धति से खुद को राजा बना लिया हो। यह प्रजातांत्रिक देश है और यहां ऋतुओं के राजा का भी चुनाव प्रजातांत्रित तरीके से होना चाहिए।

इतने सारे विरोधी तर्कों को सुनने के बाद से बसंत की नींद हराम है, डर लग रहा है कि यह तर्कवादी मिलकर कहीं इससे ऋतुराज का तमगा ही नहीं छिन ले। इस दौर में बच्‍चे भी पीछे नहीं है उनका भी तर्क ऋतुराज के खिलाफ में जा रहा है उनका कहना है कि सभी ऋतुओं में मौज मस्‍ती से स्‍कूल जाते हैं या स्‍कूल की छूट्टिया हो जाती है, लेकिन बसंत के आगमन से उनके सिर पर भी परीक्षा की तलवार लटकने लगती है और सभी तरफ से एक ही जोर होता है पढ़ाई करो। सारी मौज मस्‍ती छिन लेता है बसंत उनकी। अब या तो बसंत को अपनी नीतियों में बदलाव करना पड़ेगा या पद छोड़ना पड़ेगा। बस विकल्‍प की ही देर है कभी भी बसंत को ऋतुराज के पद से हाथ धोना पड़ सकता है, यह चर्चा सुनकर बसंत को गहरा सदमा लगा है। आने वाले दिनों में कोई और ऋतुओं की रानी इस ऋतुराज का ताज अपने सिर पर सजा लेगी।

              

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