शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023
मजबूरी का मंच
आजकल गतिविधियों की संख्या बढ़ गई है। विभिन्न स्थानों पर कई गतिविधियों का आयोजन हो रहा है। सभी में मंच का निर्माण और उस पर बैठने वाले अतिथियों को लेकर जद्दोजहद होने लगी है। हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी पद पर है और सामाजिक कार्यकर्ता का कहना ही क्या। फिर कार्यक्रम सामाजिक हो, राजनीतिक हो या सरकारी सभी को मंच पर बैठना है और सभी को अपना ज्ञान भी पेलना है, चाहे उस ज्ञान में कई सारी अज्ञानताओं का पीटारा क्यों न हो। जो समाज के बारे में नहीं जानते वे सामाजिक कार्यकर्ता है और राजनीति में दल का प्रत्येक सदस्य अपने आप को जनप्रतिनिधि समझता है। उन्हें यह भी पता नहीं है कि जनप्रतिनिधि वह होता है, जो चुन कर जनता का प्रतिनिधि बनता है। यह जनता का हक होता है कि वह किसे चुने और किसे रिजेक्ट कर दे, लेकिन रिजेक्ट हो चुका व्यक्ति भी किसी न किसी दल का प्रतिनिधित्व करता है और फिर कुछ नहीं तो सामाजिक कार्यकर्ता का तमगा या भूतपूर्व फलाने का पद तो उसके पास होता ही है।
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Very nice