शुक्रवार, 3 फ़रवरी 2023

मजबूरी का मंच

संजय भट्ट

आजकल गतिविधियों की संख्‍या बढ़ गई है। विभिन्‍न स्‍थानों पर कई गतिविधियों का आयोजन हो रहा है। सभी में मंच का निर्माण और उस पर बैठने वाले अतिथियों को लेकर जद्दोजहद होने लगी है। हर तीसरा व्‍यक्ति किसी न किसी पद पर है और सामाजिक कार्यकर्ता का कहना ही क्‍या। फिर कार्यक्रम सामाजिक हो, राजनीतिक हो या सरकारी सभी को मंच पर बैठना है और सभी को अपना ज्ञान भी पेलना है, चाहे उस ज्ञान में कई सारी अज्ञानताओं का पीटारा क्‍यों न हो। जो समाज के बारे में नहीं जानते वे सामाजिक कार्यकर्ता है और राजनीति में दल का प्रत्‍येक सदस्‍य अपने आप को जनप्रतिनिधि समझता है। उन्‍हें यह भी पता नहीं है कि जनप्रति‍निधि वह होता है, जो चुन कर जनता का प्रतिनिधि बनता है। यह जनता का हक होता है कि वह किसे चुने और किसे रिजेक्‍ट कर दे, लेकिन रिजेक्‍ट हो चुका व्‍यक्ति भी किसी न किसी दल का प्रतिनिधित्‍व करता है और फिर कुछ नहीं तो सामाजिक कार्यकर्ता का तमगा या भूतपूर्व फलाने का पद तो उसके पास होता ही है।
इस सब से मंच और मंचीय कार्यक्रम की गरिमा का चाहे नाश हो जाए, लेकिन उनको मंच और भाषण का मौका देना आवश्‍यक हो जाता है। यदि ऐसा नहीं किया जाता है तो आयोजक की खैर नहीं। ज्‍यादातर कार्यक्रम सरकारी होते हैं तथा सरकार की ओर से जनप्रति‍निधियों को उसमें शामिल करने के निर्देश भी दिए जाते हैं, लेकिन आयोजक की परेशानी है कि वह किसको जनप्रतिनिधि माने और किसे रिजेक्‍ट कर दे। जिसको भी मौका नहीं मिलता है वह दूसरे दिन चढ़ाई का मुड़ बना कर आयोजक को चमकाता है या अपने आका को इसकी सूचना देता है कि फलां कार्यक्रम में उसे तरजीह नहीं दी गई। आयोजक की यह परेशानी है कि वह किस-किस को मौका दे और किसे रिजेक्‍ट कर दे। कई कार्यक्रम तो सरकारी अधिकारियों की उपस्थ्‍िाति में करवाना बेहतर होता है।
दूसरी प्‍यास छपास की होती है, कार्यक्रम में उपस्थित है तो उनका नाम अगले दिन अखबार और न्‍युज चैनल पर आना चाहिए। क्‍या करें मजबूरी भी है यदि उनका नाम नहीं आएगा और उन्‍हें मंच नहीं मिलेगा तो उन्‍हें पहचानेगा कौन और उनकी छवि कैसे गढ़ी जाएगी। यह नहीं पता होता है कि इस छवि को चमकाने के चक्‍कर में वे अपना सम्‍मान उस आयोजक के सामने खो रहे हैं, जिसे न चाहते हुए भी मंच और मौका देना होता है। यहां भी वही परेशानी है, जिसके पास कोई काम नहीं है वह हर व्‍यक्ति अपना मौका देखता है और पिता की कमाई पर मुफ्त की मोटरसाईकिल दौड़ाने वालों का इसमें अलग ही रोल है। वह चाहता है कि उसे मौका मिल जाए और वह भय्या जी के पीछे अपना भी मौका तलाश लें। कुछ तो मान न मान मैं तेरा मेहमान बन कर आने से भी नहीं चूकते और कुछ बेगानी शादी में अब्‍द़ल्‍ला दिवाना बन कर घूमते हैं। कुछ को मजबूरी में उस गतिविधि में शामिल करना होता है, जिसमें दूर-दूर तक उसका कोई दखल न हो।
ऐसे में मंच की गरिमा समाप्‍त हो जाती है, पीछे खड़े होकर फोटो ही क्‍यों न आ जाए लोगों को दिखाने के लिए हो जाता है कि हम उस कार्यक्रम में मंच पर थे। पढ़ाई-लिखाई और कड़ी परीक्षाओं के बाद पद पर पहुँचे अधिकारी ऐसे माननीयों का सम्‍मान कर रहे होते हैं, जिनको न तो ज्ञान है और न ही उस विषय में कोई पारंगतता, लेकिन फिर से वही मजबूरी आ जाती है। इन सब प्रपोगेंडा के चलते मंच पर धकमपेल और माईक की छीना झपटी भी हो जाती है। कई बार तो कार्यक्रम अखाड़ा बन कर सामने आते हैं। मंच,मंच नहीं होकर मैदान बन जाते हैं और सारी विवादित स्थिति का सामना करना अकेले आयोजक को करना पड़ता है। ऐसी स्थिति में मंच अब मजबूरी के मंच बनकर रह गए हैं और आयोजक दबाव में उनको भी मंच देने लग गए हैं , जिनको मंच तो दूर सामने बैठने तक की योग्‍यता नहीं हो।
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Very nice

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