सोमवार, 20 फ़रवरी 2023

प्रक्रिया में उलझे काम

काम करने के सौ बहाने और नहीं करने का एक, लेकिन वह एक क्‍या है, जिससे सारे बनते काम बिगड़ जाते हैं। बहुत कोशिश के बाद पता चला कि वह एक काम है- प्रक्रिया। हमारे यहां सारे काम प्रक्रिया से ही पूर्ण होते हैं। कोई भी काम हो उसमें प्रक्रिया की उलझन हमेशा से रही है, लेकिन ये किसी को पता नहीं कि प्रक्रिया जितना काम सुधारती है, उससे कहीं अधिक काम को बिगाड़ देती है। प्रक्रिया में उलझ कर काम या तो समय सीमा में नहीं हो पाता है या उसको करने वाला परेशान हो जाता है। जब मामला ज्‍यादा उलझ जाता है और सभी प्रक्रिया में उलझ कर उल्‍टा सीधा कर बैठते हैं तो उस प्रक्रिया को बदल दिया जाता है। समय बीत जाता है लेकिन प्रक्रिया कभी पूर्ण नहीं होती। काम सामाजिक हो या सरकारी सारे प्रक्रिया के अधीन ही होते हैं।
मेरे दोस्‍त को एक लड़की पसन्‍द थी दोनों एक दूसरे को अच्‍छे से जानते थे, लेकिन विवाह अभी प्रक्रिया अधीन था। ऐसा नहीं है कि दोनों के माता-पिता इस विवाह को करना नहीं चाहते थे या दोनों को विवाह को लेकर कोई परेशानी थी, लेकिन विवाह सामाजिक और धार्मिक प्रक्रियाओं के अधीन उलझ रहा था। उमर बीतती चली जा रही थी, लेकिन प्रक्रिया है कि पूर्ण होने का नाम नहीं ले रही थी। लड़के को लड़की पसन्‍द थी और लड़की को लड़का लेकिन दोनों के मॉं-बाप चाहते थे कि एक बार परिवार के सदस्‍य घर-बार देख लें और सारी बातें बड़े बुजूर्गों के बीच तय हो जाए तो शादी का क्‍या है कर ही देंगे। इस सभी के बीच यह भूल रहे थे कि शादी लड़के-लड़की की करना है, घर की नहीं। फिर ऐसा भी नहीं कि लड़का अपने मॉं-बाप की सेवा में घर पर ही रह रहा हो। वह अपनी नौकरी के सिलसिले में दूसरे शहर में रहता है वहीं दोनों को रहना है, लेकिन फिर भी परिवार की स्‍वीकृति की घर-बार देखने की प्रक्रिया को पूर्ण होना जरूरी है, यह नहीं हो तो विवाह की क्‍या गारन्‍टी कि वह सही होगा। अब जब तक प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो विवाह अटका रहेगा। इस बीच दोनों को लगा कि प्रक्रिया में उलझ कर जिन्‍दगी को तबाह करने से अच्‍छा है कि विवाह कर लिया जाए। दोनों ने अपने दोस्‍तों को बुलवाया और रजिस्‍टर्ड मैरिज के साथ मंदिर में फेरे ले लिए। दोनों के माता-पिता को बात पता चली तो मसला गम्‍भीर हो गया। डपटते हुए कहा क्‍या हम तुम्‍हारे इस विवाह के खिलाफ तो थे नहीं बस कुछ सामाजिक प्रक्रियाएं हैं उनका ही पालन कर रहे थे। इतनी भी क्‍या जल्‍दी थी। अब देखो प्रक्रिया पूर्ण नहीं हुई तो समाज में सब लोग बाते बना रहे हैं, तुम्‍हारी बुआ और फुफाजी मुँह फूला कर घूम रहे हैं। समाज में थू-थू हो गई। सारी इज्‍जत का बेण्‍ड बज गया। इस मामले में सभी को इज्‍जत और प्रक्रिया की पड़ी थी, किसी को भी लड़के-लड़की की उम्र निकल जाने की फिक्र नहीं थी। खैर यह सामाजिक प्रक्रिया का मामला था जो निपट गया, लेकिन सरकारी प्रक्रिया पूर्ण नहीं हो तो खासी परेशानी आ जाती है।
सरकारी प्रक्रिया सामाजिक प्रक्रिया से भी खतरनाक है। सरकारी प्रक्रिया पूर्ण करते-करते आपके जूते घिस जाए या बचपन का काम बुढ़ापे तक नहीं हो किसी को चिन्‍ता नहीं बस प्रक्रिया के बगैर कोई काम नहीं होता। एक व्‍यक्ति लायसेंस बगैर वाहन चलाते हुए पकड़ा गया। पुलिस ने पूछा लायसेंस नहीं है तो वाहन क्‍यों चलाते हो। व्‍यक्ति सीधा-सरल था कहा साहब लायसेंस प्रक्रिया में है। अच्‍छा तो रसीद ही दिखा दो, व्‍यक्ति ने कहा वही तो नहीं है। फिर कौन सी प्रकिया में है। विस्‍तार से समझाया कि भटकने और भटकाने की प्रक्रिया में मामला उलझा हुआ है। लायसेंस बनाने के लिए एप्‍लाई किया तो आधार कार्ड मांगा, आधार कार्ड के लिए एप्‍लाई किया तो जन्‍म प्रमाण-पत्र की मांग की गई, जन्‍म प्रमाण-पत्र पैदा होने के समय बना नहीं था। वह जमाना ही ऐसा नहीं था कि जन्‍म प्रमाण-पत्र बने घर में जन्‍म हुआ तो क्‍या प्रमाण और क्‍या प्रमाण-पत्र। फिर कहीं से पता चला कि जन्‍म प्रमाण-पत्र अब भी बन सकता है, लेकिन जन्‍मतिथि का प्रमाण हो ऐसा कोई दस्‍तावेज प्रस्‍तुत करना पड़ेगा। वह दस्‍तावेज ही नहीं है तो क्‍या किया जा सकता है। ऐसे दस्‍तावेजों में उलझी हुई प्रक्रिया है। इसलिए प्रक्रिया अधीन मामला है। सरकारी काम के लिए जहां कहीं भी जाओ मामला प्रक्रिया अधीन ही र‍हता है। काम होता नहीं बस एक बोर्ड लगा कर घुमना पड़ता है, कार्य प्रगति पर है, प्रक्रिया पूर्ण होते ही काम पूर्ण हो जाएगा।

मकान बनवाना था। मकान पुश्‍तैनी था, लेकिन काफी पुराना और जर्जर हो गया था। उसे बनवाने के लिए धन तो था नहीं लोन की सलाह मिल गई। मकान के लोन के लिए एप्‍लाई किया, ये फोटो कॉपी वो फोटो कॉपी, यह प्रमाण-पत्र वह प्रमाण-पत्र सब इकट्ठा किए गए। सर्वे करने वाले सर्वे भी कर गए। सारी जानकारी ली गई, लेकिन फिर वही प्रक्रिया की परेशानी में मामला अटक जाता। अपनी नौकरी के आधे समय में किए गए लोन के एप्‍लाई का नतीजा रिटायरमेंट के बाद आया कि पुश्‍तैनी मकान पर लोन नहीं मिलता जब तक वह आपके नाम का नहीं हो। बार-बार तलाश करने पर एक ही जवाब मिलता आपका काम हो जाएगा, बस प्रक्रियाएं पूर्ण कर दीजिए। आखिर थक हारकर रिटायरमेंट की राशि से मकान ठीक करवाना पड़ा।
जिन्‍दगी खप गई तब कहीं जाकर एक छोटा सा सबक मिला कि काम करने के सौ तरीके लेकिन काम नहीं करने का एक तरीका और उस तरीके का एक छोटा सा नाम प्रक्रिया। भगवान से प्रार्थना करो कोई भी काम कभी प्रक्रिया में नहीं उलझे। नहीं तो यदि आप ईमानदारी का तमगा अपने सिर पर लेकर घूम रहे हो तो इस उलझन का को तोड़ कर भी बाहर नहीं आ सकते हो।
            -संजय भट्ट

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Very nice

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